मुंशी प्रेमचंद यांच्या हिंदी कथा - भाग तीन : Fiction By Munshi Premchand - Part III
कथा-क्रम
१) क्रिकेट मैच २) कोई दुख हो तो बकरी खरीद लो ३) देवी ४) पैपुजी
क्रिकेट मैच
१ जनवरी, १९३५
आज क्रिकेट
मैच में मुझे जितनी निराशा हुई मैं उसे व्यक्त नहीं कर सकता। हमारी टीम
दुश्मनों से कहीं ज्यादा मजबूत थी मगर हमें हार हुई और वे लोग जीत का डंका बजाते
हुए ट्राफी उड़ा ले गये। क्यों? सिर्फ इसलिए कि हमारे यहां नेतृत्व के लिए योग्यता नही। हम नेतृत्व
के लिए धन-दौलत जरुरी समझते हैं। हिज हाइनेस कप्तान चुने गये, क्रिकेट बोर्ड का फैसला सबको मानना पड़ा। मगर कितने दिलों में आग लगी,
कितने लोगों ने हुक्मे हाकिम समझकर इस फैसले को मंजूर किया, जोश कहां, संकल्प कहां, खून की
आखिरी बूंद गिरा देने का उत्साह कहां। हम खेले और जाहिर है दिल लगाकर खेले। मगर यह सच्चाई
के लिए जान देनेवालों की फौज न थी। खेल में किसी का दिल न था।
मैं स्टेशन पर खड़ा अपना तीसरे
दर्जे का टिकट लेने की फिक्र में था कि एक युवती ने जो अभी कार से उतरी थी आगे
बढ़कर मुझसे हाथ मिलाया और बोली-आप भी तो इसी गाड़ी से चल रहे हैं मिस्टर जफर?
मुझे हैरत हुई कि यह कौन लड़की है
और इसे मेरा नाम क्योंकर मालूम हो गया?
मुझे एक पल के लिए सकता-सा हो गया कि जैसे शिष्टाचार और अच्छे आचरण
की सब बातें दिमाग से गायब हो गई हों। सौन्दर्य में एक ऐसी शान होती है जो
बड़ों-बड़ों का सिर झुका देती है। मुझे अपनी तुच्छता की ऐसी अनुभूति कभी न हुई थी।
मैंने निजाम हैदराबाद से, हिज एक्सेलेन्सी वायसराय से,
महाराज मैसूर से हाथ मिलाया, उनके साथ बैठकर
खाना खाया मगर यह कमजोरी मुझ पर कभी न छाई थी। बस, यहां जी
चाहता था कि अपनी पलकों से उसके पांव चूम लूं। यह वह सलोनापन ना था जिस पर हम जान
देते हैं, न वह नजाकत जिसकी कवि लोग कसमें खाते हैं। उस जगह
बुद्धि की कांति थी, गंभीरता थी, गरिमा
थी, उमंग थी और थी आत्म-अभिव्यक्ति की निस्संकोच लालसा।
मैंने सवाल-भरे अंदाज से कहा-जी हां।
यह कैसे पूछूं कि मेरी आपसे भेंट
कब हुई। उसकी बेतकल्लुफी कह रही थी वह मुझसे परिचित है। मैं बेगाना कैसे बनूं। इसी
सिलसिले में मैंने अपने मर्द होने का फर्ज अदा कर दिया-मेरे लिए कोई खिदमत?
