मुंशी प्रेमचंद यांच्या हिंदी कथा - भाग एक : Fiction By Munshi Premchand - Part I

प्रेमचंद
कथा-क्रम
आत्माराम
दुर्गा का मंदिर
बड़ें घर की बेटी
पंच- परमेश्वर
शंखनाद
नाग पूजा
आत्माराम
वेदों-ग्राम
में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक
अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने
अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान
पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी। वह नित्य-प्रति एक बार
प्रात:काल अपने तोते का पिंजड़ा लिए कोई भजन गाता हुआ तालाब की ओर जाता था। उस
धँधले प्रकाश में उसका जर्जर शरीर, पोपला मुँह और झुकी हुई
कमर देखकर किसी अपरिचित मनुष्य को उसके पिशाच होने का भ्रम हो सकता था। ज्यों ही
लोगों के कानों में आवाज आती—‘सत्त
गुरुदत्त शिवदत्त दाता,’ लोग समझ जाते कि
भोर हो गयी।
महादेव
का पारिवारिक जीवन सूखमय न था। उसके तीन पुत्र थे, तीन बहुऍं थीं, दर्जनों नाती-पाते थे, लेकिन उसके बोझ को हल्का
करने-वाला कोई न था। लड़के कहते—‘तब
तक दादा जीते हैं, हम जीवन का आनंद भोग ले, फिर तो यह ढोल गले पड़ेगी
ही।’
बेचारे महादेव को कभी-कभी निराहार ही रहना पड़ता। भोजन के समय उसके घर में साम्यवाद
का ऐसा गगनभेदी निर्घोष होता कि वह भूखा
ही उठ आता, और नारियल का हुक्का पीता हुआ सो जाता। उनका व्यापसायिक जीवन और भी
आशांतिकारक था। यद्यपि वह अपने काम में निपुण था, उसकी खटाई
औरों से कहीं ज्यादा शुद्धिकारक और उसकी रासयनिक क्रियाऍं कहीं ज्यादा कष्टसाध्य थीं, तथापि उसे आये दिन शक्की और धैर्य-शून्य प्राणियों के अपशब्द सुनने पड़ते
थे, पर महादेव अविचिलित गाम्भीर्य से सिर झुकाये सब कुछ सुना
करता था। ज्यों ही यह कलह शांत होता, वह अपने तोते की ओर
देखकर पुकार उठता—‘सत्त
गुरुदत्त शिवदत्तदाता।’
इस मंत्र को जपते ही उसके चित्त को पूर्ण शांति प्राप्त हो जाती थी।
२
एक
दिन संयोगवश किसी लड़के ने पिंजड़े का द्वार खोल दिया। तोता उड़ गया। महादेव ने सिर
उठाकर जो पिंजड़े की ओर देखा, तो उसका कलेजा सन्न-से हो गया। तोता कहॉँ गया। उसने फिर पिंजड़े को देखा, तोता गायब था। महादेव घबड़ा कर उठा और इधर-उधर खपरैलों पर निगाह दौड़ाने
लगा। उसे संसार में कोई वस्तु अगर प्यारी थी, तो वह यही
तोता। लड़के-बालों, नाती-पोतों से उसका जी भर गया था। लड़को
की चुलबुल से उसके काम में विघ्न पड़ता था। बेटों से उसे प्रेम न था; इसलिए नहीं कि वे
निकम्मे थे;
बल्कि इसलिए कि उनके कारण वह अपने आनंददायी कुल्हड़ों की नियमित संख्या से वंचित
रह जाता था। पड़ोसियों से उसे चिढ़ थी, इसलिए कि वे
अँगीठी से आग निकाल ले जाते थे। इन समस्त विघ्न-बाधाओं से उसके लिए कोई पनाह थी, तो यही तोता था। इससे उसे किसी प्रकार का कष्ट न होता था। वह अब उस
अवस्था में था जब मनुष्य को शांति भोग के सिवा और कोई इच्छा नहीं रहती।
तोता
एक खपरैल पर बैठा था। महादेव ने पिंजरा उतार लिया और उसे दिखाकर कहने लगा—‘आ आ’ सत्त गुरुदत्त
शिवदाता।’
लेकिन गॉँव और घर के लड़के एकत्र हो कर चिल्लाने और तालियॉँ बजाने लगे। ऊपर से
कौओं ने कॉँव-कॉँव की रट लगायी? तोता उड़ा और गॉँव से बाहर निकल कर एक पेड़ पर जा बैठा।
महादेव खाली पिंजडा लिये उसके पीछे दौड़ा, सो दौड़ा।
लोगो को उसकी द्रुतिगामिता पर अचम्भा हो रहा था। मोह की इससे सुन्दर, इससे सजीव, इससे भावमय कल्पना नहीं की जा सकती।
दोपहर
हो गयी थी। किसान लोग खेतों से चले आ रहे थे। उन्हें विनोद का अच्छा अवसर मिला।
महादेव को चिढ़ाने में सभी को मजा आता था। किसी ने कंकड़ फेंके, किसी ने
तालियॉँ बजायीं। तोता फिर उड़ा और वहाँ से दूर आम के बाग में एक पेड़ की फुनगी पर
जा बैठा । महादेव फिर खाली पिंजड़ा लिये मेंढक की भॉँति उचकता चला। बाग में पहुँचा
तो पैर के तलुओं से आग निकल रही थी, सिर चक्कर खा रहा था। जब
जरा सावधान हुआ, तो फिर पिंजड़ा उठा कर कहने लगे—‘सत्त गुरुदत्त
शिवदत्त दाता’
तोता फुनगी से उतर कर नीचे की एक डाल पी आ बैठा, किन्तु महादेव की ओर सशंक
नेत्रों से ताक रहा था। महादेव ने समझा, डर रहा है। वह
पिंजड़े को छोड़ कर आप एक दूसरे पेड़ की आड़ में छिप गया। तोते ने चारों ओर गौर से
देखा, निश्शंक हो गया, अतरा और आ कर
पिंजड़े के ऊपर बैठ गया। महादेव का हृदय उछलने लगा। ‘सत्त गुरुदत्त शिवदत्त
दाता’
का मंत्र जपता हुआ धीरे-धीरे तोते के समीप आया और लपका कि तोते को पकड़ लें, किन्तु तोता
हाथ न आया, फिर पेड़ पर आ बैठा।
शाम
तक यही हाल रहा। तोता कभी इस डाल पर जाता, कभी उस डाल पर। कभी पिंजड़े पर आ बैठता, कभी
पिंजड़े के द्वार पर बैठे अपने दाना-पानी की प्यालियों को देखता, और फिर उड़ जाता। बुड्ढा अगर मूर्तिमान मोह था, तो
तोता मूर्तिमयी माया। यहॉँ तक कि शाम हो गयी। माया और मोह का यह संग्राम अंधकार
में विलीन हो गया।
३
रात हो गयी ! चारों ओर निबिड़
अंधकार छा गया। तोता न जाने पत्तों में कहॉँ छिपा बैठा था। महादेव जानता था कि रात
को तोता कही उड़कर नहीं जा सकता, और न पिंजड़े ही में आ सकता हैं, फिर भी वह उस जगह
से हिलने का नाम न लेता था। आज उसने दिन भर कुछ नहीं खाया। रात के भोजन का समय भी
निकल गया, पानी की बूँद भी उसके कंठ में न गयी, लेकिन उसे न भूख थी, न प्यास ! तोते के बिना उसे
अपना जीवन निस्सार, शुष्क और सूना जान पड़ता था। वह दिन-रात काम करता था; इसलिए कि यह उसकी अंत:प्रेरणा थी; जीवन के और काम
इसलिए करता था कि आदत थी। इन कामों मे उसे अपनी सजीवता का लेश-मात्र भी ज्ञान न
होता था। तोता ही वह वस्तु था, जो उसे चेतना की याद दिलाता था। उसका हाथ से जाना जीव का देह-त्याग करना
था।
महादेव
दिन-भर का भूख-प्यासा, थका-मॉँदा, रह-रह कर झपकियॉँ ले लेता था; किन्तु एक क्षण में
फिर चौंक कर ऑंखे खोल देता और उस विस्तृत अंधकार में उसकी आवाज सुनायी देती—‘सत्त गुरुदत्त
शिवदत्त दाता।’
आधी
रात गुजर गयी थी। सहसा वह कोई आहट पा कर चौका। देखा, एक दूसरे वृक्ष के नीचे एक
धुँधला दीपक जल रहा है, और कई आदमी बैंठे हुए आपस में कुछ
बातें कर रहे हैं। वे सब चिलम पी रहे थे। तमाखू की महक ने उसे अधीर कर दिया। उच्च
स्वर से बोला—‘सत्त
गुरुदत्त शिवदत्त दाता’
और उन आदमियों की ओर चिलम पीने चला गया;
किन्तु जिस प्रकार बंदूक की आवाज सुनते ही हिरन भाग जाते हैं उसी प्रकार उसे आते
देख सब-के-सब उठ कर भागे। कोई इधर गया, कोई उधर। महादेव चिल्लाने लगा—‘ठहरो-ठहरो !’ एकाएक उसे ध्यान आ
गया, ये सब चोर हैं। वह जारे से चिल्ला उठा—‘चोर-चोर, पकड़ो-पकड़ो
!’
चोरों ने पीछे फिर कर न देखा।
महादेव दीपक के पास गया, तो उसे एक
मलसा रखा हुआ मिला जो मोर्चे से काला हो रहा था। महादेव का हृदय उछलने लगा। उसने
कलसे मे हाथ डाला, तो मोहरें थीं। उसने एक मोहरे बाहर निकाली
और दीपक के उजाले में देखा। हॉँ मोहर थी। उसने तुरंत कलसा उठा लिया, और दीपक बुझा दिया और पेड़ के नीचे छिप कर बैठ रहा। साह से चोर बन गया।
उसे फिर शंका हुई, ऐसा न हो, चोर लौट आवें, और मुझे अकेला देख कर मोहरें छीन
लें। उसने कुछ मोहर कमर में बॉँधी, फिर एक सूखी लकड़ी से
जमीन की की मिटटी हटा कर कई गड्ढे बनाये, उन्हें माहरों से
भर कर मिटटी से ढँक दिया।
४
महादेव के अतर्नेत्रों के
सामने अब एक दूसरा जगत् था, चिंताओं और कल्पना से परिपूर्ण। यद्यपि अभी कोष के हाथ से निकल जाने का
भय था;
पर अभिलाषाओं ने अपना काम शुरु कर दिया। एक पक्का मकान बन गया, सराफे की एक
भारी दूकान खुल गयी, निज सम्बन्धियों से फिर नाता जुड़ गया, विलास की सामग्रियॉँ एकत्रित हो गयीं। तब तीर्थ-यात्रा करने चले, और वहॉँ से लौट कर बड़े समारोह से यज्ञ, ब्रह्मभोज
हुआ। इसके पश्चात एक शिवालय और कुऑं बन गया, एक बाग भी लग
गया और वह नित्यप्रति कथा-पुराण सुनने लगा। साधु-सन्तों का आदर-सत्कार होने लगा।
अकस्मात उसे ध्यान आया, कहीं चोर आ
जायँ , तो मैं भागूँगा क्यों-कर? उसने
परीक्षा करने के लिए कलसा उठाया। और दो सौ पग तक बेतहाशा भागा हुआ चला गया। जान
पड़ता था, उसके पैरो में पर लग गये हैं। चिंता शांत हो गयी।
इन्हीं कल्पनाओं में रात व्यतीत हो गयी। उषा का आगमन हुआ,
हवा जागी, चिड़ियॉँ गाने लगीं। सहसा महादेव के कानों में
आवाज आयी—
‘सत्त
गुरुदत्त शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लगा।’
यह बोल सदैव महादेव की
जिह्वा पर रहता था। दिन में सहस्रों ही बार ये शब्द उसके मुँह से निकलते थे, पर उनका
धार्मिक भाव कभी भी उसके अन्त:कारण को स्पर्श न करता था। जैसे किसी बाजे से राग
निकलता हैं, उसी प्रकार उसके मुँह से यह बोल निकलता था।
निरर्थक और प्रभाव-शून्य। तब उसका हृदय-रुपी वृक्ष पत्र-पल्लव विहीन था। यह निर्मल
वायु उसे गुंजरित न कर सकती थी;
पर अब उस वृक्ष में कोपलें और शाखाऍं निकल आयी थीं। इन वायु-प्रवाह से झूम उठा, गुंजित हो
गया।
अरुणोदय का समय था। प्रकृति
एक अनुरागमय प्रकाश में डूबी हुई थी। उसी समय तोता पैरों को जोड़े हुए ऊँची डाल से
उतरा, जैसे आकाश से कोई तारा टूटे और आ कर पिंजड़े में बैठ गया। महादेव
प्रफुल्लित हो कर दौड़ा और पिंजड़े को उठा कर बोला—आओ आत्माराम तुमने
कष्ट तो बहुत दिया, पर मेरा जीवन भी सफल कर दिया। अब तुम्हें चॉँदी के पिंजड़े में रखूंगा और
सोने से मढ़ दूँगा।’
उसके रोम-रोम के परमात्मा के गुणानुवाद की ध्वनि निकलने लगी। प्रभु तुम कितने
दयावान् हो !
यह तुम्हारा असीम वात्सल्य है, नहीं तो मुझ पापी, पतित प्राणी कब इस कृपा के योग्य
था !
इस पवित्र भावों से आत्मा विन्हल हो गयी ! वह अनुरक्त हो कर
कह उठा—
‘सत्त गुरुदत्त
शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लागा।’
उसने एक हाथ में पिंजड़ा
लटकाया, बगल में कलसा दबाया और घर चला।
५
महादेव घर पहुँचा, तो अभी कुछ
अँधेरा था। रास्ते में एक कुत्ते के सिवा और किसी से भेंट न हुई, और कुत्ते को मोहरों से विशेष प्रेम नहीं होता। उसने कलसे को एक नाद में
छिपा दिया, और कोयले से अच्छी तरह ढँक कर अपनी कोठरी में रख
आया। जब दिन निकल आया तो वह सीधे पुराहित के घर पहुँचा। पुरोहित पूजा पर बैठे सोच
रहे थे—कल
ही मुकदमें की पेशी हैं और अभी तक हाथ में कौड़ी भी नहीं—यजमानो में कोई सॉँस
भी लेता। इतने में महादेव ने पालागन की। पंड़ित जी ने मुँह फेर लिया। यह
अमंगलमूर्ति कहॉँ से आ पहुँची, मालमू नहीं, दाना भी मयस्सर होगा या नहीं। रुष्ट हो
कर पूछा—क्या
है जी, क्या कहते हो। जानते नहीं, हम इस समय पूजा पर रहते
हैं।
महादेव ने कहा—महाराज, आज मेरे
यहॉँ सत्यनाराण की कथा है।
पुरोहित जी विस्मित हो गये।
कानों पर विश्वास न हुआ। महादेव
के घर कथा का होना उतनी ही असाधारण घटना थी, जितनी अपने
घर से किसी भिखारी के लिए भीख निकालना। पूछा—आज क्या है?
महादेव
बोला—कुछ
नहीं, ऐसा इच्छा हुई कि आज भगवान की कथा सुन लूँ।
प्रभात ही से तैयारी होने
लगी। वेदों के निकटवर्ती गॉँवो में सूपारी फिरी। कथा के उपरांत भोज का भी नेवता
था। जो सुनता आश्चर्य करता आज रेत में दूब कैसे जमी।
संध्या
समय जब सब लोग जमा हो, और पंडित जी अपने सिंहासन पर विराजमान हुए, तो
महादेव खड़ा होकर उच्च स्वर में बोला—भाइयों
मेरी सारी उम्र छल-कपट में कट गयी। मैंने न जाने कितने आदमियों को दगा दी, कितने खरे
को खोटा किया;
पर अब भगवान ने मुझ पर दया की है, वह मेरे मुँह की कालिख को मिटाना चाहते हैं। मैं आप सब भाइयों से ललकार
कर कहता हूँ कि जिसका मेरे जिम्मे जो कुछ निकलता हो, जिसकी
जमा मैंने मार ली हो, जिसके चोखे माल का खोटा कर दिया हो, वह आकर अपनी एक-एक कौड़ी चुका ले, अगर कोई यहॉँ न आ
सका हो, तो आप लोग उससे जाकर कह दीजिए,
कल से एक महीने तक, जब जी चाहे, आये और
अपना हिसाब चुकता कर ले। गवाही-साखी का काम नहीं।
सब
लोग सन्नाटे में आ गये। कोई मार्मिक भाव से सिर हिला कर बोला—हम कहते न थे। किसी
ने अविश्वास से कहा—क्या
खा कर भरेगा, हजारों को टोटल हो जायगा।
एक
ठाकुर ने ठठोली की—और
जो लोग सुरधाम चले गये।
महादेव
ने उत्तर दिया—उसके
घर वाले तो होंगे।
किन्तु इस समय लोगों को
वसूली की इतनी इच्छा न थी, जितनी यह जानने की कि इसे इतना धन मिल कहॉँ से गया। किसी को महादेव के
पास आने का साहस न हुआ। देहात के आदमी थे, गड़े मुर्दे
उखाड़ना क्या जानें। फिर प्राय: लोगों को याद भी न था कि उन्हें महादेव से क्या
पाना हैं, और ऐसे पवित्र अवसर पर भूल-चूक हो जाने का भय उनका
मुँह बन्द किये हुए था। सबसे बड़ी बात यह थी कि महादेव की साधुता ने उन्हीं वशीभूत
कर लिया था।
अचानक
पुरोहित जी बोले—तुम्हें
याद हैं, मैंने एक कंठा बनाने के लिए सोना दिया था, तुमने कई
माशे तौल में उड़ा दिये थे।
महादेव—हॉँ, याद हैं, आपका कितना नुकसान हुआ होग।
पुरोहित—पचास रुपये से कम न
होगा।
महादेव ने कमर से दो मोहरें
निकालीं और पुरोहित जी के सामने रख दीं।
पुरोहितजी की लोलुपता पर टीकाऍं होने लगीं। यह
बेईमानी हैं, बहुत हो, तो दो-चार रुपये का नुकसान हुआ होगा।
बेचारे से पचास रुपये ऐंठ लिए। नारायण का भी डर नहीं। बनने को पंड़ित, पर नियत ऐसी खराब राम-राम !
लोगों
को महादेव पर एक श्रद्धा-सी हो गई। एक घंटा बीत गया पर उन सहस्रों मनुष्यों में से
एक भी खड़ा न हुआ। तब महादेव ने फिर कहॉँ—मालूम
होता है, आप लोग अपना-अपना हिसाब भूल गये हैं, इसलिए आज कथा
होने दीजिए। मैं एक महीने तक आपकी राह देखूँगा। इसके पीछे तीर्थ यात्रा करने चला
जाऊँगा। आप सब भाइयों से मेरी विनती है कि आप मेरा उद्धार करें।
एक
महीने तक महादेव लेनदारों की राह देखता रहा। रात को चोंरो के भय से नींद न आती। अब
वह कोई काम न करता। शराब का चसका भी छूटा। साधु-अभ्यागत जो द्वार पर आ जाते, उनका यथायोग्य
सत्कार करता। दूर-दूर उसका सुयश फैल गया। यहॉँ तक कि महीना पूरा हो गया और एक आदमी
भी हिसाब लेने न आया। अब महादेव को ज्ञान हुआ कि संसार में कितना धर्म, कितना सद्व्यवहार हैं। अब उसे मालूम हुआ कि संसार बुरों के लिए बुरा हैं
और अच्छे के लिए अच्छा।
६
इस घटना को हुए पचास वर्ष
बीत चुके हैं। आप वेदों जाइये, तो दूर ही से एक सुनहला कलस दिखायी देता है। वह ठाकुरद्वारे का कलस है।
उससे मिला हुआ एक पक्का तालाब हैं, जिसमें खूब कमल खिले रहते
हैं। उसकी मछलियॉँ कोई नहीं पकड़ता;
तालाब के किनारे एक विशाल समाधि है। यही आत्माराम का स्मृति-चिन्ह है, उसके
सम्बन्ध में विभिन्न किंवदंतियॉँ प्रचलित है। कोई कहता हैं, वह रत्नजटित पिंजड़ा
स्वर्ग को चला गया, कोई कहता, वह ‘सत्त गुरुदत्त’ कहता हुआ
अंतर्ध्यान हो गया, पर यर्थाथ यह हैं कि उस पक्षी-रुपी चंद्र को किसी बिल्ली-रुपी राहु ने
ग्रस लिया। लोग कहते हैं, आधी रात को अभी तक तालाब के किनारे
आवाज आती है—
‘सत्त गुरुदत्त
शिवदत्त दाता,
राम के चरण में चित्त लागा।’
महादेव के विषय में भी कितनी
ही जन-श्रुतियॉँ है। उनमें सबसे मान्य यह है कि आत्माराम के समाधिस्थ होने के बाद
वह कई संन्यासियों के साथ हिमालय चला गया, और वहॉँ से लौट कर न आया। उसका नाम आत्माराम प्रसिद्ध हो गया।
दुर्गा
का मन्दिर
बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने
में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नु रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई
खा ली।
ब्रजनाथ
ने क्रुद्घ हो कर भामा से कहा—तुम
इन दुष्टों को यहॉँ से हटाती हो कि नहीं? नहीं तो मैं एक-एक की खबर लेता हूँ।
भामा
चूल्हें में आग जला रही थी, बोली—अरे
तो अब क्या संध्या को भी पढ़तेही रहोगे? जरा दम तो ले लो।
ब्रज०--उठा
तो न जाएगा;
बैठी-बैठी वहीं से कानून बघारोगी !
