मुंशी प्रेमचंद यांच्या हिंदी कथा - भाग दोन : Fiction By Munshi Premchand - Part II
बँक का दिवाला
लखनऊ नेशनल बैंक के दफ्तर में
लाला साईंदास आराम कुर्सी पर लेटे हुए शेयरो का भाव देख रहे थे और सोच रहे थे कि
इस बार हिस्सेदारों को मुनाफ़ा कहॉं से दिया जाएगा। चाय, कोयला या जुट के
हिस्से खरीदने, चॉदी, सोने या रूई का
सट्टा करने का इरादा करते; लेकिन नुकसान के भय
से कुछ तय न कर पाते थे। नाज के व्यापार में इस बार बड़ा घाटा रहा; हिस्सेदारों के ढाढस के लिए
हानि- लाभ का कल्पित ब्योरा दिखाना पड़ा ओर नफा पूँजी से देना पड़ा। इससे फिर नाज
के व्यापार में हाथ डालते जी कॉपता था।
पर रूपये
को बेकार डाल रखना असम्भव था। दो-एक दिन में उसे कहीं न कहीं लगाने का उचित उपाय
करना जरूरी था; क्योंकि
डाइरेक्टरों की तिमाही बैठक एक ही सप्ताह
में होनेवाली थी, और यदि उस समय कोई निश्चय न हुआ, तो आगे तीन महीने तक फिर कुछ न हो सकेगा, और छमाही मुनाफे के बॅटवारे के समय फिर वही फरजी कार्रवाई करनी पड़ेगी,
जिसका बार-बार सहन करना बैंक के लिए कठिन है। बहुत देर तक इस उलझन में
पड़े रहने के बाद साईंदास ने घंटी बजायी। इस पर बगल के दूसरे कमरे से एक बंगाली
बाबू ने सिर निकाल का झॉंका।
साईंदास – ताजा-स्टील कम्पनी को एक
पत्र लिख दीजिए कि अपना नया बैलेंस शीट
भेज दें।
बाबू- उन लोगों को रुपया का गरज नहीं।
चिट्ठी का जवाब नहीं देता।
साईदास – अच्छा: नागपुर की स्वदेशी
मिल को लिखिए।
बाबू-उसका कारोबार अच्छा नहीं है। अभी
उसके मजदूरों ने हड़ताल किया था। दो महीना तक मिल बंद रहा।
साईंदास – अजी, तो कहीं लिखों भी! तुम्हारी समझ में सारी दुनिया
बेइमानों से भरी है।
बाबू –बाबा, लिखने को तो हम सब जगह लिख दें;: मगर खाली लिख देने से तो
कुछ लाभ नहीं होता।
लाला साईंदास अपनी कुल –प्रतिष्ठा
ओर मर्यादा के कारण बैक के मैंनेजिंग डाइरेक्टर
हो गये थे पर व्यावहरिक बातों से अपरचित थे । यहीं बंगाली बाबू इनके
सलाहाकर थे और बाबू साहब को किसी कारखाने या कम्पनी पर भरोसा न था। इन्हीं के
अविश्वास के कारण पिछले साल बैंक का रूपया सन्दूक से बाहर न निकल सका था, ओर अब वही रंग फिर दिखायी
देता था। साईंदास को इस कठिनाई से बचने का कोई उपाय न सुझता था। न इतनी हिम्मत थी
कि अपने भरोसे किसी व्यापार में हाथ डालें। बैचेनी की दशा में उठकर कमरे में टहलने
लगे कि दरबान ने आकर खबर दी – बरहल की महारानी की सवारी
आयी है।
लाल साईंदास चौंक पड़े। बरहल की
महारानी को लखनउ आये तीन-चार दिन हुए थे ओर हर एक मे मुंह से उन्हीं की चर्चा
सुनायी देती थी। कोई उनके पहनावे पर मुग्ध था, कोई उनकी सुन्दरता पर, काई उनकी स्वच्छंद वृति पर।
यहॉ तक कि उनकी दासियॉ और सिपाही आदि भी लोगों की चर्चा के पात्र बने हुए थे। रायल
होटल के द्वार पर दर्शको की भीड़ लगी रहती है। कितने ही शौकीन, बेफिकरे लोग, इतर-फरोश, बज़ाज या तम्बाकूगर का वेश
धर का उनका दर्शन कर चुके थे। जिधर से महारानी की सवारी निकल जाती, दर्शको से ठट लग जाते थे।
वाह –वाह, क्या शान! ऐसी इराकी जोड़ी लाट साहब के
सिवा किसी राजा-रईस के यहॉ तो शायद ही निकले, और सजावट भी क्या खूब है! भई, ऐसा गोरे आदमी तो यहॉ भी नहीं दिखायी देते। यहॉं के रईस तो मृगांक, चंद्रोदय और ईश्वर जाने, क्या-क्या खाक-बला खाते है, पर किसी के बदन पर तेज या
प्रकाश का नाम नहीं। ये लोग न जाने क्या भोजन करते और किस कुऍं का पानी पीते हैं
कि जिसे देखिए, ताजा सेब बना हुआ है! यह सब जलबायु का प्रभाब है।
बरहल उतर दिशा में नैपाल के समीप, अँगरेजी–राज्य में एक रियासत थी। यद्यपि जनता उसे बहुत मालदार समझती थी; पर वास्तब में उस रियासत की आमदनी
दो लाख से अधिक न थी। हॉं, क्षेत्रफल बहुत विस्तृत था। बहुत भूमि ऊसर और उजाड़
थी। बसा हुआ भाग भी पहाड़ी और बंजर था।
जमीन बहुत सस्ती उठती थी।
लाला साईंदास न तुरनत अलगानी से रेशमी
सूट उतार कर पहन लिया ओर मेज पर आकर शान से बैठ गए। मानों राजा-रानियों का यहॉ आना
कोई सधारण बात है। दफ्तर के क्लर्क भी सॅभल गए। सारे बैंक में सन्नाटे की हलचल
पैदा हो गई। दरबान ने पगड़ी सॅभाली।
चौकीदार ने तलवार निकाली, और अपने स्थान पर खड़ा हो गया। पंखा–कुली की
मीठी नींद भी टूटी और बंगाली बाबू महारानी के स्वागत के लिए दफ्तर से बाहर निकले।
साईंदास ने बाहरी ठाट तो बना लिया, किंतु चित आशा और भय से चंचल हो रहा था। एक
रानी से व्यवहार करने का यह पहला ही अवसर था; घबराते थे
कि बात करते बने या न बने। रईसों का मिजाज असमान पर होता है। मालूम नहीं, मै बात करने मे कही चूक
जॉंऊं। उन्हें इस समय अपने में एक कमी मालूम हो रही थी। वह राजसी नियमों से
अनभिज्ञ थे। उनका सम्मान किस प्रकार करना चाहिए, उनसे बातें करने में किन
बातों का ध्यान रखना चाहिए, उसकी मर्यादा–रक्षा के लिए कितनी नम्रता
उचित है, इस प्रकार के प्रश्न से वह बड़े असमंजस में पड़े हुए थे, और जी चाहता था कि किसी तरह
परीक्षा से शीघ्र ही छुटकारा हो जाय। व्यापारियों, मामूली जमींदारों या रईसों
से वह रूखाई ओर सफाई का बर्ताब किया करते थे और पढ़े-लिखे सज्जनों से शील और
शिष्टता का। उन अवसरों पर उन्हें किसी विशेष विचार की आवश्यकतान होती थी; पर इस समय बड़ी परेशानी हो रही थी। जैसे कोई लंका–वासी तिबबत
में आ गया हो, जहॉ के रस्म–रिवाज और बात-चीत का उसे ज्ञान न हो।
एकाएक उनकी दृष्टी घड़ी पर पड़ी।
तीसरे पहर के चार बज चुके थे। परन्तु घड़ी
अभी दोपहर की नींद मे मग्न थी। तारीख की सुई ने दौड़ मे समय को भी मात कर दिया था।
वह जल्दी से उठे कि घड़ी को ठीक कर दें, इतने में महारानी के कमरे मे पदार्पण हुआ। साईदास ने घड़ी को छोड़ा
और महारनी के निकट जा बगल मे खड़े हो गये। निश्चय न कर कर सके कि हाथ मिलायें या
झुक कर सलाम करें। रानी जी ने स्वंय हाथ बढ़ा कर उन्हें इस उलझन से छुड़ाया।
जब कुर्सियों पर बैठ गए, तो रानी के प्राइवेट
सेक्रेटरी ने व्यवहार की बातचीत शुरू कीं। बरहल की पुरानी गाथा सुनाने के बाद उसने उन उन्नतियों का वर्णन किया, जो रानी साहब के प्रयत्न से
हुई थीं। इस समय नहरों की एक शाखा निकालने के लिए दस लाख रूपयों की आवश्यकता थी:
परन्तु उन्होंने एक हिन्दुस्तानी बैंक से ही व्यवहार करना अच्छा समझा। अब यह
निर्णय नेशनल बैंक के हाथ में था कि वह इस अवसर से लाभ उठाना चाहता है या नहीं।
बंगाली बाबू-हम रुपया दे सकता है, मगर कागज-पत्तर देखे बिना
कुछ नहीं कर सकता।
सेक्रेटरी-आप कोई जमानत चाहते हैं?
साईंदास उदारता से बोले- महाशय, जमानत के लिए आपकी जबान ही
काफी है।
बंगाली बाबू-आपके पास रियासत का कोई
हिसाब-किताब है?
लाला साईंदास को अपने हेडक्लर्क का
दुनियादारी का बर्ताव अच्छा न लगता था। वह इस समय उदारता के नशे में चूर थे।
महारानी की सूरत ही पक्की जमानत थी। उनके सामने कागज और हिसाब का वर्णन करना
बनियापन जान पड़ता था, जिससे अविश्वास की गंध आती है।
महिलाओं के सामने हम शील और संकोच के
पुतले बन जाते हैं। साईंदास बंगाली बाबू की ओर क्रूर-कठोर दृष्टि से देख का
बोले-कागजों की जॉँच कोई आवश्यक बात नहीं है, केवल हमको विश्वास होना
चाहिए।
बंगाली बाब- डाइरेक्टर लोग कभी न
मानेगा।
साईंदास-–हमको इसकी
परवाह नहीं, हम अपनी जिम्मेदारी पर रुपये दे सकते हैं।
रानी ने साईंदास की ओर कृतज्ञतापूर्ण
दृष्टि से देखा। उनके होठों पर हल्की मुस्कराहट दिखलायी पड़ी।
३
परन्तु डाइरेक्टरों ने हिसाब किताब आय व्यय
देखना आवश्यक समझा और यह काम लाला साईंदास के सुपुर्द हुआ; क्योंकि
और किसी को अपने काम से फुर्सत न थी कि वह एक पूरे दफ्तर का मुआयना करता। साईंदास
ने नियमपालन किया। तीन-चार तक हिसाब जॉँचते रहे। तब अपने इतमीनान के अनुकूल
रिपोर्ट लिखी। मामला तय हो गया। दस्तावेज लिखा गया, रुपये दे दिए गये। नौ रुपये
सैकड़े ब्याज ठहरा।
तीन साल तक बैंक के कारोबार की अच्छी
उन्नति हुईं। छठे महीने बिना कहे सुने पैंतालिस हजार रुपयों की थैली दफ्तर में आ
जाती थी। व्यवहारियों को पॉँच रुपये सैकड़े ब्याज दे दिया जाता था। हिस्सेदारों को
सात रुपये सैकड़े लाभ था।
साईंदास से सब लोग प्रसन्न थे। सब लोग
उनकी सूझ-बूझ की प्रशंसा करते। यहॉँ तक कि बंगाली बाबू भी धीरे धीरे उनके कायल
होते जाते थे। साईंदास उनसे कहा करते-बाबू जी विश्वास संसार से न लुप्त हुआ है। और
न होगा। सत्य पर विश्वास रखना प्रत्येक मनुष्य का धर्म हैं। जिस मनुष्य के चित्त
से विश्वास जाता रहता है उसे मृतक समझना चाहिए। उसे जान पड़ता है, मैं चारों ओर शत्रुओं से
घिरा हुआ हूँ। बड़े से बड़े सिद्ध महात्मा भी उसे रंगे-सियार जान पड़ते हैं। सच्चे
से सच्चे देशप्रेमी उसकी दृष्टि में अपनी प्रशंसा के भूखे ही ठहरते हैं। संसार उसे
धोखे और छल से परिपूर्ण दिखलाई देता है। यहॉँ तक कि उसके मन में परमात्मा पर
श्रद्धा और भक्ति लुप्त हो जाती हैं। एक प्रसिद्ध फिलासफर का कथन है कि प्रत्येक
मनुष्य को जब तक कि उसके विरूद्ध कोई
प्रत्यक्ष प्रमाण न पाओ भलामानस समझो। वर्तमान शासन प्रथा इसी महत्वपूर्ण
सिद्धांत पर गठित है। और घृणा तो किसी से करनी ही न चाहिए। हमारी आत्माऍं पवित्र
हैं। उनसे घृणा करना परमात्मा से घृणा करने के समान है। मैं यह नहीं कहता हूँ कि
संसार में कपट छल है ही नहीं, है और बहुत अधिकता से है परन्तु उसका निवारण अविश्वास
से नहीं मानव चरित्र के ज्ञान से होता है और यह ईश्वर दत्त गुण है। मैं यह दावा तो
नहीं करता परन्तु मुझे विश्वास है कि मैं मनुष्य को देखकर उसके आंतरिक भावों तक
पहुँच जाता हूँ। कोई कितना ही वेश बदले, रंग-रूप सँवारे परन्तु मेरी अंतर्दृष्टि
को धोखा नहीं दे सकता। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्वास से विश्वास उत्पन्न होता
है। और अविश्वास से अविश्वास। यह
प्राकृतिक नियम है। जिस मनुष्य को आप शुरू से ही धूर्त, कपटी, दुर्जन, समझ लेगें, वह कभी आपसे निष्कपट व्यवहार
न करेगा। वह एकाएक आपको नीचा दिखाने का यत्न करेगा। इसके विपरीत आप एक चोर पर भी
भरोसा करें तो वह आपका दास हो जायगा। सारे संसार को लूटे परन्तु आपको धोखा न देगा
वह कितना ही कुकर्मी अधर्मी क्यों न हो, पर आप उसके गले में विश्वास की जंजीर
डालकर उसे जिस ओर चाहें ले जा सकते है। यहॉँ तक कि वह आपके हाथों पुण्यात्मा भी बन
सकता है।
बंगाली बाबू के पास इन दार्शनिक
तर्कों का कोई उत्तर न था।
४
चौथे वर्ष की पहली तारिख थी। लाला
साईंदास बैंक के दफ्तर में बैठ डाकिये की राह देख रहे थे। आज बरहल से पैंतालीस
हजार रुपये आवेंगे। अबकी इनका इरादा था कि कुछ सजावट के सामान और मोल ले लें। अब
तक बैंक में टेलीफोन नहीं था। उसका भी तखमीना मँगा लिया था। आशा की आभा चेहरे से
झलक रही थी। बंगाली बाबू से हँस कर कहते
थे-इस तारीख को मेरे हाथों में अदबदा के खुजली होने लगती है। आज भी हथेली खुजला
रही है। कभी दफ्तरी से कहते-अरे मियॉँ शराफत, जरा सगुन तो विचारों; सिर्फ सूद ही सूद आ रही है, या दफ्तर वालों के लिए नजराना शुकराना भी। आशा का
प्रभाव कदाचित स्थान पर भी होता है। बैंक भी आज खुला हुआ दिखायी पड़ता था।
डाकिया ठीक समय
पर आया। साईंदास ने लापरवाही से उसकी ओर देखा। उसने अपनी थैली से कई रजिस्टरी
लिफाफे निकाले। साईंदास ने लिफाफे को उड़ती निगाह से देखा। बहरल का कोई लिफाफा न
था। न बीमा, न मुहर, न वह लिखावट। कुछ निराशा-सी हुई। जी में आया, डाकिए से पूछें, कोई रजिस्टरी रह तो नहीं गयी
पर रुक गए; दफ्तर के क्लर्कों के सामने इतना
अधैर्य अनुचित था। किंतु जब डाकिया चलने लगा तब उनसे न रह गया? पूछ ही बैठे-अरे भाई, कोई बीमा का लिफाफा रह तो
नहीं गया? आज उसे आना चाहिए था। डाकिये ने कहा—सरकार भला
ऐसी बात हो सकती है! और कहीं भूल-चूक चाहे हो भी जाय पर
आपके काम में कही भूल हो सकती है?
साईंदास का चेहरा
उतर गया, जैसे कच्चे रंग पर पानी पड़ जाय। डाकिया चला गया, तो बंगाली बाबू से बोले-यह
देर क्यों हुई ? और तो कभी ऐसा न होता था।
बंगाली बाबू ने
निष्ठुर भाव से उत्तर दिया-किसी कारण से देर हो गया होगा। घबराने की कोई बात नहीं।
निराशा असम्भव को
सम्भव बना देती है। साईंदास को इस समय यह ख्याल हुआ कि कदाचित् पार्सल से रुपये
आते हों। हो सकता है तीन हजार अशर्फियों का पार्सल करा दिया हो। यद्यपि इस विचार
को औरों पर प्रकट करने का उन्हें साहस न हुआ, पर उन्हें यह आशा उस समय तक
बनी रही जब तक पार्सलवाला डाकिया वापस नहीं गया। अंत में संध्या को वह बेचैनी की
दशा में उठ कर चले गये। अब खत या तार का इंतजार था। दो-तीन बार झुंझला कर उठे, डॉँट कर पत्र लिखूँ और साफ
साफ कह दूँ कि लेन देन के मामले मे वादा पूरा न करना विश्वासघात है। एक दिन की देर
भी बैंक के लिए घातक हो सकती है। इससे यह होगा कि फिर कभी ऐसी शिकायत करने का अवसर
न मिलेगा; परंतु फिर कुछ सोचकर न लिखा।
शाम हो गयी थी, कई मित्र आ गये। गपशप होने
लगी। इतने में पोस्टमैन ने शाम की डाक दी। यों वह पहले अखबारों को खोला करते पर आज
चिटिठ्यॉँ खोलीं किन्तु बरहल का कोई खत न था। तब बेदम हो एक अँगरेजी अखबार खोला।
पहले ही तार का शीर्षक देखकर उनका खून
सर्द हो गया। लिखा था-
‘कल शाम को
बरहल की महारानी जी का तीन दिन की बीमारी के बाद देहांत हो गया।’
इसके आगे एक संक्षिप्त नोट में यह
लिखा हुआ था—‘बरहल की महारानी की अकाल मृत्यु केवल
इस रियासत के लिए ही नहीं किन्तु समस्त प्रांत के लिए शोक जनक घटना है। बड़े-बड़े
भिषगाचार्य (वैद्यराज) अभी रोग की परख भी न कर पाये थे कि मृत्यु ने काम तमाम कर
दिया। रानी जी को सदैव अपनी रियासत की उन्नति का ध्यान रहता था। उनके थोड़े से
राज्यकाल में ही उनसे रियासत को जो लाभ हुए हैं, वे चिरकाल तक स्मरण रहेंगे।
यद्यपि यह मानी हुई बात थी कि राज्य उनके बाद दूसरे के हाथ जायेगा, तथापि यह विचार कभी रानी
साहब के कर्त्तव्य पालन में बाधक नहीं बना। शास्त्रानुसार उन्हें रियासत की जमानत
पर ऋण लेने का अधिकार न था, परंतु प्रजा की भलाई के विचार से उन्हें कई बार इस
नियम का उल्लंघन करना पड़ा। हमें विश्वास है कि यदि वह कुछ दिन और जीवित रहतीं तो
रियासत को ऋण से मुक्त कर देती। उन्हें रात-दिन इसका ध्यान रहता था। परंतु इस
असामयिक मृत्यु ने अब यह फैसला दूसरों के अधीन कर दिया। देखना चाहिए, इन ऋणों का क्या परिणाम होता
है। हमें विश्वस्त रीति से यह मालूम हुआ है कि नये महाराज ने, जो आजकल लखनऊ में विराजमान
हैं, अपने
वकीलों की सम्मति के अनुसार मृतक महारानी के ऋण संबंधी हिसाबों को चुकाने से
इन्कार कर दिया है। हमें भय है कि इस निश्चय से महाजनी टोले में बड़ी हलचल पैदा
होगी और लखनऊ के कितने ही धन सम्पति के स्वामियों को यह शिक्षा मिल जायगी कि ब्याज
का लोभ कितना अनिष्टकारी होता है।
लाला साईंदास ने अखबार मेज पर रख दिया
और आकाश की ओर देखा, जो निराशा का अंतिम आश्रय है। अन्य मित्रों ने भी यह समाचार
पढ़ा। इस प्रश्न पर वाद-विवाद होने लगा। साईंदास पर चारों ओर से बौछार पड़ने लगी।
सारा दोष उन्हीं के सिर पर मढ़ा गया और उनकी चिरकाल की कार्यकुशलता और
परिणाम-दर्शिता मिट्टी मे मिल गयी। बैंक इतना बड़ा घाटा सहने में असमर्थ था। अब यह
विचार उपस्थित हुआ कि कैसे उसके प्राणों की रक्षा की जाय।
५
शहर में यह खबर फैलते ही लोग अपने
रुपये वापस लेने के लिए आतुर हो गये। सुबह शाम तक लेनदारों का तांता लगा रहता था।
जिन लोगों का धन चालू हिसाब में जमा था, उन्होंने तुरंत निकाल लिया, कोई उज्र न सुना। यह उसी
पत्र के लेख का फल था कि नेशनल बैंक की साख उठ गयी। धीरज से काम लेते तो बैंक सँभल
जाता। परंतु ऑंधी और तूफान में कौन नौका स्थिर रह सकती है? अन्त में खजांची ने टाट उलट
दिया। बैंक की नसों से इतनी रक्तधाराऍं निकलीं कि वह प्राण-रहित हो गया।
तीन दिन बीत चुके थे। बैंक घर के
सामने सहस्त्रों आदमी एकत्र थे। बैंक के द्वार पर सशस्त्र सिपाहियों का पहरा था।
नाना प्रकार की अफवाहें उड़ रहीं थीं। कभी खबर उड़ती, लाला साईंदास ने विष-पान कर
लिया। कोई उनके पकड़े जाने की सूचना लाता था। कोई कहता था-डाइरेक्टर हवालात के
भीतर हो गये।
एकाएक सड़क पर से एक मोटर निकली और
बैंक के सामने आ कर रुक गयी। किसी ने कहा-बरहल के महाराज की मोटर है। इतना सुनते
ही सैकड़ों मनुष्य मोटर की ओर घबराये हुए दौड़े और उन लोगों ने मोटर को घेर लिया।
कुँवर जगदीशसिंह महारानी की मृत्यु के
बाद वकीलों से सलाह लेने लखनऊ आये थे। बहुत कुछ सामान भी खरीदना था। वे इच्छाऍं जो
चिरकाल से ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में बँधी थी, पानी की भॉँति राह पा कर
उबली पड़ती थीं। यह मोटर आज ही ली गयी थी। नगर में एक कोठी लेने की बातचीत हो रही
थी। बहुमूल्य विलास-वस्तुओं से लदी एक गाड़ी बरहल के लिए चल चुकी थी। यहॉँ भीड़
देखी, तो सोचा
कोई नवीन नाटक होने वाला है, मोटर रोक दी। इतने में सैकड़ों की भीड़ लग गयी।
कुँवर साहब ने पूछा-यहॉँ आप लोग क्यों
जमा हैं? कोई तमाशा होने वाला है क्या?