उसने मुस्कराकर कहा-जी हां, आपसे बहुत-से काम लूंगी। चलिए,
अंदर वेटिंग रुम में बैठें। लखनऊ जा रहे होंगे?मै। भी वहीं चल रही हूं।
वेटिंग रुम आकर उसने मुझे आराम
कुर्सी पर बिठाया और खुद एक मामूली कुर्सी पर बैठकर सिगरेट केस मेरी तरफ बढ़ाती
हुई बोली-आज तो आपकी बौलिंग बड़ी भयानक थी,
वर्ना हम लोग पूरी इनिंग से हारते।
मेरा ताज्जुब और बढ़ा। इस सुन्दरी
को क्या क्रिकेट से भी शौक है! मुझे उसके सामने आरामकुर्सी पर बैठते झिझक होरही
थी। ऐसी बदतमीजी मैंने कभी न की थी। ध्यान उसी तरफ लगा था, तबियत में कुछ घुटन-सी हो रही
थी। रगों में वह तेजी और तबियत में वह गुलाबी नशा न था जो ऐसे मौके पर स्वभावत:
मुझ पर छा जाना चाहिए था। मैंने पूछा-क्या आप वहीं तशरीफ रखती थीं।
उसने अपना सिगरेट जलाते हुए
कहा-जी हां, शुरु
से आखिर तक। मुझे तो सिर्फ आपका खेल जंचा। और लोग तो कुछ बेदिल-से हो रहे थे और
मैं उसके राज समझ रही हूं। हमारे यहां लोगों में सही आदमियों को सही जगह पर रखने
का माद्दा ही नहीं है। जैसे इस राजनीतिक पस्ती ने हमारे सभी गुणों को कुचल डाला
हो। जिसके पास धन है उसे हर चीज का अधिकार है। वह किसी ज्ञान, विज्ञान के, साहित्यिक-सामाजिक जलसे का सभापति हो
सकता है, इसकी योग्यता उसमें हो या न हो। नई इमारतों का
उद्घाटन उसके हाथों कराया जाता है, बुनियादें उसके हाथ रखवाई
जाती हैं, सांस्कृतिक आंदोलनों का नेतृत्व उसे दिया जाता है,
वह कान्वोकेशन के भाषण पढ़ेगा, लड़कों को इनाम
बांटेगा, यह सब हमारी दास-मनोवृत्ति का प्रसाद है। कोई
ताज्जुब नहीं कि हम इतने नीच और गिरे हुए हैं। जहां हुक्म और अख्तियार का मामला है
वहां तो खैर मजबूरी है, हमें लोगों के पैर चूमने ही पड़ते
हैं मगर जहां हम अपने स्वतंत्र विचार और स्वतंन्त्र आचरण से काम लें सकते हैं वहां
भी हमारी जी हुजूरी की आदत हमारा गला नहीं छोड़ती। इस टीम का कप्तान आपको होना
चाहिए था, तब देखती दुश्मन क्यों बाजी ले जाता। महाराजा साहब
में इस टीम का कप्तान बनने की इतनी ही योग्यता है जितनी आप में असेम्बली का सभापति
बनने की या मुझमें सिनेमा ऐक्टिंग की।
बिल्कुल वही
भाव जो मेरे दिल में थे मगर उसकी जबान से निकलर कितने असरदार और कितने आंख
खोलनेवाले हो गए। मैंने कहा-आप ठीक कहती हैं। सचमुच यह हमारी कमजोरी है।
-आपको इस टीम में शरीक न होना
चाहिए था।
-मैं मजबूर था।
इस सुन्दरी का नाम मिस हेलेन
मुकर्जी है। अभी इंगलैण्ड से आ रही है। यही क्रिकेट मैच देखने के लिए बम्बई उतर गई
थी। इंगलैंड में उसने डाक्टरी की शिक्षा प्राप्त की है और जनता की सेवा उसके जीवन
का लक्ष्य हैं। वहां उसने एक अखबार में मेरी तस्वीर देखी थी और मेरा जिक्र भी पढ़ा
था तब से वह मेरे लिए अच्छा ख्याल रखती है। यहां मुझे खेलते देखकर वह और भी
प्रभावित हुई। उसका इरादा हैकि हिन्दुस्तान की एक नई टीम तैयार की जाए और उसमें
वही लोग लिए जाएं जो राष्ट्र का प्रतिनिधत्व करने के अधिकारी हैं। उसका प्रस्ताव
है कि मैं इस टीम का कप्तान बनाया जाऊं। इसी इरादे से वह सारे हिन्दुस्तान का दौरा
करना चाहती है। उसके स्वर्गीय पिता डा. एन. मुकर्जी ने बहुत काफी सम्पत्ति छोड़ी
है और वह उसकी सम्पूर्ण उत्तराधिकारिणी है। उसके प्रस्ताव सुनकर मेरा सर आसमान में
उड़ने लगा। मेरी जिन्दगी का सुनहरा सपनाइतने अप्रत्याशित ढंग से वास्तविकता का रुप
ले सकेगा, यह कौन
सोच सकता था। अलौकिक शक्ति में मेरा विश्वास नहीं मगर आज मेरे शरीर का रोआ-रोआ
कृतज्ञता और भक्ति भावना से भरा हुआ था। मैंने उचित और विन्रम शब्दों में मिस
हेलेन को धन्यवाद दिया।
गाड़ी की घण्टी हुई। मिस मुकर्जी
ने फर्स्ट क्लास के दो टिकट मंगवाए। मैं विरोध न कर सका। उसने मेरा लगेज उठवाया, मेराहैट खुद उठा लिया और
बेधड़क एक कमरे में जा बैठी और मुझे भी अंदर बुला लिया। उसका खानसामा तीसरे दर्जे
में बैठा। मेरी क्रिया-शक्ति जैसे खो गई थी। मैं भगवान् जाने क्यों इन सब मामलों