अभी एक-आध को पटक दूंगा, तो वहीं से गरजती हुई आओगी कि हाय-हाय ! बच्चे को मार डाला !
भामा—तो मैं कुछ बैठी या
सोयी तो नहीं हूँ। जरा एक घड़ी तुम्हीं लड़को को बहलाओगे, तो क्या
होगा !
कुछ मैंने ही तो उनकी नौकरी नहीं लिखायी!
ब्रजनाथ
से कोई जवाब न देते बन पड़ा। क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग न पा कर और भी
प्रबल हो जाता है। यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों के ज्ञाता थे; पर उनके पालन में
इस समय कुशल न दिखायी दी। मुद्दई और मुद्दालेह, दोनों को एक ही लाठी हॉँका, और दोनों को रोते-चिल्लाते छोड़ कानून का ग्रंथ बगल में दबा कालेज-पार्क
की राह ली।
२
सावन का महीना था। आज कई दिन
के बाद बादल हटे थे। हरे-भरे वृक्ष सुनहरी चादर ओढ़े खड़े थे। मृदु समीर सावन का
राग गाता था, और बगुले डालियों पर बैठे हिंडोले झूल रहे थे। ब्रजनाथ एक बेंच पर आ बैठे
और किताब खोली। लेकिन इस ग्रंथ को अपेक्षा प्रकृति-ग्रंथ का अवलोकन अधिक
चित्ताकर्षक था। कभी आसमान को पढ़ते थे, कभी पत्तियों को, कभी छविमयी हरियाली को और कभी सामने मैदान में खेलते हुए लड़कों को।
एकाएक
उन्हें सामने घास पर कागज की एक पुड़िया दिखायी दी। माया ने जिज्ञासा की—आड़ में चलो, देखें इसमें
क्या है।
बुद्धि
ने कहा—तुमसे
मतलब? पड़ी रहने दो।
लेकिन जिज्ञासा-रुपी माया की
जीत हुई। ब्रजनाथ ने उठ कर पुड़िया उठा ली। कदाचित् किसी के पैसे पुड़िया में
लिपटे गिर पड़े हैं। खोल कर देखा;
सावरेन थे। गिना, पुरे आठ निकले। कुतूहल की सीमा न रही।
ब्रजनाथ
की छाती धड़कने लगी। आठों सावरेन हाथ में लिये सोचने लगे, इन्हें क्या
करुँ? अगर यहीं रख दूँ, तो न जाने
किसकी नजर पड़े;
न मालूम कौन उठा ले जाय !
नहीं यहॉँ रखना उचित नहीं। चलूँ थाने में इत्तला कर दूँ और ये सावरेन थानेदार को
सौंप दूँ। जिसके होंगे वह आप ले जायगा या अगर उसको न भी मिलें, तो मुझ पर
कोई दोष न रहेगा, मैं तो अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो
जाऊँगा।
माया
ने परदे की आड़ से मंत्र मारना शुरु किया। वह थाने नहीं गये, सोचा—चलूं भामा से एक
दिल्लगी करुँ। भोजन तैयार होगा। कल इतमीनान से थाने जाऊँगा।
भामा
ने सावरेन देखे, तो हृदय मे एक गुदगुदी-सी हुई। पूछा किसकी है?
ब्रज०--मेरी।
भामा—चलो, कहीं हो न !
ब्रज०—पड़ी मिली है।
भामा—झूठ बात। ऐसे ही
भाग्य के बली हो, तो सच बताओ कहॉँ मिली? किसकी है?
ब्रज०—सच कहता हूँ, पड़ी मिली
है।
भामा—मेरी कसम?
ब्रज०—तुम्हारी कसम।
भामा गिन्नयों को पति के हाथ
से छीनने की चेष्टा करने लगी।
ब्रजनाथ के कहा—क्यों छीनती हो?
भामा—लाओ, मैं अपने
पास रख लूँ।
ब्रज०—रहने दो, मैं इसकी
इत्तला करने थाने जाता हूँ।
भामा का मुख मलिन हो गया।
बोली—पड़े
हुए धन की क्या इत्तला?
ब्रज०—हॉँ, और क्या, इन आठ गिन्नियों के लिए ईमान बिगाडूँगा?
भामा—अच्छा
तो सवेरे चले जाना। इस समय जाओगे, तो आने में देर होगी।
ब्रजनाथ
ने भी सोचा, यही अच्छा। थानेवाले रात को तो कोई कारवाई करेंगे नहीं। जब अशर्फियों को
पड़ा रहना है, तब जेसे थाना वैसे मेरा घर।
गिन्नियॉँ
संदूक में रख दीं। खा-पी कर लेटे, तो भामा ने हँस कर कहा—आया
धन क्यों छोड़ते हो? लाओ, मैं अपने लिए एक गुलूबंद बनवा लूँ, बहुत दिनों से जी तरस रहा है।
माया ने इस समय हास्य का रुप
धारण किया।
ब्रजनाथ ने तिरस्कार करके
कहा—गुलूबंद
की लालसा में गले में फॉँसी लगाना चाहती हो क्या?
३
प्रात:काल ब्रजनाथ थाने के
लिए तैयार हूए। कानून का एक लेक्चर छूट जायेगा, कोई हरज नहीं। वह इलाहाबाद के
हाईकोर्ट में अनुवादक थे। नौकरी में उन्नति की आशा न देख कर साल भर से वकालत की
तैयारी में मग्न थे;
लेकिन अभी कपड़े पहन ही रहे थे कि उनके एक मित्र मुंशी गोरेवाला आ कर बैठ गये, ओर अपनी
पारिवारिक दुश्चिंताओं की विस्मृति की रामकहानी सुना कर अत्यंत विनीत भाव से बोले—भाई साहब, इस समय मैं
इन झंझटों मे ऐसा फँस गया हूँ कि बुद्धि कुछ काम नहीं करती। तुम बड़े आदमी हो। इस
समय कुछ सहायता करो। ज्यादा नहीं तीस रुपये दे दो। किसी न किसी तरह काम चला लूँगा, आज तीस तारीख है। कल शाम को तुम्हें रुपये मिल जायँगे।
ब्रजनाथ
बड़े आदमी तो न थे;
किन्तु बड़प्पन की हवा बॉँध रखी थी। यह मिथ्याभिमान उनके स्वभाव की एक दुर्बलता
थी। केवल अपने वैभव का प्रभाव डालने के लिए ही वह बहुधा मित्रों की छोटी-मोटी
आवश्यकताओं पर अपनी वास्तविक आवश्यकताओं को निछावर कर दिया करत थे, लेकिन भामा
को इस विषय में उनसे सहानुभूति न थी, इसलिए जब ब्रजनाथ पर इस
प्रकार का संकट आ पड़ता था, तब थोड़ी देर के लिए उनकी
पारिवारिक शांति अवश्य नष्ट हो जाती थी। उनमें इनकार करने या टालने की हिम्मत न
थी।
वह
सकुचाते हुए भामा के पास गये और बोले—तुम्हारे
पास तीस रुपये तो न होंगे? मुंशी गोरेलाल मॉँग रहे है।
भामा ने रुखाई से रहा—मेरे पास तो रुपये
नहीं।
ब्रज०—होंगे तो जरुर, बहाना करती
हो।
भामा—अच्छा, बहाना ही
सही।
ब्रज०—तो मैं उनसे क्या कह
दूँ !
भामा—कह दो घर में रुपये
नहीं हैं, तुमसे न कहते बने, तो मैं पर्दे की आड़ से कह दूँ।
ब्रज०--कहने को तो मैं कह
दूँ, लेकिन उन्हें विश्वास न आयेगा। समझेंगे, बहाना कर
रहे हैं।
भामा--समझेंगे; तो समझा करें।
ब्रज०—मुझसे ऐसी बमुरौवती
नहीं हो सकती। रात-दिन का साथ ठहरा, कैसे इनकार करुँ?
भामा—अच्छा, तो जो मन
में आवे, सो करो। मैं एक बार कह चुकी,
मेरे पास रुपये नहीं।
ब्रजनाथ मन में बहुत खिन्न
हुए। उन्हें विश्वास था कि भामा के पास रुपये है; लेकिन केवल मुझे लज्जित
करने के लिए इनकार कर रही है। दुराग्रह ने संकल्प को दृढ़ कर दिया। संदूक से दो
गिन्नियॉँ निकालीं और गोरेलाल को दे कर बोले—भाई, कल शाम को
कचहरी से आते ही रुपये दे जाना। ये एक आदमी की अमानत हैं,
मैं इसी समय देने जा रहा था --यदि कल
रुपये न पहुँचे तो मुझे बहुत लज्जित होना पड़ेगा; कहीं मुँह दिखाने
योग्य न रहूँगा।
गोरेलाल ने मन में कहा—अमानत स्त्री के
सिवा और किसकी होगी, और गिन्नियॉँ जेब मे रख कर घर की राह ली।
४
आज पहली तारीख की संध्या है।
ब्रजनाथ दरवाजे पर बैठे गोरेलाल का इंतजार कर रहे है।
पॉँच बज गये, गोरेलाल अभी
तक नहीं आये। ब्रजनाथ की ऑंखे रास्ते की तरफ लगी हुई थीं। हाथ में एक पत्र था; लेकिन पढ़ने में जी
नहीं लगता था। हर तीसरे मिनट रास्ते की ओर देखने लगते थे; लेकिन सोचते थे—आज वेतन मिलने का
दिन है। इसी कारण आने में देर हो रही है। आते ही होंगे। छ: बजे, गोरे लाल का
पता नहीं। कचहरी के कर्मचारी एक-एक करके चले आ रहे थे। ब्रजनाथ को कोई बार धोखा हुआ।
वह आ रहे हैं। जरुर वही हैं। वैसी ही अचनक है। वैसे ही टोपी है। चाल भी वही है।
हॉँ, वही हैं। इसी तरफ आ रहे हैं। अपने हृदय से एक बोझा-सा
उतरता मालूम हुआ; लेकिन
निकट आने पर ज्ञात हुआ कि कोई और है। आशा की कल्पित मूर्ति दुराशा में बदल गयी।
ब्रजनाथ
का चित्त खिन्न होने लगा। वह एक बार कुरसी से उठे। बरामदे की चौखट पर खडे हो, सड़क पर
दोनों तरफ निगाह दौड़ायी। कहीं पता नहीं। दो-तीन बार दूर से आते हुए इक्कों को देख
कर गोरेलाल का भ्रम हुआ। आकांक्षा की प्रबलता !
सात
बजे;
चिराग जल गये। सड़क पर अँधेरा छाने लगा। ब्रजनाथ सड़क पर उद्विग्न भाव से टहलने
लगे। इरादा हुआ, गोरेलाल के घर चलूँ, उधर कदम बढाये; लेकिन हृदय कॉँप
रहा था कि कहीं वह रास्ते में आते हुए न मिल जायँ, तो समझें कि थोड़े-से रुपयों के
लिए इतने व्याकुल हो गये। थोड़ी ही दूर गये कि किसी को आते देखा। भ्रम हुआ, गोरेलाल है, मुड़े और सीधे बरामदे में आकर दम लिया, लेकिन फिर वही धोखा !
फिर वही भ्रांति !
तब सोचले लगे कि इतनी देर क्यों हो रही हैं? क्या अभी तक वह कचहरी से न आये होंगे ! ऐसा कदापि नहीं हो
सकता। उनके दफ्तर-वाले मुद्दत हुई, निकल गये। बस दो बातें हो सकती हैं, या तो उन्होंने
कल आने का निश्चय कर लिया, समझे होंगे,
रात को कौन जाय, या जान-बूझ कर बैठे होंगे, देना न चाहते होंगे, उस समय उनको गरज थी, इस समय मुझे गरज है। मैं ही किसी को क्यों न भेज दूँ? लेकिन किसे भेजूँ? मुन्नू जा सकता है। सड़क ही पर
मकान है। यह सोच कर कमरे में गये, लैप जलाया और पत्र लिखने
बैठे, मगर ऑंखें द्वार ही की ओर लगी हुई थी। अकस्मात् किसी
के पैरों की आहट सुनाई दी। परन्तु पत्र को एक किताब के नीचे दबा लिया और बरामद में चले आये। देखा, पड़ोस का एक कुँजड़ा तार पढ़ाने आया है। उससे
बोले—भाई, इस समय
फुरसत नहीं हैं;
थोड़ी देर में आना। उसने कहा--बाबू जी, घर भर के आदमी घबराये हैं, जरा एक निगाह देख लीजिए।
निदान ब्रजनाथ ने झुँझला कर उसके हाथ से तार ले लिया, और
सरसरी नजर से देख कर बोले—कलकत्ते
से आया है। माल नहीं पहुँचा। कुँजड़े ने डरते-डरते कहा—बाबू जी, इतना और देख
लीजिए किसने भेजा है। इस पर ब्रजनाथ ने तार फेंक दिया और बोले--मुझे इस वक्त फुरसत
नहीं है।
आठ
बज गये। ब्रजनाथ को निराशा होने लगी—मुन्नू
इतनी रात बीते नहीं जा सकता। मन में निश्चय किया, आज ही जाना चाहिए, बला से बुरा मानेंगे। इसकी कहॉँ तक चिंता करुँ स्पष्ट कह दूँगा मेरे
रुपये दे दो। भलमानसी भलेमानसों से निभाई जा सकती है। ऐसे धूर्तो के साथ भलमनसी का
व्यवहार करना मूर्खता हैं अचकन पहनी;
घर में जाकर माया से कहा—जरा
एक काम से बाहर जाता हूँ, किवाड़े बन्द कर लो।
चलने
को तो चले;
लेकिन पग-पग पर रुकते जाते थे। गोरेलाल का घर दूर से दिखाई दिया; लैंप जल रहा था।
ठिठक गये और सोचने लगे चल कर क्या कहूँगा? कहीं उन्होंने जाते-जाते रपए निकाल कर दे दिये, और
देर के लिए क्षमा मॉँगी तो मुझे बड़ी झेंप होगी। वह मुझे क्षुद्र, ओछा, धैर्यहीन समझेंगे। नहीं,
रुपयों की आतचीत करूँ? कहूंगा—भाई घर में बड़ी देर
से पेट दर्द कर रहा है। तुम्हारे पास पुराना तेज सिरका तो नहीं है मगर नहीं, यह बहाना
कुछ भद्दा-सा प्रतीत होता है। साफ कलई खुल जायगी। ऊंह ! इस झंझट की जरुरत ही क्या
है। वह मुझे देखकर आप ही समझ जायेंगे। इस विषय में बातचीत की कुछ नौबत ही न आवेगी।
ब्रजनाथ इसी उधेड़बुन में आगे बढ़ते चले जाते थे जैसे नदी में लहरें चाहे किसी ओर
चलें, धारा अपना मार्ग नहीं छोड़ती।
गोरेलाल
का घर आ गया। द्वार बंद था। ब्रजनाथ को उन्हें पुकारने का साहस न हुआ, समझे खाना
खा रहे होंगे। दरवाजे के सामने से निकले, और धीरे-धीरे टहलते
हुए एक मील तक चले गए। नौ बजने की आवाज कान में आयी। गोरेलाल भोजन कर चुके होंगे, यह सोचकर लौट पड़े;
लेकिन द्वार पर पहुंचे तो, अंधेरा था। वह आशा-रूपी दीपक बुझ गया था। एक मिनट तक दुविधा में खड़े रहे।
क्या करूँ। अभी बहुत सबेरा है। इतनी जल्दी थोड़े ही सो गए होंगे? दबे पॉँव बरामदे पर चढ़े। द्वार पर कान लगा कर सुना, चारों ओर ताक रहे थे कि कहीं कोई देख न ले। कुछ बातचीत की भनक कान में
पड़ी। ध्यान से सुना। स्त्री कह रही थी-रुपये तो सब उठ रए,
ब्रजनाथ को कहॉँ से दोगे? गोरेलाल ने उत्तर दिया-ऐसी कौन सी
उतावली है, फिर दे देंगे। और दरख्वास्त दे दी है, कल मंजूर हो ही जायगी। तीन महीने के बाद लौटेंगे तब देखा जायगा।
ब्रजनाथ
को ऐसा जान पड़ा मानों मुँह पर किसी न तमाचा मार दिया।
क्रोध
और नैराश्य से भरे हुए बरामदे में उतर आए। घर चले तो सीधे कदम न पड़ते थे, जैसे कोई
दिन-भर का थका-मॉंदा पथिक हो।
५
ब्रजनाथ रात-भर करवटें बदलते
रहे। कभी गोरेलाल की धुर्तता पर क्रोध आता था, कभी अपनी सरलता पर; मालूम नहीं; किस गरीब के रुपये
हैं। उस पर क्या बीती होगी ! लेकिन अब क्रोध या खेद रो क्या लाभ? सोचने
लगे--रुपये कहॉँ से आवेंगे? भाभा पहले ही इनकार कर चुकी है, वेतन में इतनी गुंजाइश नहीं। दस-पॉँच रुपये की बात होती तो कतर ब्योंत
करता। तो क्या करू? किसी से उधार लूँ। मगर मुझे कौन देगा। आज
तक किसी से मॉँगने का संयोग नहीं पड़ा, और अपना कोई ऐसा मित्र
है भी नहीं। जो लोग हैं, मुझी को सताया करते हैं, मुझे क्या देंगे। हॉँ, यदि कुछ दिन कानून छोड़कर
अनुवाद करने में परिश्रम करूँ, तो रुपये मिल
सकते हैं। कम-से-कम एक मास
का कठिन परिश्रम है। सस्ते अनुवादकों के मारे दर भी तो गिर गयी है ! हा निर्दयी !
तूने बड़ी दगा की। न जाने किस जन्म का बैर चुकाया है। कहीं का न रखा !