एक महाशय, जो देखने में कोई बिगड़े रईस
मालूम होते थे, बोले-जी हॉँ, बड़ा मजेदार तमाशा है।
कुँवर-किसका तमाशा है?
वह तकदीर का।
कुँवर महाशय को
यह उत्तर पाकर आश्चर्य तो हुआ, परंतु सुनते आये थे कि लखनऊ वाले बात-बात में बात
निकाला करते हैं; अत: उसी ढंग से उत्तर देना आवश्यक
हुआ। बोले-तकदीर का खेल देखने के लिए यहाँ आना तो आवश्यक नहीं।
लखनवी महाशय ने कहा-आपका कहना सच है
लेकिन दूसरी जगह यह मजा कहॉँ? यहाँ सुबह शाम तक के बीच भाग्य ने कितनों को धनी से
निर्धन और निर्धन से भिखारी बना दिया। सबेरे जो लोग महल में बैठे थे उन्हें इस समय
रोटियों के लाले पडें हैं। अभी एक सप्ताह पहले जो लोग काल-गति भाग्य के खेल और समय
के फेर को कवियों की उपमा समझते थे इस समय उनकी आह और करुण क्रंदन वियोगियों को भी
लज्जित करता है। ऐसे तमाशे और कहॉँ देखने में आवेंगें?
कुँवर-जनाब आपने तो पहेली को और गाढ़ा
कर दिया। देहाती हूँ मुझसे साधारण तौर से बात कीजिए।
इस पर सज्जन ने कहा-साहब यह नेशनल
बैंक हैं। इसका दिवाला निकल गया है। आदाब अर्ज, मुझे पहचाना?
कुँवर साहब ने उसकी ओर देखा, तो मोटर से कूद पड़े और उनसे
हाथ मिलाते हुए बोले अरे मिस्टर नसीम? तुम यहॉँ कहॉँ? भाई तुमसे मिलकर बड़ा आनंद हुआ।
मिस्टर नसीम कुँवर साहब के साथ
देहरादूर कालेज में पढ़ते थे। दोनों साथ-साथ देहरादून की पहाड़ियों पर सैर करते थे, परंतु जब से कुँवर महाशय ने
घर के झंझटों से विवश होकर कालेज छोड़ा, तब से दोंनों मित्रों में भेंट न हुई
थी। नसीम भी उनके आने के कुछ समय पीछे अपने घर लखनऊ चले आये थे।
नसीम ने उत्तर दिया-शुक्र है, आपने पहचाना तो। कहिए अब तो
पौ-बारह है। कुछ दोस्तों की भी सुध है।
कुँवर-सच कहता हूँ, तुम्हारी याद हमेशा आया करती
थी । कहो आराम से तो हो? मैं रायल होटल में टिका हूँ, आज आओं तो इतमीनान से बातचीत
हो।
नसीम—जनाब, इतमीनान तो नेशनल बैंक के
साथ चला गया। अब तो रोजी की फिक्र सवार है। जो कुछ जमा पूँजी थी सब आपको भेंट हुई।
इस दिवाले ने फकीर बना दिया। अब आपके दरवाजे पर आ कर धरना
दूंगा।
कुँवर-तुम्हारा
घर हैं, बेखटके आओ । मेरे साथ ही क्यों न चलों। क्या बतलाऊँ, मुझे कुछ भी घ्यान न था कि
मेरे इन्कार करने का यह फल होगा। जान पड़ता हैं, बैंक ने बहुतेरों को तबाह कर
दिया।
नसीम-घर-घर
मातम छाया हुआ है। मेरे पास तो इन कपड़ों के सिवा और कुछ नहीं रहा।
इतने में एक
‘तिलकधारी पंडित’ जी आ गये और बोले-साहब, आपके शरीर पर वस्त्र
तो है। यहॉँ तो धरती आकाश कहीं ठिकाना नहीं। राघोजी पाठशाला का अध्यापक हूं।
पाठशाला का सब धन इसी बैंक में जमा था। पचास विद्यार्थी इसी के आसरे संस्कृत पढ़ते
और भोजन पाते थे। कल से पाठशाला बंद हो जायगी। दूर-दूर के विद्यार्थी हैं। वह अपने
घर किस तरह पहुँचेंगे, ईश्वर ही जानें।
एक महाशय, जिनके सिर पर पंजाबी
ढंग की पगड़ी थी, गाढ़े का कोट और चमरौधा जूता पहने हुए थे, आगे बढ़ आये और नेत़ृत्व के भाव से बोले-महायाय, इस
बैंक के फेलियर ने कितने ही इंस्टीट्यूशनों को समाप्त कर दिया। लाला दीनानाथ का
अनथालय अब एक दिन भी नहीं चल सकता। उसके एक लाख रुपये डूब गये। अभी पन्द्रह दिन
हुए, मैं डेपुटेशन से लौटा तो पन्द्रह हजार रुपये अनाथालय
कोष में जमा किये थे, मगर अब कहीं कौड़ी का ठिकाना नहीं।
एक बूढ़े ने
कहा-साहब,
मेरी तो जिदंगी भी की कमाई मिट्टी में मिल गयी। अब कफन का भी भरोसा नहीं।
धीरे-धीरे
और लोग भी एकत्र हो गये और साधारण बातचीत होने लगी। प्रत्येक मनुष्य अपने पासवाले
को अपनी दु:खकथा सुनाने लगा। कुँवर साहब आधे घंटे तक नसीम के साथ खड़े ये विपत्
कथाएँ सुनते रहे। ज्यों ही मोटर पर बैठे और होटल की ओर चलने की आज्ञा दी, त्यों ही उनकी दृष्टि
एक मनुष्य पर पड़ी,
जो पृथ्वी पर सिर झुकाये बैठा था। यह एक अपीर था जो लड़कपन में कुँवर साहब
के साथ खेला था। उस समय उनमें ऊँच-नीच का विचार न था, कबड्डी
खेले, साथ पेड़ों पर चढ़े और चिड़ियों के बच्चे चुराये थे।
जब कुँवर जी देहरादून पढ़ने गये तब यह अहीर का लड़का शिवदास अपने बाप के साथ लखनऊ
चला आया। उसने यहॉँ एक दूध की दूकान खोल ली थी। कुँवर साहब ने उसे पहचाना और उच्च
स्वर से पुकार-अरे शिवदास इधर देखो।
शिवदास ने बोली सुनी, परन्तु सिर ऊपर न
उठाया। वह अपने स्थान पर बैठा ही कुँवर साहब को देख रहा था। बचपन के वे दिन-याद आ
रहे थे, जब वह जगदीश के साथ गुल्ली-डंडा खेलता था, जब दोनों बुड्ढे गफूर मियॉँ को मुँह चिढ़ा कर घर में छिप जाते थे जब वह
इशारों से जगदीश को गुरु जी के पास से बुला लेता था, और
दोनों रामलीला देखने चले जाते थे। उसे विश्वास था कि कुँधर जी मुझे भूल गये होंगे, वे लड़कपन की बातें अब कहॉँ? कहॉँ मैं और कहॉँ यह।
लेकिन कुँवर साहब ने उसका नाम लेकर बुलाया, तो उसने प्रसन्न
होकर मिलने के बदले और भी सिर नीचा कर लिया और वहॉँ से टल जाना चाहा। कुँवर साहब
की सहृदयता में वह साम्यभाव न था। मगर कुँवर साहब उसे हटते देखकर मोटर से उतरे और
उसका हाथ पकड़ कर बोले-अरे शिवदास, क्या मुझे भूल गये?
अब शिवदास अपने मनोवेग को रोक न सका।
उसके नेत्र डबडबा आये। कुँवर के गले से लिपट गया और बोला-भूला तो नहीं, पर आपके सामने आते
लज्जा आती है।
कुवर-यहॉँ दूध की दूकान करते हो क्या? मुझे मालूम ही न था, नहीं अठवारों से पानी पीते-पीते जुकाम क्यों होता?
आओ, इसी मोटर पर बैठ जाओ। मेरे साथ होटल तक चलो। तुमसे बातें
करने को जी चाहता है। तुम्हें बरहल ले चलूँगा और एक बार फिर गुल्ली-ड़डे का खेल
खेलेंगे।
शिवदास-ऐसा न कीजिए, नहीं तो देखनेवाले
हँसेंगे। मैं होटल में आ जाऊँगा। वही हजरतगंजवाले होटल में ठहरे हैं न?
कुँवर––हॉँ, अवश्य आओगे न?
शिवदास––आप बुलायेंगे, और मैं न आऊँगा?
कुँवर––यहॉँ कैसे बैठे हो? दूकान तो चल रही है न?
शिवदास––आज सबेरे तक तो चलती थी। आगे का हाल
नहीं मालूम।
कुँवर––तुम्हारे रुपये भी बैंक में जमा थे
क्या?
शिवदास––जब आऊँगा तो बताऊँगा।
कुँवर साहब मोटर पर आ बैठे और ड्राइवर
से बोले-होटल की ओर चलो।
ड्राइवर––हुजूर ने ह्वाइटवे कम्पनी की
दूकान पर चलने की आज्ञा जो दी थी।
कुँवर––अब उधर न जाऊँगा।
ड्राइवर––जेकब साहब बारिस्टर के यहॉँ
भी न चलेंगे?
कुँवर––(झँझलाकर) नहीं, कहीं मत चलो। मुझे
सीधे होटल पहुँचाओ।
निराशा और विपत्ति के इन दृश्यों ने
जगदीशसिंह के चित्त में यह प्रश्न उपस्थित कर दिया था कि अब मेरा क्या कर्तव्य है?
६
आज से सात वर्ष पूर्व जब बरहल के
महाराज ठीक युवावस्था में घोड़े से गिर कर मर गये थे और विरासत का प्रश्न उठा तो
महाराज के कोई सन्तान न होने के कारण, वंश-क्रम मिलाने से
उनके सगे चचेरे भाई ठाकुर रामसिंह को विरासत का हक पहुँचता था। उन्होंने दावा किया, लेकिन न्यायालयों ने रानी को ही हकदार ठहराया। ठाकुर साहब ने अपीलें कीं, प्रिवी कौंसिल तक गये, परन्तु सफलता न हुई।
मुकदमेबाजी में लाखों रुपये नष्ठ हुए, अपने पास की मिलकियत
भी हाथ से जाती रही, किन्तु हार कर भी वह चैन से न बैठे।
सदैव विधवा रानी को छेड़ते रहे। कभी असामियों को भड़काते,
कभी असामियों से रानी की बुराई करते, कभी उन्हें जाली
मुकदमों में फँसाने का उपाय करते, परन्तु रानी बड़े जीवट की
स्त्री थीं। वह भी ठाकुर साहब के प्रत्येक आघात का मुँहतोड़ उत्तर देतीं। हॉँ, इस खींचतान में उन्हें बड़ी-बड़ी रकमें अवश्य खर्च करनी पड़ती थीं।
असामियों से रुपये न वसूल होते इसलिए उन्हें बार-बार ऋण लेना पड़ता था, परन्तु कानून के अनुसार उन्हें ऋण लेने का अधिकार न था। इसलिए उन्हें या
तो इस व्यवस्था को छिपाना पड़ता था, या सूद की गहरी दर
स्वीकार करनी पड़ती थी।
कुँवर जगदीशसिंह का लड़कपन तो
लाड़-प्यार से बीता था, परन्तु जब ठाकुर रामसिंह मुकदमेबाजी से बहुत तंग आ गये और यह सन्देह होने
लगा कि कहीं रानी की चालों से कुँवर साहब का जीवन संकट में पड़ जाय, तो उन्होंने विवश होकर कुँवर साहब को देहरादून भेज दिया। कुँवर साहब वहॉँ
दो वर्ष तक तो आनन्द से रहे, किन्तु ज्योंही कॉलेज की प्रथम
श्रेणी में पहुँचे कि पिता परलोकवासी ही गये। कुँवर साहब को पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
बरहल चले आये, सिर पर कुटुम्ब-पालन और रानी से पुरानी
शत्रुता के निभाने का बोझ आ पड़ा। उस समय से महारानी के मृत्यु-काल तक उनकी दशा
बहुत गिरी रही। ऋण या स्त्रियों के गहनों के सिवा और कोई आधार न था। उस पर
कुल-मर्यादा की रक्षा की चिन्ता भी थी। ये तीन वर्ष तक उनके लिए कठिन परीक्षा के
समय थे। आये दिन साहूकारों से काम पड़ता था। उनके निर्दय बाणों से कलेजा छिद गया
था। हाकिमों के कठोर व्यवहार और अत्याचार भी सहने पड़ते, परन्तु सबसे हृदय-विदारक अपने आत्मीयजनों का बर्ताव था, जो सामने बात न करके बगली चोटें करते थे, मित्रता
और ऐक्य की आड़ में कपट हाथ चलाते थे। इन कठोर यातनाओं ने कुँवर साहब को अधिकार, स्वेच्छाचार और धन-सम्पत्ति का जानी दुश्मनी बना दिया था। वह बड़े भावुक
पुरुष थे। सम्बन्धियों की अकृपा और देश-बंधुओ की दुर्नीति उनके हृदय पर काला चिन्ह
बनाती जाती थी, साहित्य-प्रेम ने उन्हें मानव प्रकृति–का तत्त्वान्वेषी बना दिया था
और जहां यह ज्ञान उन्हें प्रतिदिन सभ्यता से दूर लिये जाता था, वहॉँ उनके चित्त में
जन-सत्ता और साम्यवाद के विचार पुष्ट करता जाता था। उनपर प्रकट हो गया था यदि
सद्व्यवहार जीवित हैं, तो वह झोपड़ों और गरीबों में ही है।
उस कठिन समय में, जब चारों और अँधेरा छाया हुआ था, उन्हें कभी-कभी सच्ची सहानुभूति का प्रकाश यहीं दृष्टिगोचर हो जाता था।
धन-सम्पत्ति को वह श्रेष्ठ प्रसाद नहीं, ईश्वर का प्रकोप
समझते थे जो मनुष्य के हृदय से दया और प्रेम के भावों को मिटा देता है, यह वह मेघ हैं, जो चित्त के प्रकाशित तारों पर छा
जाता है।
परन्तु
महारानी की मृत्यु के बाद ज्यों ही धन-सम्पत्ति ने उन पर वार किया, बस दार्शनिक तर्को की
यह ढाल चूर-चूर हो गयी। आत्मनिदर्शन की शक्ति नष्ट हो गयी। वे मित्र बन गये जो
शत्रु सरीखे थे और जा सच्चे हितैषी थे, वे विस्मृत हो गये।
साम्यवाद के मनोगत विचारों में घोर परिवर्तन आरम्भ हो गया। हृदय में असहिष्णुता का
उद्भव हुआ। त्याग ने भोग की ओर सिर झुका दिया, मर्यादा की
बेड़ी गले में पड़ी। वे अधिकारी, जिन्हें देखकर उनके तेवर
बदल जाते थे, अब उनके सलाहकार बन गये। दीनता और दरिद्रता को, जिनसे उन्हे सच्ची सहानुभूति थी, देखकर अब वह ऑंखे
मूँद लेते थे।
इसमें संदेह नहीं कि कुँवर साहब अब भी साम्यवाद के भक्त थे, किन्तु उन विचारों के
प्रकट करने में वह पहले की-सी स्वतंत्रता न थी। विचार अब व्यवहार से डरता था।
उन्हें कथन को कार्य-रुप में परिणत करने का अवसर प्राप्त था; पर अब कार्य-क्षेत्र
कठिनाइयों से घिरा हुआ जान पड़ता था। बेगार के वह जानी दुश्मन थे; परन्तु अब बेगार को बंद करना
दुष्कर प्रतीत होता था। स्वच्छता और स्वास्थ्यरक्षा के वह भक्त थे, किन्तु अब धन-व्यय न
करके भी उन्हें ग्राम-वासियों की ही ओर से विरोध की शंका होती थी। असामियों से पोत
उगाहने में कठोर बर्ताव को वह पाप समझते थे; मगर अब कठोरता के बिना काम चलता न
जान पड़ता था। सारांश यह कि कितने ही सिद्धांत, जिन पर पहले उनकी श्रद्धा थी अब असंगत मालूम
होते थे।
परन्तु आज
जो दु:खजनक दृश्य बैंक के होते में नजर आये उन्होंने उनके दया-भाव को जाग्रत कर
दिया। उस मनुष्य की-सी दशा हो गयी, जो नौका में बैठा सुरम्य तट की शोभा का आनन्द
उठाता हुआ किसी श्मशान के सामने आ जाय, चिता पर लाशें जलती
देखे, शोक-संतप्तों के करुण-क्रंदन को सुने ओर नाव से उतर कर
उनके दु:ख में सम्मिलित हो जाय।
रात के दस
बज गये थे। कुँवर साहब पलँग पर लेटे थे। बैंक के होत का दृश्य ऑंखों के सामने नाच
रहा था। वही विलाप-ध्वनि कानों में आ रही थी। चित्त में प्रश्न हो रहा था, क्या इस विडम्बना का
कारण मैं ही हूं। मैंने तो वही किया, जिसका मुझे कानूनन
अधिकार था। यह बैंक के संचालकों की भूल है, जो उन्होंने बिना
जमानत के इतनी रकम कर्ज दे दी, लेनदारों को उन्हीं की गरदन
नापनी चाहिए। मैं कोई खुदाई फौजदार नहीं हूं, कि दूसरों की
नादानी का फल भोगूँ। फिर विचार पलटा, मैं नाहक इस होटल में
ठहरा। चालीस रुपये प्रतिदिन देने पड़ेगे। कोई चार सौ रुपये के मत्थे जायेगी। इतना
सामान भी व्यर्थ ही लिया। क्या आवश्यकता थी? मखमली गद्दे की
कुर्सियों या शीशे की सजावट से मेरा गौरव नहीं बढ़ सकता। कोई साधारण मकान पॉँच
रुपये पर ले लेता, तो क्या काम न चलता?