में उसे अगुवाई करने देता था जो पुरुष होने के नाते मेरे अधिकार की चीज थी। शायद
उसके रुप, उसक बौद्धिक गरिमा, उसकी
उदारता ने मुझ पर रोब डाल दिया था कि जैसे उसने कामरुप की जादूगरनियों की तरह मुझे
भेड़ बना लिया हो और मेरी अपनी इच्छा शक्ति लुप्त हो गई हो। इतनी ही देर में मेरा
अस्तित्व उसकी इच्छा में खो गया था। मेरे स्वाभिमान की यह मांग थी कि मैं उसे अपने
लिए फर्स्ट क्लास का टिकट न मंगवाने देता और तीसरे ही दर्जे में आराम से बैठता और
अगर पहले दर्जे में बैठना था तो इतनी ही उदारता से दोनों के लिए खुद पहले दर्जे का
टिकट लाता, लेकिन अभी तो मेरी क्रियाशक्ति लुप्त हो गई थी।
२ जनवरी-मैं हैरान हूं हेलेन को
मुझसे इतनी हमदर्दी क्यों है और यह सिर्फ दोस्तना हमदर्दी नहीं है। इसमें मुहब्बत
की सच्चाई है। दया में तो इतना आतिथ्य-सत्कार नहीं हुआ करता, और रही मेरे गुणो की स्वीकृति
तो मैं अक्ल से इतना खाली नहीं हूं कि इस धोखे में पडूं। गुणों की स्वीकृति ज्यादा
से ज्यादा एक सिगरेट और एक प्याली चाय पा सकती है। यह सेवा-सत्कार तो मैं वहीं
पाता हूं जहां किसी मैच में खेलने के लिए मुझे बुलाया जाता है। तो भी वहां भी इतने
हार्दिक ढंग से मेरा सत्कार नहीं होा, सिर्फ रस्मी खातिरदारी
बरती जाती है। उसने जैसे मेरी सुविधा और मेरे आराम के लिए अपने को समर्पित कर दिया
हो। मैं तो शायद अपनी प्रेमिका के सिवा और किसी के साथ इस हार्दिकता का बर्ताव न
कर सकता। याद रहे, मैने प्रेमिका कहा है पत्नी नहीं कहा।
पत्नी की हम खातिरदारी नहीं करते, उससे तो खातिरदारी करवाना
ही हमारा स्वभाव हो गया है और शायद सच्चाई भी यही है। मगर फिलहाल तो मैं इन दोनों
नेमतों में से एक का भी हाल नहीं जानता। उसके नाश्ते, डिनर,
लंच में तो मैं श्रीक था ही, हर स्टेशन पर (वह
डाक थी था और खास-खास स्टेशनों पर ही रुकती थीं) मेवे और फल मंगवाती और मुझे
आग्रहपूर्वक खिलाती। कहां की क्या चीज मशहूर है, इसका उसे
खूब पता है। मेरे दोस्तों और घरवालों के लिए तरह-तरह के तोहफे खरीदे मगर हैरत यह
है कि मैंने एक बार भी उसे मना न किया। मना क्योंकर करता, मुझसे
पूछकर तो लाती नहीं। जब वह एक चीज लाकर मुहब्बत के साथ मुझे भेंट करती है तो मैं
कैसे इन्कार करुं! खुदा जाने क्यों मैं मर्द होकर भी उसके सामने औरत की तरह
शर्मीला, कम बोलनेवाला हो जाता हूं कि जैसे मेरे मुंह में
जबान ही नहीं। दिन की थकान की वजह से रात-भर मुझे बेचैनी रही सर में हल्का-सा दर्द
था मगर मैंने इस दर्द को बढ़ाकर कहा। अकेला होता तो शायद इस दर्द की जरा भी पर वाह
न करता मगर आज उसकी मौजूदगी में मुझे उस दर्द को जाहिर करने में मजा आ रहा था। वह
मेरे सर में तेल की मालिश करने लगी और मैं खामखाह निढाल हुआ जाता था। मेरी बेचैनी
के साथ उसकी परेशानी बढ़ती जाती थी। मुझसे बार-बार पूछती, अब
दर्द कैसा है और मैं अनमने ढंग से कहता-अच्छा हूं। उसकी नाजुक हथेलियों के स्पर्श
से मेरे प्राणों में गुदगुदी होती थी। उसका वह आकर्षक चेहरा मेरे सर पर झुका है, उसकी गर्म सांसे मेरे माथे को चूम रही है और मैं गोया जन्नत के मजे ले
रहा हूं। मेरे दिल में अब उस पर फतेह पाने की ख्वाहिश झकोले ले रही है। मैं चाहता
हूं वह मेरे नाज उठाये। मेरी तरफ से कोई ऐसी पहलन न होनी चाहिए जिससे वह समझ जाये
कि मैं उस पर लट्टू हो गया हूं। चौबीस घंटे के अन्दर मेरी मन:स्थिति में कैसे यह
क्रांति हो जाती है, मैं क्योंकर प्रेम के प्रार्थी से प्रेम
का पात्र बन जाता हूं। वह बदस्तूर उसी तल्लीनता से मेरे सिर पर हाथ रक्खे बैठी हुई
है। तब मुझे उस पर रहम आ जाता है और मैं भी उस एहसास से बरी नहीं हूं मगर इसमाशूकी
में आज जो लुत्फ आया उस पर आशिकी निछावर है। मुहब्बत करना गुलामी है, मुहब्बत किया जाना बादशाहत।
मैंने दया दिखलाते हुए कहा-आपको
मेरी वजह से बड़ी तकलीफ हुई।
उसने उमगकर कहा-मुझे क्या तकलीफ
हुई। आप दर्द से बेचैन थे और मैं बैठी थी। काश, यह दर्द मुझे हो जाता!