दूसरे
दिन ब्रजनाथ को रुपयों की धुन सवार हुई। सबेरे कानून के लेक्चर में सम्मिलित होते, संध्या को
कचहरी से तजवीजों का पुलिंदा घर लाते और आधी रात बैठे अनुवाद किया करते। सिर उठाने
की मुहलत न मिलती ! कभी एक-दो भी बज जाते। जब मस्तिष्क बिलकुल शिथिल हो जाता तब
विवश होकर चारपाई पर पड़े रहते।
लेकिन
इतने परिश्रम का अभ्यास न होने के कारण कभी-कभी सिर में दर्द होने लगता। कभी
पाचन-क्रिया में विध्न पड़ जाता, कभी ज्वर चढ़ आता। तिस पर भी वह मशीन की तरह काम में लगे रहते। भाभा
कभी-कभी झुँझला कर कहती--अजी, लेट भी रहो; बड़े धर्मात्मा बने
हो। तुम्हारे जैसे दस-पॉँच आदमी और होते, तो संसार का काम ही बन्द हो जाता। ब्रजनाथ इस बाधाकारी व्यंग का उत्तर न
देते, दिन निकलते ही फिर वही चरखा ले बैठते।
यहॉँ
तक कि तीन सप्ताह बीत गये और पचीस रुपये हाथ आ गए। ब्रजनाथ सोचते थे--दो तीन दिन
में बेड़ा पार है;
लेकिन इक्कीसवें दिन उन्हें प्रचंड ज्वर चढ़ आया और तीन दिन तक न उतरा। छुट्टी
लेनी पड़ी, शय्यासेवी बन गए। भादों का महीना था। भाभा ने समझा,
पित्त का, प्रकोप है; लेकिन जब एक सप्ताह तक डाक्टर
की औषधि सेवन करने पर भी ज्वर न उतरा तब घबरायी। ब्रजनाथ प्राय: ज्वर में बक-झक भी
करने लगते। भाभा सुनकर डर के मारे कमरे में से भाग जाती। बच्चों को पकड़ कर दूसरे
कमरे में बन्द कर देती। अब उसे शंका होने लगती थी कि कहीं यह कष्ट उन्हीं रुपयों
के कारण तो नहीं भोगना पड़ रहा है ! कौन जाने, रुपयेवाले ने कुछ कर धर दिया हो
! जरूर यही बात है, नहीं तो औषधि से लाभ क्यों नहीं होता?
संकट
पड़ने पर हम धर्म-भीरु हो जाते हैं, औषधियों से निराश होकर देवताओं की शरण लेते हैं। भाभा ने भी देवताओं की
शरण ली। वह जन्माष्टमी, शिवरात्रि का कठिन व्रत शुरू किया।
आठ
दिन पूरे हो गए। अंतिम दिन आया। प्रभात का समय था। भाभा ने ब्रजनाथ को दवा पिलाई
और दोनों बालकों को लेकर दुर्गा जी की पूजा करने के लिए चली। उसका हृदय आराध्य
देवी के प्रति श्रद्धा से परिपूर्ण था। मन्दिर के ऑंगन में पहुँची। उपासक आसनों पर
बैठे हुए दुर्गापाठ कर रहे थे। धूप और अगर की सुगंध उड़ रही थी। उसने मन्दिर में
प्रवेश किया। सामने दुर्गा की विशाल प्रतिमा शोभायमान थी। उसके मुखारविंद पर एक
विलक्षण दीप्त झलक रही थी। बड़े-बड़े उज्जल नेत्रों से प्रभा की किरणें छिटक रही
थीं। पवित्रता का एक समॉँ-सा छाया हुआ था। भाभा इस दीप्तवर्ण मूर्ति के सम्मुख
साधी ऑंखों से ताक न सकी। उसके अन्त:करण में एक निर्मल, विशुद्ध
भाव-पूर्ण भय का उदय हो आया। उसने ऑंखें बन्द कर लीं। घुटनों के बल बैठ गयी, और हाथ जोड़ कर करुण स्वर से बोली—माता, मुझ पर दया
करो।
उसे
ऐसा ज्ञात हुआ, मानों देवी मुस्कराई। उसे उन दिव्य नेत्रों से एक ज्योति-सी निकल कर अपने
हृदय में आती हुई मालूम हुई। उसके कानों में देवी के मुँह से निकले ये शब्द सुनाई
दिए—पराया
धन लौटा दे, तेरा भला होगा।
भाभा
उठ बैठी। उसकी ऑंखों में निर्मल भक्ति का आभास झलक रहा था। मुखमंडल से पवित्र
प्रेम बरसा पड़ता था। देवी ने कदाचित् उसे अपनी प्रभा के रंग में डूबा दिया था।
इतने
में दूसरी एक स्त्री आई। उसके उज्जल केश बिखरे और मुरझाए हुए चेहरे के दोनों ओर
लटक रहे थे। शरीर पर केवल एक श्वेत साड़ी थी। हाथ में चूड़ियों के सिवा और कोई
आभूषण न था। शोक और नैराश्य
की साक्षात् मूर्ति मालूम होती थी। उसने भी देवी
के सामने सिर झुकाया और दोनों हाथों से ऑंचल फैला कर बोली—देवी, जिसने मेरा
धन लिया हो, उसका सर्वनाश करो।
जैसे
सितार मिजराब की चोट खा कर थरथरा उठता है, उसी प्रकार भाभा का हृदय अनिष्ट के भय से थरथरा उठा। ये शब्द तीव्र शर के
समान उसके कलेजे में चुभ गए। उसने देवी की ओर कातर नेत्रों से देखा। उनका
ज्योतिर्मय स्वरूप भयंकर था, नेत्रों से भीषण ज्वाला निकल
रही थी। भाभा के अन्त:करण में सर्वथा आकाश से, मंदिर के
सामने वाले वृक्षों से;
मंदिर के स्तंभों से, सिंहासन के ऊपर जलते हुए दीपक से और देवी के विकराल मुँह से ये शब्द
निकलकर गूँजने लगे--पराया धन लौटा दे, नहीं तो तेरा सर्वनाश
हो जायगा।
भाभा
खड़ी हो गई और उस वृद्धा से बोली-क्यों माता, तुम्हारा धन किसी ने ले लिया है?
वृद्धा
ने इस प्रकार उसकी ओर देखा, मानों डूबते को तिनके का सहारा मिला। बोली—हॉं बेटी !
भाभा--कितने
दिन हुए ?
वृद्धा--कोई
डेढ़ महीना।
भामा--कितने
रुपये थे?
वृद्धा--पूरे
एक सौ बीस।
भामा--कैसे
खोए?
वृद्धा--क्या
जाने कहीं गिर गए। मेरे स्वामी पलटन में नौकर थे। आज कई बरस हुए, वह परलोक
सिधारे। अब मुझे सरकार से आठ रुपए साल पेन्शन मिलती है। अक्की दो साल की पेन्शन एक
साथ ही मिली थी। खजाने से रुपए लेकर आ रही थी। मालूम नहीं,
कब और कहॉँ गिर पड़े। आठ गिन्नियॉँ थीं।
भामा--अगर
वे तुम्हें मिल जायँ तो क्या दोगी।
वृद्धा--अधिक
नहीं, उसमें से पचास रुपए दे दूँगी।
भामा
रुपये क्या होंगे, कोई उससे अच्छी चीज दो।
वृद्धा--बेटी
और क्या दूँ जब तक जीऊँगी, तुम्हारा यश गाऊँगी।
भामा--नहीं, इसकी मुझे
आवश्यकता नहीं !
वृद्धा--बेटी, इसके सिवा
मेरे पास क्या है?
भामा--मुझे
आर्शीवाद दो। मेरे पति बीमार हैं, वह अच्छे हो जायँ।
वृद्धा--क्या
उन्हीं को रुपये मिले हैं?
भामा--हॉँ, वह उसी दिन
से तुम्हें खोज रहे हैं।
वृद्धा
घुटनों के बल बैठ गई, और ऑंचल फैला कर कम्पित स्वर से बोली--देवी ! इनका कल्याण करो।
भामा ने फिर देवी की ओर सशंक
दृष्टि से देखा। उनके दिव्य रूप पर प्रेम का प्रकाश था। ऑंखों में दया की
आनंददायिनी झलक थी। उस समय भामा के अंत:करण में कहीं स्वर्गलोक से यह ध्वनि सुनाई
दी--जा तेरा कल्याण होगा।
संध्या
का समय है। भामा ब्रजनाथ के साथ इक्के पर बैठी तुलसी के घर, उसकी थाती
लौटाने जा रही है। ब्रजनाथ के बड़े परिश्रम की कमायी जो डाक्टर की भेंट हो चुकी है, लेकिन भामा ने एक पड़ोसी के हाथ अपने कानों के झुमके बेचकर रुपये जुटाए
हैं। जिस समय झुमके बनकर आये थे, भामा बहुत प्रसन्न हुई थी।
आज उन्हें बेचकर वह उससे भी अधिक प्रसन्न है।
जब ब्रजनाथ ने आठों
गिन्नियॉँ उसे दिखाई थीं, उसके हृदय में एक गुदगुदी-सी हुई
थी;
लेकिन यह हर्ष मुख पर आने का साहस न कर सका था। आज उन गिन्नियों को हाथ से जाते
समय उसका हार्दिक आनन्द ऑंखों में चमक रहा है, ओठों पर नाच रहा है, कपोलों को रंग रहा है, और अंगों पर किलोल कर रहा है; वह इंद्रियों का
आनंद था, यह आत्मा का आनंद है; वह आनंद लज्जा के
भीतर छिपा हुआ था, यह आनंद गर्व से बाहर निकला पड़ता है।
तुलसी
का आशीर्वाद सफल हुआ। आज पूरे तीन सप्ताह के बाद ब्रजनाथ तकिए के सहारे बैठे थे।
वह बार-बार भामा को प्रेम-पूर्ण नेत्रों से देखते थे। वह आज उन्हें देवी मालूम
होती थी। अब तक उन्होंने उसके बाह्य सौंदर्य की शोभ देखी थी, आज वह उसका
आत्मिक सौंदर्य देख रहे हैं।
तुलसी
का घर एक गली में था। इक्का सड़क पर जाकर
ठहर गया। ब्रजनाथ इक्के पर से उतरे, और अपनी छड़ी टेकते हुए भामा के हाथों के सहारे तुलसी के घर पहुँचे। तुलसी
ने रुपए लिए और दोनों हाथ फैला कर आशीर्वाद दिया--दुर्गा जी तुम्हारा कल्याण करें।
तुलसी
का वर्णहीन मुख वैसे ही खिल गया, जैसे वर्षा के पीछे वृक्षों की पत्तियॉँ खिल जाती हैं। सिमटा हुआ अंग फैल
गया, गालों की झुर्रियॉँ मिटती दीख पड़ीं। ऐसा मालूम होता थ, मानो उसका
कायाकलूप हो गया।
वहॉँ
से आकर ब्रजनाथ अपवने द्वार पर बैठे हुए थे कि गोरेलाल आ कर बैठ गए। ब्रजनाथ ने
मुँह फेर लिया।
गोरेलाल
बोले--भाई साहब ! कैसी तबियत है?
ब्रजनाथ--बहुत
अच्छी तरह हूँ।
गोरेलाल--मुझे क्षमा
कीजिएगा। मुझे इसका बहुत खेद है कि आपके रुपये देने में इतना विलम्ब हुआ। पहली
तारीख ही को घर से एक आवश्यक पत्र आ गया, और मैं किसी तरह तीन महीने की छुट्टी लेकर घर भागा। वहॉँ की विपत्ति-कथा
कहूँ, तो समाप्त न हो; लेकिन आपकी बीमारी की
शोक-समाचार सुन कर आज भागा चला आ रहा हूँ। ये लीजिये, रुपये हाजिर
हैं। इस विलम्ब के लिए अत्यंत लज्जित हूँ।
ब्रजनाथ
का क्रोध शांत हो गया। विनय में कितनी शक्ति है ! बोले-जी हॉँ, बीमार तो था; लेकिन अब अच्छा हो
गया हूँ, आपको मेरे कारण व्यर्थ कष्ट उठाना पड़ा। यदि इस समय आपको असुविधा हो, तो रुपये फिर दे दीजिएगा। मैं अब उऋण हो गया हूँ। कोई जल्दी नहीं है।
गोरेलाल
विदा हो गये, तो ब्रजनाथ रुपये लिये हुए भीतर आये और भामा से बोले--ये लो अपने रुपये; गोरेलाल दे गये।
भामा
ने कहा--ये मरे रुपये नहीं तुलसी के हैं;
एक बार पराया धन लेकर सीख गयी।
ब्रज०--लेकिन
तुलसी के पूरे रुपये तो दे दिये गये !
भामा--दे
दिये तो क्या हुआ? ये उसके आशीर्वाद की न्योछावर है।
ब्रज०-कान
के झुमके कहॉँ से आवेंगे?
भामा--झुमके
न रहेंगे, न सही;
सदा के लिए ‘कान’ तो हो गये।
बड़े घर की
बेटी
बेनीमाधव
सिंह गौरीपुर गॉँव के जमींदार और नम्बरदार थे। उनके पितामह किसी समय बड़े धन-धान्य
संपन्न थे। गॉँव का पक्का तालाब और मंदिर जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के
कीर्ति-स्तंभ थे। कहते हैं इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब
उसकी जगह एक बूढ़ी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के
सिवा और कुछ शेष न रहा था;
पर दूध शायद बहुत देती थी;
क्योंकि एक न एक आदमी हॉँड़ी लिए उसके सिर पर सवार ही रहता था। बेनीमाधव सिंह अपनी
आधी से अधिक संपत्ति वकीलों को भेंट कर चुके थे। उनकी वर्तमान आय एक हजार रुपये
वार्षिक से अधिक न थी। ठाकुर साहब के दो बेटे थे। बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था।
उसने बहुत दिनों के परिश्रम और उद्योग के बाद बी.ए. की डिग्री प्राप्त की थी। अब
एक दफ्तर में नौकर था। छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान
था। भरा हुआ मुखड़ा,चौड़ी छाती। भैंस का दो सेर ताजा दूध वह
उठ कर सबेरे पी जाता था। श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी। इन नेत्रप्रिय
गुणों को उन्होंने बी०ए०--इन्हीं दो अक्षरों पर न्योछावर कर दिया था। इन दो
अक्षरों ने उनके शरीर को निर्बल और चेहरे को कांतिहीन बना दिया था। इसी से वैद्यक
ग्रंथों पर उनका विशेष प्रेम था। आयुर्वेदिक औषधियों पर उनका अधिक विश्वास था।
शाम-सबेरे उनके कमरे से प्राय: खरल की सुरीली कर्णमधुर ध्वनि सुनायी दिया करती थी।
लाहौर और कलकत्ते के वैद्यों से बड़ी लिखा-पढ़ी रहती थी।
श्रीकंठ
इस अँगरेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी अँगरेजी सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी
न थे;
बल्कि वह बहुधा बड़े जोर से उसकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे। इसी से गॉँव में
उनका बड़ा सम्मान था। दशहरे के दिनों में वह बड़े उत्साह से रामलीला होते और स्वयं
किसी न किसी पात्र का पार्ट लेते थे। गौरीपुर में रामलीला के वही जन्मदाता थे।
प्राचीन हिंदू सभ्यता का गुणगान उनकी धार्मिकता का प्रधान अंग था। सम्मिलित
कुटुम्ब के तो वह एक-मात्र उपासक थे। आज-कल स्त्रियों को कुटुम्ब को कुटुम्ब में
मिल-जुल कर रहने की जो अरुचि होती है, उसे वह जाति और देश दोनों के लिए हानिकारक समझते थे। यही कारण था कि गॉँव
की ललनाऍं उनकी निंदक थीं ! कोई-कोई तो उन्हें अपना शत्रु समझने में भी संकोच न
करती थीं ! स्वयं उनकी पत्नी को ही इस
विषय में उनसे विरोध था। यह इसलिए नहीं कि उसे अपने सास-ससुर, देवर या जेठ आदि घृणा थी;
बल्कि उसका विचार था कि यदि बहुत कुछ सहने और तरह देने पर भी परिवार के साथ
निर्वाह न हो सके, तो आये-दिन की कलह से जीवन को नष्ट करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी
खिचड़ी अलग पकायी जाय।
आनंदी
एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी। उसके बाप एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे।
विशाल भवन, एक हाथी, तीन कुत्ते, बाज, बहरी-शिकरे, झाड़-फानूस,
आनरेरी मजिस्ट्रेट और ऋण, जो एक प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार के
भोग्य पदार्थ हैं, सभी यहॉँ विद्यमान थे। नाम था भूपसिंह।
बड़े उदार-चित्त और प्रतिभाशाली पुरुष थे; पर दुर्भाग्य से
लड़का एक भी न था। सात लड़कियॉँ हुईं और दैवयोग से सब की सब जीवित रहीं। पहली उमंग
में तो उन्होंने तीन ब्याह दिल खोलकर किये;
पर पंद्रह-बीस हजार रुपयों का कर्ज सिर पर हो गया, तो ऑंखें खुलीं, हाथ समेट लिया। आनंदी चौथी लड़की थी। वह अपनी सब बहनों से अधिक रूपवती और
गुणवती थी। इससे ठाकुर भूपसिंह उसे बहुत प्यार करते थे। सुन्दर संतान को कदाचित्
उसके माता-पिता भी अधिक चाहते हैं। ठाकुर साहब बड़े धर्म-संकट में थे कि इसका
विवाह कहॉँ करें? न तो यही चाहते थे कि ऋण का बोझ बढ़े और न
यही स्वीकार था कि उसे अपने को भाग्यहीन समझना पड़े। एक
दिन श्रीकंठ उनके पास किसी चंदे का रुपया मॉँगने
आये। शायद नागरी-प्रचार का चंदा था। भूपसिंह उनके स्वभाव पर रीझ गये और धूमधाम से
श्रीकंठसिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया।
आनंदी
अपने नये घर में आयी, तो यहॉँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा। जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत
पड़ी हुई थी, वह यहां नाम-मात्र को भी न थी। हाथी-घोड़ों का
तो कहना ही क्या, कोई सजी हुई सुंदर बहली तक न थी। रेशमी
स्लीपर साथ लायी थी;
पर यहॉँ बाग कहॉँ। मकान में खिड़कियॉँ तक न थीं, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें। यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थी का मकान था; किन्तु आनंदी ने
थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानों उसने
विलास के सामान कभी देखे ही न थे।
२
एक
दिन दोपहर के समय लालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला--जल्दी
से पका दो, मुझे भूख लगी है। आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी। अब वह नया
व्यंजन बनाने बैठी। हांड़ी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक न
था। बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाने। उसने सब घी मांस में
डाल दिया। लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी न था, बोला-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?
आनंदी
ने कहा--घी सब मॉँस में पड़ गया। लालबिहारी जोर से बोला--अभी परसों घी आया है।
इतना जल्द उठ गया?
आनंदी
ने उत्तर दिया--आज तो कुल पाव--भर रहा होगा। वह सब मैंने मांस में डाल दिया।
जिस
तरह सूखी लकड़ी जल्दी से जल उठती है, उसी तरह क्षुधा से बावला मनुष्य जरा-जरा सी बात पर तिनक जाता है।
लालबिहारी को भावज की यह ढिठाई बहुत बुरी मालूम हुई, तिनक कर
बोला--मैके में तो चाहे घी की नदी बहती हो !