मैं और साथ के सब आदमी आराम से रहते यही न होता कि लोग निंदा करते। इसकी क्या
चिंता। जिन लोगों के मत्थे यह ठाट कर रहा हूं, वे गरीब तो
रोटियों को तरसते हैं। ये ही दस-बारह हजार रुपये लगा कर कुऍं बनवा देता, तो सहस्रों दीनों
का भला होता। अब फिर लोगों के चकमें में न जाऊँगा। यह मोटरकार व्यर्थ हैं। मेरा
समय इतना महँगा नही हैं कि घंटे-आध-घंटे की किफायत के लिए दो सौ रुपये का खर्च
बढ़ा लूँ। फाका करनेवाले असामियों के सामने दौड़ना उनकी छातियों पर मूँग दलना है।
माना कि वे रोब में आ जायेंगे, जिधर से निकल जाऊँगा, सैकड़ों स्त्रियों और बच्चे देखने के लिए खड़े हो जायेंगे, मगर केवल इतने ही दिखावे के लिए इनता खर्च बढ़ाना मूर्खता है। यदि दूसरे
रईस ऐसा करते हैं तो करें, मैं उनकी बराबरी क्यों करुँ। अब
तक दो हजार रुपये सालाने में मेरा निर्वाह हो जाता था। अब दो के बदले चार हजार
बहुत हैं। फिर मुझे दूसरों की कमाई इस प्रकार उड़ाने का अधिकार ही क्या है? मैं कोई उद्योग-धंधा, कोई कारोबार नहीं करता जिसका
यह नफा हो। यदि मेरे पुरुषों ने हठधर्मी, जबरदस्ती से इलाका
अपने हाथों में रख लिया, तो मुझे उनके लूट के धन में शरीक
होने का क्या अधिकार हैं? जो लोग परिश्रम करते हैं, उन्हें अपने परिश्रम का पूरा फल मिलना चाहिए। राज्य उन्हें केवल दूसरों
के कठोर हाथों से बचाता है। उसे इस सेवा का उचित मुआवजा मिलता चाहिए। बस, मैं तो राज्य की ओर से यह मुआवजा वसूल करने के लिए नियत हूं। इसके सिवा
इन गरीबों की कमाई में मेरा और कोई भाग नहीं। बेचारे दीन हैं, मूर्ख हैं, बेजबान हैं, इस
समय हम इन्हें चाहे जितना सता लें। इन्हें अपने स्वत्व का ज्ञान नहीं। मैं अपने
महत्व को नहीं समझता पर एक समय ऐसा अवश्य आयेगा, जब इनके
मुँह में भी जबान होगी, इन्हें भी अपने अधिकारों का ज्ञान
होगा। तब हमारी दशा बुरी होगी। ये भोग-विलास मुझे अपने आदमियों से दूर किये देते
हैं। मेरी भलाई इसी में है कि इन्हीं में रहूँ, इन्हीं की
भॉँति जीवन-निर्वाह और इनकी सहायता करुँ। कोई छोटी-माटी रकम होती, तो कहता लाओ, जिस सिर पर बहुत भार है; उसी तरह यह भी सही। मूल के
अलावा कई हजार रुपये सूद के अलग हुए। फिर महाजनों के भी तीन लाख रुपये हैं। रियासत
की आमदनी डेढ़-दो लाख रुपये सालाना है, अधिक
नहीं। मैं इतना बड़ा साहस करुँ भी, तो किस बिरते पर? हॉँ, यदि बैरागी हो जाऊँ तो सम्भव है, मेरे जीवन में--यदि कहीं अचानक मृत्यु न हो जाय तो यह झगड़ा पाक हो जाय।
इस अग्नि में कूदना अपने सम्पूर्ण जीवन, अपनी उमंगों और अपनी
आशाओं को भस्म करना है। आह ! इन दिनों की प्रतीक्षा में मैंने क्या-क्या कष्ट नहीं
भोगे। पिता जी ने इस चिंता में प्राण-त्याग किया। यह शुभ मुहूर्त हमारी अँधेरी रात
के लिए दूर का दीपक था। हम इसी के आसरे जीवित थे। सोते-जागते सदैव इसी की चर्चा
रहती थी। इससे चित्त को कितना संतोष और कितना अभिमान था। भूखे रहने के दिन भी
हमारे तेवर मैले ने होते थे। जब इतने धैर्य और संतोष के बाद अच्छे दिन आये तो उससे
कैसे विमुख हुआ जाय। फिर अपनी ही चिंता तो नहीं, रियासत की उन्नति की कितनी ही स्कीमें
सोच चुका हूँ। क्या अपनी इच्छाओं के साथ उन विचारों को भी त्याग दूँ। इस अभागी
रानी ने मुझे बुरी तरह फँसाया, जब तक जीती रही, कभी चैन से न बैठने दिया। मरी तो मेरे सिर पर यह बला डाल दी। परन्तु मैं
दरिद्रता से इतना डरता क्यों हूँ? कोई पाप नहीं है। यदि मेरा
त्याग हजारो घरानों को कष्ट और दुरावस्था से बचाये तो मुझे उससे मुँह न मोड़ना
चाहिए। केवल सुख से जीवन व्यतीत करना ही हमारा ध्येय नहीं है। हमारी मान-प्रतिष्ठा
और कीर्ति सुख-भोग ही से तो नहीं हुआ करती। राजमंदिरों में रहने वालों और विलास
में रत राणाप्रताप को कौन जानता हैं? यह उनका आत्म-समर्पण और कठिन व्रतपालन ही हैं, लिसने उन्हें हमारी
जाति का सूर्य बना दिया है। श्रीरामचंद्र ने यदि अपना जीवन सुख-भोग में बिताया
होता तो, आज हम उनका नाम भी न जानते। उनके आत्म बलिदान ने ही
उन्हें अमर बना दिया। हमारी प्रतिष्ठा धन और विलास पर अवलम्बित नहीं है। मैं मोटर
पर सवार हुआ तो क्या, और टट्टू पर चढ़ा तो क्या, होटल में ठहरा तो क्या और किसी मामूली घर ठहरा तो क्या। बहुत होगा, ताल्लुकदार लोग मेरी हँसी उड़ावेंगे। इसकी परवा नहीं। मैं तो हृदय से
चाहता हूँ कि उन लोगों से अलग-अलग रहूँ। यदि इतनी निंदा से सैकड़ों परिवार का भला
हो जाय, तो मैं मनुष्य नहीं, यदि
प्रसन्नता से उसे सहन न करुँ। यदि अपने घोड़े और फिटन, सैर
और शिकार, नौकर, चाकर और स्वार्थ-साधक
हित-मित्रों से रहित होकर मैं सहस्रों अमीर-गरीब कुटुम्बों को, विधवाओं, अनाथों का भला कर सकूँ, तो मुझे इसमें कदापि विलम्ब न करना चाहिए। सहस्रों परिवारों के भाग्य इस
समय मेरी मुट्टी में हैं। मेरा सुखभोग उनके लिए विष और मेरा आत्म-संयम उनके लिए
अमृत है। मैं अमृत बन सकता हूँ, विष क्यों बनूँ। और फिर इसे
आत्म त्याग समझना मेरी भूल है। यह एक संयोग है कि मैं आज इस जायदाद का अधिकारी हूँ, मैंने उसे कमाया नहीं। उसके लिए रक्त नहीं बहाया। न पसीना बहाया। यदि
जायदाद मुझे न मिली होती तो मैं सहस्रों दीन भाइयों की भॉँति आज जीविकोपार्जन में
लगा रहता। मैं क्यों न भूल जाऊँ कि में इस राज्य का स्वामी हूँ। ऐसे ही अवसरों पर
मनुष्य की परख होती है। मैंने वर्षो पुस्तकावलोकन किया,
वर्षो परोपकार के सिद्धान्तों का अनुनायी रहा। यदि इस समय उन सिद्धांतो को भूल
जाऊँ, स्वार्थ को मनुष्यता और सदाचार से बढ़ने दूं तो, वस्तुत: यह मेरी अत्यन्त कायरता और स्वार्थपरता होगी। भला स्वार्थसाधन की
शिक्षा के लिए गीता, मिल एमर्सन और अरस्तू का शिष्य बनने की
क्या आवश्यकता थी? यह पाठ तो मुझे अपने दूसरे भाइयों से यों
ही मिल जाता। प्रचलित प्रथा से बढ़ कर और कौन गुरु था?
साधारण लोगों की भॉँति क्या मैं भी स्वार्थ के सामने सिर झुका दूँ। तो फिर विशेषता
क्या रही? नहीं, मैं नानशंस
(विवेक-बुद्धि) का ख्रून न करुँगा। जहां पुण्य कर सकता हूँ,
पाप न करूँगा। परमात्मन्, तुम मेरी सहायता करो तुमने मुझे
राजपूत-घर में जन्म दिया है। मेरे कर्म से इस महान् जाति को लज्जित न करो। नहीं, कदापि नहीं। यह गर्दन स्वार्थ के सम्मुख न झुकेगी। मैं राम, भीष्म और प्रताप का वंशज हूँ। शरीर-सेवक न बनूँगा।
कुँवर जगदीश
सिंह को इस समय ऐसा ज्ञात हुआ, मानो वह किसी ऊँचे मीनार पर चड़ गये हैं। चित्त अभिमान से
पूरित हो गया। ऑंखे प्रकाशमान हो गयीं। परन्तु एक ही क्षण में इस उमंग का उतार
होने लगा, ऊँचे मानार के नीचे की ओर ऑंखे गयीं। सारा शरीर
कॉँप उठा। उस मनुष्य की-सी दशा हो गयी, जो किसी नदी के तट पर
बैठा उसमें कूदने का विचार कर रहा हो।
उन्होंने
सोचा,
क्या मेरे घर के लोग मुझसे सहमत होंगे? यदि मेरे कारण वे
सहमत भी हो जायँ, तो क्या मुझे अधिकार हैं कि अपने साथ उनकी
इच्छाओं का भी बलिदान करुँ? और-तो-और,
माताजी कभी न मानेंगी, और कदाचित भाई लोग भी अस्वीकार करें।
रियासत की हैसियत को देखते हुए वे कम हजार सालाना के हिस्सेदार हैं। और उनके भाग
में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता। मैं केवल अपना मालिक हूँ, परन्तु में भी तो अकेला नहीं हूँ। सावित्री स्वयं चाहे मेरे साथ आग में
कूदने को तैयार हो, किंतु पने प्यारे पुत्र को इस ऑच के समीप
कदापि न आने देगी।
कुँवर महाशय
और अधिक न सोच सके । वह एक विकल दशा में पलंग पर से उठ बैठे और कमरे में टहलने
लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने जँगले के बाहर की ओर झॉँका और किवाड़ खोलकर बाहर चले गये।
चारों ओर अँधेरा था। उनकी चिंताओं की भॉँति सामने अपार और भंयकर गोमी नदी बह रही
थी। वह धीरे-धीरे नदी के तट पर चले गये और देर तक वहॉँ टहलते रहे। आकुल हृदय को
जल-तरंगों से प्रेम होता है। शायद इसलिए कि लहरें व्याकुल हैं। उन्होंने उपने चंचल
को फिर एकाग्र किया। यदि रियासत की आमदनी से ये सब वृत्तियॉँ दी जायँगी, तो ऋण का सूद निकलना
भी कठिन होगा। मूल का तो कहना ही क्या ! क्या आय में वृद्धि नहीं हो सकती? अभी अस्तबल में बीस
घोड़े हैं। मेरे लिए एक काफी हैं। नौकरों की संख्या सौ से कम न होगी। मेरे लिए दो
भी अधिक हैं। यह अनुचित हैं कि अपने ही भाइयों से नीचे सेवाएँ करायी जायँ। उन
मनुष्यों को मैं अपने सीर की जमीन दे दूँगा। सुख से खेती करेंगे और मुझे आशीर्वाद
देंगे। बगीचों के फल अब तक डालियों की भेंट हो जाते थे। अब उन्हें बेचूँगा, और सबसे बड़ी आमदनी तो बयाई की
है। केवल महेशगंज के बाजार के दस हजार रुपये आते है। यह सब आमदनी महंत जी उड़ा
जाते हैं। उनके लिए एक हजार रुपये साल होना चाहिए। अबकी इस बाजार का ठेका दूँगा।
आठ हजार से कम न मिलेंगे। इन भदों से पचीस हजार रुपये की वार्षिक आय होगी।
सावित्री और लल्ला (लड़के) के लिए एक हजार रुपये काफी हैं। मैं सावित्री से स्पष्ट
कह दूँगा कि या तो एक हजार रुपये मासिक लो और मेरे साथ रहो या रियासत की आधी आमदनी
ले लो, ओर मुझे छोड़ दो। रानी बनने की इच्छा हो, तो खुशी से बनो, परंतु मैं राजा न बनूँगा।
अचानक कुँवर
साहब के कानों में आवाज आयी--राम नाम सत्य है। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। कई
मनुष्य एक लाश लिए आते थे। उन लोगों ने नदी किनारे चिता बनायी और उसमें आग लगा दी।
दो स्त्रियॉँ चिंग्धार कर रो रही थीं। इस विलाप का कुँवर साहब के चित्त पर कुछ
प्रभाव न पड़ा। वह चित्त में लज्जित हो रहे थे कि मैं कितना पाषण-हृदय हूँ ! एक दीन मनुष्य की लाश जल रही
हैं,
स्त्रियाँ रो रही हैं और मेरा हृदय तनिक भी नहीं पसीजता ! पत्थर की मूर्ति की भॉँति
खड़ा हूँ । एकबारगी स्त्री ने रोते हुए कहा- ‘हाय मेरे राजा ! तुम्हें विष कैसे मीठा लगा? यह हृदय-विदारक विलाप
सुनते ही कुँवर साहब के चित्त में एक घाव-सा लग गया। करुण सजग हो गयी और नेत्र
अश्रुपूर्ण हो गये। कदाचित इसने विष-पान करके प्राण दिये हैं। हाय ! उसे विष कैसे मीठा लगा ! इसमें कितनी करुणा हैं, कितना दु:ख, कितना आश्चर्य ! विष तो कड़वा पदार्थ है। क्योंकर मीठा हो गया। कटु, विष के बदले जिसने
अपने मधुर प्राण दे दिये उस पर कोई कड़ी मुसीबत पड़ी होगी। ऐसी ही दशा में विष
मधुर हो सकता है। कुँवर साहब तड़प गये। कारुणिक शब्द बार-बार उनके हृदय में गूंजते
थे। अब उनसे वहॉँ न खड़ा रहा गया। वह उन आदमियों के पास आये,
एक मनुष्य से पूछा--क्या बहुत दिनों से बीमार थे? इस मनुष्य
ने कुँवर साहब की और आँसू-भरे नेत्रों से देखकर कहा--नहीं साहब, कहॉँ की बीमारी ! अभी आज संध्या तक भली-भांति बातें कर रहे थे। मालूम नहीं, संध्या को क्या खा
लिया की खून की कै होने लगी। जब तक वैद्य-राज के यहॉँ जायॅ,
तब तक ऑंखे उलट गयीं। नाड़ी छूट गयी। वैद्यराज ने आकर देखा,
तो कहा--अब क्या हो सकता हैं.? अभी कुल बाईस-तेईस वर्ष की
अवस्था थी। ऐसा पट्ठा सारे लखनऊ में नहीं था।
कुँवर--कुछ मालूम हुआ, विष क्यों खाया?
उस मनुष्य ने संदेह-दृष्टि से देखकर
कहा--महाशय, और तो कोई
बात नहीं हुई । जब से यह बड़ा बैंक टूटा है, बहुत उदास रहते थे।
कोई हजार रुपये बैंक में जमा किये थे। घी-दूध-मलाई की बड़ी दूकान थी। बिरादरी में
मान था। वह सारी पूँजी डूब गयी। हम लोग राकते रहे कि बैंक में रुपये मत जमा करो ; किन्तु होनहार यह थी। किसी
की नहीं सुनी। आज सबेरे स्त्री से गहने मॉँगते थे कि गिरवी रखकर अहीरों के दूध के
दाम दे दें। उससे बातों-बातों में झगड़ा हो गया। बस न जाने क्या खा लिया।
कुँवर साहब
हृदय कांप उठा। तुरन्त ध्यान आया--शिवदास तो नहीं है। पूछा इनका नाम शिवदास तो
नहीं था। उस मनुष्य ने विस्मय से देख कर कहा-- हॉँ, यही नाम था। क्या आपसे जान-पहचान थी?
कुँवर--हॉँ, हम और यह बहुत दिनों
तक बरहल में साथ-साथ खेले थे। आज शाम को वह हमसे बैंक में मिले थे। यदि उन्होंने
मुझसे तनिक भी चर्चा की होती, तो मैं यथाशक्ति उनकी सहायता
करता। शोक?