मैं सातवें आसमान पर उड़ जा रहा
था।
५ जनवरी-कल शाम को हम लखनऊ पहुंच
गये। रास्ते में हेलेन से सांस्कृतिक,
राजनीतिक और साहित्यिक प्रश्नों पर खूब बातें हुईं। ग्रेजुएट तो
भगवान की दया से मैं भी हूं और तब से फुर्सत् के वक्त किताबें भी देखता ही रहा हूं,
विद्वानों की संगत में भी बैठा हूं लेकन उसके ज्ञान के विस्तार के
आगे कदम-कदम पर मुझे अपनी हीनता का बोध होता है। हर एक प्रश्न पर उसकी अपनी राय है
और मालूम होता है कि उसने छानबीन के बाद वह राय कामय की है। उसके विपरीत मैं उन
लोगों मैं हूं जो हवा के साथ उड़ते हैं, जिनके क्षणिक
प्रेरणाएं उलट-पुलटकर रख देती हैं। मैं कोशिश करता था कि किसी तरह उस पर अपनी अक्ल
का सिक्का जमा दूं मगर उसके दृष्टिकोण मुझे बेजबान कर देते थे। जब मैंने देखा कि
ज्ञान-विज्ञान की बातों में मैं उससे न जीत सकूंगा तो मैंने एबीसीनिया और इटली की
लड़ाई काजिक्र छेड़ दिया जिस पर मैंने अपनीसमझ में बहुत कुछ पढ़ा था और इंगलैण्ड
और फ्रांस ने इटली पर दबाव डाला है उसकी तारीफ में मैंने अपनी वाक्-शक्ति खर्च कर
दी। उसने एक मुस्कराहट के साथ कहा-आपका यह ख्याल है कि इंगलैण्ड और फ्रांस सिर्फ
इंसानियत और कमजोर की मदद करने की भावना से प्रभावित हो रहे हैं तो आपकी गलती है।
उनकी साम्राज्य-लिप्सा यह नहीं बर्दाश्त कर सकती कि दुनिया की कोई दूसरी ताकत
फले-फूले। मुसोलिनी वही कर रहा है जो इंगलैण्ड ने कितनी ही बार किया है आज भी कर
रहा है। यह सारा बहुरुपियापन सिर्फ एबीसीनिया में व्यावसायिक सुविधाएं प्राप्त
करने के लिए है। इंगलैण्ड को अपने व्यापार के लिए बाजारों की जरुरत है, अपनी बढ़ी हुई आबादी के लिए जमीन के टुकड़ों की जरुरत है, अपने शिक्षितों के लिए ऊंचे पदों की जरुरत है तो इटली को क्यों न हो। इटली
जो कुछ कर रहा है ईमानदारी के साथ एलानिया कर रहा है। उसने कभी दुनिया के सब लोगों
के साथ भाईचारे का डंका नहीं पीटा, कभी शान्ति का राग नहीं
अलापा। वह तो साफ कहता है कि संघर्ष ही जीवन का लक्षण है। मनुष्य की उन्नति लड़ाई
ही के जरिये होती है। आदमी के अच्छे गुण लड़ाई के मैदान में ही खुलते हैं। सबकी
बराबरी के दृष्टिकोण को वह पागलपन रहता है। वह अपना शुमार भी उन्हें बड़ी कौमों
में करता है जिन्हें रंगीन आबादियां पर हुकूमत करने का हक है। इसलिए हम उसकी
कार्य-प्रणाली को समझ सकते हैं। इंगलैण्ड ने हमेशा धोखेबाजी से काम लिया है। हमेशा
एक राष्ट्र के विभिन्न तत्वों में भेद डालकर या उनके आपसी विरोधों को राजनीति के
आधार बनाकर उन्हें अपना पिछलग्गू बनाया है। मैं तो चाहती हूं कि दुनिया में इटली, जापान और जर्मनी खूब तरक्की करें और इंगलैण्ड को आधिपत्य टूटे। तभी
दुनिया में असली जनतंत्र और शांति पैदा होगी। वर्तमान सभ्यता जब तक मिट न जायेगी,
दुनिया में शांति का राज्य न होगा। कमजोर कौमों को जिन्दा रहने का
कोई हक नहीं, उसी तरह जिस तरह कमजोर पौधों को। सिर्फ इसलिए
नहीं कि उनका अस्तित्व स्वयं उनके लिएकष्ट का कारण है बल्कि इसलिए कि वही दुनिया