स्त्री
गालियॉँ सह लेती हैं, मार भी सह लेती हैं;
पर मैके की निंदा उनसे नहीं सही जाती। आनंदी मुँह फेर कर बोली--हाथी मरा भी, तो नौ लाख
का। वहॉँ इतना घी नित्य नाई-कहार खा जाते हैं।
लालबिहारी
जल गया, थाली उठाकर पलट दी, और बोला--जी चाहता है, जीभ पकड़ कर खींच लूँ।
आनंद
को भी क्रोध आ गया। मुँह लाल हो गया, बोली--वह होते तो आज इसका मजा चखाते।
अब
अपढ़, उजड्ड ठाकुर से न रहा गया। उसकी स्त्री एक साधारण जमींदार की बेटी थी। जब
जी चाहता, उस पर हाथ साफ कर लिया करता था। खड़ाऊँ उठाकर
आनंदी की ओर जोर से फेंकी, और बोला--जिसके गुमान पर भूली हुई
हो, उसे भी देखूँगा और तुम्हें भी।
आनंदी
ने हाथ से खड़ाऊँ रोकी, सिर बच गया;
पर अँगली में बड़ी चोट आयी। क्रोध के मारे हवा से हिलते पत्ते की भॉँति कॉँपती हुई
अपने कमरे में आ कर खड़ी हो गयी। स्त्री का बल और साहस, मान और
मर्यादा पति तक है। उसे अपने पति के ही बल और पुरुषत्व का घमंड होता है। आनंदी खून
का घूँट पी कर रह गयी।
३
श्रीकंठ
सिंह शनिवार को घर आया करते थे। वृहस्पति को यह घटना हुई थी। दो दिन तक आनंदी
कोप-भवन में रही। न कुछ खाया न पिया, उनकी बाट देखती रही। अंत में शनिवार को वह नियमानुकूल संध्या समय घर आये
और बाहर बैठ कर कुछ इधर-उधर की बातें, कुछ देश-काल संबंधी
समाचार तथा कुछ नये मुकदमों आदि की चर्चा करने लगे। यह वार्तालाप दस बजे रात तक
होता रहा। गॉँव के भद्र पुरुषों को इन बातों में ऐसा आनंद मिलता था कि खाने-पीने
की भी सुधि न रहती थी। श्रीकंठ को पिंड छुड़ाना मुश्किल हो जाता
था। ये दो-तीन घंटे आनंदी ने बड़े कष्ट से काटे
! किसी तरह भोजन का समय आया। पंचायत उठी। एकांत हुआ, तो लालबिहारी ने कहा--भैया, आप जरा भाभी को समझा दीजिएगा कि मुँह सँभाल कर बातचीत किया करें, नहीं तो एक दिन अनर्थ हो जायगा।
बेनीमाधव
सिंह ने बेटे की ओर साक्षी दी--हॉँ, बहू-बेटियों का यह स्वभाव अच्छा नहीं कि मर्दों के मूँह लगें।
लालबिहारी--वह
बड़े घर की बेटी हैं, तो हम भी कोई कुर्मी-कहार नहीं है। श्रीकंठ ने चिंतित स्वर से पूछा--आखिर
बात क्या हुई?
लालबिहारी
ने कहा--कुछ भी नहीं;
यों ही आप ही आप उलझ पड़ीं। मैके के सामने हम लोगों को कुछ समझती ही नहीं।
श्रीकंठ
खा-पीकर आनंदी के पास गये। वह भरी बैठी थी। यह हजरत भी कुछ तीखे थे। आनंदी ने
पूछा--चित्त तो प्रसन्न है।
श्रीकंठ
बोले--बहुत प्रसन्न है;
पर तुमने आजकल घर में यह क्या उपद्रव मचा रखा है?
आनंदी
की त्योरियों पर बल पड़ गये, झुँझलाहट के मारे बदन में ज्वाला-सी दहक उठी। बोली--जिसने तुमसे यह आग
लगायी है, उसे पाऊँ, मुँह झुलस दूँ।
श्रीकंठ--इतनी
गरम क्यों होती हो, बात तो कहो।
आनंदी--क्या
कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है ! नहीं तो गँवार छोकरा,
जिसको चपरासगिरी करने का भी शऊर नहीं, मुझे खड़ाऊँ से मार कर
यों न अकड़ता।
श्रीकंठ--सब हाल साफ-साफ कहा, तो मालूम
हो। मुझे तो कुछ पता नहीं।
आनंदी--परसों
तुम्हारे लाड़ले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। घी हॉँडी में पाव-भर से अधिक न
था। वह सब मैंने मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा--दल में घी क्यों
नहीं है? बस, इसी पर मेरे मैके को बुरा-भला कहने लगा--मुझसे
न रहा गया। मैंने कहा कि वहॉँ इतना घी तो नाई-कहार खा जाते हैं, और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस इतनी सी बात पर इस अन्यायी ने मुझ पर
खड़ाऊँ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक लूँ, तो सिर फट जाय। उसी
से पूछो, मैंने जो कुछ कहा है, वह सच
है या झूठ।
श्रीकंठ
की ऑंखें लाल हो गयीं। बोले--यहॉँ तक हो गया, इस छोकरे का यह साहस ! आनंदी
स्त्रियों के स्वभावानुसार रोने लगी;
क्योंकि ऑंसू उनकी पलकों पर रहते हैं। श्रीकंठ बड़े धैर्यवान् और शांति पुरुष थे।
उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था;
स्त्रियों के ऑंसू पुरुष की क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते हैं। रात भर
करवटें बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण पलक तक नहीं झपकी। प्रात:काल अपने बाप के
पास जाकर बोले--दादा, अब इस घर में मेरा निबाह न होगा।
इस
तरह की विद्रोह-पूर्ण बातें कहने पर श्रीकंठ ने कितनी ही बार अपने कई मित्रों को
आड़े हाथों लिया था;
परन्तु दुर्भाग्य, आज उन्हें स्वयं वे ही बातें अपने मुँह से कहनी पड़ी ! दूसरों को उपदेश
देना भी कितना सहज है!
बेनीमाधव
सिंह घबरा उठे और बोले--क्यों?
श्रीकंठ--इसलिए
कि मुझे भी अपनी मान--प्रतिष्ठा का कुछ विचार है। आपके घर में अब अन्याय और हठ का
प्रकोप हो रहा है। जिनको बड़ों का आदर--सम्मान करना चाहिए, वे उनके सिर
चढ़ते हैं। मैं दूसरे का नौकर ठहरा घर पर रहता नहीं। यहॉँ मेरे पीछे स्त्रियों पर
खड़ाऊँ और जूतों की बौछारें होती हैं। कड़ी बात तक
चिन्ता नहीं। कोई एक की दो कह ले, वहॉँ तक मैं
सह सकता हूँ किन्तु यह कदापि नहीं हो सकता कि मेरे ऊपर लात-घूँसे पड़ें और मैं दम
न मारुँ।
बेनीमाधव सिंह कुछ जवाब न दे
सके। श्रीकंठ सदैव उनका आदर करते थे। उनके ऐसे तेवर देखकर बूढ़ा ठाकुर अवाक् रह
गया। केवल इतना ही बोला--बेटा, तुम बुद्धिमान होकर ऐसी बातें करते हो? स्त्रियॉं इस
तरह घर का नाश कर देती है। उनको बहुत सिर चढ़ाना अच्छा नहीं।
श्रीकंठ--इतना मैं जानता हूँ, आपके
आशीर्वाद से ऐसा मूर्ख नहीं हूँ। आप स्वयं जानते हैं कि मेरे ही समझाने-बुझाने से, इसी गॉँव में कई घर सँभल गये, पर जिस स्त्री की
मान-प्रतिष्ठा का ईश्वर के दरबार में उत्तरदाता हूँ, उसके
प्रति ऐसा घोर अन्याय और पशुवत् व्यवहार मुझे असह्य है। आप सच मानिए, मेरे लिए यही कुछ कम नहीं है कि लालबिहारी को कुछ दंड नहीं होता।
अब बेनीमाधव सिंह भी गरमाये।
ऐसी बातें और न सुन सके। बोले--लालबिहारी तुम्हारा भाई है। उससे जब कभी भूल--चूक
हो, उसके कान पकड़ो लेकिन.
श्रीकंठ—लालबिहारी को मैं अब
अपना भाई नहीं समझता।
बेनीमाधव सिंह--स्त्री के
पीछे?
श्रीकंठ—जी नहीं, उसकी
क्रूरता और अविवेक के कारण।
दोनों कुछ देर चुप रहे।
ठाकुर साहब लड़के का क्रोध शांत करना चाहते थे, लेकिन यह नहीं स्वीकार करना
चाहते थे कि लालबिहारी ने कोई अनुचित काम किया है। इसी बीच में गॉँव के और कई
सज्जन हुक्के-चिलम के बहाने वहॉँ आ बैठे। कई स्त्रियों ने जब यह सुना कि श्रीकंठ
पत्नी के पीछे पिता से लड़ने की तैयार हैं, तो उन्हें बड़ा
हर्ष हुआ। दोनों पक्षों की मधुर वाणियॉँ सुनने के लिए उनकी आत्माऍं तिलमिलाने
लगीं। गॉँव में कुछ ऐसे कुटिल मनुष्य भी थे, जो इस कुल की
नीतिपूर्ण गति पर मन ही मन जलते थे। वे कहा करते थे—श्रीकंठ अपने बाप से
दबता है, इसीलिए वह दब्बू है। उसने विद्या पढ़ी, इसलिए वह
किताबों का कीड़ा है। बेनीमाधव सिंह उसकी सलाह के बिना कोई काम नहीं करते, यह उनकी मूर्खता है। इन महानुभावों की शुभकामनाऍं आज पूरी होती दिखायी
दीं। कोई हुक्का पीने के बहाने और कोई लगान की रसीद दिखाने आ कर बैठ गया। बेनीमाधव
सिंह पुराने आदमी थे। इन भावों को ताड़ गये। उन्होंने निश्चय किया चाहे कुछ ही
क्यों न हो, इन द्रोहियों को ताली बजाने का अवसर न दूँगा।
तुरंत कोमल शब्दों में बोले--बेटा, मैं तुमसे बाहर नहीं हूँ।
तम्हारा जो जी चाहे करो, अब तो लड़के से अपराध हो गया।
इलाहाबाद का अनुभव-रहित
झल्लाया हुआ ग्रेजुएट इस बात को न समझ सका। उसे डिबेटिंग-क्लब में अपनी बात पर
अड़ने की आदत थी, इन हथकंडों की उसे क्या खबर? बाप ने जिस मतलब से
बात पलटी थी, वह उसकी समझ में न आया। बोला—लालबिहारी के साथ अब
इस घर में नहीं रह सकता।
बेनीमाधव—बेटा, बुद्धिमान
लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो कुछ भूल हुई, उसे तुम बड़े होकर क्षमा करो।
श्रीकंठ—उसकी इस दुष्टता को
मैं कदापि नहीं सह सकता। या तो वही घर में रहेगा, या मैं ही। आपको यदि वह अधिक
प्यारा है, तो मुझे विदा कीजिए, मैं
अपना भार आप सॅंभाल लूँगा। यदि मुझे रखना चाहते हैं तो उससे कहिए, जहॉँ चाहे चला जाय। बस यह मेरा अंतिम निश्चय है।
लालबिहारी
सिंह दरवाजे की चौखट पर चुपचाप खड़ा बड़े भाई की बातें सुन रहा था। वह उनका बहुत
आदर करता था। उसे कभी इतना साहस न हुआ था कि श्रीकंठ के सामने चारपाई पर बैठ जाय, हुक्का पी
ले या पान खा ले। बाप का भी वह इतना मान न करता था। श्रीकंठ का भी उस पर हार्दिक
स्नेह था। अपने
होश में उन्होंने कभी उसे घुड़का तक न था। जब वह
इलाहाबाद से आते, तो उसके लिए कोई न कोई वस्तु अवश्य लाते। मुगदर की जोड़ी उन्होंने ही
बनवा दी थी। पिछले साल जब उसने अपने से ड्यौढ़े जवान को नागपंचमी के दिन दंगल में
पछाड़ दिया, तो उन्होंने पुलकित होकर अखाड़े में ही जा कर
उसे गले लगा लिया था, पॉँच रुपये के पैसे लुटाये थे। ऐसे भाई
के मुँह से आज ऐसी हृदय-विदारक बात सुनकर लालबिहारी को बड़ी ग्लानि हुई। वह
फूट-फूट कर रोने लगा। इसमें संदेह नहीं कि अपने किये पर पछता रहा था। भाई के आने
से एक दिन पहले से उसकी छाती धड़कती थी कि देखूँ भैया क्या कहते हैं। मैं उनके
सम्मुख कैसे जाऊँगा, उनसे कैसे बोलूँगा, मेरी ऑंखें उनके सामने कैसे उठेगी। उसने समझा था कि भैया मुझे बुलाकर
समझा देंगे। इस आशा के विपरीत आज उसने उन्हें निर्दयता की मूर्ति बने हुए पाया। वह
मूर्ख था। परंतु उसका मन कहता था कि भैया मेरे साथ अन्याय कर रहे हैं। यदि श्रीकंठ
उसे अकेले में बुलाकर दो-चार बातें कह देते; इतना ही नहीं दो-चार तमाचे
भी लगा देते तो कदाचित् उसे इतना दु:ख न होता; पर भाई का यह कहना कि अब
मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता, लालबिहारी से सहा न गया ! वह रोता हुआ घर आया। कोठारी में जा कर कपड़े
पहने, ऑंखें पोंछी, जिसमें कोई यह न
समझे कि रोता था। तब आनंदी के द्वार पर आकर बोला—भाभी, भैया ने
निश्चय किया है कि वह मेरे साथ इस घर में न रहेंगे। अब वह मेरा मुँह नहीं देखना
चाहते;
इसलिए अब मैं जाता हूँ। उन्हें फिर मुँह न दिखाऊँगा ! मुझसे जो कुछ अपराध हुआ, उसे क्षमा
करना।
यह
कहते-कहते लालबिहारी का गला भर आया।
४
जिस
समय लालबिहारी सिंह सिर झुकाये आनंदी के द्वार पर खड़ था, उसी समय
श्रीकंठ सिंह भी ऑंखें लाल किये बाहर से आये। भाई को खड़ा देखा, तो घृणा से ऑंखें फेर लीं, और कतरा कर निकल गये।
मानों उसकी परछाही से दूर भागते हों।
आनंदी ने लालबिहारी की
शिकायत तो की थी, लेकिन अब मन में पछता रही थी वह स्वभाव से ही दयावती थी। उसे इसका तनिक
भी ध्यान न था कि बात इतनी बढ़ जायगी। वह मन में अपने पति पर झुँझला रही थी कि यह
इतने गरम क्यों होते हैं। उस पर यह भय भी लगा हुआ था कि कहीं मुझसे इलाहाबाद चलने
को कहें, तो कैसे क्या करुँगी। इस बीच में जब उसने लालबिहारी
को दरवाजे पर खड़े यह कहते सुना कि अब मैं जाता हूँ, मुझसे
जो कुछ अपराध हुआ, क्षमा करना, तो उसका
रहा-सहा क्रोध भी पानी हो गया। वह रोने लगी। मन का मैल धोने के लिए नयन-जल से
उपयुक्त और कोई वस्तु नहीं है।
श्रीकंठ
को देखकर आनंदी ने कहा—लाला
बाहर खड़े बहुत रो रहे हैं।
श्रीकंठ--तो
मैं क्या करूँ?
आनंदी—भीतर बुला लो। मेरी
जीभ में आग लगे ! मैंने कहॉँ से यह झगड़ा उठाया।
श्रीकंठ--मैं
न बुलाऊँगा।
आनंदी--पछताओगे।
उन्हें बहुत ग्लानि हो गयी है, ऐसा न हो, कहीं चल दें।
श्रीकंठ
न उठे। इतने में लालबिहारी ने फिर कहा--भाभी, भैया से मेरा प्रणाम कह दो। वह मेरा मुँह नहीं देखना चाहते; इसलिए मैं भी अपना
मुँह उन्हें न दिखाऊँगा।
लालबिहारी
इतना कह कर लौट पड़ा, और शीघ्रता से दरवाजे की ओर बढ़ा। अंत में आनंदी कमरे से निकली और उसका
हाथ पकड़ लिया। लालबिहारी ने पीछे फिर कर देखा और ऑंखों में ऑंसू भरे बोला--मुझे
जाने दो।
आनंदी कहॉँ जाते हो?
लालबिहारी--जहॉँ कोई मेरा
मुँह न देखे।
आनंदी—मैं न जाने दूँगी?
लालबिहारी—मैं तुम लोगों के
साथ रहने योग्य नहीं हूँ।
आनंदी—तुम्हें मेरी सौगंध
अब एक पग भी आगे न बढ़ाना।
लालबिहारी—जब तक मुझे यह न
मालूम हो जाय कि भैया का मन मेरी तरफ से साफ हो गया, तब तक मैं इस घर में कदापि न
रहूँगा।
आनंदी—मैं ईश्वर को साक्षी
दे कर कहती हूँ कि तुम्हारी ओर से मेरे मन में तनिक भी मैल नहीं है।
अब
श्रीकंठ का हृदय भी पिघला। उन्होंने बाहर आकर लालबिहारी को गले लगा लिया। दोनों
भाई खूब फूट-फूट कर रोये। लालबिहारी ने सिसकते हुए कहा—भैया, अब कभी मत
कहना कि तुम्हारा मुँह न देखूँगा। इसके सिवा आप जो दंड देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार करूँगा।
श्रीकंठ
ने कॉँपते हुए स्वर में कहा--लल्लू ! इन बातों को बिल्कुल भूल जाओ। ईश्वर चाहेगा, तो फिर ऐसा
अवसर न आवेगा।
बेनीमाधव
सिंह बाहर से आ रहे थे। दोनों भाइयों को गले मिलते देखकर आनंद से पुलकित हो गये।
बोल उठे—बड़े
घर की बेटियॉँ ऐसी ही होती हैं। बिगड़ता हुआ काम बना लेती हैं।
गॉँव
में जिसने यह वृत्तांत सुना, उसी ने इन शब्दों में आनंदी की उदारता को सराहा—‘बड़े घर की बेटियॉँ
ऐसी ही होती हैं।‘
पंच परमेश्वर
जुम्मन
शेख अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी
साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गये थे, तब अपना घर
अलगू को सौंप गये थे, और अलगू जब कभी बाहर जाते, तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खाना-पाना का व्यवहार था, न धर्म का नाता;
केवल विचार मिलते थे। मित्रता का मूलमंत्र भी यही है।
इस
मित्रता का जन्म उसी समय हुआ, जब दोनों मित्र बालक ही थे, और जुम्मन के पूज्य
पिता, जुमराती, उन्हें शिक्षा प्रदान
करते थे। अलगू ने गुरू जी की बहुत सेवा की
थी, खूब प्याले धोये। उनका हुक्का एक क्षण के लिए भी
विश्राम न लेने पाता था, क्योंकि प्रत्येक चिलम अलगू को आध
घंटे तक किताबों से अलग कर देती थी। अलगू के पिता पुराने विचारों के मनुष्य थे।
उन्हें शिक्षा की अपेक्षा गुरु की सेवा-शुश्रूषा पर अधिक विश्वास था। वह कहते थे
कि विद्या पढ़ने ने नहीं आती;
जो कुछ होता है, गुरु के आशीर्वाद से। बस, गुरु जी की कृपा-दृष्टि
चाहिए। अतएव यदि अलगू पर जुमराती शेख के आशीर्वाद अथवा सत्संग का कुछ फल न हुआ, तो यह मानकर संतोष कर लेना कि विद्योपार्जन में मैंने यथाशक्ति कोई बात
उठा नहीं रखी, विद्या उसके भाग्य ही में न थी, तो कैसे आती?
मगर
जुमराती शेख स्वयं आशीर्वाद के कायल न थे। उन्हें अपने सोटे पर अधिक भरोसा था, और उसी सोटे
के प्रताप से आज-पास के गॉँवों में जुम्मन की पूजा होती थी। उनके लिखे हुए
रेहननामे या बैनामे पर कचहरी का मुहर्रिर भी कदम न उठा सकता था। हल्के का डाकिया, कांस्टेबिल और तहसील का चपरासी--सब उनकी कृपा की आकांक्षा रखते थे। अतएव
अलगू का मान उनके धन के कारण था, तो जुम्मन शेख अपनी अनमोल विद्या से ही सबके आदरपात्र बने थे।
२
जुम्मन शेख की एक बूढ़ी खाला (मौसी) थी। उसके पास कुछ
थोड़ी-सी मिलकियत थी;
परन्तु उसके निकट संबंधियों में कोई न था। जुम्मन ने लम्बे-चौड़े वादे करके वह
मिलकियत अपने नाम लिखवा ली थी। जब तक दानपत्र की
रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार किया गया; उन्हें खूब
स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये। हलवे-पुलाव की वर्षा- सी की गयी; पर रजिस्ट्री की
मोहर ने इन खातिरदारियों पर भी मानों मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों
के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज, तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मन शेख भी निठुर हो गये। अब बेचारी खालाजान
को प्राय: नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थी।
बुढ़िया न जाने कब तक जियेगी। दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया, मानों मोल
ले लिया है !
बघारी दाल के बिना रोटियॉँ नहीं उतरतीं !
जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से तो अब तक गॉँव मोल ले लेते।
कुछ दिन खालाजान ने सुना और सहा; पर जब न सहा गया तब
जुम्मन से शिकायत की। तुम्मन ने स्थानीय कर्मचारी—गृहस्वांमी—के प्रबंध देना उचित
न समझा। कुछ दिन तक दिन तक और यों ही रो-धोकर काम चलता रहा। अन्त में एक दिन खाला
ने जुम्मन से कहा—बेटा
!
तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह न होगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना
पका-खा लूँगी।
जुम्मन ने घृष्टता के साथ उत्तर दिया—रुपये क्या यहाँ
फलते हैं?
खाला ने नम्रता से कहा—मुझे कुछ रूखा-सूखा चाहिए भी
कि नहीं?
जुम्मन ने गम्भीर स्वर से जवाब़ दिया—तो कोई यह थोड़े ही
समझा था कि तु मौत से लड़कर आयी हो?
खाला बिगड़ गयीं, उन्होंने पंचायत करने की धमकी दी। जुम्मन हँसे, जिस
तरह कोई शिकारी हिरन को जाली की तरफ जाते देख कर मन ही मन हँसता है। वह बोले—हॉँ, जरूर पंचायत
करो। फैसला हो जाय। मुझे भी यह रात-दिन की खटखट पसंद नहीं।
पंचायत
में किसकी जीत होगी, इस विषय में जुम्मन को कुछ भी संदेह न थ। आस-पास के गॉँवों में ऐसा कौन
था, उसके अनुग्रहों का ऋणी न हो; ऐसा कौन था, जो उसको
शत्रु बनाने का साहस कर सके? किसमें इतना बल था, जो उसका सामना कर सके? आसमान के फरिश्ते तो पंचायत
करने आवेंगे ही नहीं।
३
इसके
बाद कई दिन तक बूढ़ी खाला हाथ में एक लकड़ी लिये आस-पास के गॉँवों में दौड़ती
रहीं। कमर झुक कर कमान हो गयी थी। एक-एक पग चलना दूभर था; मगर बात आ पड़ी थी।
उसका निर्णय करना जरूरी था।
बिरला ही कोई भला आदमी होगा, जिसके समाने
बुढ़िया ने दु:ख के ऑंसू न बहाये हों। किसी ने तो यों ही ऊपरी मन से हूँ-हॉँ करके
टाल दिया, और किसी
ने इस अन्याय पर जमाने को गालियाँ दीं। कहा—कब्र में पॉँव जटके हुए हैं, आज मरे, कल दूसरा दिन, पर हवस नहीं मानती। अब तुम्हें क्या
चाहिए? रोटी खाओ और अल्लाह का नाम लो। तुम्हें अब खेती-बारी
से क्या काम है? कुछ ऐसे सज्जन भी थे,
जिन्हें हास्य-रस के रसास्वादन का अच्छा अवसर मिला। झुकी हुई कमर, पोपला मुँह, सन के-से बाल इतनी सामग्री एकत्र हों, तब हँसी क्यों न आवे? ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे, जिन्होंने इस अबला के दुखड़े को गौर से सुना हो और उसको सांत्वना दी हो।
चारों ओर से घूम-घाम कर बेचारी अलगू चौधरी
के पास आयी। लाठी पटक दी और दम लेकर बोली—बेटा, तुम भी दम
भर के लिये मेरी पंचायत में चले आना।
अलगू—मुझे बुला कर क्या
करोगी? कई गॉँव के आदमी तो आवेंगे ही।
खाला—अपनी विपद तो सबके
आगे रो आयी। अब आनरे न आने का अख्तियार उनको है।
अलगू—यों आने को आ जाऊँगा; मगर पंचायत में
मुँह न खोलूँगा।
खाला—क्यों बेटा?
अलगू—अब इसका कया जवाब
दूँ? अपनी खुशी। जुम्मन मेरा पुराना मित्र है। उससे बिगाड़ नहीं कर सकता।
खाला—बेटा, क्या बिगाड़
के डर से ईमान की बात न कहोगे?
हमारे
सोये हुए धर्म-ज्ञान की सारी सम्पत्ति लुट जाय, तो उसे खबर नहीं होता, परन्तु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है। फिर उसे कोई जीत नहीं सकता। अलगू
इस सवाल का काई उत्तर न दे सका, पर उसके
हृदय में ये शब्द गूँज रहे थे-
क्या
बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?
४
संध्या समय एक पेड़ के नीचे
पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही फर्श बिछा रखा था। उन्होंने पान, इलायची, हुक्के-तम्बाकू आदि का प्रबन्ध भी किया था। हॉँ, वह
स्वय अलबत्ता अलगू चौधरी के साथ जरा दूर पर बैठेजब पंचायत में कोई आ जाता था,
तब दवे हुए सलाम से उसका स्वागत करते थे। जब सूर्य अस्त हो गया और
चिड़ियों की कलरवयुक्त पंचायत पेड़ों पर बैठी, तब यहॉँ भी
पंचायत शुरू हुई। फर्श की एक-एक अंगुल जमीन भर गयी; पर अधिकांश दर्शक
ही थे। निमंत्रित महाशयों में से केवल वे ही लोग पधारे थे, जिन्हें
जुम्मन से अपनी कुछ कसर निकालनी थी। एक कोने में आग सुलग रही थी। नाई ताबड़तोड़
चिलम भर रहा था। यह निर्णय करना असम्भव था कि सुलगते हुए उपलों से अधिक धुऑं
निकलता था या चिलम के दमों से। लड़के इधर-उधर दौड़ रहे थे। कोई आपस में गाली-गलौज
करते और कोई रोते थे। चारों तरफ कोलाहल मच रहा था। गॉँव के कुत्ते इस जमाव को भोज
समझकर झुंड के झुंड जमा हो गए थे।
पंच
लोग बैठ गये, तो बूढ़ी खाला ने उनसे विनती की--
‘पंचों, आज तीन साल
हुए, मैंने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे जुम्मन के नाम लिख
दी थी। इसे आप लोग जानते ही होंगे। जुम्मन ने मुझे ता-हयात रोटी-कपड़ा देना कबूल
किया। साल-भर तो मैंने इसके साथ रो-धोकर काटा। पर अब रात-दिन का रोना नहीं सहा
जाता। मुझे न पेट की रोटी मिलती है न तन का कपड़ा। बेकस बेवा हूँ। कचहरी दरबार
नहीं कर सकती। तुम्हारे सिवा और किसको अपना दु:ख सुनाऊँ? तुम
लोग जो राह निकाल दो, उसी राह पर चलूँ। अगर मुझमें कोई ऐब
देखो, तो मेरे मुँह पर थप्पड़ मारी। जुम्मन में बुराई देखो,
तो उसे समझाओं, क्यों एक बेकस की आह लेता है ! मैं पंचों का हुक्म
सिर-माथे पर चढ़ाऊँगी।’
रामधन मिश्र, जिनके कई
असामियों को जुम्मन ने अपने गांव में बसा लिया था, बोले—जुम्मन मियां किसे
पंच बदते हो? अभी से इसका निपटारा कर लो। फिर जो कुछ पंच कहेंगे, वही
मानना पड़ेगा।
जुम्मन को इस समय सदस्यों
में विशेषकर वे ही लोग दीख पड़े,
जिनसे किसी न किसी कारण उनका वैमनस्य था। जुम्मन बोले—पंचों का हुक्म
अल्लाह का हुक्म है। खालाजान जिसे चाहें,
उसे बदें। मुझे कोई उज्र नहीं।
खाला ने चिल्लाकर कहा--अरे अल्लाह के बन्दे ! पंचों का नाम क्यों
नहीं बता देता? कुछ मुझे भी तो मालूम हो।
जुम्मन ने क्रोध से कहा--इस वक्त मेरा मुँह न खुलवाओ। तुम्हारी बन
पड़ी है, जिसे चाहो, पंच बदो।
खालाजान जुम्मन के आक्षेप को समझ गयीं, वह बोली--बेटा, खुदा से डरो। पंच न किसी के दोस्त होते हैं, ने किसी
के दुश्मन। कैसी बात कहते हो!
और तुम्हारा किसी पर विश्वास न हो, तो जाने दो;
अलगू चौधरी को तो मानते हो,
लो, मैं उन्हीं को सरपंच बदती हूँ।
जुम्मन शेख आनंद से फूल उठे, परन्तु
भावों को छिपा कर बोले--अलगू ही सही, मेरे लिए जैसे रामधन
वैसे अलगू।
अलगू इस झमेले में फँसना नहीं चाहते थे। वे कन्नी काटने लगे।
बोले--खाला, तुम जानती हो कि मेरी जुम्मन से गाढ़ी दोस्ती है।
खाला ने गम्भीर स्वर में कहा--‘बेटा, दोस्ती के
लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंच के दिल में खुदा बसता है। पंचों के मुँह से जो
बात निकलती है, वह खुदा की तरफ से निकलती है।’
अलगू चौधरी सरपंच हुएं
रामधन मिश्र और जुम्मन के दूसरे विरोधियों
ने बुढ़िया को मन में बहुत कोसा।
अलगू चौधरी बोले--शेख जुम्मन
!
हम और तुम पुराने दोस्त हैं !
जब काम पड़ा, तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पड़ा, तुम्हारी
सेवा करते रहे हैं;
मगर इस समय तुम और बुढ़ी खाला, दोनों हमारी निगाह में बराबर हो। तुमको पंचों से जो कुछ अर्ज करनी हो, करो।
जुम्मन को पूरा विश्वास था कि अब बाजी मेरी है। अलग यह सब दिखावे की
बातें कर रहा है। अतएव शांत-चित्त हो कर बोले--पंचों, तीन साल हुए
खालाजान ने अपनी जायदाद मेरे नाम हिब्बा कर दी थी। मैंने उन्हें ता-हयात
खाना-कप्ड़ा देना कबूल किया था। खुदा गवाह है, आज तक मैंने
खालाजान को कोई तकलीफ नहीं दी। मैं उन्हें अपनी मॉँ के समान समझता हूँ। उनकी खिदमत
करना मेरा फर्ज है;
मगर औरतों में जरा अनबन रहती है, उसमें मेरा क्या बस है? खालाजान मुझसे माहवार खर्च
अलग मॉँगती है। जायदाद जितनी है;
वह पंचों से छिपी नहीं। उससे इतना मुनाफा नहीं होता है कि माहवार खर्च दे सकूँ।
इसके अलावा हिब्बानामे में माहवार खर्च का
कोई जिक्र नही। नहीं तो मैं भूलकर भी इस झमेले मे न पड़ता। बस, मुझे यही
कहना है। आइंदा पंचों का अख्तियार है, जो फैसला चाहें,
करे।
अलगू
चौधरी को हमेशा कचहरी से काम पड़ता था। अतएव वह पूरा कानूनी आदमी था। उसने जुम्मन
से जिरह शुरू की। एक-एक प्रश्न जुम्मन के हृदय पर हथौड़ी की चोट की तरह पड़ता था।
रामधन मिश्र इस प्रश्नों पर मुग्ध हुए जाते थे। जुम्मन चकित थे कि अलगू को क्या हो
गया। अभी यह अलगू मेरे साथ बैठी हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था ! इतनी ही देर में
ऐसी कायापलट हो गयी कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है। न मालूम कब की कसर यह निकाल
रहा है? क्या इतने दिनों की दोस्ती कुछ भी काम न आवेगी?
जुम्मन
शेख तो इसी संकल्प-विकल्प में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू ने फैसला सुनाया--
जुम्मन शेख तो इसी संकल्प-विकल्प में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू
ने फैसला सुनाया--
जुम्मन शेख !
पंचों ने इस मामले पर विचार किया। उन्हें यह नीति संगत मालूम होता है कि खालाजान
को माहवार खर्च दिया जाय। हमारा विचार है कि खाला की जायदाद से इतना मुनाफा अवश्य
होता है कि माहवार खर्च दिया जा सके। बस,
यही हमारा फैसला है। अगर जुम्मन को खर्च देना मंजूर न हो, तो हिब्वानामा रद्द समझा जाय।
यह फैसला सुनते ही जुम्मन सन्नाटे में आ गये। जो अपना मित्र हो, वह शत्रु का
व्यवहार करे और गले पर छुरी फेरे, इसे समय के हेर-फेर के
सिवा और क्या कहें? जिस पर पूरा भरोसा था, उसने समय पड़ने पर धोखा दिया। ऐसे ही अवसरों पर झूठे-सच्चे मित्रों की
परीक्षा की जाती है। यही कलियुग की दोस्ती है। अगर लोग ऐसे कपटी-धोखेबाज न होते, तो देश में आपत्तियों का प्रकोप क्यों होता? यह
हैजा-प्लेग आदि व्याधियॉँ दुष्कर्मों के ही दंड हैं।
मगर रामधन मिश्र और अन्य पंच अलगू चौधरी की इस नीति-परायणता को
प्रशंसा जी खोलकर कर रहे थे। वे कहते थे--इसका नाम पंचायत है ! दूध का दूध और पानी
का पानी कर दिया। दोस्ती,
दोस्ती की जगह है, किन्तु धर्म का पालन करना
मुख्य है। ऐसे ही सत्यवादियों के बल पर पृथ्वी ठहरी है, नहीं
तो वह कब की रसातल को चली जाती।
इस फैसले ने अलगू और जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ-साथ
बातें करते नहीं दिखायी देते। इतना पुराना मित्रता-रूपी वृक्ष
सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच वह बालू की
ही जमीन पर खड़ा था।
उनमें अब शिष्टाचार का अधिक
व्यवहार होने लगा। एक दूसरे की आवभगत ज्यादा करने लगा। वे मिलते-जुलते थे, मगर उसी तरह
जैसे तलवार से ढाल मिलती है।
जुम्मन के चित्त में
मित्र की कुटिलता आठों पहर खटका करती थी। उसे हर घड़ी यही चिंता रहती थी कि किसी
तरह बदला लेने का अवसर मिले।
५
अच्छे
कामों की सिद्धि में बड़ी दरे लगती है;
पर बुरे कामों की सिद्धि में यह बात नहीं होती; जुम्मन को भी बदला लेने का
अवसर जल्द ही मिल गया। पिछले साल अलगू चौधरी बटेसर से बैलों की एक बहुत अच्छी गोई
मोल लाये थे। बैल पछाहीं जाति के सुंदर,
बडे-बड़े सीगोंवाले थे। महीनों तक आस-पास के गॉँव के लोग दर्शन करते
रहे। दैवयोग से जुम्मन की पंचायत के एक महीने के बाद इस जोड़ी का एक बैल मर गया।
जुम्मन ने दोस्तों से कहा--यह दग़ाबाज़ी की सजा है। इन्सान सब्र भले ही कर जाय,
पर खुदा नेक-बद सब देखता है। अलगू को संदेह हुआ कि जुम्मन ने बैल को
विष दिला दिया है। चौधराइन ने भी जुम्मन पर ही इस दुर्घटना का दोषारोपण किया उसने
कहा--जुम्मन ने कुछ कर-करा दिया है। चौधराइन और करीमन में इस विषय पर एक दिन खुब
ही वाद-विवाद हुआ दोनों देवियों ने शब्द-बाहुल्य की नदी बहा दी। व्यंगय, वक्तोक्ति अन्योक्ति और उपमा आदि अलंकारों में बातें हुईं। जुम्मन ने
किसी तरह शांति स्थापित की। उन्होंने अपनी पत्नी को डॉँट-डपट कर समझा दिया। वह उसे
उस रणभूमि से हटा भी ले गये। उधर अलगू चौधरी ने समझाने-बुझाने का काम अपने
तर्क-पूर्ण सोंटे से लिया।
अब
अकेला बैल किस काम का?
उसका जोड़ बहुत ढूँढ़ा गया, पर न मिला। निदान
यह सलाह ठहरी कि इसे बेच डालना चाहिए। गॉँव में एक समझू साहु थे, वह इक्का-गाड़ी हॉँकते थे। गॉँव के गुड़-घी लाद कर मंडी ले जाते, मंडी से तेल, नमक भर लाते, और
गॉँव में बेचते। इस बैल पर उनका मन लहराया। उन्होंने सोचा, यह
बैल हाथ लगे तो दिन-भर में बेखटके तीन खेप हों। आज-कल तो एक ही खेप में लाले पड़े
रहते हैं। बैल देखा, गाड़ी में दोड़ाया, बाल-भौरी की पहचान करायी, मोल-तोल किया और उसे ला कर
द्वार पर बॉँध ही दिया। एक महीने में दाम चुकाने का वादा ठहरा। चौधरी को भी गरज थी
ही, घाटे की परवाह न की।
समझू
साहु ने नया बैल पाया,
तो लगे उसे रगेदने। वह दिन में तीन-तीन, चार-चार
खेपें करने लगे। न चारे की फिक्र थी, न पानी की, बस खेपों से काम था। मंडी ले गये, वहॉँ कुछ सूखा
भूसा सामने डाल दिया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेने पाया था कि फिर जोत दिया।
अलगू चौधरी के घर था तो चैन की बंशी बचती थी। बैलराम छठे-छमाहे कभी बहली में जोते
जाते थे। खूब उछलते-कूदते और कोसों तक दौड़ते चले जाते थे। वहॉँ बैलराम का रातिब
था, साफ पानी, दली हुई अरहर की दाल और
भूसे के साथ खली, और यही नहीं, कभी-कभी
घी का स्वाद भी चखने को मिल जाता था। शाम-सबेरे एक आदमी खरहरे करता, पोंछता और सहलाता था। कहॉँ वह सुख-चैन, कहॉँ यह आठों
पहर कही खपत। महीने-भर ही में वह पिस-सा गया। इक्के का यह जुआ देखते ही उसका लहू
सूख जाता था। एक-एक पग चलना दूभर था। हडिडयॉँ निकल आयी थी; पर था वह पानीदार, मार की
बरदाश्त न थी।
एक
दिन चौथी खेप में साहु जी ने दूना बोझ लादा। दिन-भरका थका जानवर, पैर न उठते
थे। पर साहु जी कोड़े फटकारने लगे। बस, फिर क्या था, बैल कलेजा तोड़ का चला। कुछ दूर दौड़ा और चाहा कि जरा दम ले लूँ; पर साहु जी को जल्द
पहुँचने की फिक्र थी;
अतएव उन्होंने कई कोड़े बड़ी निर्दयता से फटकारे। बैल ने एक बार फिर जोर लगाया; पर अबकी बार शक्ति
ने जवाब दे दिया। वह धरती पर गिर पड़ा,
और ऐसा गिरा कि फिर न उठा। साहु जी ने बहुत पीटा, टॉँग पकड़कर खीचा, नथनों में लकड़ी ठूँस दी; पर कहीं मृतक भी उठ
सकता है? तब साहु जी को कुछ शक हुआ। उन्होंने बैल को गौर से देखा, खोलकर अलग किया;
और सोचने लगे कि गाड़ी कैसे घर पहुँचे। बहुत चीखे-चिल्लाये; पर देहात का रास्ता
बच्चों की ऑंख की तरह सॉझ होते
ही बंद हो जाता है। कोई नजर न आया। आस-पास कोई
गॉँव भी न था। मारे क्रोध के उन्होंने मरे हुए बैल पर और दुर्रे लगाये और कोसने
लगे--अभागे। तुझे मरना ही था,
तो घर पहुँचकर मरता !
ससुरा बीच रास्ते ही में मर रहा। अब गड़ी कौन खीचे? इस तरह साहु जी खूब जले-भुने।
कई बोरे गुड़ और कई पीपे घी उन्होंने बेचे थे, दो-ढाई सौ
रुपये कमर में बंधे थे। इसके सिवा गाड़ी पर कई बोरे नमक थे; अतएव छोड़ कर जा भी
न सकते थे। लाचार वेचारे गाड़ी पर ही लेटे गये। वहीं रतजगा करने की ठान ली। चिलम
पी, गाया। फिर हुक्का पिया। इस तरह साह जी आधी रात तक नींद को बहलाते रहें।
अपनी जान में तो वह जागते ही रहे;
पर पौ फटते ही जो नींद टूटी और कमर पर हाथ रखा, तो थैली गायब ! घबरा कर इधर-उधर
देखा तो कई कनस्तर तेल भी नदारत !