उस मनुष्य
ने तब ध्यानपूर्वक कुँवर साहब को देखा, और जाकर स्त्रियों से कहा--चुप हो जाओ, बरहल के महाराज आये है। इतना सुनते ही शिवदास की माता जोर-जोर से सिर
पटकती और रोती हुई आकर कुँवर साहब के पैरों पर गिर पड़ी। उसके मुख से केवल ये शब्द
निकले--‘बेटा, बचपन से जिसे तुम भैया कहा करते थे--और गला रुँध गया।
कुँवर महाशय
की ऑंखों से भी अश्रुपात हो रहा था। शिवदास की मूर्ति उनके सामने खड़ी यह कहती देख
पड़ती थी कि तुमने मित्र होकर मेरे प्राण लिए।
७
भोर हो गया; परन्तु कुँवर साहब को नींद न
आयी। जब से वह तीर से लौटे थे, उनके चित्त पर एक वैराग्य-सा छाया हुआ था। वह कारुणिक
दृश्य उपने स्वार्थ के तर्को को छिन्न-भिन्न किये देता था। सावित्री के विरोध, लल्ला के निराशा-युक्त हठ और माता के कुशब्दों का अब उन्हें लेशमात्र भी
भय न था। सावित्री कुढ़ेगी कुढ़े, लल्ला को भी संग्राम के
क्षेत्र में कूदना पड़ेगा, कोई चिंता नहीं ! माता प्राण देने पर तत्पर
होगी,
क्या हर्ज है। मैं अपनर स्त्री-पुत्र तथा हित-मित्रादि के लिए सहस्रों परिवारो की
हत्या न करुँगा। हाय ! शिवदास को जीवित रखने के लिए मैं ऐसी कितनी रियासतें छोड़
सकता हूँ। सावित्री को भूखों रहना पड़े, लल्ला को मजदूरी करनी पड़े, मुझे द्वार-द्वार भीख मॉँगनी पड़े तब भी दूसरों का गला न दबाऊँगा। अब
विलम्ब का अवसर नहीं। न जाने आगे यह दिवाला और क्या-क्या आपत्तियॉँ खड़ी करे। मुझे
इतना आगा-पीछा क्यों हा रहा है? यह केवल आत्म-निर्बलता हैं
वरना यह कोई ऐसा बड़ा काम नहीं, जो किसी ने न किया हो। आये
दिन लोग रुपये दान-पुण्य करते है। मुझे अपने कर्तव्य का ज्ञान है। उससे क्यों मुँह
मोडूँ। जो कुछ हो, जो चाहे सिर पड़े,
इसकी क्या चिन्ता। कुँवर ने घंटी बजायी। एक क्षण में अरदली ऑंखे मलता हुआ आया।
कुँवर साहब
बोले--अभी जेकब बारिस्टर के पास जाकर मेरा सलाम दो। जाग गये होंगे। कहना, जरुरी काम है। नहीं, यह पत्र लेते जाओ। मोटर तैयार करा लो।
८
मिस्टर जेकब ने कुँवर साहब को बहुत
समझाया कि आप इस दलदल में न फँसें, नहीं तो निकलना कठिन होगा। मालूम नहीं, अभी कितनी ऐसी रकमें हैं जिनका आपको पता नहीं है,
परन्तु चित्त में दृढ़ हो जानेवाला निश्चय चूने का फर्श है,
जिसको आपति के थपेड़े और भी पुष्ट कर देते हैं, कुँवर साहब
अपने निश्चय पर दृढ़ रहे। दूसरे दिन समाचार-पत्रों में छपवा दिया कि मृत महारानी
पर जितना कर्ज हैं वह सकारते हैं और नियत समय के भीतर चुका देगे।
इस विज्ञापन
के छपते ही लखनऊ में खलबली पड़ गयी। बुद्धिमानों की सम्मति में यह कुँवर महाशय की
नितांत भूल थी, और जो लोग कानून से अनभिज्ञ थे, उन्होंने सोचा कि
इसमें अवश्य कोई भेद है। ऐसे बहुत कम मनुष्य थे, जिन्हें
कुँवर साहब की नीयत की सचाई पर विश्वास आया हो परन्तु कुँवर साहब का बखान चाहे न
हुआ हो, आशीर्वाद की कमी न थी। बैंक के हजारों गरीब लेनदार
सच्चे हृदय से उन्हे आशीर्वाद दे रहे थे।
एक सप्ताह तक कुँवर साहब को सिर उठाने
का अवकाश न मिला। मिस्टर जेकब का विचार सत्य सिद्ध हुआ। देना प्रतिदिन बढ़ता जाता
था। कितने ही प्रोनोट ऐसे मिले, जिनका उन्हें कुछ भी पता न था। जौहरियों और अन्य बड़े-बड़े
दूकानदारों का लेना भी कम न था। अन्दाजन तेरह- चौदह लाख का था। मीजान बीस लाख तक
पहुँचा। कुँवर साहब घबराये। शंका हुई--ऐसा न हो कि उन्हें भाइयों का गुजारा भी
बन्द करना पड़े, जिसका उन्हें कोई अधिकर नहीं था। यहॉँ तक कि
सातवें दिन उन्होंने कई साहूकारों को बुरा-भला कहकर सामने से दूर किया। जहॉँ ब्याज
का दर अधिक थी, उस कम कराया और जिन रकमों की मीयादें बीत
चुकी थी, उनसे इनकार कर दिया।
उन्हें साहूकारों की कठोराता पर क्रोध
आता था। उनके विचार से महाजनों को डूबते धन का एक भाग पा कर ही सन्तोष कर लेना
चाहिए था। इतनी खींचतान करने पर भी कुल उन्नीस लाख से कम न हुआ।
कुँवर साहब इन कामों से अवकाश पाकर एक
दिन नेशनल बैंक की ओर जा निकले। बैंक खुला था। मृतक शरीर में प्राण आ गये थे।
लेनदारों की भीड़ लगी हुई थी। लोग प्रसन्नचित्त लौटे जा रहे थे। कुँवर साहब को
देखते ही सैकड़ो मनुष्य बड़े प्रेम से उनकी ओर दौड़े। किसी ने रोकर, किसी ने पैरों पर गिर
कर और किसी ने सभ्यतापूर्वक अपनी कृतज्ञता प्रकट की। वह बैंक के कार्यकर्ताओं से
भी मिले। लोगों ने कहा--इस विज्ञापन ने बैंक को जीवित कर दिया। बंगाली बाबू ने
लाला साईंदास की आलोचना की--वह समझता था संसार में सब मनुष्य भलामानस है। हमको
उपदेश करता था। अब उसकी ऑंख खुल गई है। अकेला घर में बैठा रहता है ! किसी को मुँह नहीं दिखाता हम
सुनता है,
वह यहॉँ से भाग जाना चाहता था। परन्तु बड़ा साहब बोला, भागेगा
तो तुम्हारा ऊपर वारंट जारी कर देगा। अब साईंदास की जगह बंगाली बाबू मैंनेजर हो
गये थे।
इसके बाद कुँवर साहब बरहल आये। भाइयों
ने यह वृत्तांत सुना, तो बिगड़े, अदालत की धमकी दी। माताजी को ऐसा धक्का
पहुँचा कि वह उसी दिन बीमार होकर एक ही सप्ताह में इस संसार से विदा हो गयीं।
सावित्री को भी चोट लगी; पर उसने केवल सन्तोष ही नहीं किया, पति की उदारता और
त्याग की प्रंशसा भी की ! रह गये लाल साहब। उन्होंने जब देखा कि अस्तवल से घोड़े निकले
जाते हैं,
हाथी मकनपुर के मेले में बिकने के लिए भेज दिये गये हैं और कहार विदा किये जा रहे
हैं, तो व्याकुल हो पिता से बोले--बाबूजी, यह सब नौकर, घोड़े, हाथी कहॉँ
जा रहे हैं?
कुँवर--एक राजा साहब के उत्सव में।
लालजी--कौन से राजा?
कुँवर—उनका नाम राजा दीनसिंह है।
लालजी—कहॉँ रहते हैं?
कुँवर—दरिद्रपुर।
लालजी—तो हम भी जायेंगे।
कुँवर—तुम्हें भी ले चलेंगे; परंतु इस बारात में पैदल
चलने वालों का सम्मान सवारों से अधिक होगा।
लालजी—तो हम भी पैदल चलेंगे।
कुँवर--वहॉँ परिश्रमी मनुष्य की
प्रशंसा होती हैं।
लालजी—तो हम सबसे ज्यादा परिश्रम करेंगे।
कुँवर साहब के दोनों भाई पॉँच-पॉच
हजार रुपये गुजारा लेकर अलग हो गये। कुँवर साहब अपने और परिवार के लिए कठिनाई से
एक हजार सालाना का प्रबन्ध कर सके, पर यह आमदनी एक रईस के लिए किसी तरह पर्याप्त
नहीं थी। अतिथि-अभ्यागत प्रतिदिन टिके ही रहते थे। उन सब का भी सत्कार करना पड़ता
था। बड़ी कठिनाई से निर्वाह होता था। इधर एक वर्ष से शिवदास के कुटुम्ब का भार भी
सिर पर पड़ा, परन्तु कुँवार साहब कभी अपने निश्चय पर शोक
नहीं करते। उन्हें कभी किसी ने चिंतित नहीं देखा। उनका मुख-मंडल धैर्य और सच्चे
अभियान से सदैव प्रकाशित रहता है। साहित्य-प्रेम पहले से था। अब बागवानी से प्रेम
हो गया है। अपने बाग में प्रात:काल से शाम तक पौदों की देख-रेख किया करते हैं और
लाल साहब तो पक्के कृषक होते दिखाई देते है। अभी नव-दास वर्ष से अधिक अवस्था नहीं
है, लेकिन अँधेरे मुँह खेत पहुँच जाते हैं। खाने-पीने की भी
सुध नहीं रहती।
उनका घोड़ा मौजूद हैं; परन्तु महीनों उस पर नहीं
चढ़ते। उनकी यह धुन देखकर कुँवर साहब प्रसन्न होते हैं और कहा करते हैं—रियासत के भविष्य की ओर से
निश्चित हूँ। लाल साहब कभी इस पाठ को न भूलेंगे। घर में सम्पत्ति होती, तो सुख-भोग, शिकार, दुराचार से सिवा और क्या सूझता ! सम्पत्ति बेचकर हमने परिश्रम
और संतोष खरीदा, और यह सौदा बुरा नहीं। सावित्री इतनी संतोषी नहीं। वह कुँवर साहब के
रोकने पर भी असामियां से छोटी-माटी भेंट ले लिया करती है और कुल-प्रथा नहीं तोड़ना
चाहती।
मैकू
कादिर और मैकू ताड़ीखाने के सामने
पहूँचे;तो वहॉँ
कॉँग्रेस के वालंटियर झंडा लिए खड़े नजर आये। दरवाजे के इधर-उधर हजारों दर्शक खड़े
थे। शाम का वक्त था। इस वक्त गली में पियक्कड़ों के सिवा और कोई न आता था। भले
आदमी इधर से निकलते झिझकते। पियक्कड़ों की छोटी-छोटी टोलियॉँ आती-जाती रहती थीं।
दो-चार वेश्याऍं दूकान के सामने खड़ी नजर आती थीं। आज यह भीड़-भाड़ देख कर मैकू ने
कहा—बड़ी भीड़
है बे,
कोई दो-तीन सौ आदमी होंगे।
कादिर ने
मुस्करा कर कहा—भीड़ देख कर डर गये क्या? यह सब हुर्र हो जायँगे, एक भी न
टिकेगा। यह लोग तमाशा देखने आये हैं, लाठियॉँ खाने नहीं आये
हैं।
मैकू ने
संदेह के स्वर में कहा—पुलिस के सिपाही भी बैठे हैं। ठीकेदार ने तो कहा थ, पुलिस न बोलेगी।
कादिर—हॉँ बे , पुलिस न बोलेगी, तेरी नानी क्यों मरी जा रही है । पुलिस वहॉँ बोलती है, जहॉँ चार पैसे मिलते है या जहॉँ कोई औरत का मामला होता है। ऐसी बेफजूल
बातों में पुलिस नहीं पड़ती। पुलिस तो और शह दे रही है। ठीकेदार से साल में
सैकड़ों रुपये मिलते हैं। पुलिस इस वक्त उसकी मदद न करेगी तो कब करेगी?
मैकू—चलो, आज दस हमारे भी सीधे
हुए। मुफ्त में पियेंगे वह अलग, मगर हम सुनते हैं, कॉँग्रेसवालों में बड़े-बड़े मालदार लोग शरीक है। वह कहीं हम लोगों से
कसर निकालें तो बुरा होगा।
कादिर—अबे, कोई कसर-वसर नहीं
निकालेगा, तेरी जान क्यों निकल रही है?
कॉँग्रेसवाले किसी पर हाथ नहीं उठाते, चाहे कोई उन्हें मार
ही डाले। नहीं तो उस दिन जुलूस में दस-बारह चौकीदारों की मजाल थी कि दस हजार
आदमियों को पीट कर रख देते। चार तो वही ठंडे हो गये थे, मगर
एक ने हाथ नहीं उठाया। इनके जो महात्मा हैं, वह बड़े भारी
फकीर है ! उनका हुक्म है कि चुपके से मार खा लो, लड़ाई मत करो।
यों बातें
करते-करते दोनों ताड़ीखाने के द्वार पर पहुँच गये। एक स्वयंसेवक हाथ जोड़कर सामने
आ गया और बोला –भाई साहब, आपके मजहब में ताड़ी हराम है।
मैकू ने बात
का जवाब चॉँटे से दिया । ऐसा तमाचा मारा कि स्वयंसेवक की ऑंखों में खून आ गया। ऐसा मालूम होता था, गिरा चाहता है। दूसरे
स्वयंसेवक ने दौड़कर उसे सँभाला। पॉँचों उँगलियो का रक्तमय प्रतिबिम्ब झलक रहा था।
मगर
वालंटियर तमाचा खा कर भी अपने स्थान पर खड़ा रहा। मैकू ने कहा—अब हटता है कि और लेगा?
स्वयंसेवक
ने नम्रता से कहा—अगर आपकी यही इच्छा है, तो सिर सामने किये हुए हूँ। जितना चाहिए, मार लीजिए। मगर अंदर न जाइए।
यह कहता हुआ
वह मैकू के सामने बैठ गया ।
मैकू ने
स्वयंसेवक के चेहरे पर निगाह डाली। उसकी पॉचों उँगलियों के निशान झलक रहे थे। मैकू
ने इसके पहले अपनी लाठी से टूटे हुए कितने ही सिर देखे थे, पर आज की-सी ग्लानी
उसे कभी न हुई थी। वह पाँचों उँगलियों के निशान किसी पंचशूल की भॉति उसके ह्रदय में चुभ रहे थे।
कादिर
चौकीदारों के पास खड़ा सिगरेट पीने लगा। वहीं खड़े-खड़े बोला—अब, खड़ा क्या देखता है, लगा कसके एक हाथ।
मैकू ने
स्वयंसेवक से कहा—तुम उठ जाओ, मुझे अन्दर जाने दो।
‘आप मेरी छाती पर पॉँव रख कर
चले जा सकते हैं।’
‘मैं कहता हूँ, उठ जाओ, मै अन्दर ताड़ी न पीउँगा , एक दूसरा ही काम है।’
उसने यह बात
कुछ इस दृढ़ता से कही कि स्वयंसेवक उठकर रास्ते से हट गया। मैकू ने मुस्करा कर
उसकी ओर ताका । स्वयंसेवक ने फिर हाथ जोड़कर कहा—अपना वादा भूल न जाना।
एक चौकीदार
बोला—लात के आगे
भूत भागता है, एक ही तमाचे में ठीक हो गया !
कादिर ने
कहा—यह तमाचा
बच्चा को जन्म-भर याद रहेगा। मैकू के तमाचे सह लेना मामूली काम नहीं है।
चौकीदार—आज ऐसा ठोंको इन सबों को कि
फिर इधर आने को नाम न लें ।
कादिर—खुदा ने चाहा, तो फिर इधर आयेंगे भी
नहीं। मगर हैं सब बड़े हिम्मती। जान को हथेली पर लिए फिरते हैं।
२
मैकू भीतर
पहुँचा,
तो ठीकेदार ने स्वागत किया –आओ मैकू मियॉँ ! एक ही तमाचा लगा कर क्यो रह गये? एक तमाचे का भला इन
पर क्या असर होगा? बड़े लतखोर हैं सब। कितना ही पीटो, असर ही नहीं होता। बस आज सबों के हाथ-पॉँव तोड़ दो; फिर इधर न आयें ।
मैकू—तो क्या और न आयेंगें?
ठीकेदार—फिर आते सबों की नानी मरेगी।
मैकू—और जो कहीं इन तमाशा
देखनेवालों ने मेरे ऊपर डंडे चलाये तो!
ठीकेदार—तो पुलिस उनको मार भगायेगी।
एक झड़प में मैदान साफ हो जाएगा। लो, जब तक एकाध बोतल पी लो। मैं तो आज मुफ्त की
पिला रहा हूँ।
मैकू—क्या इन ग्राहकों को भी मुफ्त
?
ठीकेदार –क्या करता , कोई आता ही न था।
सुना कि मुफ्त मिलेगी तो सब धँस पड़े।
मैकू—मैं तो आज न पीऊँगा।
ठीकेदार—क्यों? तुम्हारे लिए तो आज
ताजी ताड़ी मँगवायी है।
मैकू—यों ही , आज पीने की इच्छा
नहीं है। लाओ, कोई लकड़ी निकालो, हाथ
से मारते नहीं बनता ।
ठीकेदार ने
लपक कर एक मोटा सोंटा मैकू के हाथ में दे दिया, और डंडेबाजी का तमाशा देखने के लिए द्वार पर
खड़ा हो गया ।
मैकू ने एक
क्षण डंडे को तौला, तब उछलकर ठीकेदार को ऐसा डंडा रसीद किया कि वहीं दोहरा होकर द्वार में
गिर पड़ा। इसके बाद मैकू ने पियक्कड़ों की ओर रुख किया और लगा डंडों की वर्षा
करने। न आगे देखता था, न पीछे, बस डंडे
चलाये जाता था।
ताड़ीबाजों
के नशे हिरन हुए । घबड़ा-घबड़ा कर भागने लगे, पर किवाड़ों के बीच में ठीकेदार की देह बिंधी
पड़ी थी। उधर से फिर भीतर की ओर लपके। मैकू ने फिर डंडों से आवाहन किया । आखिर सब
ठीकेदार की देह को रौद-रौद कर भागे। किसी का हाथ टूटा, किसी
का सिर फूटा, किसी की कमर टूटी। ऐसी भगदड़ मची कि एक मिनट के
अन्दर ताड़ीखाने में एक चिड़िये का
पूत भी न रह गया।
एकाएक मटकों
के टूटने की आवाज आयी। स्वयंसेवक ने भीतर झाँक कर देखा, तो मैकू मटकों को
विध्वंस करने में जुटा हुआ था। बोला—भाई साहब, अजी भाई साहब, यह आप गजब
कर रहे हैं। इससे तो कहीं अच्छा कि आपने हमारे ही ऊपर अपना गुस्सा उतारा होता।
मैंकू ने
दो-तीन हाथ चलाकर बाकी बची हुई बोतलों और मटकों का सफाया कर दिया और तब चलते-चलते
ठीकेदार को एक लात जमा कर बाहर निकल आया।
कादिर ने
उसको रोक कर पूछा –तू पागल तो नहीं हो गया है बे?
क्या करने आया था, और क्या कर रहा है।
मैकू ने
लाल-लाल ऑंखों से उसकी ओर देख कर कह—हॉँ अल्लाह का शुक्र है कि मैं जो करने आया था, वह न करके कुछ और ही
कर बैठा। तुममें कूवत हो, तो वालंटरों को मारो, मुझमें कूवत नहीं है। मैंने तो जो एक थप्पड़ लगाया। उसका रंज अभी तक है
और हमेशा रहेगा ! तमाचे के निशान मेरे कलेजे पर बन गये हैं। जो लोग दूसरों को गुनाह से
बचाने के लिए अपनी जान देने को खड़े हैं, उन पर वही हाथ उठायेगा,
जो पाजी है, कमीना है, नामर्द है। मैकू
फिसादी है, लठैत ,गुंडा है, पर कमीना और नामर्द नहीं हैं। कह दो पुलिसवालों से , चाहें तो मुझे गिरफ्तार कर लें।
कई ताड़ीबाज
खड़े सिर सहलाते हुए, उसकी ओर सहमी हुई ऑंखो से ताक रहै थे। कुछ बोलने की हिम्मत न पड़ती थी।
मैकू ने उनकी ओर देख कर कहा –मैं कल फिर आऊँगा। अगर तुममें
से किसी को यहॉँ देखा तो खून ही पी जाऊँगा ! जेल और फॉँसी से नहीं डरता। तुम्हारी भलमनसी इसी में
है कि अब भूल कर भी इधर न आना । यह कॉँग्रेसवाले तुम्हारे दुश्मन नहीं है।
तुम्हारे और तुम्हारे बाल-बच्चों की भलाई के लिए ही तुम्हें पीने से रोकते हैं। इन
पैसों से अपने बाल-बच्चो की परवरिश करो, घी-दूध खाओ। घर में तो फाके हो रहै हैं, घरवाली तुम्हारे नाम को रो रही है, और तुम यहॉँ
बैठे पी रहै हो? लानत है इस
नशेबाजी पर ।
मैकू ने
वहीं डंडा फेंक दिया और कदम बढ़ाता हुआ घर चला। इस वक्त तक हजारों आदमियों का
हुजूम हो गया था। सभी श्रद्धा, प्रेम और गर्व की ऑंखो से मैकू को देख रहे थे।
शान्ति
जब मै ससुराल आयी, तो बिलकुल फूहड थी। न
पहनने-ओढ़ने को सलीका , न बातचीत करने का ढंग। सिर उठाकर
किसी से बातचित न कर सकती थीं। ऑंखें अपने आप झपक जाती थीं। किसी के सामने जाते
शर्म आती, स्त्रियों तक के सामने बिना घूँघट के झिझक होती
थी। मैं कुछ हिन्दी पढ़ी हुई थी; पर उपन्यास, नाटक आदि के पढ़ने में आन्नद न आता था। फुर्सत
मिलने पर रामायण पढ़ती। उसमें मेरा मन बहुत लगता था। मै उसे मनुष्य-कृत नहीं समझती
थी। मुझे पूरा-पूरा विश्वास था कि उसे किसी देवता ने स्वयं रचा होगा। मै मनुष्यों
को इतना बुद्धिमान और सहृदय नहीं समझती थी। मै दिन भर घर का कोई न कोई काम करती
रहती। और कोई काम न रहता तो चर्खे पर सूत कातती। अपनी बूढ़ी सास से थर-थर कॉँपती
थी। एक दिन दाल में नमक अधिक हो गया। ससुर जी ने भोजन के समय सिर्फ इतना ही कहा—‘नमक जरा अंदाज से डाला करो।’ इतना सुनते ही हृदय कॉँपने
लगा। मानो मुझे इससे अधिक कोई वेदना नहीं पहुचाई जा सकती थी।
लेकिन मेरा
यह फूहड़पन मेरे बाबूजी (पतिदेव) को पसन्द न आता था। वह वकील थे। उन्होंने शिक्षा
की ऊँची से ऊँची डिगरियॉँ पायी थीं। वह मुझ पर प्रेम अवश्य करते थे; पर उस प्रेम में दया की मात्रा अधिक
होती थी। स्त्रियों के रहन-सहन और शिक्षा के सम्बन्ध में उनके विचार बहुत ही उदार
थे; वह मुझे उन विचारों से बहुत नीचे
देखकर कदाचित् मन ही मन खिन्न होते थे;
परन्तु उसमें मेरा कोई अपराध न देखकर हमारे रस्म-रिवाज पर झुझलाते थे। उन्हें मेरे
साथ बैठकर बातचीत करने में जरा आनन्द न आता। सोने आते, तो कोई न कोई
अँग्रेजी पुस्तक साथ लाते, और नींद न आने तक पढ़ा करते। जो
कभी मै पूछ बैठती कि क्या पढ़ते हो, तो मेरी ओर करूण दृष्टि
से देखकर उत्तर देते—तुम्हें क्या बतलाऊँ यह आसकर वाइल्ड की सर्वश्रेष्ठ रचना है।
मै अपनी अयोग्यता पर बहुत लज्जित थी। अपने को धिक्कारती, मै ऐसे विद्वान पुरूष
के योग्य नहीं हूँ। मुझे किसी उजड्ड के घर पड़ना था। बाबूजी मुझे निरादर की दृष्टि
से नहीं देखते थे, यही मेरे लिए सौभग्य की बात थी।
एक दिन
संध्या समय मैं रामायण पढ़ रही थी। भरत जी रामचंद्र जी की खोज में निकाले थे। उनका
करूण विलाप पढ़कर मेरा हृदय गदगद् हो रहा था। नेत्रों से अश्रुधारा बह रही थी।
हृदय उमड़ आता था। सहसा बाबू जी कमरे में
आयें। मैने पुस्तक तुरंत बन्द कर दीं। उनके सामने मै अपने फूहड़पन को भरसक प्रकट न
होने देती थी। लेकिन उन्होंने पुस्तक देख ली;
और पूछा—रामायण है
न?