के इस झगड़े और रक्तपात के लिए जिम्मेदार हैं।
मैं भला क्यों इस बात से सहमत
होने लगा। मैंने जवाब तो दिया और इन विचारों को इतने ही जोरदार शब्दों में खंडन भी
किया। मगर मैंने देखा कि इस मामले में वह संतुलित बुद्धि से काम नहीं लेना चाहती
या नहीं ले सकती।
स्टेशन पर उतरते ही मुझे यह फिक्र
सवार हुई कि हेलेन का अपना मेहमान कैसे बनाऊं। अगर होटल में ठहराऊं तो भगवान् जाने
अपने दिल में क्या कहे। अगर अपने घर ले जाऊं तो शर्म मालूम होती हैं। वहां ऐसी
रुचि-सम्पन्न और अमीरों जैसे स्वभाव वाली युवती के लिए सुविधा की क्या सामग्रिया
हैं। यह संयोग की बात है कि मैं क्रिकेट अच्छा खेलने लगा और पढ़ना-लिखना, छोड़-छोड़कर उसी का हो रहा और
एक स्कूल का मास्टर हूं मगर घर की हालत बदस्तूर है। वही पुरा, अंधेरा, टूटा-फूटा मकान, तंग
गली में, वही पुराने रग-ढंग, वही पुरा
ढच्चर। अम्मा तो शायद हेलेन को घर में कदम ही न रखने दें। और यहां तक नौबत ही
क्यों आने लगी, हेलेन खुद दरवाजे ही से भागेगी। काश, आज अपना मकान होता, सजा-संवरा, मैं इस काबिल होता कि हेलेन की मेहमानदारी कर सकता, इससे
ज्यादा खुशनसीबी और क्या हो सकती थी लेकिन बेसरोसामनी का बुरा हो!
मैं यही सोच रहा था कि हेलेन ने
कुली से असबाब उठावाया और बाहर आकर एक टैक्सी बुला ली। मेरे लिए इस टैक्सी में बैठ
जाने के सिवा दूसरा चारा क्या बाकी रह गया थ। मुझे यकीन है, अगर मै। उसे अपने घर ले जाता
तो उस बेसरोसामनी के बावजूद वह खुश होती। हेलेन रुचि-सम्पन्न है मगर नखरेबाज नहीं
है। वह हर तरह की आजमाइश और तजुर्बे के लिएतैयार रहती है। हेलेन शायद आजमाइशों को
और नागवार तजुर्बों को बुलाती है। मगर मुझ में न यह कल्पना है न वह साहस।
उसने जरा गौर से मेरा चेहरा देखा
होता तो उसे मालूम हो जाता कि उस पर कितनी शार्मिन्दगी और कितनी बेचारगी झलक रही
थी। मगर शिष्टाचार का निबाह तो जरुरी था,
मैंने आपत्ति की, मैं तो आपको अपना मेहमान
बनाना चाहता थ मगरआप उल्टा मुझे होटल लिए जा रही हैं।
उसने शरारत से कहा-इसीलिए कि आप
मेरे काबू से बाहर न हो जाएं। मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या होती कि आपके
आतिथ्य सत्कार का आनन्द उठाऊं लेकिन प्रेम ईर्ष्यालु होता है, यह आपको मालूम है। वहां आपके
इष्ट मित्र आपके वक्त का बड़ा हिस्सा लेंगे,आपको मुझसे बात
करने का वक्त ही न मिलेगा और मर्द आम तौर पर कितने बेमुरब्बत ओर जल्द भूल जाने
वाले होते हैं इसका मुझे अनुभव हो चुका है। मैं तुम्हें एक क्षण के लिए भी अलग
नहीं छोड़ सकती। मुझे अपने सामने देखकर तुम मुझे भूलना भी चाहो तो नहीं भूल सकते।
मुझे अपनी इस खुशनसीबी पर हैरत ही
नहीं, बल्कि ऐसा
लगने लगा कि जैसे सपना देख रहा हूं। जिस सुन्दरी की एक नजर पर मैं अपने को कुर्बान
कर देता वह इस तरह मुझसे मुहब्बत काइजहार करे। मेरा तो जी चाहता था कि इसी बात पर उनके कदमों को पकड़ कर सीने से लगा
लूं और आसुंओं से तर कर दूं।
होटल में पहुंचे। मेरा कमरा अलग