अफसोस में बेचारे ने सिर पीट लिया और पछाड़ खाने लगा। प्रात: काल रोते-बिलखते घर
पहँचे। सहुआइन ने जब यह बूरी सुनावनी सुनी,
तब पहले तो रोयी, फिर अलगू चौधरी को गालियॉँ
देने लगी--निगोड़े ने ऐसा कुलच्छनी बैल दिया कि जन्म-भर की कमाई लुट गयी।
इस
घटना को हुए कई महीने बीत गए। अलगू जब अपने बैल के दाम मॉँगते तब साहु और सहुआइन, दोनों ही
झल्लाये हुए कुत्ते की तरह चढ़ बैठते और अंड-बंड बकने लगते—वाह ! यहॉँ तो सारे जन्म
की कमाई लुट गई, सत्यानाश हो गया, इन्हें दामों की पड़ी है। मुर्दा
बैल दिया था, उस पर दाम मॉँगने चले हैं ! ऑंखों में धूल झोंक
दी, सत्यानाशी बैल गले बॉँध दिया, हमें निरा पोंगा ही
समझ लिया है !
हम भी बनिये के बच्चे है,
ऐसे बुद्धू कहीं और होंगे। पहले जाकर किसी गड़हे में मुँह धो आओ,
तब दाम लेना। न जी मानता हो, तो हमारा बैल खोल
ले जाओ। महीना भर के बदले दो महीना जोत लो। और क्या लोगे?
चौधरी
के अशुभचिंतकों की कमी न थी। ऐसे अवसरें पर वे भी एकत्र हो जाते और साहु जी के
बराने की पुष्टि करते। परन्तु डेढ़ सौ रुपये से इस तरह हाथ धो लेना आसान न था। एक
बार वह भी गरम पड़े। साहु जी बिगड़ कर लाठी ढूँढ़ने घर चले गए। अब सहुआइन ने मैदान
लिया। प्रश्नोत्तर होते-होते हाथापाई की नौबत आ पहुँची। सहुआइन ने घर में घुस कर
किवाड़ बन्द कर लिए। शोरगुल सुनकर गॉँव के भलेमानस घर से निकाला। वह परामर्श देने
लगे कि इस तरह से काम न चलेगा। पंचायत कर लो। कुछ तय हो जाय, उसे स्वीकार
कर लो। साहु जी राजी हो गए। अलगू ने भी हामी भर ली।
६
पंचायत की तैयारियॉँ होने
लगीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने दल बनाने शुरू किए। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष
के नीचे पंचायत बैठी। वही संध्या का समय था। खेतों में कौए पंचायत कर रहे थे।
विवादग्रस्त विषय था यह कि मटर की फलियों पर उनका कोई स्वत्व है या नही, और जब तक यह प्रश्न हल न हो जाय,
तब तक वे रखवाले की पुकार पर अपनी अप्रसन्नता प्रकट करना आवश्यकत
समझते थे। पेड़ की डालियों पर बैठी शुक-मंडली में वह प्रश्न छिड़ा हुआ था कि मनुष्यों
को उन्हें वेसुरौवत कहने का क्या अधिकार है, जब उन्हें स्वयं
अपने मित्रों से दगां करने में भी संकोच नहीं होता।
पंचायत बैठ गई,
तो रामधन मिश्र ने कहा-अब देरी क्या है ? पंचों
का चुनाव हो जाना चाहिए। बोलो चौधरी ;
किस-किस को पंच बदते हो।
अलगू ने दीन भाव से कहा-समझू साहु ही चुन लें।
समझू खड़े हुए और कड़कर बोले-मेरी ओर से जुम्मन शेख।
जुम्मन का नाम सुनते ही अलगू चौधरी का कलेजा धक्-धक् करने लगा, मानों किसी
ने अचानक थप्पड़ मारा दिया हो। रामधन अलगू के मित्र थे। वह बात को ताड़ गए।
पूछा-क्यों चौधरी तुम्हें कोई उज्र तो नही।
चौधरी ने निराश हो कर
कहा-नहीं, मुझे क्या उज्र होगा?
अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक
होता है। जब हम राह भूल कर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय
पथ-प्रदर्शक बन जाता है।
पत्र-संपादक अपनी शांति कुटी में बैठा हुआ कितनी धृष्टता और
स्वतंत्रता के साथ अपनी प्रबल लेखनी से मंत्रिमंडल पर आक्रमण करता है: परंतु ऐसे
अवसर आते हैं, जब वह स्वयं मंत्रिमंडल में सम्मिलित होता है। मंडल के भवन में पग धरते ही
उसकी लेखनी कितनी मर्मज्ञ, कितनी विचारशील, कितनी न्याय-परायण हो जाती है। इसका कारण उत्तर-दायित्व का ज्ञान है।
नवयुवक युवावस्था में कितना उद्दंड रहता है। माता-पिता उसकी ओर से कितने चितिति
रहते है!
वे उसे कुल-कलंक समझते हैंपरन्तु थौड़ी हीी समय में परिवार का बौझ सिर पर पड़ते ही
वह अव्यवस्थित-चित्त उन्मत्त युवक कितना धैर्यशील, कैसा शांतचित्त हो जाता है,
यह भी उत्तरदायित्व के ज्ञान का फल है।
जुम्मन शेख के मन में भी सरपंच का उच्च स्थान ग्रहण करते ही अपनी
जिम्मेदारी का भाव पेदा हुआ। उसने सोचा,
मैं इस वक्त न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह
से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देववाणी के सदृश है-और देववाणी
में मेरे मनोविकारों का कदापि समावेश न होना चाहिए। मुझे सत्य से जौ भर भी टलना
उचित नही!
पंचों ने दोनों पक्षों से
सवाल-जवाब करने शुरू किए। बहुत देर तक दोनों दल अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते
रहे। इस विषय में तो सब सहमत थे कि समझू को बैल का मूल्य देना चाहिए। परन्तु वो
महाशय इस कारण रियायत करना चाहते थे कि बैल के मर जाने से समझू को हानि हुई। उसके
प्रतिकूल दो सभ्य मूल के अतिरिक्त समझू को दंड भी देना चाहते थे, जिससे फिर
किसी को पशुओं के साथ ऐसी निर्दयता करने का साहस न हो। अन्त में जुम्मन ने फैसला
सुनाया-
अलगू चौधरी और समझू साहु। पंचों ने तुम्हारे मामले पर अच्छी तरह
विचार किया। समझू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दें। जिस वक्त उन्होंने बैल लिया, उसे कोई
बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे दिए जाते, तो आज समझू उसे
फेर लेने का आग्रह न करते। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बड़ा कठिन
परिश्रम लिया गया और उसके दाने-चारे का कोई प्रबंध न किया गया।
रामधन मिश्र बोले-समझू ने बैल को जान-बूझ कर मारा है, अतएव उससे
दंड लेना चाहिए।
जुम्मन बोले-यह दूसरा सवाल है। हमको इससे कोई मतलब नहीं !
झगडू साहु ने कहा-समझू के साथं कुछ रियायत होनी चाहिए।
जुम्मन बोले-यह अलगू चौधरी की इच्छा पर निर्भर है। यह रियायत करें, तो उनकी
भलमनसी।
अलगू चौधरी फूले न समाए। उठ खड़े हुए और जोर से बोल-पंच-परमेश्वर की
जय!
इसके साथ ही चारों ओर से प्रतिध्वनि हुई-पंच परमेश्वर की जय! यह मनुष्य का काम
नहीं, पंच में परमेश्वर वास करते हैं, यह उन्हीं की महिमा
है। पंच के सामने खोटे को कौन खरा कह सकता है?
थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उनके गले लिपट कर बोले-भैया, जब से तुमने
मेरी पंचायत की तब से मैं तुम्हारा प्राण-घातक शत्रु बन गया था; पर आज मुझे ज्ञात
हुआ कि पंच के पद पर बैठ कर न कोई किसी का दोस्त है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और
कुछ नहीं सूझता। आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से खुदा बोलता है। अलगू
रोने लगे। इस पानी से दोनों के दिलों का मैल धुल गया। मित्रता की मुरझाई हुई लता
फिर हरी हो गई।
शंखनाद
भानु चौधरी अपने गॉँव के
मुखिया थे। गॉँव में उनका बड़ा मान था। दारोगा जी उन्हें टाटा बिना जमीन पर न
बैठने देते। मुखिया साहब को ऐसी धाक बँधी हुई थी कि उनकी मर्जी बिना गॉँव में एक
पत्ता भी नहीं हिल सकता था। कोई घटना,
चाहे, वह सास-बहु का विवाद हो, चाहे मेड़ या खेत का झगड़ा, चौधरी साहब के
शासनाधिकारी को पूर्णरुप से सचते करने के लिए काफी थी, वह
तुरन्त घटना स्थल पर पहुँचते, तहकीकात होने लगती गवाह और
सबूत के सिवा किसी अभियोग को सफलता सहित चलाने में जिन बातों की जरुरत होती है,
उन सब पर विचार होता और चौधरी जी के दरबार से फैसला हो जाता। किसी
को अदालत जाने की जरुरत न पड़ी। हॉँ, इस कष्ट के लिए
चौधरीसाहब कुछ फीस जरुर लेते थे। यदि किसी अवसर पर फीस मिलने में असुविधा के कारण
उन्हें धीरज से काम लेना पड़ता तो गॉँव में आफत मच जाती थी; क्योंकि उनके धीरज
और दरोगा जी के क्रोध में कोई घनिष्ठ सम्बन्ध था। सारांश यह है कि चौधरी से उनके
दोस्त-दुश्मन सभी चौकन्ने रहते थे।
२
चौधरी माहश्य के तीन सुयोग्य
पुत्र थे। बड़े लड़के बितान एक सुशिक्षित मनुष्य थे। डाकिये के रजिस्टर पर दस्तखत
कर लेते थे। बड़े अनुभवी, बड़े नीति
कुशल। मिर्जई की जगह कमीज पहनते, कभी-कभी सिगरेट भी पीते,
जिससे उनका गौरव बढ़ता था। यद्यपि उनके ये दुर्व्यसन बूढ़े चौधरी को
नापसंद थे, पर बेचारे विवश थे; क्योंकि अदालत और
कानून के मामले बितान के हाथों में थे। वह कानून का पुतला था। कानून की दफाएँ उसकी
जबान पर रखी रहती थीं। गवाह गढ़ने में वह पूरा उस्ताद था। मँझले लड़के शान चौधरी
कृषि-विभाग के अधिकारी थे। बुद्धि के मंद; लेकिन शरीर से बड़े
परिश्रमी। जहॉँ घास न जमती हो,
वहॉँ केसर जमा दें। तीसरे लड़के का नाम गुमान था। वह बड़ा रसिक,
साथ ही उद्दंड भी था। मुहर्रम में ढोल इतने जोरों से बजाता कि कान
के पर्दे फट जाते। मछली फँसाने का बड़ा शौकीन था बड़ा रँगील जवान था। खँजड़ी
बजा-बजाकर जब वह मीठे स्वर से ख्याल गाता, तो रंग जम जाता।
उसे दंगल का ऐसा शौक था कि कोसों तक धावा मारता; पर घरवाले कुछ ऐसे
शुष्क थे कि उसके इन व्यसनों से तलिक भी सहानुभूति न रखते थे। पिता और भाइयों ने
तो उसे ऊसर खेत समझ रखा था। घुड़की-धमकी,
शिक्षा और उपदेश, स्नेह और विनय, किसी का उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। हॉँ, भावजें अभी
तक उसकी ओर से निराश न हुई थी। वे अभी तक उसे कड़वी दवाइयॉँ पिलाये जाती थी; पर आलस्य वह राज
रोग है जिसका रोग कभी नहीं सँभलता। ऐसा कोई बिराल ही दिन जाता होगा कि बॉँक गुमान
को भावजों के कटुवाक्य न सुनने पड़ते हों। ये बिषैले शर कभी-कभी उसे कठोर ह्रदय
में चुभ जाते;
किन्तु यह घाव रात भर से अधिक न रहता। भोर होते ही थकना के साथ ही यह पीड़ा भी
शांत हा जाती। तड़का हुआ,
उसने हाथ-मुँह धोया, बंशी उठायी और तालाब की
ओर चल खड़ा हुआ। भावजें फूलों की वर्षा किया करती; बूढ़े चौधरी पैतरे
बदलते रहते और भाई लोग तीखी निगाह से देखा करते, पर अपनी धुन का पूरा बॉँका
गुमान उन लोगों के बीच से इस तरह अकड़ता चला जाता, जैसे कोई
मस्त हाथी कुत्तों के बीच से निकल जाता है। उसे सुमार्ग पर लाने के लिए क्या-क्या
उपाय नही किये गये। बाप समझाता-बेटा ऐसी राह चलो जिसमें तुम्हें भी पैसें मिलें और
गृहस्थी का भी निर्वाह हो। भाइयों के भरोसे कब तक रहोगे? मैं
पका आम हूँ-आज टपक पड़ा या कल। फिर तुम्हारा निबाह कैसे होगा ? भाई बात भी न पूछेगे;
भावजों का रंग देख रहे हो। तुम्हारे भी लड़के बाले है, उनका भार
कैसे सँभालोगे ? खेती में जी न लगे, कास्टि-बिली में भरती करा दूँ ? बाँका गुमनान खड़ा-खड़ा यह सब सुनता, लेकिन पत्थर का
देवता था, कभी
न पसीजता ! इन माहश्य के
अत्याचार का दंड उसकी स्त्री बेचारी को भोगना पड़ता था। मेहनत के घर के जितने काम
होते, वे उसी के सिर थोपे जाते। उपले पाथती, कुंए से पानी
लाती, आटा पीसती और
तिस पर भी जेठानानियॉँ सीधे मुँह बात न करती, वाक्य बाणों से
छेदा करतीं। एक बार जब वह पति से कई दिन रुठी रही, तो बॉँके
गुमान कुछ नर्म हुए। बाप से जाकर बोले-मुझे कोई दूकान खोलवा दीजिए। चौधरी ने
परमात्मा को धन्यवाद दिया। फूले न समाये। कई सौ रुपये लगाकर कपड़े की दूकान खुलवा
दी। गुमान के भाग जगे। तनजेब के चुन्नटदार कुरते बनवाये, मलमल
का साफा धानी रंग में रँगवाया। सौदा बिके या न बिके, उसे लाभ
ही होना था!
दूकान खुली हुई है,
दस-पाँच गाढ़े मित्र जमे हुए हैं, चरस की दम
और खयाल की तानें उड़ रही हैं—
चल झपट री, जमुना-तट री,
खड़ो, नटखट री।
इस तरह तीन महीने चैन से
कटे। बॉँके गुमान ने खूब दिल खोल कर अरमान निकाले, यहॉँ तक कि सारी लागत लाभ हो
गयी। टाट के टुकड़े के सिवा और कुछ न बचा। बूढ़े चौधरी कुऍं में गिरने चले,
भावजों ने घोर आन्दोलन मचाया—अरे राम ! हमारे बच्चे और हम
चीथड़ों को तरसें,
गाढ़े का एक कुरता भी नसीब न हो, और इतनी बड़ी
दूकान इस निखट्टू का कफ़न बन गई। अब कौन मुँह दिखायेगा? कौन
मुँह लेकर घर में पैर रखेगा? किंतु बॉँके गुमान के तेवर जरा
भी मैले न हुए। वही मुँह लिए वह फिर घर आया और फिर वही पुरानी चाल चलने लगा।
कानूनदां बिताने उनके ये ठाट-बाट देकर जल जाता। मैं सारे दिन पसीना बहाऊँ, मुझे नैनसुख का कुरता भी न मिले, यह अपाहिज सारे
दिन चारपाई तोड़े और यों बन-ठन कर निकाले? एसे वस्त्र तो
शायद मुझे अपने ब्याह में भी न मिले होंगे। मीठे शान के ह्रदय में भी कुछ ऐसे ही
विचार उठते थे। अंत में यह जलन सही न गयी, और अग्नि भड़की; तो एक दिन कानूनदाँ
बितान की पत्नी गुमनाम के सारे कपड़े उठा लायी और उन पर मिट्टी का तेल उँड़ेल कर
आग लगा दी। ज्वाला उठी,
सारे कपड़े देखत-देखते जल कर राख हो गए। गुमान रोते थे। दोनों भाई
खड़े तमाशा देखते थे। बूढ़े चौधरी ने यह दृश्य देखा, और सिर
पीट लिया। यह द्वेषाग्नि हैं। घर को जलाकर तक बुझेगी।
३
यह ज्वाला तो थोड़ी देर में
शांत हो गयी, परन्तु ह्रदय की आग ज्यों की त्यों दहकती रही। अंत में एक दिन बूढ़े चौधरी
ने घर के सब मेम्बरों को एकत्र किया और गूढ़ विषय पर विचार करने लगे कि बेड़ा कैसे
पार हो। बितान से बोले- बेटा, तुमने आज देखा कि बात की बात
में सैकड़ों रुपयों पर पानी फिर गया। अब इस तरह निर्वाह होना असम्भव है। तुम
समझदार हो, मुकदमे-मामले करते हो, कोई
ऐसी राह निकालो कि घर डूबने से बचे। मैं तो चाहता था कि जब तक चोला रहे, सबको समेटे रहूँ, मगर भगवान् के मन में कुछ और ही
है।
बितान की नीतिकुशलता अपनी
चतुर सहागामिनी के सामने लुप्त हो जाती थी। वह अभी उसका उत्तर सोच ही रहे थे कि
श्रीमती जी बोल उठीं—दादा
जी!
अब समुझाने-बुझाने से काम नहीं चलेगा,
सहते-सहते हमारा कलेजा पक गया। बेटे की जितनी पीर बाप को होगी,
भाइयों को उतनी क्या, उसकी आधी भी नहीं हो
सकती। मैं तो साफ कहती हूँ—गुमान
को तुम्हारी कमाई में हक है, उन्हें कंचन के कौर खिलाओ और चॉँदी के हिंडाले में झुलाओ। हममें न इतना
बूता है, न इतना कलेजा। हम अपनी झोपड़ी अलग बना लेगें। हॉँ,
जो कुछ हमारा हो, वह हमको मिलना चाहिए।
बॉँट-बखरा कर दीजिए। बला से चार आदमी हँसेगे, अब कहॉँ तक
दुनिया की लाज ढोवें?
नीतिज्ञ बितान पर इस प्रबल
वक्तृता का जो असर हुआ,
वह उनके विकासित और पुमुदित चेहरे से झलक रहा था। उनमें स्वयं इतना
साहस न था कि इस प्रस्ताव का इतनी स्पष्टता से व्यक्त कर सकते। नीतिज्ञ महाशय
गंभीरता से बोले—जायदाद
मुश्तरका, मन्कूला या गैरमन्कूला, आप के हीन-हायात तकसीम की जा
सकती है, इसकी नजीरें मौजूद है। जमींदार को साकितुलमिल्कियत
करने का कोई इस्तहक़ाक़ नहीं है।
अब मंदबुद्धि शान की बारी
आयी, पर बेचारा किसान, बैलों के पीछे ऑंखें बंद करके चलने
वाला, ऐसे गूढ़ विषय पर कैसे मुँह खोलता। दुविधा में पड़ा
हुआ था। तब उसकी सत्यवक्ता धर्मपत्नी ने अपनी जेठानी का अनुसरण कर यह कठिन कार्य
सम्पन्न किया। बोली—बड़ी
बहन ने जो कुछ कहा,
उसके सिवा और दूसरा उपाय नहीं। कोई तो कलेजा तोड़-तोड़ कर कमाये मगर
पैसे-पैसे को तरसे, तन ढॉँकने को वस्त्र तक न मिले, और कोई सुख की नींद सोये, हाथ बढ़ा-बढ़ा के खाय! ऐसी अंधेरे नगरी
में अब हमारा निबाह न होगा।
शान चौधरी ने भी इस प्रस्ताव
का मुक्तकंठ से अनुमोदन किया। अब बूढ़े चौधरी गुमान से बोले—क्यों बेटा, तुम्हें भी
यह मंजूर है ? अभी कुछ नहीं बिगड़ा। यह आग अब भी बुझ सकती
है। काम सबको प्यारा है, चाम किसी को नहीं। बोलो, क्या कहते हो ? कुछ काम-धंधा करोगे या अभी ऑंखें
नहीं खुलीं ?