मैने
अपराधियों की भांति सिर झुका कर कहा—हॉँ, जरा देख रही थी।
बाबू जी—इसमें शक नहीं कि पुस्तक बहुत
ही अच्छी,
भावों से भरी हुई है; लेकिन जैसा अंग्रेज या
फ्रांसीसी लेखक लिखतें हैं। तुम्हारी समझ में तो न आवेगा, लेकिन कहने में क्या
हरज है, योरोप में अजकल ‘स्वाभाविकता’ ( Realism) का जमाना है। वे लोग
मनोभावों के उत्थान और पतन का ऐसा वास्तविक वर्णन करते है कि पढ़कर आश्चर्य होता
है। हमारे यहॉँ कवियो को पग-पग पर धर्म तथा नीति का ध्यान रखना पड़ता है, इसलिए कभी-कभी उनके
भावों में अस्वभाविकता आ जाती है, और यही त्रुटी तुलसीदास
में भी है।
मेरी समझ
में उस समय कुछ भी न आया। बोली –मेरे लिए तो यही बहुत है, अँग्रेजी पुस्तकें कैसे समझूँ।
बाबू जी—कोई कठिन बात नहीं। एक घंटे
भी रोज पढ़ो, तो थोड़े ही समय में काफी योग्यता प्रप्त कर सकती हो; पर तुमने तो मानो मेरी बातें न मानने
की सौगंध ही खा ली है। कितना समझाया कि मुझसे शर्म करने की आवश्यकता नहीं, पर तुम्हारे ऊपर असर
न पड़ा। कितना कहता हूं कि जरा सफाई से रहा करो, परमात्मा
सुन्दरता देता है तो चाहता है कि उसका श्रृंगार भी होता रहे; लेकिन जान पड़ता है, तुम्हारी दृष्टि में
उसका कुछ भी मूल्य नहीं ! या शायद तुम समझती हो कि
मेरे जैसे कुरूप मनुष्य के लिए तुम चाहे जैसा भी रहो, आवश्यकता से अधिक
अच्छी हो। यह अत्याचार मेरे ऊपर है। तुम मुझे ठोंक-पीट कर वैराग्य सिखाना चाहती
हो। जब मैं दिन-रात मेहनत करके कमाता हूँ तो स्व-भावत:- मेरी यह इच्छा होती है कि
उस द्रव्य का सबसे उत्तम व्यय हो। परन्तु
तुम्हारा फूहड़पन और पुराने विचार मेरे सारे परिश्रम पर पानी फेर देते है।
स्त्रियाँ केवल भोजन बनाने, बच्चे पालने, पति सेवा करने और एकादशी व्रत रखने के
लिए नहीं है, उनके जीवन का लक्ष्य इससे बहुत ऊँचा है। वे
मनुष्यों के समस्त सामाजिक और मानसिक विषयों में समान रूप से भाग लेने की
अधिकारिणी हैं। उन्हे भी मनुष्यों की भांति स्वतंत्र रहने का अधिकार प्राप्त है। मुझे तुम्हारी यह बंदी-दशा देखकर
बड़ा कष्ट होता है। स्त्री पुरष की अर्द्धागिनी मानी गई है; लेकिन तुम मेरी मानसिक और सामाजिक, किसी आवश्यकता को
पूरा नहीं कर सकतीं। मेरा और तुम्हारा धर्म अलग, आचार-विचार
अलग, आमोद-प्रमोद के विषय अलग। जीवन के किसी कार्य में मुझे
तुमसे किसी प्रकार की सहायता नहीं मिल सकती। तुम स्वयं विचार सकती हो कि ऐसी दशा
में मेरी जिंदगी कैसी बुरी तरह कट रही है।
बाबू जी का
कहना बिलकुल यथार्थ था। मैं उनके गले में एक जंजीर की भांति पड़ी हुई थी। उस दिन
से मैने उन्हीं के कहें अनुसार चलने की दृढृ प्रतिज्ञा करली, अपने देवता को किस भॉँति
अप्रसन्न करती?
२
यह तो कैसे
कहूँ कि मुझे पहनने-ओढ़ने से प्रेम न था, और उतना ही था, जितना
दूसरी स्त्रियों को होता है। जब बालक और वृद्ध तक श्रृंगार पसंद करते है, तों मैं युवती ठहरी। मन भीतर ही भीतर मचल कर रह जाता था। मेरे मायके में
मोटा खाने और मोटा पहनने की चाल थी। मेरी मॉँ और दादी हाथों से सूत कातती थीं; और जुलाहे से उसी सूत के कपड़े बुनवा
लिए जाते थे। बाहर से बहुत कम कपड़े आते थे। में जरा महीन कपड़ा पहनना चाहतीं या
श्रृगार की रूची दिखाती तो अम्मॉँ फौरन टोकतीं और समझाती कि बहुत बनाव-सवॉँर भले
घर की लड़कियों को शोभा नहीं देता। ऐसी आदत अच्छी नहीं। यदि कभी वह मुझे दर्पण के
सामने देख लेती, तो झिड़कने लगती; परन्तु अब बाबूजी की जिद से
मेरी यह झिझक जाती रही। सास और ननदें मेरे बनाव-श्रृंगार पर नाक-भौं सिकोड़ती; पर मुझे अब उनकी परवाह न थी। बाबूजी
की प्रेम-परिपूर्ण दृष्टि के लिए मै
झिड़कियां भी सह सकती थी। अब उनके और मेरे विचारों में समानता आती जाती थी। वह
अधिक प्रसन्नचित्त जान पड़ते थे। वह मेरे लिए फैसनेबुल साड़ियॉँ, सुंदर जाकटें, चमकते हुए जूते और कामदार स्लीपरें लाया करते; पर मैं इन वस्तुओं को धारण कर किसी के
सामने न निकलती, ये वस्त्र केवल बाबू जी के ही सामने पहनने के लिए रखे थे। मुझे इस प्रकार
बनी-ठनी देख कर उन्हे बड़ी प्रसन्नता होती थी। स्त्री अपने पति की प्रसन्नता के
लिए क्या नहीं कर सकती। अब घर के काम-काज से मेरा अधिक समय बनाव-श्रृंगार तथा
पुस्तकावलोकन में ही बीतने लगा। पुस्तकों से मुझे प्रेम हाने लगा था।
यद्यपि अभी
तक मै अपने सास-ससुर का लिहाज करती थी, उनके सामने बूट और गाउन पहन कर निकलने का मुझे
साहस न होता था, पर मुझे उनकी शिक्षा-पूर्ण बाते न भांति थी।
मैं सोचती, जब मेरा पति सैकड़ों रूपये महीने कमाता है तो घर
में चेरी बनकर क्यों रहूँ? यों अपनी इच्छा से चाहे जितना काम
करूँ, पर वे लोग मुझे आज्ञा देने वाले कौन होते हैं? मुझमें आत्मभिमान की मात्रा बढ़ने लगी। यदि अम्मॉँ मुझे कोई काम करने को
कहतीं, तो तैं अदबदा कर टाल जाती। एक दिन उन्होनें कहा—सबेरे के जलपान के लिए कुछ
दालमोट बना लो। मैं बात अनसुनी कर गयी। अम्मॉँ ने कुछ देर तक मेरी राह देखी; पर जब मै अपने कमरे से न निकली तों
उन्हे गुस्सा हो आया। वह बड़ी ही चिड़चिड़ी प्रकृति की थी। तनिक-सी बात पर तुनक जाती थीं। उन्हे अपनी
प्रतिष्ठा का इतना अभिमान था कि मुझे बिलकुल लौंडी समझती थीं। हॉँ, अपनी पुत्रियों से
सदैव नम्रता से पेश आतीं; बल्कि मैं तो यह कहूँगी कि
उन्हें सिर चढ़ा रखा था। वह क्रोध में भरी हुई मेरे कमरे के द्वार पर आकर बोलीं—तुमसे मैंने दाल—मोट बनाने को कहा था, बनाया?
मै कुछ
रूष्ट होकर बोली—अभी फुर्सत नहीं मिली।
अम्मॉँ—तो तुम्हारी जान में दिन-भर
पड़े रहना ही बड़ा काम है! यह आजकल तुम्हें हो क्या गया है? किस घमंड में हो? क्या
यह सोचती हो कि मेरा पति कमाता है, तो मै काम क्यों करूँ? इस घमंड में न भूलना! तुम्हारा पति लाख कमाये;
लेकिन घर में राज मेरा ही रहेगा। आज वह चार पैसे कमाने लगा है, तो तुम्हें मालकिन
बनने की हवस हो रही है; लेकिन उसे पालने-पोसने तुम
नहीं आयी थी, मैंने ही उसे पढ़ा-लिखा कर इस योग्य बनाया है। वाह! कल को छोकरी और अभी से यह गुमान।
मैं रोने
लगी। मुँह से एक बात न निकली। बाबू जी उस समय ऊपर कमरे में बैठे कुछ पढ़ रहे थे।
ये बातें उन्होंने सुनीं। उन्हें कष्ट हुआ। रात को जब वह घर आये तो बोले—देखा तुमने आज अम्मॉँ का क्रोध? यही अत्याचार है, जिससे स्त्रियों को अपनी जिंदगी पहाड़ मालूम होते लगत है। इन बातों से
हृदय में कितनी वेदना होती है, इसका जानना असम्भव है। जीवन
भार हो जाता है, हृदय जर्जर हो जाता है और मनुष्य की
आत्मोन्नति उसी प्रकार रूक जाती है जैसे जल, प्रकाश और वायु
के बिना पौधे सूख जाते है। हमारे घरों में यह बड़ा अंधेर है। अब मैं उनका पुत्र ही
ठहरा। उनके सामने मुँह नहीं खोल सकूँगा। मेरे ऊपर उनका बहुत बड़ा अधिकार है। अतएव
उनके विरुद्ध एक शब्द भी कहना मेरे लिये लज्जा की बात होगी,
और यही बंधन तुम्हारे लिए भी है। यदि तुमने उनकी बातें चुपचाप न सुन ली होतीं, तो मुझे
बहुत ही दु:ख होता। कदाचित् मैं विष खा लेता। ऐसी दशा में दो ही बातें सम्भव है, या तो सदैव उनकी घुड़कियों-झिड़कियों को सहे जाओ,
या अपने लिए कोई दूसरा रास्ता ढूढ़ो। अब इस बात की आशा करना कि अम्मॉँ के सवभाव
में कोई परिवर्तन होगा, बिलकुल भ्रम है। बोलो, तुम्हें क्या स्वीकार है।
मैंने डरते
डरते कहा—आपकी जो
आज्ञा हो,
वह करें। अब कभी न पढूँ-लिखूँगी, और जो कुछ वह कहेंगी वही करूँगी। यदि वह इसी में
प्रसन्न हैं तो यही सही। मुझे पढ़-लिख कर क्या करना है?
बाबूजी –पर यह मैं नहीं चाहती। अम्मॉँ
ने आज आरम्भ किया है। अब रोज बढ़ती ही जायँगी। मैं तुम्हें जितनी ही सभ्य तथा
विचार-शील बनाने की चेष्टा करूँगा, उतना ही उन्हें बुरा लगेगा, और उनका गुस्सा तुम्हीं पर उतरेगा। उन्हें पता नहीं जिस अबहवा में
उन्होंने अपनी जिनदगी बितायी है, वह अब नहीं रही।
विचार-स्वातंत्र्य और समयानुकूलता उनकी
दृष्टि में अधर्म से कम नहीं। मैंने यह उपाय सोचा है कि किसी दूसरे शहर में
चल कर अपना अड्डा जमाऊँ। मेरी वकालत भी यहॉँ
नहीं चलती; इसलिए किसी बहाने की भी
आवश्यकता न पड़ेगी।
मैं इस
तजबीज के विरुद्ध कुछ न बोली। यद्यपि मुझे अकेले रहने से भय लगता था, तथापि वहॉँ स्वतन्त्र
रहने की आशा ने मन को प्रफुल्लित कर दिया।
३
उसी दिन से
अम्मॉँ ने मुझसे बोलना छोड़ दिया। महरियों, पड़ोसिनों और ननदों के आगे मेरा परिहास किया
करतीं। यह मुझे बहुत बुरा मालुम होता था। इसके पहले यदि वह कुछ भली-बुरी बातें कह
लेतीं, तो मुझे स्वीकार था। मेरे हृदय से उनकी मान-मर्यादा
घटने लगी। किसी मनुष्य पर इस प्रकार कटाक्ष करना उसके हृदय से अपने आदर को मिटने
के समान है। मेरे ऊपर सबसे गुरुतर दोषारोपण यह था कि मैंने बाबू जी पर कोई मोहन
मंत्र फुर्क दिया है, वह मेरे इशारों पर चलते है; पर याथार्थ में बात उल्टी ही
थी।
भाद्र मास था। जन्मष्टामी का त्यौहार
आया था। घर में सब लोगों ने व्रत रखा। मैंने भी सदैव की भांति व्रत रखा। ठाकुर जी
का जन्म रात को बारह बजे होने वाला था , हम सब बैठी गांती बजाती थी। बाबू जी इन असभ्य
व्यवहारों के बिलकुल विरुद्ध थे। वह होली के दिन रंग भी खेलते, गाने बजाने की तो बात ही अलग । रात को एक बजे जब मैं उनके कमरे में गयी, तो मुझे समझाने लगे- इस प्रकार शरीर को कष्ट देने से क्या लाभ? कृष्ण महापुरूष अवश्य थे, और उनकी पूजा करना हमारा कतर्व्य है: पर इस गाने-बजाने से क्या फायदा? इस ढोंग का नाम धर्म नहीं है। धर्म का सम्बन्ध सचाई ओर ईमान से है, दिखावे से नहीं ।
बाबू जी स्वयं इसी मार्ग का अनुकरण
करते थे। वह भगवदगीता की अत्यंत प्रशंसा करते पर उसका पाठ कभी न करते थे। उपनिषदों
की प्रशंसा में उनके मुख से मानों पुष्प- बष्टि होने लगती थी; पर मैंने उन्हें कभी कोई
उपनिषद् पढ़ते नहीं देखा। वह हिंदु धर्म के गूढ़ तत्व ज्ञान पर लट्टू थे, पर उसे समयानुकूल
नहीं समझते थे। विशेषकर वेदांत को तो भारत की अबनति का मूल कारण समझाते थे। वह कहा
करते कि इसी वेदांत ने हमको चोपट कर दिया;
हम दुनिया के पदार्थो को तुच्छ समझने लगे,
जिसका फल अब तक भुगत रहे हैं। अब उन्नति का समय है। चुपचाप बैठे रहने से
निर्वाह नहीं। संतोष ने ही भारत को गारत कर दिया ।
उस समय उनको उत्तर देने की शक्ति देने
की शक्ति मुझमें कहॉ थी ? हॉ, अब जान पड़ता है यह योरोपियन सभ्यता के चक्कर
में पड़े हुए थे। अब वह स्वयं ऐसी बाते नहीं करते, वह जोश अब
टंडा हो चला है।
४
इसके कुछ दिन बाद हम इलाहाबाद चेले आये। बाबू जी ने पहले ही एक दो- मंजिला
मकान ले रखा था –सब तरह से सजा-सजाया। हमो यहाँ पॉच नौकर थे— दो स्त्रियाँ, दो पुरुष और एक
महाराज। अब मैं घर के कुल काम-काज से छुटी पा गयी । कभी जी घबराता को कोई उपन्यास
लेकर पढ़ने लगती ।
यहॉं फूल और पीतल के बर्तन बहुत कम
थे। चीनी की रकाबियॉं और प्याले आलमारियों में सजे रखे थे । भोजन मेज पर आता था।
बाबू जी बड़े चाब से भोजन करते। मुझे पहले
कुछ शरम आती थी; लेकिन धीरे-धीरे मैं भी मेज ही पर भोजन करने लगी। हमारे पास एक सुन्दर
टमटम भी थी। अब हम पैदल बिलकुल न चलते। बाबू जी कहते – यही फैशन है !