था। खाना हमने साथ खाया और थोड़ी देर तक वहीं हरी-हरी घास पर टहलते रहे।
खिलाड़ियों को कैसे चुना जाय, यही सवाल था। मेरा जी तो यही चाहता था कि सारी रात उसके साथ टहलता रहूं
लेकिन उसने कहा-आप अब आराम करें, सुबह बहुत काम है। मैं अपने
कमरे में जाकर लेट रहा मगर सारी रात नींद नहीं आई। हेलेन का मन अभी तक मेरी आंखों
से छिपा हुआ था, हर क्षण वह मेरे लिए पहेली होती जा रही है।
१२ जनवरी-आज दिन-भर लखनऊ के
क्रिकेटरों का जमाव रहा। हेलेन दीपक थी और पतिंगे उसके गिर्द मंडरा रहे थे। यहां
से मेरे अलावा दो लोगों का खेल हेलेन को बहुत पसन्द आया-बृजेन्द्र और सादिक। हेलेन
उन्हें आल इंडिया टीम में रखना चाहती थी। इसमें कोई शक नहीं कि दोनों इस फन के
उस्ताद हैं लेकिन उन्होंने जिस तरह शुरुआत की है उससे तो यही मालूम होता है कि वह
क्रिकेट खेलने नहीं अपनी किस्मत की बाजी खेलने आये हैं। हेलने किस मिजाज की औरत है, यह समझना मुश्किल है।
बृजेन्द्र मुझसे ज्यादा सुन्दर है, यह मैं भी स्वीकार करता
हूं, रहन-सहन से पूरा साहब है। लेकिन पक्का शोहदा, लोफर। मैं नहीं चाहता कि हेलेन उससे किसी तरह का सम्बन्ध रक्खे। अदब तो
उसे छू नहीं गया। बदजबान परले सिरे का, बेहूदा गन्दे मजाक, बातचीत का ढंग नहीं और मौके-महल की समझ नहीं। कभी-कभी हेलेन से ऐसे
मतलब-भरे इशारे करजाता है कि मैं शर्म से सिर झुका लेता हूं लेकिन हेलेन को शायद
उसका बाजारुपन, उसका छिछोरापन महसूस नहीं होता। नहीं,
वह शायद उसके गन्दे इशारों कामजा लेती है। मैंने कभी उसके माथे पर
शिकन नहीं देखी। यह मैं नहीं कहता कि वह हंसमुखपन कोइर् बुरी चीज है, न जिन्दादिली का मैं दुश्मन हूं लेकिन एक लेडी के साथ तो अदब और कायदे का
लिहाज रखना ही चाहिए।
सादिक एक प्रतिष्ठित कुल का दीपक
है, बहुत ही शुद्ध
आचरण, यहां तक कि उसे ठण्डे स्वभाव का भी कह सकते हैं,
बहुत घमंडी, देखने में चिड़चिड़ा लेकिन अब वह
भी शहीदों में दाखिल हो गया है। कल आप हेलेन को अपने शेर सुनाते रहे और वह खुश
होती रही। मुझे तो उन शेरों में कुछ मजा न आया। इससे पहले मैंने इन हजरत को कभी
शायरी करते नहीं देखा, यह मस्ती कहां से फट पड़ी है? रुप में जादू की ताकत है औश्र क्या कहूं। इतना भी न सूझा कि उसे शेर ही
सुनाना है तो हसरत या जिगर या जोश के कलाम से दो-चार शेर याद कर लेता। हेलेन सका
कलाम पढ़ थोड़े ही बैठी है। आपको शेर कने
की क्या जरुरत मगर यही बात उनसे कह दूं तो बिगड़ जाएंगे, समझेंगे
मुझे जलन हो रही है। मुझे क्यों जलन होने लगी। हेलेन की पूजा करनेवालों में एक मैं
ही हूं? हां, इतना जरुर चाहता है कि वह
अच्छे-बुरे की पहचान कर सके, हर आदमी के बेतकल्लुफी मुझे
पसन्द नहीं, मगर हेलेन की नजरों में सब बराबर हैं। वह बारी-बारी
से सबसे अलग हो जाती है और सबसे प्रेम करती है। किसकी ओर ज्यादा झुकी है, यह फैसला करना मुश्किल है। सादिक की धन-सम्पत्ति से वह जरा भी प्रभावित
नहीं जान पड़ती। कल शाम को हम लोग सिनेमा देखने गये थे। सादिक ने आज असाधारण
उदारता दिखाई। जेब से वह रुपया निकाल कर सबके लिए टिकट लेने चले। मियां सादिक जो