गुमान में धैर्य की कमी न
थी। बातों को इस कान से सुन कर उस कान से उड़ा देना उसका नित्य-कर्म था। किंतु
भाइयों की इस जन-मुरीदी पर उसे क्रोध आ गया। बोला—भाइयों की जो इच्छा है, वही मेरे मन
में भी लगी हुई है। मैं भी इस जंजाल से भागना चाहता हूँ। मुझसे न मंजूरी हुई,
न होगी। जिसके भाग्य में चक्की पीसना बदा हो, वह
पीसे!
मेरे भाग्य में चैन करना लिखा है, मैं क्यों अपना सिर ओखली में दूँ ? मैं तो किसी से
काम करने को नहीं कहता। आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए है। अपनी-अपनी फिक्र
कीजिए। मुझे आध सेर आटे की कमी नही है।
इस तरह की सभाऍं कितनी ही
बार हो चुकी थीं,
परन्तु इस देश की सामाजिक और राजनीतिक सभाओं की तरह इसमें भी कोई
प्रयोजन सिद्ध नहीं होता था। दो-तीन दिन गुमान ने घर पर खाना नहीं खाया। जतन सिंह
ठाकुर शौकीन आदमी थे, उन्हीं की चौपाल में पड़ा रहता। अंत
में बूढ़े चौधरी गये और मना के लाये। अब फिर वह पुरानी गाड़ी अड़ती, मचलती, हिलती चलने लगी।
४
पांडे घर के चूहों की तरह, चौधरी के धर
में बच्चें भी सयाने थे। उनके लिए घोड़े मिट्टी के घोड़े और नावें कागज की नावें
थीं। फलों के विषय में उनका ज्ञान असीम था, गूलर और जंगली
बेर के सिवा कोई ऐसा फल न था जिसे बीमारियों का घर न समझते हों, लेकिन गुरदीन के खोंचे में ऐसा प्रबल आकर्षण था कि उसकी ललकार सुनते ही
उनका सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता साधारण बच्चों की तरह यदि सोते भी हो; तो चौंक पड़ते थे।
गुरदीन उस था। गॉँव में साप्ताहिक फेरे लगाता था। उसके शुभागमन की प्रतीक्षा और
आकांक्षा में कितने ही बालकों को बिना किंडरागार्टन की रंगीन गोलियों के ही, संख्याऍं और
दिनों के नाम याद हो गए थे। गुरदीन बूढ़ा-सा, मैला-कुचैला
आदमी था;
किन्तु आस-पास में उसका नाम उपद्रवी लड़कों के लिए हनुमान-मंत्र से कम न था। उसकी
आवाज सुनते ही उसके खोंचे पर लड़कों का ऐसा धावा होता कि मक्खियों की असंख्य सेना
को भी रण-स्थल से भागना पड़ता था। और जहॉँ बच्चों के लिए मिठाइयॉँ थीं, वहॉँ गुरदीन
के पास माताओं के लिए इससे भी ज्यादा मीठी बातें थी। मॉँ कितना ही मना करती रहे,
बार-बार पैसा न रहने का बहाना करे पर गुरदीन चटपट मिठाईयों का दोनों
बच्चों के हाथ में रख ही देता और स्नहे-पूर्ण भाव से कहता---बहू जी, पैसों की कोई चिन्ता न करो, फिर मिलते रहेंगे,
कहीं भागे थोड़े ही जाते हैं। नारायण ने तुमको बच्चे
दिए हैं, तो मुझे भी
उनकी न्योछावर मिल जाती है, उन्हीं की बदौलत मेरे बाल-बच्चे
भी जीते हैं। अभी क्या, ईश्वर इनका मौर तो दिखावे, फिर देखना कैसा ठनगन करता हूँ।
गुरदीन का यह व्यवहारा चाहे वाणिज्य-नियमों के
प्रतिकूल ही क्यों न हो, चाहे, ‘नौ नगद सही, तेरह उधार
नही’
वाली कहावत अनुभव-सिद्ध ही क्यों न हो,
किन्तु मिष्टाभाषी गुरदीन को कभी अपने इस व्यवहार पर पछताने या
उसमें संशोन करने की जरुरत नहीं हुई।
मंगल का शुभ दिन था। बच्चे
बड़े बेचैनी से अपने दरवाजे पर खड़े गुरदीन की राह देख रहे थे। कई उत्साही लड़के
पेड़ पर चढ़ गए और कोई-कोई अनुराग से विवश होकर गॉँव के बाहर निकल गए थे। सूर्य
भगवान् अपना सुनहला गाल लिए पूरब से पश्चिम जा पहुँचे थे, इतने में ही
गुरदीन आता हुआ दिखाई दिया। लड़कों ने दौड़कर उसका दामन पकड़ा और आपस में
खींचातानी होने लगी। कोई कहता था मेरे घर चलो; कोई अपने घर का
न्योता देता था। सबसे पहले भानु चौधरी का मकान पड़ा। गुरदीन अपना खोंचा उतार दिया।
मिठाइयों की लूट शुरु हो गयी। बालको और स्त्रियों का ठट्ट लग गया। हर्ष और विषाद, संतोष और
लोभ, ईर्ष्या ओर क्षोभ, द्वेष और जलन
की नाट्यशाला सज गयी। कनूनदॉँ बितान की पत्नी अपने तीनों लड़कों को लिए हुए निकली।
शान की पत्नी भी अपने दोनों लड़कों के साथ उपस्थित हुई। गुरदीन ने मीठी बातें करनी
शुरु की। पैसे झोली में रखे, धेले की मिठाई दी और धेले का
आशीर्वाद। लड़के दोनो लिए उछलते-कूदते घर में दाखिल हुए। अगर सारे गॉँव में कोई
ऐसा बालक था जिसने गुरदीन की उदारता से लाभ उठाया हो, तो वह
बॉँके गुमान का लड़का धान था।
यह कठिन था कि बालक धान अपने
भाइयों-बहनों को हँस-हँस और उलल-उछल कर मिठाइयॉँ खाते देख कर सब्र कर जाय! उस पर तुर्रा यह कि
वे उसे मिठाइयॉँ दिख-दिख कर ललचाते और चिढ़ाते थे। बेचारा धान चीखता और अपनी मात का ऑंचल
पकड़-पकड़ कर दरवाजे की तरफ खींचता था;
पर वह अबला क्या करे। उसका ह्रदय बच्चे के लिए ऐंठ-ऐंठ कर रह जाता था। उसके पास एक
पैसा भ्री नहीं था। अपने दुर्भाग्य पर,
जेठानियों की निष्ठुरता पर और सबसे ज्यादा अपने पति के निखट्टूपन पर
कुढ़-कुढ़ कर रह जाती थी। अपना आदमी ऐसा निकम्मा न होता, तो
क्यों दूसरों का मुँह देखना पड़ता, क्यों दूसरों के धक्के
खाने पड़ते ? उठा लिया और प्यार से दिलासा देने लगी—बेटा, रोओ मत,
अबकी गुरदीन आवेगा तो तुम्हें बहुत-सी मिठाई ले दूँगी, मैं इससे अच्छी मिठाई बाजार से मँगवा दूँगी, तुम
कितनी मिठाई खाओग!
यह कहते कहते उसकी ऑंखें भर अयी। आह!
यह मनहूस मंगल आज ही फिर आवेगा;
और फिर ये ही बहाने करने पड़ेगे!
हाय, अपना प्यारा बच्चा धेले की मिठाई को तरसे और घर में किसी का पत्थर-सा
कलेजा न पसीजे!
वह बेचारी तो इन चिंताओं में डूबी हुई थी ओर धान किसी तरह चुप ही न होता था। जब
कुछ वश न चला, तो मॉँ की गोद से जमीन पर उतर कर लोठने लगा और रो-रो कर दुनिया सिर पर उठा
ली। मॉँ ने बहुत बहलाया, फुसलाया, यहॉँ
तक कि उसे बच्चे के इस हठ पर क्रोध भी आ गया। मानव ह्रदय के रहस्य कभी समझ में
नहीं आते। कहॉँ तो बच्चे को प्यार से चिपटाती थी, ऐसी
झल्लायी की उसे दो-तीन थप्पड़ जोर से लगाये और घुड़कर कर बोली—चुप रह आभगे! तेरा ही मुँह मिठाई
खाने का है ? अपने दिन को नहीं रोता, मिठाई खाने चला है।
बाँका गुमान अपनी कोठरी के
द्वार पर बैठा हुआ यह कौतुक बड़े ध्यान से देख रहा था। वह इस बच्चे को बहुत चाहता
था। इस वक्त के थप्पड़ उसके ह्रदय में तेज भाले के समान लगे और चुभ गया। शायद उसका
अभिप्राय भी यही था। धुनिया रुई को धुनने के लिए तॉँत पर चोट लगाता है।
जिस तरह पत्थर और पानी में
आग छिपी रहती है,
उसी तरह मनुष्य के ह्रदय में भी, चाहे वह कैसा
ही क्रूर और कठोर क्यों न हो, उत्कृष्ट और कोमल भाव छिपे
रहते हैं। गुमान की ऑंखें भर आयी। ऑंसू की बूँदें
बहुधा हमारे ह्रदय की
मुलिनता को उज्जवल कर देती हैं। गुमान सचेत हो गया। उसने जा कर बच्चे का गोद में
उठा लिया और अपनी पत्नी से करुणोत्पादक स्वर में बोला—बच्चे पर इतना क्रोध
क्यों करती हो ? तुम्हारा दोषी मैं हूँ, मुझको जो दंड चाहो, दो। परमात्मा ने चाहा तो कल से लोग इस घर में मेरा और मेरे बाल-बच्चों का
भी आदर करेंगे। तुमने आज मुझे सदा के लिए इस तरह जगा दिया, मानों
मेरे कानों में शंखनाद कर मुझे कर्म-पथ में प्रवेश का उपदेश दिया हो।
नाग-पूजा
प्रात:काल था। आषढ़ का पहला
दौंगड़ा निकल गया था। कीट-पतंग चारों तरफ रेंगते दिखायी देते थे। तिलोत्तमा ने
वाटिका की ओर देखा तो वृक्ष और पौधे ऐसे निखर गये थे जैसे साबुन से मैने कपड़े
निखर जाते हैं। उन पर एक विचित्र आध्यात्मिक शोभा छायी हुई थी मानों योगीवर आनंद
में मग्न पड़े हों। चिड़ियों में असाधारण चंचलता थी। डाल-डाल, पात-पात
चहकती फिरती थीं। तिलोत्तमा बाग में निकल आयी। वह भी इन्हीं पक्षियों की भॉँति
चंचल हो गयी थी। कभी किसी पौधे की देखती, कभी किसी फूल पर
पड़ी हुई जल की बूँदो को हिलाकर अपने मुँह पर उनके शीतल छींटे डालती। लाज
बीरबहूटियॉँ रेंग रही थी। वह उन्हें चुनकर हथेली पर रखने लगी। सहसा उसे एक काला
वृहत्काय सॉँप रेंगता दिखायी-दिया। उसने पिल्लाकर कहा—अम्मॉँ, नागजी जा
रहे हैं। लाओ थोड़ा-सा दूध उनके लिए कटोरे में रख दूं।
अम्मॉँ ने कहा—जाने दो बेटी, हवा खाने
निकले होंगे।
तिलोत्तमा—गर्मियों में कहॉँ
चले जाते हैं ? दिखायी नहीं देते।
मॉँ—कहीं जाते नहीं बेटी, अपनी बॉँबी
में पड़े रहते हैं।
तिलोत्तमा—और कहीं नहीं जाते ?
मॉँ—बेटी, हमारे देवता
है और कहीं क्यों जायेगें ? तुम्हारे जन्म के साल से ये
बराबर यही दिखायी देतें हैं। किसी से नही बोलते। बच्चा पास से निकल जाय, पर जरा भी नहीं ताकते। आज तक कोई चुहिया भी नहीं पकड़ी।
तिलोत्तमा—तो खाते क्या होंगे ?
मॉँ—बेटी, यह लोग हवा
पर रहते हैं। इसी से इनकी आत्मा दिव्य हो जाती है। अपने पूर्वजन्म की बातें इन्हें
याद रहती हैं। आनेवाली बातों को भी जानते हैं। कोई बड़ा योगी जब अहंकार करने लगता
है तो उसे दंडस्वरुप इस योनि में जन्म लेना पड़ता है। जब तक प्रायश्चित पूरा नहीं
होता तब तक वह इस योनि में रहता है। कोई-कोई तो सौ-सौ, दो-दो
सौं वर्ष तक जीते रहते हैं।
तिलोत्तमा—इसकी पूजा न करो तो
क्या करें।
मॉँ—बेटी, कैसी बच्चों
की-सी बातें करती हो। नाराज हो जायँ तो सिर पर न जाने क्या विपत्ति आ पड़े। तेरे
जन्म के साल पहले-पहल दिखायी दिये थे। तब से साल में दस-पॉँच बार अवश्य दर्शन दे
जाते हैं। इनका ऐसा प्रभाव है कि आज तक किसी के सिर में दर्द तक नहीं हुआ।
२
कई वर्ष हो गये। तिलोत्तमा
बालिका से युवती हुई। विवाह का शुभ अवसर आ पहुँचा। बारात आयी, विवाह हुआ,
तिलोत्तमा के पति-गृह जाने का मुहूर्त आ पहुँचा।
नयी वधू का श्रृंगार हो रहा
था। भीतर-बाहर हलचल मची हुई थी,
ऐसा जान पड़ता था भगदड़ पड़ी हुई है। तिलोत्तमा के ह्रदय में वियोग
दु:ख की तरंगे उठ रही हैं। वह एकांत में बैठकर रोना चाहती है। आज माता-पिता,
भाईबंद, सखियॉँ-सहेलियॉँ सब छूट जायेगी। फिर
मालूम नहीं कब मिलने का संयोग हो। न जाने अब कैसे आदमियों से पाला पड़ेगा। न जाने
उनका स्वभाव कैसा होगा। न जाने कैसा बर्ताव करेंगे। अममाँ की ऑंखें एक क्षण भी न
थमेंगी। मैं एक दिन के लिए कही, चली जाती थी तो वे रो-रोकर
व्यथित हो जाती थी।
अब यह जीवनपर्यन्त का वियोग
कैसे सहेंगी ? उनके सिर में दर्द होता था जब तक मैं धीरे-धीरे न मलूँ, उन्हें किसी तरह कल-चैन ही न पड़ती थी। बाबूजी को पान बनाकर कौन देगा ?
मैं जब तक उनका भोजन न बनाऊँ, उन्हें कोई चीज
रुचती ही न थी? अब उनका भोजन कौन बानयेगा ? मुझसे इनको देखे बिना कैसे रहा जायगा? यहॉँ जरा सिर
में दर्द भी होता था तो अम्मॉं और बाबूजी घबरा जाते थे। तुरंत बैद-हकीम आ जाते थे।
वहॉँ न जाने क्या हाल होगा। भगवान् बंद घर में कैसे रहा जायगा ? न जाने वहॉँ खुली छत है या नहीं। होगी भी तो मुझे कौन सोने देगा ? भीतर घुट-घुट कर मरुँगी। जगने में जरा देर हो जायगी तो ताने मिलेंगे।
यहॉँ सुबह को कोई जगाता था, तो अम्मॉँ कहती थीं, सोने दो। कच्ची नींद जाग जायगी तो सिर में पीड़ा होने लगेगी। वहॉँ व्यंग
सुनने पड़ेंगे, बहू आलसी है, दिन भर
खाट पर पड़ी रहती है। वे (पति) तो बहुत सुशील मालूम होते हैं। हॉँ, कुछ अभिमान अवश्य हैं। कहों उनका स्वाभाव निठुर हुआ तो............?
सहसा उनकी माता ने आकर
कहा-बेटी, तुमसे एक बात कहने की याद न रही। वहॉं नाग-पूजा अवश्य करती रहना। घर के
और लोग चाहे मना करें;
पर तुम इसे अपना कर्तव्य समझना। अभी मेरी ऑंखें जरा-जरा झपक गयी थीं। नाग बाबा ने
स्वप्न में दर्शन दिये।
तिलोत्तमा—अम्मॉँ, मुझे भी
उनके दर्शन हुए हैं, पर मुझे तो उन्होंले बड़ा विकाल रुप
दिखाया। बड़ा भंयंकर स्वप्न था।
मॉँ—देखना, तुम्हारे धर
में कोई सॉँप न मारने पाये। यह मंत्र नित्य पास रखना।
तिलोत्तमा अभी कुछ जवाब न
देने पायी थी कि अचानक बारात की ओर से रोने के शब्द सुनायी दिये, एक क्षण में
हाहाकर मच गया। भंयकर शोक-घटना हो गयी। वर को सौंप ने काट लिया। वह बहू को बिदा
कराने आ रहा था। पालकी में मसनद के नीचे एक काला साँप छिपा हुआ था। वर ज्यों ही
पालकी में बैठा, साँप ने काट लिया।
चारों ओर कुहराम मच गया।
तिलात्तमा पर तो मनों वज्रपात हो गया। उसकी मॉँ सिर पीट-पीट रोने लगी। उसके पिता
बाबू जगदीशचंद्र मूर्च्छित होकर गिर पड़े। ह्रदयरोग से पहले ही से ग्रस्त थे।
झाड़-फूँक करने वाले आये,
डाक्टर बुलाये गये, पर विष घातक था। जरा देर
में वर के होंठ नीले पड़ गये, नख काले हो गये, मूर्छा आने लगी। देखते-देखते शरीर ठंडा पड़ गया। इधर उषा की लालिमा ने
प्रकृति को अलोकित किया, उधर टिमटिमाता हुआ दीपक बुझ गया।
जैसे कोई मनुष्य बोरों से
लदी हुई नाव पर बैठा हुआ मन में झुँझलाता है कि यह और तेज क्यों नहीं चलती , कहीं आराम
से बैठने की जगह नहीं, राह इतनी हिल क्यों रही हैं, मैं व्यर्थ ही इसमें बैठा;
पर अकस्मात् नाव को भँवर में पड़ते देख कर उसके मस्तूल से चिपट जाता है, वही दशा
तिलोत्तमा की हुई। अभी तक वह वियोगी दु:ख में ही मग्न थी, ससुराल
के कष्टों और दुर्व्यवस्थाओं की चिंताओं में पड़ी हुई थी। पर, अब उसे होश आया की इस नाव के साथ मैं भी डूब रही हूँ। एक क्षण पहले वह
कदाचित् जिस पुरुष पर झुँझला रही थी, जिसे लुटेरा और डाकू
समझ रही थी, वह अब कितना प्यारा था। उसके बिना अब जीवन एक
दीपक था;
बुझा हुआ। एक वृक्ष था;
फल-फूल विहीन। अभी एक क्षण पहले वह दूसरों की इर्ष्या का कारण थी, अब दया और
करुणा की।
थोड़े ही दिनों में उसे
ज्ञात हो गया कि मैं पति-विहीन होकर संसार के सब सुखों से वंचित हो गयी।
३
एक वर्ष बीत गया। जगदीशचंद्र
पक्के धर्मावलम्बी आदमी थे,
पर तिलोत्तमा का वैधव्य उनसे न सहा गया। उन्होंने तिलोत्तमा के
पुनर्विवाह का निश्चय कर लिया। हँसनेवालों ने तालियॉँ बाजायीं पर जगदीश बाबू ने
हृदय से काम लिया। तिलात्तमा पर सारा घर जान देता था। उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई
बात न होने पाती यहॉँ तक कि वह घर की मालकिन बना दी गई थी। सभी ध्यान रखते कि उसकी
रंज ताजा न होने पाये। लेकिन उसके चेहरे पर उदासी छायी रहती थी, जिसे देख कर लोगों को दु:ख होता था। पहले तो मॉँ भी इस सामाजिक अत्याचार
पर सहमत न हुई;
लेकिन बिरादरीवालों का विरोध ज्यों-ज्यों बढ़ता गया उसका विरोध ढीला पड़ता गया।
सिद्धांत रुप से तो प्राय: किसी को आपत्ति न थी किन्तु उसे व्यवहार में लाने का
साहस किसी में न था। कई महीनों के लगातार प्रयास के बाद एक कुलीन सिद्धांतवादी, सुशिक्षित
वर मिला। उसके घरवाले भी राजी हो गये। तिलोत्तमा को समाज में अपना नाम बिकते देख
कर दु:ख होता था। वह मन में कुढ़ती थी कि पिताजी नाहक मेरे लिए समाज में नक्कू बन
रहे हैं। अगर मेरे भाग्य में सुहाग लिखा होता तो यह वज्र ही क्यों गिरता। तो उसे
कभी-कभी ऐसी शंका होती थी कि मैं फिर विधवा हो जाऊँगी। जब विवाह निश्चित हो गया और
वर की तस्वीर उसके सामने आयी तो उसकी ऑंखों में ऑंसू भर आये। चेहरे से कितनी
सज्जनता, कितनी दृढ़ता, कितनी विचारशीलता टपकती थी। वह चित्र को लिए हुए माता
के पास गयी और शर्म से सिर झुकाकर बोली-अम्मॉं, मुँह मुझे तो
न खोलना चाहिए, पर अवस्था ऐसी आ पड़ी है कि बिना मुँह खोले
रहा नहीं जाता। आप बाबूजी को मना कर दें। मैं जिस दशा में हूँ संतुष्ट हूँ। मुझे
ऐसा भय हो रहा है कि अबकी फिर वही शोक घटना.............