बाबू जी की आमदनी अभी बहुत कम
थी। भली-भांति खर्च भी न चलता था। कभी-कभी
मैं उन्हें चिंताकुल देखती तो समझाती कि जब आया इतनी कम है तो व्यय इतना क्यों
बढ़ा रखा है? कोई छोटो–सा मकान ले लो। दो नौकरों से भी काम चल सकता है। लेकिनं बाबू जी मेरी बातों
पर हॅस देते और कहते–मैं अपनी दरिद्रता का ढिढोरा अपने-आप क्यों पीटूँ? दरिद्रता प्रकट करना
दरिद्र होने से अधिक दु:खदायी होता है। भूल जाओं कि हम लोग निर्धन है, फिर लक्ष्मी हमारे पास आप दौड़ी आयेगी । खर्च बढ़ना, आवश्यकताओं का अधिक होना ही द्रव्योपार्जन की पहली सीढ़ी हैं इससे हमारी
गुप्त शक्ति विकसित हो जाती हैं। और हम उन कष्टों को झेलते हुए आगे पंग धरने के
योग्य होते हैं। संतोष दरद्रिता का दूसरा नाम है।
अस्तु, हम लोगों का खर्च दिन –दिन बढ़ता ही जाता था। हम लोग
सप्ताह में तीन बार थियेटर जरूर देखने जाते। सप्ताह में एक बार मित्रों को भोजन
अवश्य ही दिया जाता। अब मुझे सूझने लगा कि जीवन का लक्ष्य सुख –भोग ही है। ईश्वर को हमारी
उपासाना की इच्छा नहीं । उसने हमको उत्तम- उत्तम बस्तुऍ भोगने के लिए ही दी हैं
उसको भोगना ही उसकी सर्वोतम आराधना है। एक इसाई लेडी मुझे पढ़ाने तथा गाना सिखाने
आने लंगी। घर में एक पियानो भी आ गया। इन्हीं आनन्दों में फँस कर मैं रामायण और
भक्तमाल को भूल गयी । ये पुस्तकें मुझे अप्रिय लगने लगीं । देवताओं से विश्वास उठ
गया ।
धीरे-धीरे यहॉ के बड़े लोगों से स्नेह
और सम्बन्ध बढ़ने लगा। यह एक बिलकुल नयी सोसाटी थीं इसके रहन-सहन, आहार-व्यवहार और
आचार- विचार मेरे लिए सर्वथा अनोखे थे। मै इस सोसायटी में उसे जान पड़ती, जैसे मोरों मे कौआ । इन लेडियों की बातचीत कभी थियेटर और घुड़दौड़ के
विषय में होती, कभी टेनिस, समाचार –पत्रों और अच्छे-अच्छे लेखकों
के लेखों पर । उनके चातुर्य ,बुद्धि की तीव्रता फुर्ती और चपलता
पर मुझे अचंभा होता । ऐसा मालूम होता कि वे ज्ञान और प्रकाश की पुतलियॉ
हैं। वे बिना घूंघट बाहर निकलतीं। मैं उनके साहस पर चकित रह जाती । मुझे भी
कभी-कभी अपने साथ ले जाने की चेष्टा करती, लेकिन मैं लज्जावश
न जा सकती । मैं उन लेडियों को भी उदास या चिंतित न पाती। मिसस्टर दास बहुत बीमार
थे। परन्तु मिसेज दास के माथे पर चिन्ता का चिन्ह तक न था। मिस्टर बागड़ी नैनीताल
में पतेदिक का इलाज करा रहे थे, पर मिसेज बागड़ी नित्य टेनिस
खेलने जाती थीं । इस अवस्था में मेरी क्या दशा होती मै ही जानती हूं।
इन लेडियो की रीति नीति में एक
आर्कषण- शाक्ति थी, जो मुझे खींचे लिए जाती थी। मै उन्हैं सदैव आमोद–प्रमोदक के लिए उत्सुक देखती
और मेरा भी जी चाहता कि उन्हीं की भांति
मैं भी निस्संकोच हो जाती । उनका अंग्रजी वार्तालाप सुन मुझे मालूम होता कि ये
देवियॉ हैं। मैं अपनी इन त्रुटियों की पूर्ति के लिए प्रयत्न किया करती थीं।
इसी बीच में मुझे एक खेदजनक अनुभव
होने लगा। यद्यपि बाबूजी पहले से मेरा अधिक आदर करते,मुझे सदैव ‘डियर-डार्लिग कहकर पूकारते थे, तथापि मुझे उनकी बातो
में एक प्रकार की बनावट मालूम होती थीं। ऐसा प्रतीत होता,
मानों ये बातें उनके हृदय से नहीं, केवल मुख से निकलती है। उनके स्नेह ओर प्यार में हार्दिक भावों की जगह
अलंकार ज्यादा होता था; किन्तु और भी अचम्भे की बात यह थी कि अब मुझे बाबू जी पर वह
पहले की –सी
श्राद्धा न रही। अब उनकी सिर की पीड़ा से मेरे हृदय में पीड़ा न होती थी। मुझमें
आत्मगौरव का आविर्भाव होने लगा था। अब मैं
अपना बनाव-श्रृंगार इसलिए करती थी कि
संसार में सह भी मेरा कर्तव्य है; इसलिए नहीं कि मैं किसी एक पुरूष की व्रतधारिणी हूँ। अब मुझे भी अपनी सुन्दरता पर गर्व होने
लगा था । मैं अब किसी दूसरे के लिए नहीं, अपने लिए जीती थीं। त्याग तथा सेवा का भाव मेरे हृदय से लुपत होने
लग था।
मैं अब भी परदा करती थी; परन्तु हृदय अपनी सुन्दरता
की सराहना सुनने के लिए व्याकुल रहता था। एक दिन मिस्टर दास तथा और भी अनेक सभ्य–गण बाबू जी के साथ बैठे थे।
मेरे और उसके बीच में केवल एक परदे की आड़ थी। बाबू जी मेरी इस झिझक से बहुत ही
लज्जित थे। इसे वह अपनी सभ्यता में कला
धब्बा समझते थे । कदाचित् यह दिखाना चाहते
कि मेरी स्त्री इसलिए परदे में नहीं है कि वह रूप तथा वस्त्राभूषणों में
किसी से कम है बल्कि इसलिए कि अभी उसे
लज्जा आती है। वह मुझे किसी बहाने से बार-बार परदे के निकट बुलाते; जिसमें अनके उनके मित्र मेरी
सुन्दरता और वस्त्राभूषण देख लें । अन्त में कुछ दिन बाद मेरी झिझक गायब हो गयी। इलाहाबाद
आने के पूरे दो वर्ष बाद में बाबू जी के साथ बिना परदे के सैर करने लगी। सैर के
बाद टेनिस की नोबत आयीं अन्त में मैंने क्लब में जाकर दम लिया । पहले यह टेनिस और
क्लब मुझे तमाशा –सा मालूम होत था मानों वे लोग व्यायाम के लिए नहीं बल्कि फैशन के लिए टेनिस
खेलने आते थे। वे कभी न भूलते थे कि हम
टेनिस खेल रहे है। उनके प्रत्येक काम में, झुकने में, दौड़ने में, उचकने में एक कृत्रिमता होती थी, जिससे यह प्रतीत
होता था कि इस खेल का प्रयोजन कसरत नहीं केवल दिखावा है।
क्लब में इससे विचित्र अवस्था थी। वह
पूरा स्वांग था, भद्दा और बेजोड़ । लोग अंग्ररेजी
के चुने हुए शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसमें कोई सार न
होता था।स्त्रियों की वह फूहड़ निर्लज्जता और पुरूषों की वह भाव-शून्य स्त्री –पूजा मुझे भी न भाती थी।
चारों ओर अंग्ररेजी चाल-ढ़ाल की हास्यजनक
नकल थीं। परन्तु क्रमश: मैं भी वह रंग पकड़ने और उन्हीं का अनुकरण करने लगी । अब
मुझे अनुभव हुआ कि इस प्रदशर्न-लोलुपता में कितनी शक्ति है। मैं अब नित्य नये
श्रृंगार करती, नित्य नया रूप भरती, केवल इस लिए कि क्लब में सबकी
आँखों में चुभ जाऊँ ! अब मुझे बाबू जी के सेवा सत्कार से अधिक अपने बनाब श्रृंगार की धुन रहती थी । यहॉ
तक कि यह शौक एक नशा–सा बन गया। इतना ही नहीं, लोगों से अपने
सौदर्न्य की प्रशंसा सुन कर मुझे एक अभिमान –मिश्रित आंनद का अनुभव होने लगा। मेरी
लज्जाशीलता की सीमांऍ विस्तृत हो गयी ।वह दृष्टिपात जो कभी मेरे शरीर के प्रत्येक रोऍ को खड़ा कर देता और
वह हास्यकटाक्ष, जो कभी मुझे विष खा लेने को
प्रस्तुत कर देता, उनसे अब मुझे एक उनमाद पूर्ण हर्ष होता था
परन्तु जब कभी में अपनी अवस्था पर आंतरिक दृष्टि डालती तो मुझे बड़ी घबराहट होती
थी। यह नाव किस घट लगेगी? कभी-कभी इरादा करती कि क्लब न
जाऊँगी; परन्तु
समय आते ही फिर तैयार हो जाती । मैं अपने वश में न थी । मेरी सत्कल्पनाऍ
निर्बल हो गयी थीं।
५
दो वर्ष और बीत गये और अब बाबू जी के
स्भाव में एक विचित्र परिवर्तन होने लगा । वह उदास और चिंतित रहने लगे। मुझसे बहुत कम बोलते। ऐसा जान पड़ता कि इन्हें
कठिन चिंता ने घेर रखा है, या कोई
बीमारी हो गयी है। मुँह बिलकुल सुखा रहता था। तनिक –तनिक –सी बात पर नौकरों से झल्लाने
लगते, और
बाहर बहुत कम जाते ।
अभी एक ही मास पहले वह सौ काम छोड़कर
क्लब अवश्य जाते थे, वहॉ गये बिना उन्हें कल न पड़ती थी; अब अधिकतर अपने कमरे में आराम –कुर्सी पर लेटे हुए समाचार-पत्र और पुस्कतें देखा करते
थे । मेरी समझ में न आता कि बात क्या है।
एक दिन उन्हें बड़े जोर का बुखार आया, दिन-भर बेहोश रहे, परनतु मुझे उनके पास बैठने में अनकुस –सा लगता था। मेरा जी एक
उपन्यास में लगा हुआ था । उनके पास जाती थी और पल भर में फिर लौट आती। टेनिस का
समय आया,
तो दुविधा में पड़ गयी कि जाउँ या न जाऊँ । देर तक मन में यह संग्राम होता रहा
अन्त को मैंने यह निर्णय किया कि मेरे यहॉ रहने से वह कुछ अच्छे तो हो नहीं जायँगे, इससे मेरा यहॉ बैठा रहना बिलकुल निर्रथक है। मैंने बढ़िया बस्त्र पहने, और रैकेट लेकर क्लब घर जा पहूँची । वहॉ मैंने मिसेज दास और मिसेज बागची
से बाबू जी की दशा बतलायी, और सजल नेत्र चुपचाप बैठी रही ।
जब सब लोग कोर्ट में जाने लगे और मिस्टर दास ने मुझसे चलने को कहा तो मैं ठंडी आह
भरकर कोर्ट में जा पहूँची और खेलने लगी।
आज से तीन वर्ष बाबू जी को इसी प्रकार
बुखार आ गया था। मैं रात भर उन्हें पंखा झेलती रही थी; हृदय व्याकुल था और यही
चाहता था कि इनके बदले मुझे बुखार आ जाय, परन्तु वह उठ बैठें । पर अब हृदय तो स्नेह –शून्य हो गया था, दिखावा अधिक था। अकेले रोने की मुझमें क्षमता न
रह गयी थी । मैं सदैव की भाँति रात को नौ बजे लौटी। बाबू जी का जी कुछ अच्छा जान
पड़ा । उन्होंने मुझे केवल दबी दृष्टि से देखा और करबट बदल ली; परन्तु मैं लेटी, तो मेरा हृदय मुझे
अपनी स्वार्थपरता और प्रमोदासक्ति पर धिक्कारता ।
मैं अब अंग्ररेजी उपन्यासों को समझने
लगी । हमारी बातचीत अधिक उत्कृष्ट और आलोचनात्मक होती थी।
हमारा सभ्यता का आदर्श अब बहुत ही
उच्च हो गया । हमको अब अपनी मित्र मण्डली से बाहर दूसरों से मिलने–जुलने में संकोच होता था। हम
अपने से छोटी श्रेणी के लोंगो से बोलने में अपना अपमान समझते थे। नौकरों को अपना
नौकर समझते थे, और बस । हम उनके निजी मामलों से कुछ मतलब न था। हम उनसे अलग रह कर उनके
ऊपर अपना जोर जमाये रखना चाहते थे। हमारी
इच्छा यह थी कि वह हम लोगों को साहब समझें । हिन्दुसतानी स्त्रियों को देखकर मुझे
उनसे घृणा होती थी, उनमें शिष्टता न थी। खैर!
बाबू जी का जी दूसरे दिन भी न सॅभला ।
मैं क्लब न गयी । परन्तु जब लगातार तीन दिन तक उन्हें बुखार आता गया और मिसेज दास
ने बार-बार एक नर्स बुलाने का आदेश किया, तो मैं सहमत हो गयी । उस दिन से रोगी की
सेवा-शुश्रूषा से छुट्टी पा कर बड़ा हर्ष हुआ।यद्यपि दो दिन मैं क्लब न गयी थी, परंतु मेरा जी वहीं लगा रहता था , बल्कि अपने
भीरूतापूर्ण त्याग पर क्रोध भी आता था।
६
एक दिन तीसरे पहर मैं कुर्सी पर लेटी
हुई अंग्ररेजी पुस्तक पढ़ रही थी। अचानक मनमें यह विचार उठा कि बाबू जी का बुखार असाध्य हो जाय तो ? पर इस विचार से
लेश-मात्र भी दु:ख न हुआ । मैं इस शोकमय कल्पना का मन ही मन आनंद उठाने लगी ।
मिसेज दास, मिसेज नायडू मिसेज श्रीवास्तब, मिस खरे, मिसेज शरगर अवश्य ही मातमपूर्सी करने
आवेगीं। उन्हें देखते ही मैं सजल नेत्र हो उठूँगी, और
कहूँगी- बहनों ! मैं लूट गयी । हाय मै लुट गयी ।
अब मेरा जीवन अँधेरी रात के भयावह वन या श्मशान के दीपक के समान है, परंतु मेरी अवस्था पर
दु:ख न प्रकट करो । मुझ पर जो पड़ेगी, उसे मै उस महान् आत्म
के मोक्ष के विचार से सह लूँगी ।
मैंने इस प्रकार मन में एक शोकपूर्ण
व्याख्यान की रचना कर डाल। यहॉँ तक कि अपने उस वस्त्र के विषय में भी निश्चय कर
लिया, जो
मृतक के साथ श्मशान जाते समय पहनूँगी।
इस घटना की शहर भर में चर्चा हो
जायेगी । सारे कैन्टोमेंट के लोग मुझे
समवेदना के पत्र भेजेगें । तब में उनका उत्तर समाचार पत्रों में प्रकाशित करा
दूँगी कि मैं प्रत्येक शोंक-पत्र का उत्तर देने में असमर्थ हूं । हृदय के
टुकड़े-टुकड़े हो गऐ है, उसे रोने के सिवा और किसी काम के लिए समय नहीं है। मै इस महदर्दी
के लिए उन लोगों की कृतज्ञ हूं , ओर उनसे विनय- पूर्वक
निवेदन करती हूं कि वे मृतक की आत्मा की सदगति के निमित्त ईश्वर से प्रार्थना
करें।
मै इन्हीं विचारों मे डूब हुई थी कि
नर्स ने आकर कहा – आपको साहब याद करते हैं। यह मेरे क्लब जाने का समय था। मुझे उनका बुलाना अखर गया, लेकिन एक मास हो गया था।
वह अत्यन्त दुर्बल हो रहे थे। उन्होंने मेरी और विनयपूर्ण दृष्टि से
देखा। उसमे ऑसू भरे हुए थे। मुझे उन पर दया आयी। बैठ गयी, और ढ़ाढस देते हुए बोली –क्या करूँ ? कोई दूसरा डाक्टर
बुलाऊ?
बाबू जी आँखें नीची करके अत्यंत करूण
भाव से बोले – यहॉ कभी
नहीं अच्छा हो सकता, मुझे अम्मॉ के पास पहूँचा दो।
मैंने कहा- क्या आप समझते है कि वहाँ
आपकी चिकित्सा यहाँ से अच्छी होगी ?
बाबू जी बोले – क्या जाने क्यों मेरा जी
अम्मॉ के दर्शनों को लालायित हो रहा है। मुझे ऐसा मालूम होता है कि में वहॉ बना
दवा- दर्पण के भी अच्छा हो जाऊँगा ।
मैं- यह आपका केवल विचार मात्र है।
बाबजी – शायद ऐसा ही हो । लेकिन मेरी विनय स्वीकार करो। मैं इस
रोग से नहीं इस जीवन से ही दु:खित हूँ।
मैंने अचरज से उनकी ओर देखा !
बाबू जी फिर बोले – हॉ, इस जिंदगी से तंग आ
गया हूँ! में अब समझ रहा हूँ मै जिस स्वच्छ, लहराते, हुए निर्मल जल
की ओर दौड़ा जा रहा था, वह मरूभूमि हैं। मैं इस प्रकार जीवन
के बाहरी रूप पर लट्टू हो रहा था; परंतु अब मुझे उसकी आंतरिक अवस्थाओं का बोध हो रहा है! इन चार बर्षो मे मेने इस
उपवन मे सूब भ्रमण किया, और उसे आदि से अंत तक कंटकमय पाया । यहॉ न तो हदय को शांति है, न आत्मिक आंनंद। यह एक उन्मत, अशांतिमय, स्वार्थ-पूर्ण, विलाप–युक्त जीवन है। यहॉ न नीति है; न धर्म, न सहानुभुति, न सहदयता। परामात्मा के लिए मुझे
इस अग्नि से बचाओं। यदि और कोई उपाय न हो तो अम्माँ को एक पत्र ही लिख दो । वह
आवश्य यहॉ आयेगीं। अपने अभागे पुत्र का दु:ख उनसे न देखा जाएगा। उन्हें इस सोसाइटी
की हवा अभी नहीं लगी, वह आयेगी। उनकी वह मामतापूर्ण दृष्टि, वह स्नेहपूर्ण शुश्रृषा मेरे लिए सौ ओषधियों का काम करेगी। उनके मुख पर
वह ज्योति प्रकाशमान होगी, जिसके लिए मेरे नेत्र तरस रहे
हैं। उनके हदय मे स्नेह है, विश्वास है। यदि उनकी गोद मे मैं
मर भी जाऊँ तो मेरी आत्मा का शांति मिलेगी।
मैं समझी कि यह बुखार की बक-झक हैं।
नर्स से कहा – जरा इनमा
टेम्परेचर तो लो, मैं अभी डाक्टर के पास जाती हूँ। मेरा हृदय एक अज्ञात भय से कॉपते लगा।
नर्स ने थर्मामीटर निकाला; परन्तु ज्यों ही वह बाबू जी के समीप गयी, उन्होनें उसके हाथ से
वह यंत्र छीन कर पृथ्वी पर पटक दिया। उसके टुकड़े-टुकड़े हो गये। फिर मेरी ओर एक
अवहेलनापूर्ण दृष्टि से देखकर कहा – साफ- साफ क्यों नहीं कहती हो कि मै क्लब –घर जाती हूँ जिसके लिए तुमने
ये वस्त्र धारण किये है और गाउन पहनी है। खैर, घूमती हुई यदि डाक्टर के पास जाना, तो कह देना कि यहॉ टेम्परेचर उस बिंदु पर पहुँच चुका है, जहॉ आग लग जाती है।
मैं और भी अधिक भयभीत हो गयी। हदय में
एक करूण चिंता का संचार होने लगा। गला भर आया। बाबूजी ने नेत्र मूँद लिये थे और
उनकी साँस वेग से चल रही थी। मैं द्वार की ओर चली कि किसी को डाक्टर के पास भेजूँ।
यह फटकार सुन कर स्वंय कैसे जाती। इतने में बाबू जी उठ बैठे और विनीत भाव से बोले –श्यामा! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता
हूँ। बात दो सप्ताह से मन में थी: पर साहस न हुआ। आज मैंने निश्चय कर लिया है कि
ही डालूँ। में अब फिर अपने घर जाकर वही पहले की–सी जिंदगी बिताना चाहता हूँ। मुझे अब
इस जीवन से घृणा हो गयी है, ओर यही मेरी बीमारी का मुख्य कारण हैं। मुझे शारीरिक नहीं मानसिक कष्ट
हैं। मैं फिर तुम्हें वही पहले की–सी सलज्ज, नीचा सिर करके चलनेवाली,
पुजा करनेवाली,
रमायण पढ़नेवाली, घर का काम-काज करनेवाली, चरखा
कातनेवाली, ईश्वर से डरनेवाली,
पतिश्रद्धा से परिपूर्ण स्त्री देखना चाहता हूँ। मै विश्वास करता हूँ तुम मुझे
निराश न करेगी। तुमको सोलहो आना अपनी बनाना और सोलहो आने तुम्हारा बनाना चाहता
हूँ। मैं अब समझ गया कि उसी सादे पवित्र जीवन मे वास्तविक सुख है। बोलो , स्वीकार है? तुमने सदैव मेरी आज्ञाओं का पालन किया
है, इस समय निराश न
करना; नहीं तो
इस कष्ट और शोंक का न जाने कितना भयंकर परिणाम हो।
मै सहसा
कोई उतर न दे सकी। मन में सोचने लगी – इस स्वतंत्र जीवन मे कितना सुख था? ये मजे वहॉ कहॉँ? क्या इतने दिन स्वतंत्र वायु मे विचरण करने के पश्चात फिर उसी पिंजड़े मे
जाऊँ? वही लौंडी बनकर रहूँ? क्यों
इन्होंने मुझे वर्षों स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया, वर्षो
देवताओं की, रामायण की पूजा–पाठ की, व्रत–उपवास की बुराई की, हॅंसी उड़ायी? अब जब मैं उन बातों को भूल गयीं, उन्हें मिथ्या
समझने लगी, तो फिर मुझे उसी अंधकूप मे ढकेलना चाहते हैं। मैं
तो इन्हीं की इच्छा के अनुसार चलती हूँ, फिर मेरा अपराध क्या
है? लेकिन बाबूजी के मुख पर एक ऐसा दीनता-पूर्ण विवशता थी कि
मैं प्रत्यक्ष अस्वीकार न कर सकी। बोली- आखिर यहॉ क्या कष्ट है ?
मैं उनके विचारों की तह तक पहुँचना चाहती थीं।
बाबूजी फिर उठ बैठे और मेरी ओर कठोर
दृष्ट से देखकर बोल-बहुत ही अच्छा होता कि तुम इस प्रश्न को मुझसे पूछने के बदले
अपने ही हदय से पूछ लेती। क्या अब मैं तुम्हारे लिए वही हूँ जो आज से तीन वर्ष
पहले था। जब मैं तुमसे अधिक शिक्षा प्राप्त, अधिक बुद्विमान, अधिक
जानकार होकर तुम्हारे लिए वह नहीं रहा जो पहले था –तुमने चाहे इसका अनुभव न किया
हो परन्तु मैं स्वंय कर रहा हूँ—तो मैं अनमान करूँ कि उन्हीं भावों ने तुम्हें रखलित न किया
होगा?
नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष चिह्ल देख पड़ते है कि तुम्हारे हदय
पर उन भावों का और भी अधिक प्रभाव पड़ा है। तुमने अपने को ऊपरी बनाव-चुनाव ओर
विलास के भॅवर में डाल दिया, और तुम्हें उसकी लेशमत्र भी
सुधि नहीं हैं। अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि सभ्ता,
स्वेछाचारित का भूत स्त्रियों के कोमल हदय पर बड़ी सुगमता से कब्जा कर सकता है।
क्या अब से तीन वर्ष पूर्व भी तुम्हें यह साहस हो सकता था कि मुझे इस दशा में छोड़
कर किसी पड़ोसिन के यहॉ गोन–बजाने चली जाती? मैं बिछोने पर रहता, और
तुम किसी के घर जाकर कलोलें करती। स्त्रियों का हदय आधिक्य-प्रिय होता हैं; परन्तु इस नवीन आधिक्य के
बदले मुझे वह पुराना आधिक्य कहीं ज्यादा पसन्द हैं। उस अधिक्य का फल आत्मिक एव
शारीरिक अभ्युदय ओर हृदय की पवित्रता और स्वेच्छाचार। उस समय यदि तुम इस प्रकार
मिस्टर दास के सम्मुख हॅंसती-बोलती, तो मैं या तो तुम्हें मार डालता, या स्वयं विष-पान कर लेता । परन्तु बेहयाई ऐसे जीवन का प्रधान तत्व है।
मै सब कुछ स्वयं देखता ओर सहता हूँ।
कदाचित् सहे भी जाता यदि इस बीमारी ने मुझे सचेत न कर दिया होता। अब यदि तुम यहॉ बैठी भी रहो,
तो मुझे संतोष न होगा, क्योंकि मुझे यह विचार दु:खित करता
रहेगा कि तुम्हारा हदय यहॉ नहीं हैं। मैंने अपने को उस इन्द्रजाल से निकालने का
निश्चय कर लिया है, जहॉ धन का नाम मान है, इन्द्रिया लिप्सा का सभ्यता और
भ्रष्टता का विचार स्वतन्त्र्य। बोलो, मेरा प्रस्ताव स्वीकार
है?
मेरे हदय
पर वज्रपात–सा हो गया।
बाबूजी का अभिप्राय पूर्णतया हृदयंगम हो गया। अभी हदय में कुछ पुरानी लज्जा बाकी
थी। यह यंत्रणा असह्रा हो गयी। लज्जित हो उठी। अंतरात्मा ने कहा– अवश्य! मैं अब वह नहीं हूँ, जो पहले थी। उस समय
मैं इनको अपना इष्टदेव मानती थी, इनकी आज्ञा शिरोधार्य थी; पर अब वह मेरी दृष्टि में एक
साधारण मनुष्य हैं। मिस्टर दास का चित्र मेरे नेत्रों के सामने खिंच गया। कल मेरे
हदय पर इस दुरात्मा की बातों का कैसा नशा छा गया था, यह सोचते ही नेत्र लज्जा से झुक गये।
बाबूजी की आंतरिक अवस्था उनके मुखड़े ही से प्रकाशमान हो रही थी। स्वार्थ और
विलास-लिप्सा के विचार मेरे हदय से दूर हो गये। उनके बदले ये शब्द ज्वलंत अक्षरों
मे लिखे हुए नजर आये- तूने फैशन और वस्त्राभूषणों में अवश्य उन्नति की है, तुझमें अपने स्वार्थें का ज्ञान हो आया है, तुझमें
जीवन के सुख भागने की योग्यता अधिक हो गयी है, तू अब अधिक
गर्विणी, दृढ़हदय और शिक्षा-सम्पन्न भी हो गयी: लेकिन तेरे
आत्मिक बल का विनाश हो गया, क्योंकि तू अपने कर्तव्य को भूल
गयी।
मै
दोंनों हाथ जोड़कर बाबूजी के चरणों पर गिर पड़ी। कंठ रूँध गया, एक शब्द भी मुंह से न
निकला, अश्रुधारा बह चली।
अब मैं फिर अपने घर पर आ गयी हूं।
अम्माँ जी अब मेरा अधिक सम्मान करती हैं, बाबूजी संतुष्ट दीख पड़ते है। वह अब स्वयं
प्रतिदिन संध्यावंदन करते है।
मिसेज
दास के पत्र कभी कभी आते हैं, वह इलाहाबादी सोसाइटी के नवीन समाचारों से भरे होते हैं।
मिस्टर दास और मिस भाटिया से संबंध में कलुषिक बातें उड़ रही है। मैं इन पत्रों का
उतर तो देती हूँ, परन्तु चाहती हूँ कि वह अब आते तो अच्छा
होता। वह मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं, जिन्हें मैं भूल जाना चाहती हूँ।
कल
बाबूजी ने बहुत-सी पुरानी पाथियॉँ अग्निदेव को अर्पण कीं। उनमें आसकर वाइल्ड की कई
पुस्तकें थीं। वह अब अँग्रेजी पुस्तकें बहुत कम पढ़ते हैं। उन्हें कार्लाइल, रस्किन और एमरसन के
सिवा और कोई पुस्तक पढ़ते मैं नहीं देखती। मुझे तो अपनी रामायण ओर महाभारत में फिर
वही आनन्द प्राप्त होने लगा है। चरखा अब पहले के अधिक चलाती हूँ क्योंकि इस बीच
चरखे ने खूब प्रचार पा लिया है।
समर यात्रा
आज सबेरे ही
से गॉँव में हलचल मची हुई थी। कच्ची झोपड़ियॉँ हँसती हुई जान पड़ती थी। आज
सत्याग्रहियों का जत्था गॉँव में आयेगा। कोदई चौधरी के द्वार पर चँदोवा तना हुआ
है। आटा,
घी, तरकारी , दुध और दही जमा किया जा
रहा है। सबके चेहरों पर उमंग है, हौसला है, आनन्द है। वही बिंदा अहीर, जो दौरे के हाकिमो के
पड़ाव पर पाव-पाव भर दूध के लिए मुँह छिपाता फिरता था, आज
दूध और दही के दो मटके अहिराने से बटोर कर रख गया है। कुम्हार, जो घर छोड़ कर भाग जाया करता था , मिट्टी के
बर्तनों का अटम लगा गया है। गॉँव के नाई-कहार सब आप ही आप दौड़े चले आ रहे हैं।
अगर कोई प्राणी दुखी है, तो वह नोहरी बुढ़िया है। वह अपनी
झोपड़ी के द्वार पर बैठी हुई अपनी पचहत्तर साल की बूढ़ी सिकुड़ी हुई ऑंखों से यह
समारोह देख रही है और पछता रही है। उसके पास क्या है,जिसे ले
कर कोदई के ,द्वार पर जाय और कहे—मैं यह लायी हूँ। वह तो दानों
को मुहताज है।
मगर नोहरी
ने अच्छे दिन भी देखे हैं। एक दिन उसके पास धन, जन सब कुछ था। गॉँव पर उसी का राज्य था। कोदई
को उसने हमेशा नीचे दबाये रखा। वह स्त्री होकर भी पुरुष थी। उसका पति घर में सोता था, वह खेत मे सोने जाती थी। मामले –मुकदमें की पैरवी खुद ही करती थी।
लेना-देना सब उसी के हाथों में था लेकिन वह सब कुछ विधाता ने हर लिया; न धन रहा, न जन रहे—अब उनके नामों को रोने के लिए
वही बाकी थी। ऑंखों से सूझता न था, कानों से सुनायी न देता था, जगह से हिलना मुश्किल था। किसी तरह जिंदगी के दिन पूरे कर रही थी और उधर
कोदई के भाग उदय हो गये थे। अब चारों ओर
से कोदई की पूछ थी—पहूँच थी। आज जलसा भी कोदई के द्वार पर हो रहा हैं। नोहरी को अब कौन पूछेगा
। यह सोचकर उसका मनस्वी ह्रदय मानो किसी पत्थर से कुचल उठा। हाय ! मगर भगवान उसे इतना अपंग न
कर दिया होता, तो आज झोपड़े को लीपती, द्वार पर बाजे बजवाती; कढ़ाव चढ़ा देती, पुड़ियॉँ बनवायी और
जब वह लोग खा चुकते; तो अँजुली भर रुपये उनको भेंट कर देती।
उसे वह दिन
याद आया जब वह बूढ़े पति को लेकर यहॉँ से बीस कोस महात्मा जी के दर्शन करने गयी थी।
वह उत्साह , वह सात्विक प्रेम, वह श्रद्धा, आज उसके ह्रदय में आकाश के मटियाले मेंघों की भॉँति उमड़ने लगी।
कोदई ने आ
कर पोपले मुँह से कहा—भाभी , आज महात्मा जी का जत्था आ रहा है। तुम्हें भी कुछ देना है।
नोहरी ने
चौधरी का कटार भरी हुई ऑंखों से देखा । निर्दयी मुझे जलाने आया है। नीचा दिखाना
चाहता है। जैसे आकाश पर चढ़ कर बोली –मुझे जो कुछ देना है, वह उन्हीं लोंगो को
दूँगी । तुम्हें क्यों दिखाऊँ !
कोदई ने
मुस्करा कर कहा—हम किसी से कहेगें नहीं, सच कहते हैं भाभी, निकालो वह पुरानी
हॉँड़ी ! अब किस दिन के लिए रखे हुए हो। किसी ने
कुछ नहीं दिया। गॉंव की लाज कैसे रहैगी ?
नोहरी ने
कठोर दीनता के भाव से कहा—जले पर नमक न छिड़को, देवर जी! भगवान ने दिया होता,तो तुम्हें कहना न पड़ता । इसी द्वार पर
एक दिन साधु-संत, जोगी-जती,हाकिम-सूबा
सभी आते थे; मगर सब दिन बराबर नहीं जाते !
कोदई लज्जित
हो गया। उसके मुख की झुर्रियॉँ मानों रेंगने लगीं। बोला –तुम तो हँसी-हँसी में बिगड़
जाती हो भाभी ! मैंने तो
इसलिए कहा था कि पीछे से तुम यह न कहने
लगो—मुझसे
तो किसी ने कुछ कहा ही नहीं ।
यह कहता हुआ
वह चला गया। नोहरी वहीं बैठी उसकी ओर ताकती रही। उसका वह व्यंग्य सर्प की भॉँति
उसके सामने बैठा हुआ मालूम होता था।
२
नोहरी अभी
बैठी हूई थी कि शोर मचा—जत्था आ गया। पश्चिम में गर्द उड़ती हुई नजर आ रही थी, मानों पृथ्वी उन
यात्रियों के स्वागत में अपने राज-रत्नों की वर्षा कर रही हो। गॉँव के सब स्त्री-पुरुष
सब काम छोड़-छोड़ कर उनका अभिवादन करने चले। एक क्षण मे तिरंगी पताका हवा में
फहराती दिखायी दी, मानों स्वराज्य ऊँचे आसन पर बैठा हुआ सबको
आशीर्वाद दे रहा है।
स्त्रियां मंगल-गान करने लगीं। जरा
देर में यात्रियों का दल साफ नजर आने लगा। दो-दो आदमियों की कतारें थीं। हर एक की
देह पर खद्दर का कुर्ता था, सिर पर गॉँधी टोपी , बगल में थैला लटकता हुआ, दोनों हाथ खाली, मानों स्वराज्य का आलिंगन करने को
तैयार हों। फिर उनका कण्ठ-स्वर सुनायी देने लगा। उनके मरदाने गलों से एक कौमी
तराना निकल रहा था, गर्म,गहरा, दिलों में स्फूर्ति डालनेवाला—
एक
दिन वह था कि हम सारे जहॉँ में फर्द थे,
एक
दिन यह है कि हम-सा बेहया कोई नहीं।
एक
दिन वह था कि अपनी शान पर देते थे जान,
एक
दिन यह है कि हम-सा बेहया कोई नहीं।
गॉँववालों ने कई कदम आगे बढ़कर
यात्रियों का स्वागत किया। बेचारों के सिरों पर धुल जमी हुई थी, ओठ सूखे हुए, चेहरे सँवालाये; पर ऑखों में जैसे आजादी की ज्योति चमक रही थी ।
स्त्रियां गा रही थीं, बालक उछल रहै थे और
पुरुष अपने अँगोछों से यात्रियों की हवा कर रहे थे। इस समारोह में नोहरी की ओर
किसी का ध्यान न गया, वह अपनी लठिया पकड़े सब के पीछे सजीव आशीर्वाद बनी खड़ी थी उसकी ऑंखें
डबडबायी हुई थीं, मुख से गौरव की ऐसी झलक आ रही थी मानो वह
कोई रानी है, मानो यह सारा गॉँव उसका है, वे सभी युवक उसके बालक है। अपने मन में उसने ऐसी शाक्ति, ऐसे विकास, ऐसे उत्थान का अनुभव कभी न किया था।
सहसा उसने लाठी फेंक दी और भीड़ को
चीरती हुई यात्रियों के सामने आ खड़ी हुई, जैसे लाठी के साथ ही उसने बुढ़ापे और दु:ख के
बोझ को फेंक दिया हो ! वह एक पल अनुरक्त ऑंखों से आजादी के सैनिको की ओर ताकती रही, मानों उनकी शक्ति को
अपने अंदर भर रही हो, तब वह नाचने लगी,
इस तरह नाचने लगी, जैसे कोई सुन्दरी नवयौवना प्रेम और उल्लास
के मद से विह्वल होकर नाचे। लोग दो-दो, चार-चार कदम पीछे हट
गये, छोटा-सा ऑंगन बन गया और उस ऑंगन में वह बुढ़िया अपना
अतीत नृत्य-कौशल दिखाने लगी । इस अलौकिक आनन्द के रेले में वह अपना सारा दु:ख और
संताप भूल गयी। उसके जीर्ण अंगों में जहॉँ सदा वायु को प्रकोप रहता था, वहॉँ न जाने इतनी चपलता , इतनी लचक, इतनी फुरती कहॉँ से आ गयी थी ! पहले कुछ देर तो लोग मजाक से उसकी ओर ताकते रहे ; जैसे बालक बंदर का नाच देखते
हैं, फिर
अनुराग के इस पावन प्रवाह ने सभी को मतवाला कर दिया। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि सारी
प्रकृति एक विराट व्यापक नृत्य की गोद में खेल रही है।
कोदई ने कहा—बस करो भाभी, बस करो।
नोहरी ने थिरकते हुए कहा—खड़े क्यों हो, आओ न जरा देखूँ कैसा
नाचते हो!
कोदई बोले- अब बुढ़ापे में क्या नाचूँ?
नोहरी ने रुक कर कहा – क्या तुम आज भी बूढ़े हो? मेरा बुढ़ापा तो जैसे
भाग गया। इन वीरों को देखकर भी तुम्हारी छाती नहीं फूलती?
हमारा ही दु:ख-दर्द हरने के लिए तो इन्होंने यह परन ठाना है। इन्हीं हाथों से
हाकिमों की बेगार बजायी हैं, इन्ही कानों से उनकी गालियॉँ और घुड़कियॉँ सुनी है। अब तो उस जोर-जुलुम
का नाश होगा –हम और तुम क्या अभी बुढ़े होने जोग थे? हमें पेट की आग ने जलाया है। बोलो ईमान से
यहॉँ इतने आदमी हैं, किसी ने इधर छह महीने से पेट-भर रोटी
खायी है? घीकिसी को सूँघने को मिला है ! कभी नींद-भर सोये हो ! जिस खेत का लगान तीन रुपये
देते थे,
अब उसी के नौ-दस देते हो। क्या धरती सोना उगलेगी? काम
करते-करते छाती फट गयी। हमीं हैं कि इतना सह कर भी जीते हैं। दूसरा होता, तो या तो मार डालता, या मर जाता धन्य है महात्मा और
उनके चेले कि दीनों का दु:ख समझते हैं, उनके उद्धार का जतन
करते हैं। और तो सभी हमें पीसकर हमारा रक्त निकालना जानते हैं।
यात्रियों के चेहरे चमक उठे, ह्रदय खिल उठे। प्रेम
की डूबी हुई ध्वनि निकली—
एक दिन था कि पारस थी यहॉँ की सरजमीन,
एक दिन यह है कि यों बे-दस्तोपा कोई
नहीं।
३
कोदई के द्वार पर मशालें जल रही थीं।
कई गॉंवों के आदमी जमा हो गये थे। यात्रियों के भोजन कर लेने के बाद सभा शुरू हुई।
दल के नायक ने खड़े होकर कहा—
भाइयो,आपने आज हम लोगों का जो आदर-सत्कार किया, उससे हमें यह आशा हो रही है कि हमारी बेड़ियॉँ जल्द ही कट जायँगी। मैने
पूरब और पश्चिम के बहुत से देशों को देखा है, और मै तजरबे से
कहता हूँ कि आप में जो सरलता, जो ईमानदारी, जो श्रम और धर्मबुद्धि है, वह संसार के और किसी देश
में नहीं । मैं तो यही कहूँगा कि आप मनुष्य नहीं, देवता हैं।
आपको भोग-विलास से मतलब नहीं, नशा-पानी से मतलब नहीं, अपना काम करना और अपनी दशा पर संतोष रखना। यह आपका आदर्श है, लेकिन आपका यही देवत्व, आपका यही सीधापन आपके हक
में घातक हो रहा है। बुरा न मानिएगा, आप लोग इस संसार में
रहने के योग्य नहीं। आपको तो स्वर्ग में कोई स्थान पाना चाहिए था। खेतों का लगान
बरसाती नाले की तरह बढ़ता जाता है,आप चूँ नहीं करते । अमले
और अहलकार आपको नोचते रहते हैं, आप जबान नहीं हिलाते। इसका
यह नतीजा हो रहा है कि आपको लोग दोनों हाथों लूट रहै हे; पर आपको खबर नहीं। आपके
हाथों से सभी रोजगार छिनते जाते हैं, आपका सर्वनाश हो रहा है,
पर आप ऑंखें खोलकर नहीं देखते। पहले लाखों भाई सूत कातकर,
कपड़े बुनकर गुजर करते थे। अब सब कपड़ा विदेश से आता है। पहले लाखों आदमी यहीं नमक
बनाते थे। अब नमक बाहर से आता है। यहॉँ नमक बनाना जुर्म है। आपके देश में इतना नमक
है कि सारे संसार का दो सौ साल तक उससे काम चल सकता है।, पर
आप सात करोड़ रुपये सिर्फ नमक के लिए देते हैं। आपके ऊसरों में, झीलों में नमक भरा पड़ा है, आप उसे छू नहीं सकते।
शायद कुछ दिनों में आपके कुओं पर भी महसूल लग जाय। क्या आप अब भी यह अन्याय सहते
रहेंगे?
एक आवाज आयी—हम किस लायक हैं?
नायक—यही तो आपका भ्रम हैं। आप ही की गर्दन
पर इतना बड़ा राज्य थमा हुआ है। आप ही इन बड़ी –बड़ी फौजों, इन बड़े-बड़े अफसरों
के मालिक है; मगर फिर भी आप भूखों मरते हैं, अन्याय सहते हैं। इसलिए कि आपको अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं। यह समझ लीजिए
कि संसार में जो आदमी अपनी रक्षा नहीं कर सकता, वह सदैव
स्वार्थी और अन्यायी आदमियों का शिकार बना रहेगा ! आज संसार का सबसे बड़ा आदमी
अपने प्राणों की बाजी खेल रहा है। हजारों जवान अपनी जानें हथेली पर लिये आपके
दु:खों का अंत करने के लिए तैयार हैं। जो लोग आपको असहाय समझकर दोनों हाथों से
आपको लूट रहे हैं, वह कब चाहेंगे कि उनका शिकार उनके मुँह से छिन जाय। वे आपके इन सिपाहियों
के साथ जितनी सख्तियॉँ कर सकते हैं, कर रहै हैं ; मगर हम लोग सब कुछ सहने को
तैयार हैं। अब सोचिए कि आप हमारी कुछ मदद करेंगे? मरदों की तरह निकल कर अपने को अन्याय
से बचायेंगे या कायरों की तरह बैठे हुए
तकदीर को कोसते रहेंगे? ऐसा अवसर फिर शायद कभी न आयें। अगर
इस वक्त चूके, तो फिर हमेशा हाथ मलते रहिएगा। हम न्याय और
सत्य के लिए लड़ रहे हैं; इसलिए न्याय और सत्य ही के हथियारों से हमें लड़ना है। हमें
ऐसे वीरों की जरूरत है, जो हिंसा और क्रोध को दिल से निकाल डालें और ईश्वर पर अटल विश्वास रख कर
धर्म के लिए सब कुछ झेल सके ! बोलिए आप क्या मदद कर सकते हैं?