इस अमीरी के बावजूद तंगदिल आदमी हैं, मैं तो कंजूर कहूंगा,
हेलेन ने उनकी उदारता को जगा दिया है। मगर हेलेन ने उन्हें रोक लिया
और खुद अंदर जाकर सबके लिए टिकट लाई। और यों भी वह इतनी बेदर्दी से रुपया खर्च
करती है कि मियां सादिक के छक्के छूट जाते हैं। जब उनका हाथ जेब में जाता है,
हेलेन के रुपये काउन्टर पर जा पहुंचते हैं। कुछ भी हो, मैं तो हेलेन के स्वभाव-ज्ञान पर जान देता हूं। ऐसा मालूम होता है वह
हमारी फर्माइशों काइन्तजार करती रहती है और उनको पूरा करने में उसे खास मजा आता
है। सादिक साहब को उसने अलब भेंट कर दिया जो योरोप के दुर्लभ चित्रों की
अनुकृतियों का संग्रह है और जो उसने योरोप की तमाम चित्रशालाओं में जाकर खुद
इकट्ठा किया है। उसकी आंखें कितनी सौंदय्र-प्रेमी है। बृजेनद्र जब शाम को अपना नया
सूट पहन कर आया, जो उसने अभी सिलाया है, तो हेलेन ने मुस्करा कर कहा-देखों कहीं नजर न लग जाय तुम्हें! आज तो तुम
दूसरे युसूफ बने हुए हो। बृजेन्द्र बाग-बाग हो गया। मैंने जब लय के साथ अपनी ताजा
गजल सुनाई तो वह एक-एक शेर पर उछल-उछल पड़ी। अदभुत काव्यर्मज्ञ है। मुझे अपनी
कविता-रचना पर इतनी खुशी कभी न हुई थी मगर तारीफ जब सबका बुलौवा हो जाये तो उसकी
क्या कीमत। मियां सादिक को कभी अपनी सुन्दरता का दावा नहीं हुआ। भीतरी सौंदर्य से
आप जितने मालामाल हैं बाहरी सौंदर्य में उतने ही कंगाल। मगर आज शराब के दौर में
ज्यों ही उनकी आंखों में सुर्खी आई हेलेन ने प्रेम से पगे हुए स्वर में कहा-भई,
तुम्ळारी ये आंखें तो जिगर के पार हुई जाती हैं। और सादिक साहब उस
वक्त उसके पैरों पर गिरते-गिरते रुक गये। लज्जा बाधक हुई। उनकी आंखों की ऐसी तारीफ
शायद ही किसी ने की हो। मुझे कभी अपने रुप-रंग, चाल-ढाल की
तारीफ सुनने नहीं हो सका कि मैं खूबसूरत हूं। यह भ्ज्ञभ् जनता कि हेलेन का यह सब
सत्कार कोई मतलब नहीं रखता। लेकिन अब मुझे भी यह बेचैनी होने लगी कि देखो मुझ पर
क्या इनायत होती है। कोई बात न थी, मगर मैं बेचैन रहा। जब
मैं शाम को यूनिवर्सिटी ग्राउण्ड से खेल की प्रैक्टिस करके आ रहा था तो मेरे ये
बिखरे हुए बाल कुछ और ज्यादा बिखरे गये थे। उसने आसक्त नेत्रों से देखकर फौरन
कहा-तुम्हारी इन बिखरी हुई जुल्फों पर निसार होने की जी चाहता है! मैं निहाल हो
गया, दिल में क्या-क्या तूफान उठे कह नहीं सकता।
मगर खुदा जाने क्यों हम तीनों में
से एक भी उसकी किसी अंदाज या रुप की प्रशंसा शब्दों में नहीं कर पाता। हमें लगता
है कि हमें ठीक शब्द नहीं मिलते। जो कुछ हम कह सकते हैं उससे कहीं ज्यादा प्रभावित
हैं। कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं होती।
१ फरवरी-हम दिल्ली आ गये। इसी बीच
में मुरादाबाद, नैनीताल,
देहरादून वगैरह जगहों के दौरे किये मगर कहीं कोई खिलाड़ी न मिला।
अलीगढ़ और दिल्ली से कई अच्छे खिलाड़ियों के मिलने की उम्मीद है इसलिए हम लोग वहां
कई दिन रहेंगे। एलेविन पूरी होते ही हम लोग बम्बई आ जाएंगे और वहां एक महीने