मॉँ ने सहमी हुई ऑंखों से
देख कर कहा—बेटी
कैसी अशगुन की बात मुँह से निकाल रही हो। तुम्हारे मन में भय समा गया है, इसी से यह
भ्रम होता है। जो होनी थी, वह हो चुकी। अब क्या ईश्वर क्या
तुम्हारे पीछे पड़े ही रहेंगे ?
तिलोत्तमा—हॉँ, मुझे तो ऐसा
मालूम होता है ?
मॉँ—क्यों, तुम्हें ऐसी
शंका क्यों होती है ?
तिलोत्तमा—न जाने क्यो ? कोई मेरे मन
मे बैठा हुआ कह रहा है कि फिर अनिष्ट होगा। मैं प्रया: नित्य डरावने स्वप्न देखा
करती हूँ। रात को मुझे ऐसा जान पड़ता है कि कोई प्राणी जिसकी सूरत सॉँप से बहुत
मिलती-जुलती है मेरी चारपाई के चारों ओर घूमता है। मैं भय के मारे चुप्पी साध लेती
हूँ। किसी से कुछ कहती नहीं।
मॉँ ने समझा यह सब भ्रम है।
विवाह की तिथि नियत हो गयी। यह केवल तिलोत्तमा का पुनर्संस्कार न था, बल्कि
समाज-सुधार का एक क्रियात्मक उदाहरण था। समाज-सुधारकों के दल दूर से विवाह
सम्मिलित होने के लिए आने लगे, विवाह वैदिक रीति से हुआ।
मेहमानों ने खूब वयाख्यान दिये। पत्रों ने खूब आलोचनाऍं कीं। बाबू जगदीशचंद्र के
नैतिक साहस की सराहना होने लगी। तीसरे दिन बहू के विदा होने का मुहूर्त था।
जनवासे में यथासाध्य रक्षा
के सभी साधनों से काम लिया गया था। बिजली की रोशनी से सारा जनवास दिन-सा हो गया
था। भूमि पर रेंगती हुई चींटी भी दिखाई देती थी। केशों में न कहीं शिकन थी, न सिलवट और
न झोल। शामियाने के चारों तरफ कनातें खड़ी कर दी गयी थी। किसी तरफ से
कीड़ो-मकोड़ों के आने की संम्भावना न थी; पर भावी प्रबल होती है।
प्रात:काल के चार बजे थे। तारागणों की बारात विदा हो रही थी। बहू की विदाई की
तैयारी हो रही थी। एक तरफ शहनाइयॉँ बज रही थी। दूसरी तरफ विलाप की आर्त्तध्वनि उठ
रही थी। पर तिलोत्तमा की ऑंखों में ऑंसू न थे, समय नाजुक था। वह किसी तरह घर
से बाहर निकल जाना
चाहती थी। उसके सिर पर तलवार
लटक रही थी। रोने और सहेलियों से गले मिलने में कोई आनंद न था। जिस प्राणी का
फोड़ा चिलक रहा हो उसे जर्राह का घर बाग में सैर करने से ज्यादा अच्छा लगे, तो क्या
आश्चर्य है।
वर को लोगों ने जगया। बाजा
बजने लगा। वह पालकी में बैठने को चला कि वधू को विदा करा लाये। पर जूते में पैर
डाला ही था कि चीख मार कर पैर खींच लिया। मालूम हुआ, पॉँव चिनगारियों पर पड़ गया।
देखा तो एक काला साँप जूते में से निकलकर रेंगता चला जाता था। देखते-देखते गायब हो
गया। वर ने एक सर्द आह भरी और बैठ गया। ऑंखों में अंधेरा छा गया।
एक क्षण में सारे जनवासे में
खबर फैली गयी, लोग दौड़ पड़े। औषधियॉँ पहले ही रख ली गयी थीं। सॉँप का मंत्र जाननेवाले
कई आदमी बुला लिये गये थे। सभी ने दवाइयॉँ दीं। झाड़-फूँक शुरु हुई। औषधियॉँ भी दी
गयी, पर काल के समान किसी का वश न चला। शायद मौत सॉँप का वेश
धर कर आयी थी। तिलोत्तमा ने सुना तो सिर पीट लिया। वह विकल होकर जनवासे की तरफ
दौड़ी। चादर ओढ़ने की भी सुधि न रही। वह अपने पति के चरणों को माथे से लगाकर अपना
जन्म सफल करना चाहती थी। घर की स्त्रियों ने रोका। माता भी रो-रोकर समझाने लगी।
लेकिन बाबू जगदीशचन्द्र ने कहा-कोई हरज नहीं, जाने दो। पति
का दर्शन तो कर ले। यह अभिलाषा क्यों रह जाय। उसी शोकान्वित दशा में तिलोत्तमा
जनवासे में पहुँची, पर वहॉँ उसकी तस्कीन के लिए मरनेवाले की
उल्टी सॉँसें थी। उन अधखुले नेत्रों में असह्य आत्मवेदना और दारुण नैराश्य।
४
इस अद्भुत घटना का सामाचार
दूर-दूर तक फैल गया। जड़वादोगण चकित थे,
यह क्या माजरा है। आत्मवाद के भक्त ज्ञातभाव से सिर हिलाते थे मानों
वे चित्रकालदर्शी हैं। जगदीशचन्द्र ने नसीब ठोंक लिया। निश्चय हो गया कि कन्या के
भाग्य में विधवा रहना ही लिखा है। नाग की पूजा साल में दो बार होने लगी। तिलोत्तमा
के चरित्र में भी एक विशेष अंतर दीखने लगा। भोग और विहार के दिन भक्ति और
देवाराधना में कटने लगे। निराश प्राणियों का यही अवलम्ब है।
तीन साल बीत थे कि ढाका
विश्वविद्यालय के अध्यापक ने इस किस्से को फिर ताजा किया। वे पशु-शास्त्र के
ज्ञाता थे। उन्होंने साँपों के आचार-व्यवहार का विशेष रीति से अध्ययन किया। वे इस
रहस्य को खोलना चाहते थे। जगदीशचंद्र को विवाह का संदेश भेजा। उन्होंने टाल-मटोल
किया। दयाराम ने और भी आग्रह किया। लिखा,
मैने वैज्ञानिक अन्वेषण के लिए यह निश्चय किया है। मैं इस विषधर नाग
से लड़ना चाहता हूँ। वह अगर सौ दॉँत ले कर आये तो भी मुझे कोई हानि नहीं पहुँचा
सकता, वह मुझे काट कर आप ही मर जायेगा। अगर वह मुझे काट भी ले
तो मेरे पास ऐसे मंत्र और औषधियॉँ है कि
मैं एक क्षण में उसके विष को उतार सकता हूँ। आप इस विषय में कुछ चिंता न किजिए।
मैं विष के लिए अजेय हूँ। जगदशीचंद्र को अब कोई उज्र न सूझा। हॉँ, उन्होंने एक विशेष प्रयत्न यह किया कि ढाके में ही विवाह हो। अतएब वे अपने
कुटुम्बियों को साथ ले कर विवाह के एक सप्ताह पहले गये। चलते समय अपने संदूक,
बिस्तर आदि खूब देखभाल कर रखे कि सॉँप कहीं उनमें उनमें छिप कर न
बैठा जाय। शुभ लगन में विवाह-संस्कार हो गया। तिलोत्तमा विकल हो रही थी। मुख पर एक
रंग आता था, एक रंग जाता था, पर
संस्कार में कोई विध्न-बाधा न पड़ी। तिलोत्तमा रो धो-कर ससुराल गयी। जगदीशचंद्र घर
लौट आये, पर ऐसे चिंतित थे जैसे कोई आदमी सराय मे खुला हुआ
संदूक छोड़ कर बाजार चला जाय।
तिलोत्तमा के स्वभाव में अब
एक विचित्र रुपांतर हुआ। वह औरों से हँसती-बोलती आराम से खाती-पीती सैर करने जाती, थियेटरों और
अन्य सामाजिक सम्मेलनों में शरीक होती। इन अवसरों पर प्रोफेसर दया
राम से भी बड़े प्रेम का
व्यवहार करती, उनके आराम का बहुत ध्यान रखती। कोई काम उनकी इच्छा के विरुद्ध न करती। कोई
अजनबी आदमी उसे देखकर कह सकता था, गृहिणी हो तो ऐसी हो। दूसरों
की दृष्टि में इस दम्पत्ति का जीवन आदर्श था, किन्तु आंतरिक
दशा कुछ और ही थी। उनके साथ शयनागार में जाते ही उसका मुख विकृत हो जाता, भौंहें तन जाती, माथे पर बल पड़ जाते, शरीर अग्नि की भॉँति जलने लगता, पलकें खुली रह जाती,
नेत्रों से ज्वाला-सी निकलने लगती और उसमें से झुलसती हुई लपटें
निकलती, मुख पर कालिमा छा जाती और यद्यपि स्वरुप में कोई
विशेष अन्तर न दिखायी देखायी देता;
पर न जाने क्यों भ्रम होने लगता,
यह कोई नागिन है। कभी –कभी
वह फुँकारने भी लगतीं। इस स्थिति में दयाराम को उनके समीप जाने या उससे कुछ बोलने
की हिम्मत न पड़ती। वे उसके रुप-लावण्य पर मुग्ध थे, किन्तु इस अवस्था में उन्हें
उससे घृणा होती। उसे इसी उन्माद के आवेग में छोड़ कर बाहर निकल आते। डाक्टरों से
सलाह ली, स्वयं इस विषय की कितनी ही किताबों का अध्ययन किया; पर रहस्य कुछ समझ
में न आया, उन्हें भौतिक विज्ञान में अपनी अल्पज्ञता स्वीकार करनी पड़ी।
उन्हें अब अपना जीवन असह्य
जान पड़ता। अपने दुस्साहस पर पछताते। नाहक इस विपत्ति में अपनी जान फँसायी। उन्हें
शंका होने लगी कि अवश्य कोई प्रेत-लीला है !
मिथ्यावादी न थे,
पर जहॉँ बुद्धि और तर्क का कुछ वश नहीं चलता, वहॉँ
मनुष्य विवश होकर मिथ्यावादी हो जाता है।
शनै:-शनै: उनकी यह हालत हो
गयी कि सदैव तिलोत्तमा से सशंक रहते। उसका उन्माद, विकृत मुखाकृति उनके ध्यान से न
उतरते। डर लगता कि कहीं यह मुझे मार न डाले। न जाने कब उन्माद का आवेग हो। यह
चिन्ता ह्रदय को व्यथित किया करती। हिप्नाटिज्म, विद्युत्शक्ति
और कई नये आरोग्यविधानों की परीक्षा की गयी । उन्हें हिप्नाटिज्म पर बहुत भरोसा था; लेकिन जब यह योग भी
निष्फल हो गया तो वे निराश हो गये।
५
एक दिन प्रोफेसर दयाराम किसी
वैज्ञनिक सम्मेलन में गए हुए थे। लौटे तो बारह बज गये थे। वर्षा के दिन थे।
नौकर-चाकर सो रहे थे। वे तिलोत्तमा के शयनगृह में यह पूछने गये कि मेरा भोजन कहॉँ
रखा है। अन्दर कदम रखा ही था कि तिलोत्तमा के सिरंहाने की ओर उन्हें एक अतिभीमकाय
काला सॉँप बैठा हुआ दिखायी दिया। प्रो. साहब चुपके से लौट आये। अपने कमरे में जा
कर किसी औषधि की एक खुराक पी और पिस्तौल तथा साँगा ले कर फिर तिलोत्तमा के कमरे
में पहुँचे। विश्वास हो गया कि यह वही मेरा पुराना शत्रु है। इतने दिनों में टोह
लगाता हुआ यहॉँ आ पहुँचा। पर इसे तिलोत्तामा से क्यों इतना स्नेह है। उसके सिरहने
यों बैठा हुआ है मानो कोई रस्सी का टुकड़ा है। यह क्या रहस्य है ! उन्होंने साँपों के
विषय में बड़ी अदभूत कथाऍं पढ़ी और सुनी थी,
पर ऐसी कुतूहलजनक घटना का उल्लेख कहीं न देखा था। वे इस भॉँति
सशसत्र हो कर फिर कमरे में पहुँचे तो साँप का पात न था। हॉँ, तिलोत्तमा के सिर पर भूत सवार हो गया था। वह बैठी हुई आग्ये हुई नेत्रों
के द्वारा की ओर ताक रही थी। उसके नयनों से ज्वाला निकल रही थी, जिसकी ऑंच दो गज तक लगती। इस समय उन्माद अतिशय प्रचंड था। दयाराम को देखते
ही बिजली की तरह उन पर टूट पड़ी और हाथों से आघात करने के बदले उन्हें दॉँतों से
काटने की चेष्टा करने लगी। इसके साथ ही अपने दोनों हाथ उनकी गरदन डाल दिये। दयाराम
ने बहुतेरा चाहा, ऐड़ी-चोटी तक का जोर लगा कि अपना गला छुड़ा
लें, लेकिन तिलोत्तमा का बाहुपाश प्रतिक्षण साँप की केड़ली
की भॉँति कठोर एवं संकुचित होता जाता था। उधर यह संदेह था कि इसने मुझे काटा तो
कदाचित् इसे जान से हाथ धोना पड़े। उन्होंने अभी जो औषधि पी थी, वह सर्प विष से
अधिक घातक थी। इस दशा में
उन्हें यह शोकमय विचार उत्पन्न हुआ। यह भी कोई जीवन है कि दम्पति का उत्तरदायित्व
तो सब सिर पर सवार,
उसका सुख नाम का नहीं, उलटे रात-दिन जान का
खटका। यह क्या माया है। वह सॉँप कोई प्रेत तो नही है जो इसके सिर आकर यह दशा कर
दिया करता है। कहते है कि ऐसी अवस्था में रोगी पर चोट की जाती है, वह प्रेत पर ही पड़ती हैं नीचे जातियों में इसके उदाहरण भी देखे हैं। वे
इसी हैंसंबैस में पड़े हुए थे कि उनका दम घुटने लगा। तिलात्तमा के हाथ रस्सी के
फंदे की भॉँति उनकी गरदन को कस रहे थें वे दीन असहाय भाव से इधर-उधर ताकने लगे।
क्योंकर जान बचे, कोई उपाय न सूझ पड़ता था। साँस लेना।
दुस्तर हो गया, देह शिथिल पड़ गयी, पैर
थरथराने लगे। सहसा तिलोत्तमा ने उनके बाँहों की ओर मुँह बढ़ाया। दयाराम कॉँप उठे।
मृत्यु ऑंखें के सामने नाचने लगी। मन में कहा—यह इस समय मेरी
स्त्री नहीं विषैली भयंकर नागिन है: इसके विष से जान बचानी मुश्किल है। अपनी औषधि
पर जो भरोसा था,
वह जाता रहा। चूहा उन्मत्त दशा में काट लेता है तो जान के लाले पड़
जाते है। भगवान् ? कितन विकराल स्वरुप है ? प्रत्यक्ष नागिन मालूम हो रही है। अब उलटी पड़े या सीधी इस दशा का अंत
करना ही पड़ेगा। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि अब गिरा ही चाहता हूँ। तिलोत्तमा बार-बार
सॉँप की भॉँति फुँकार मार कर जीभ निकालते हुए उनकी ओर झपटती थी। एकाएक वह बड़े
कर्कश स्वर से बोली—‘मूर्ख
? तेरा इतना साहस कि तू इस सुदंरी से प्रेमलिंगन करे।’ यह कहकर वह बड़े
वेग से काटने को दौड़ी। दयाराम का धैर्य जाता रहा। उन्होंने दहिना हाथ सीधा किया
और तिलोत्तमा की छाती पर पिस्तौल चला दिया। तिलोत्तमा पर कुछ असर न हुआ। बाहें और
भी कड़ी हो गयी;
ऑंखों से चिनगारियॉँ निकलने लगी। दयाराम ने दूसरी गोली दाग दी। यह चोट पूरी पड़ी।
तिलोत्तमा का बाहु-बंधन ढीला पड़ गया। एक क्षण में उसके हाथ नीचे को लटक गये, सिर झ्रुक
गया और वह भूमि पर गिर पड़ी।
तब वह दृश्य देखने में आया
जिसका उदाहराण कदाचित् अलिफलैला चंद्रकांता में भी न मिले। वही फ्लँग के पास, जमीन पर एक
काला दीर्घकाय सर्प पड़ा तड़प रहा था। उसकी छाती और मुँह से खून की धारा बह रही
थी।
दयाराम को अपनी ऑंखों पर
विश्वास न आता था। यह कैसी अदभुत प्रेत-लीला थी! समस्या क्या है किससे पूछूँ
? इस तिलस्म को तोड़ने का प्रयत्न करना मेरे जीवन का एक कर्त्तव्य हो गया।
उन्होंने सॉँगे से सॉँप की देह मे एक कोचा मारा और फिर वे उसे लटकाये हुए ऑंगन में
लाये। बिलकुल बेदम हो गया था। उन्होंने उसे अपने कमरे में ले जाकर एक खाली संदूक
में बंदकर दिया। उसमें भुस भरवा कर बरामदे में लटकाना चाहते थे। इतना बड़ा गेहुँवन
साँप किसी ने न देखा होगा।
तब वे तिलोत्तमा के पास गये।
डर के मारे कमरे में कदम रखने की हिम्मत न
पड़ती थी। हॉँ,
इस विचार से कुछ तस्कीन होती थी कि सर्प प्रेत मर गया है तो उसकी
जान बच गयी होगी। इस आशा और भय की दशा में वे अन्दर गये तो तिलोत्तमा आईने के
सामने खड़ी केश सँवार रही थी।
दयाराम को मानो चारों पदार्थ
मिल गये। तिलोत्तमा का मुख-कमल खिला हुआ था। उन्होंने कभी उसे इतना प्रफुल्लित न
देखा था। उन्हें देखते ही वह उनकी ओर प्रेम से चली और बोली—आज इतनी रात तक कहॉँ
रहे ?
दयाराम प्रेमोन्नत हो कर
बोले—एक
जलसे में चला गया था। तुम्हारी तबीयत कैसी हे ? कहीं दर्द नहीं है ?
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