कोई आगे
नहीं बढ़ता। सन्नाटा छाया रहता है।
४
एकाएक शोर
मचा—पुलिस ! पुलिस आ गयी !!
पुलिस का
दारोगा कांसटेबिलों के एक दल के साथ आ कर सामने खड़ा हो गया। लोगों ने सहमी हुई
ऑंखों और धड़कते हुऐ दिलों से उनकी ओर देखा और छिपने के लिए बिल खोजने लगे।
दारोगाजी ने
हुक्म दिया—मार कर भगा
दो इन बदमाशों को ?
कांसटेबलों
ने अपने डंडे सँभाले; मगर इसके पहले कि वे किसी पर हाथ चलायें, सभी लोग हुर्र हो गये ! कोई इधर से भागा, कोई उधर से। भगदड़ मच
गयी। दस मिनट में वहाँ गॉँव का एक आदमी भी न रहा। हॉँ, नायक
अपने स्थान पर अब भी खड़ा था और जत्था उसके पीछे बैठा हुआ था; केवल कोदई चौधरी नायक के
समीप बैठे हुए थिर ऑंखों से भूमि की ओर ताक रहे थे।
दारोगा ने
कोदई की ओर कठोर ऑंखों से देखकर कहा—क्यों रे कोदइया, तूने इन बदमाशों को क्यों ठहराया यहॉँ?
कोदई ने
लाल-लाल ऑंखों से दारोगा की ओर देखा और जहर की तरह गुस्से को पी गये। आज अगर उनके
सिर गृहस्थी का बखेड़ा न होता, लेना-देना न होता तो वह भी इसका मुँहतोड़ जवाब देते। जिस
गृहस्थी पर उन्होंने अपने जीवन के पचास साल होम कर दिये थे; वह इस समय एक विषैले सर्प की
भॉँति उनकी आत्मा में लिपटी हुई थी।
कोदई ने अभी
कोई जवाब न दिया था कि नोहरी पीछे से आकर बोली—क्या लाल पगड़ी बॉँधकर तुम्हारी जीभ ऐंठ गयी है? कोदई क्या तुम्हारे
गुलाम हैं कि कोदइया-कोदइया कर रहै हो? हमारा ही पैसा खाते
हो और हमीं को ऑंखें दिखाते हो? तुम्हें लाज नहीं आती ?
नोहरी इस वक्त दोपहरी की धुप की तरह
कॉँप रही थी। दारोगा एक क्षण के लिए सन्नाटे में आ गया। फिर कुछ सोचकर औरत के मुँह
लगना अपनी शान के खिलाफ समझकर कोदई से बोला—यह कौन शैतान का खाला है, कोदई ! खुदा का खौफ न होता तो इसकी
जबान तालू से खींच लेता।
बुढ़िया लाठी टेककर दारोगा की ओर
घूमती हुई बोली—क्यों खुदा की दुहाई देकर खुदा को बदनाम करते हो। तुम्हारे खुदा तो
तुम्हारे अफसर हैं, जिनकी तुम जूतियॉँ चाटते हो। तुम्हें तो चाहिए था कि डूब मरते चिल्लू भर
पानी में ! जानते हो, यह लोग जो यहॉँ आये हैं, कौन हैं? यह वह लोग है, जो हम गरीबों के लिए अपनी जान तक
होमने को तैयार हैं। तुम उन्हें बदमाश कहते हो ! तुम जो घूस के रुपये खाते हो, जुआ खेलाते हो, चोरियॉँ करवाते हो, डाके डलवाते हो; भले आदमियों को फँसा कर
मुट्ठियॉँ गरम करते हो और अपने देवताओं की
जूतियों पर नाक रगड़ते हो, तुम इन्हें बदमाश कहते हो !
नोहरी की तीक्ष्ण बातें सुनकर बहुत-से
लोग जो इधर-उधर दबक गये थे, फिर जमा हो गये। दारोगा ने देखा, भीड़ बढ़ती जाती
है, तो अपना हंटर लेकर उन पर पिल पड़े। लोग फिर तितर-बितर हो
गये। एक हंटर नोहरी पर भी पड़ा उसे ऐसा मालूम हुआ कि कोई चिनगारी सारी पीठ पर दौड़
गयी। उसकी ऑंखों तले अँधेरा छा गया, पर अपनी बची हुई शक्ति
को एकत्र करके ऊँचे स्वर से बोली—लड़को क्यों भागते हो? क्या नेवता खाने आये थे। या कोई
नाच-तमाशा हो रहा था? तुम्हारे इसी लेंड़ीपन ने इन सबों को
शेर बना रखा है। कब तक यह मार-धाड़, गाली-गुप्ता सहते रहोगे।
एक सिपाही ने बुढ़िया की गरदन पकड़कर
जोर से धक्का दिया।बुढ़िया दो-तीन कदम पर औंधे मुँह गिरा चाहती थी कि कोदई ने
लपककर उसे सँभाल लिया और बोला—क्या एक दुखिया पर गुस्सा दिखाते हो यारो? क्या गुलामी ने
तुम्हें नामर्द भी बना दिया है? औरतों पर , बूढ़ों पर, निहत्थों पर, वार
करते हो,वह मरदों का काम नहीं है।
नोहरी ने जमीन
पर पड़े-पड़े कहा—मर्द होते तो गुलाम ही क्यों होते ! भगवान ! आदमी इतना निर्दयी भी हो सकता है? भला अँगरेज इस तरह
बेदरदी करे तो एक बात है। उसका राज है। तुम तो उसके चाकर हो,
तुम्हें राज तो न मिलेगा, मगर रॉँड मॉँड में ही खुश ! इन्हें कोई तलब देता जाय, दूसरों की गरदन भी
काटने में इन्हें संकोच नहीं !
अब दारोगा ने नायक को डॉँटना शुरु
किया—तुम किसके
हुक्म से इस गॉँव में आये?
नायक ने
शांत भाव से कहा—खुदा के हुक्म से ।
दारोगा—तुम रिआया के अमन में खलल
डालते हो?
नायक—अगर तुम्हें उनकी हालत बताना
उनके अमन में खलल डालना है ता बेशक हम उसके अमन में खलल डाल रहे है।
भागनेवालों
के कदम एक बार फिर रुक गये। कोदई ने उनकी ओर निराश ऑंखों से देख कर कॉँपते हुए
स्वर में कहा—भाइयो इस
बखत कई गॉँवों के आदमी यहॉँ जमा हैं? दारोगा ने हमारी जैसी बेआबरुई की है, क्या उसे सह कर तुम आराम की नींद सो सकते हो? इसकी
फरियाद कौन सुनेगा? हाकिम लोग क्या हमारी फरियाद
सुनेंगे। कभी नहीं। आज अगर हम लोग मार
डाले जायँ, तो भी कुछ न होगा। यह है हमारी इज्जत और आबरु? थुड़ी है इस जिंदगी पर!
समूह स्थिर
भाव से खड़ा हो गया, जैसे बहता हुआ पानी मेंड़ से रुक जाय। भय का धुआं जो लोगों के हृदय पर छा
गया था, एकाएक हट गया। उनके चेहरे कठोर हो गये। दारोगा ने
उनके तीवर देखे, तो तुरन्त घोड़े पर सवार हो गया और कोदई को
गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। दो सिपाहियों ने बढ़ कर कोदई की बॉँह पकड़ ली। कोदई
ने कहा—घबड़ाते
क्यों हो,
मैं कहीं भागूँगा नहीं। चलो, कहॉँ चलने हो?
ज्योंही
कोदई दोनों सिपाहियों के साथ चला, उसके दोनों जवान बेटे कई आदमियों के साथ सिपाहियों की ओर
लपके कि कोदई को उनके हाथों से छीन लें। सभी आदमी विकट आवेश में आकर पुलिसवालों के
चारों ओर जमा हो गये।
दारोगा ने
कहा—तुम लोग हट
जाओ वरना मैं फायर कर दूँगा। समूह ने इस धमकी का जवाब ‘भारत माता की जाय !’ से दिया और एका-एक दो-दो कदम
और आगे खिसक आये।
दारोगा ने
देखा, अब
जान बचती नहीं नजर आती है। नम्रता से बोला—नायक साहब, यह लोग फसाद पर अमादा
हैं। इसका नतीजा अच्छा न होगा !
नायक ने कहा—नहीं, जब तक हममें एक आदमी
भी यहॉँ रहेगा, आपके ऊपर कोई हाथ न उठा सकेगा। आपसे हमारी
कोई दुश्मनी नहीं है। हम और आप दोनों एक ही पैरों के तले दबे हुए हैं। यह हमारी
बद-नसीबी है कि हम आप दो विरोधी दलों में खड़े हैं।
यह कहते हुए नायक ने गॉँववालों को
समझाया—भाइयो, मैं आपसे कह चुका हूँ
यह न्याय और धर्म की लड़ाई है और हमें न्याय और धर्म के हथियार से ही लड़ना है।
हमें अपने भाइयों से नहीं लड़ना है। हमें तो किसी से भी लड़ना नहीं है। दारोगा की
जगह कोई अंगरेज होता, तो भी हम उसकी इतनी ही रक्षा करते।
दारोगा ने कोदई चौधरी को गिरफ्तार किया है। मैं इसे चौधरी का सौभाग्य समझता हूँ।
धन्य हैं वे लोग जो आजादी की लड़ाई में सजा पायें। यह बिगड़ने या घबड़ाने की बात
नहीं है। आप लोग हट जायँ और पुलिस को जाने दें।
दारोगा और सिपाही कोदई को लेकर चले। लोगों ने जयध्वनि की—‘भारतमाता की जय।’
कोदई ने जवाब दिया—राम-राम भाइयो, राम-राम। डटे रहना मैदान में। घबड़ाने की कोई बात नहीं है। भगवान सबका
मालिक है।
दोनों
लड़के ऑंखों में ऑंसू भरे आये और कातर स्वर में बोले—हमें क्या कहे जाते हो दादा !
कोदई ने
उन्हें बढ़ावा देते हुए कहा—भगवान् का भरोसा मत छोड़ना और वह करना जो मरदों को करना चाहिए।
भय सारी बुराइयों की जड़ है। इसे मन से निकाल डालो, फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं कर सकता।
सत्य की कभी हार नहीं होती।
आज पुलिस
सिपाहियों के बीच में कोदई को निर्भयता का जैसा अनुभव हो रहा था, वैसा पहले कभी न हुआ
था। जेल और फॉँसी उसके लिए आज भय की वस्तु नहीं, गौरव की
वस्तु हो गयी थी! सत्य का प्रत्यक्ष रुप आज उसने पहली बार देखा मानों वह कवच की भॉँति उसकी
रक्षा कर रहा हो।
५
गॉँववालों
के लिए कोदई का पकड़ लिया जाना लज्जाजनक मालूम हो रहा था। उनको ऑंखों के सामने
उनके चौधरी इस तरह पकड़ लिये गये और वे कुछ न कर सके। अब वे मुँह कैसे दिखायें! हर एक मुख पर गहरी वेदना झलक
रही थी जैसे गॉँव लुट गया
!
सहसा नोहरी
ने चिल्ला कर कहा—अब सब जने खड़े क्या पछता रहै हो? देख ली अपनी दुर्दशा, या
अभी कुछ बाकी है ! आज तुमने देख लिया न कि हमारे ऊपर कानून से नहीं लाठी से राज हो रहा है ! आज हम इतने बेशरम हैं कि
इतनी दुर्दशा होने पर भी कुछ नहीं बोलते ! हम इतने स्वार्थी, इतने कायर न होते, तो उनकी मजाल थी कि हमें
कोड़ों से पीटते। जब तक तुम गुलाम बने रहोगे, उनकी सेवा-टहल करते रहोगे, तुम्हें भूसा-कर मिलता रहेगा, लेकिन जिस दिन तुमने कंधा
टेढ़ा किया, उसी दिन
मार पड़ने लगेगी। कब तक इस तरह मार खाते रहोगे? कब तक मुर्दो की तरह पड़े गिद्धों से
अपने आपको नोचवाते रहोगें? अब दिखा दो कि तुम भी जीते-जागते हो और तुम्हें भी अपनी
इज्जत-आबरु का कुछ खयाल है। जब इज्जत ही न रही तो क्या करोगे खेती-बारी करके, धर्म कमा कर? जी कर ही क्या करोगे? क्या इसीलिए जी रहे हो कि
तुम्हारे बाल-बच्चे इसी तरह लातें खाते जायँ, इसी तरह कुचले जायँ? छोड़ो यह कायरता ! आखिर एक
दिन खाट पर पड़े-पड़े मर जाओगे। क्यों नहीं इस धरम की लड़ाई में आकर वीरों की तरह
मरते। मैं तो बूढ़ी औरत हूँ, लेकिन और कुछ न कर सकूँगी, तो जहॉँ यह लोग सोयेंगे वहॉँ झाडू तो
लगा दूँगी, इन्हें
पंखा तो झलूँगी।
कोदई का बड़ा
लड़का मैकू बोला—हमारे जीते-जी तुम जाओगी काकी, हमारे जीवन को धिक्कार है ! अभी तो हम
तुम्हारे बालक जीते ही हैं। मैं चलता हूँ उधर ! खेती-बारी गंगा देखेगा।
गंगा उसका छोटा
भाई था। बोला—भैया तुम
यह अन्याय करते हो। मेरे रहते तुम नहीं जा सकते। तुम रहोगे, तो गिरस्ती सँभालोगे। मुझसे
तो कुछ न होगा। मुझे जाने दो।
मैकू—इसे काकी पर छोड़ दो। इस तरह
हमारी-तुम्हारी लड़ाई होगी। जिसे काकी का हुक्म हो वह जाय।
नोहरी ने
गर्व से मुस्करा कर कहा—जो मुझे घूस देगा, उसी को जिताऊँगी।
मैकू—क्या तुम्हारी कचहरी में भी
वही घूस चलेगा काकी? हमने तो समझा था, यहॉँ ईमान का फैसला होगा !
नोहरी—चलो रहने दो। मरती दाई राज
मिला है तो कुछ तो कमा लूँ।
गंगा हँसता
हुआ बोला—मैं
तुम्हें घूस दँगा काकी। अबकी बाजार जाऊँगा,तो तुम्हारे लिए पूर्वी तमाखू का पत्ता लाऊँगा।
नोहरी—तो बस तेरी ही जीत है, तू ही जाना।
मैकू—काकी, तुम न्याय नहीं कर रही हो।
नोहरी—अदालत का फैसला कभी दोनों
फरीक ने पसन्द किया है कि तुम्हीं करोगे?
गंगा ने नोहरी के चरण दुए, फिर भाई से गले मिला
और बोला—कल दादा को कहला भेजना कि मै जाता हूँ।
एक आदमी ने
कहा—मेरा भी
नाम लिख लो भाई—सेवाराम।
सबने जय-घोष किया। सेवाराम आकर नायक
के पास खड़ा हो गया।
दूसरी आवाज आयी—मेरा नाम लिख लो—भजनसिंह।
सबने जय-घोष किया। भजनसिंह जाकर नायक
के पास खड़ा हो गया।
भजन सिंह
दस-पांच गॉँवो मे पहलवानी के लिए मशहुर था। यह अपनी चौड़ी छाती ताने, सिर उठाये नायक के
पास खड़ा हो हुआ, तो जैसे मंडप के नीचे एक नये जीवन का उदय
हो गया।
तुरंत ही
तीसरी आवाज आयी—मेरा नाम लिखो-घूरे।
यह गॉँव का
चौकीदार थ। लोगों ने सिर उठा-उठा कर उसे देख। सहसा किसी को विश्वास न आता था कि
घूरे अपना नाम लिखायेगा।
भजनसिंह ने
हँसते हुए पूंछा—तम्हें क्या हुआ है घूरे?
घूरे ने कहा—मुझे वही हुआ है, जो तुम्हें हुआ है।
बीस साल तक गुलामी करते-करते थक गया।
फिर आवाज
आयी—मेरा नाम
लिखो—काले खॉँ।
वह जमींदार
का सहना था, बड़ा ही जाबिर और दबंग। फिर लोंगो आश्चर्य हुआ।
मैकू बोला—मालूम होता है, हमको लूट-लूटकर घर भर
लिया है, क्यों।
काले खॉँ
गम्भीर स्वर में बोला—क्या जो आदमी भटकता रहै, उसे कभी सीधे रास्ते पर न आने दोगे भाई। अब तक जिसका नमक
खाता था, उसका हुक्म बजाता था। तुमको लूट-लूट कर उसका घर
भरता था। अब मालूम हुआ कि मैं बड़े भारी मुगालते में पड़ा हुआ था। तुम सब भाइयों
को मैने बहुत सताया है। अब मुझे माफी दो।
पॉँचो
रँगरूट एक दूसरे से लिपटते थे, उछलते थे, चीखते थे, मानो उन्होंने सचमुच स्वराज्य पा लिया हो, और
वास्तव में उन्हे स्वराज्य मिल गया था। स्वराज्य
चित्त की वृत्तिमात्र है। ज्योंही पराधीनता का आतंक दिल से निकल गया, आपको स्वराज्य मिल गया। भय ही पराधीनता है निर्भयता ही स्वराज्य है।
व्यवस्था और संगठन तो गौण है।
नायक ने उन
सेवकों को सम्बोधित करके कहा--मित्रों!
आप आज आजादी के सिपाहियों में आ मिले, इस पर मै आपको बधाई देता हूं। आपको मालूम है, हम किस तरह लड़ाई करने जा रहे है? आपके ऊपर तरह-तरह
की सख्तियाँ की जायेंगी, मगर याद रखिए,
जिस तरह आज आपने मोह और लोभ का त्याग कर दिया है, उसी तरह
हिंसा और क्रोध का भी त्याग कर दीजिए। हम धर्म संग्राम में जा रहे हैं। हमें धर्म
के रास्ते पर जमा रहना होगा। आप इसके लिए तैयार है!
पॉँचों ने एक स्वर में कहा—तैयार है!
नायक ने आशीर्वाद दिया—ईश्वर आपकी मदद करे।
६
उस
सुहावने-सुनहले प्रभात में जैसे उमंग घुली हुई थी। समीर के हलके-हलके झोकों में
प्रकश की हल्की-हल्की किरणों में उमंग सनी हुई थी। लोग जैसे दीवाने हो गये थें।
मानो आजादी की देवी उन्हे अपनी ओर बुला रही हो। वही खेत-खलिहान, बाग-बगीचे हैं, वही स्त्री-पुरुष हैं पर आज के प्रभात में जो आशीर्वाद है, जो वरदान है, जो विभूति है, वह
और कभी न थी। वही खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, स्त्री-पुरूष आज एक नयी विभूति में रंग गये हैं।
सूर्य
निकलने के पहले ही कई हजार आदमियों का जमाव हो गय था। जब सत्याग्रहियों का दल
निकला तो लोगों की मस्तानी आवाजों से आकाश गूँज उठा। नये सैनिकों की विदाई, उनकी रमणियों का कातर
धैर्य, माता-पिता का आर्द्र गर्व,
सैनिको के परित्याग का दृश्य लोंगों को मस्त किये देता था।
सहसा नोहरी
लाठी टेकती हुई आ कर खड़ी हो गयी।
मैकू ने कहा—काकी, हमें आशिर्वाद दो।
नोहरी—मै तुम्हारे साथ चलती हूँ
बेटा! कितना आशिर्वाद लोगे?
कई आदमियों
ने एक स्वर से कहा—काकी, तुम चली जाओगी, तो यहॉँ कौन रहेगा?
नोहरी ने
शुभ-कामना से भरे हुए स्वर में कहा—भैया, जाने के तो अब दिन ही है, आज न
जाऊँगी, दो-चार महीने बाद जाऊँगी। अभी आऊँगी, तो जीवन सफल हो जायेगा। दो-चार महीने में खाट पर पड़े-पड़े जाऊँगी, तो मन की आस मन में ही रह जायेगी। इतने बलक हैं,
इनकी सेवा से मेरी मुकुत बन जायगी। भगवान करे, तुम लोगों के
सुदिन आयें और मै अपनी जिंदगी में तुम्हारा सुख देख लूँ।
यह कहते हुए नोहरी ने सबको आशीर्वाद
दिया और नायक के पास जाकर खड़ी हो गयी।
लोग
खड़े देख रहे थे और जत्था गाता हुआ जाता था।
एक
दिन यह है कि हम-सा बेहया कोई नहीं।
नोहरी के पाँव जमीन पर न पड़ते थे; मानों विमान पर बैठी हुई स्वर्ग जा रही हो।
: समाप्त :

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