प्रैक्टिस करेंगे। मार्च में आस्ट्रेलियन टीम यहां से रवाना होगी। तब तक वह
हिन्दुसतान में सारे पहले से निश्चित मैच खेल चुकी होगी। हम उससे आखिरी मैच
खेलेंगे और खुदा ने चाहा तो हिन्दुस्तान की सारी शिकस्तों का बदला चुका देंगे।
सादिक और बृजेन्द्र भी हमारे साथ घूमते रहे। मैं तो न चाहता था कि ये लोग आएं मगर
हेलेन को शायद प्रेमियों के जमघट में मजा आता हैंहम सबके सब एक ही होटल में हैं और
सब हेलेन के मेहमान हैं। स्टेशन पर पहुंचे तो सैकड़ों आदमी हमारा स्वागत करने के
लिए मौजूद थे। कई औरतें भी थीं, लेकिन हेलेन को न मालूम
क्यों औरतों से आपत्ति है। उनकी संगत से भागती है, खासकर
सुन्दर औरतों की छाया से भी दूर रहती है हालांकि उसे किसी सुन्दरी से जलने काकोई
कारण नहीं है। यह मानते हुए भी कि हुस्न उस पर खत्म नहीं हो गया है, उसमें आकषर्ण के ऐसे तत्व मौजूद हैं कि कोई परी भी उसके मुकाबे में नहीं
खड़ी हो सकती। नख-शिख ही तो सब कुछ नहीं है, रुचि का सौंदर्य,
बातचीत का सौंदर्य, अदाओं का सौंदर्य भी तो
कोई चीज है। प्रेम उसके दिल में है या नहीं खुदा जाने लेकिन प्रेम के प्रदर्शन में
वह बेजोड़ है। दिलजोई और नाजबरदारी के फन में हम जैसे दिलदारों को भी उससे
शर्मिन्दा होना पड़ता है। शाम को हम लोग नई दिल्ली की सैर को गए। दिलकश जगह है,
खुली हुई सड़कें, जमीन के खूबसूरत टुकड़े,
सुहानी रबिशे। उसको बनाने में सरकार ने बेदरेग रुपया खर्च किया है
और बेजरुरत। यह रकम रिआया की भलाई पर खर्च की जा सकती थी मगर इसको क्या कीजिए कि
जनसाधारण इसके निर्माण से जितने प्रभावित हैं, उतने अपनी
भलाई की किसी योजना से न होते। आप दस-पांच मदरसे ज्यादा खोल देते या सड़कों की
मरम्मत में या, खेती की जांच-पड़ताल में इस रुपये को खर्च कर
देते मगर जनता को शान-शौकत, धन-वैभव से आज भी जितना प्रेम है
उतना आपके रचनात्मक कामों से नहीं है। बादशाह की जो कल्पना उसके रोम-रोम में घुल
गई है वह अभी सदियों तक न मिटेगी। बादशाह के लिए शान-शौकत जरूरी है। पानी की तरह
रुपया बहाना जरूरी है। किफायतशार या कंजूस बादशाह चाहे वह एक-एक पैसा प्रजा की
भलाई के लिए खर्च करे, इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता। अंग्रेज
मनोविज्ञान के पंडित हैं। अंग्रेज ही क्यों हर एक बादशाह जिसने अपने बाहुबल और
अपनी बुद्धि से यह स्थान प्राप्त किया है स्वभात: मनोविज्ञान का पण्डित होता है।
इसके बगैर जनता पर उसे अधिकार क्यों कर प्राप्त होता। खैर, यह
तो मैंने यूंही कहा। मुझे ऐसा अन्देशा हो रहा है शायद हमारी टीम सपना ही रह जाए।
अभी से हम लोगों में अनबन रहने लगी है। बृजेन्द्र कदम-कदम पर मेरा विरोध करता है।
मैं आम कहूं तो वह अदबदाकर इमली कहेगा और हेलेन को उससे प्रेम है। जिन्दगी के
कैसे-कैसे मीठे सपने देखने लगा था मगर बृजेन्द्र, कृतघ्न-स्वार्थी
बृजेन्द्र मेरी जिन्दगी तबाह किए डालता है। हम दोनों हेलेन के प्रिय पात्र नहीं रह
सकते, यह तय बात है; एक को मैदान से
हटाना पड़ेगा।
७ फरवरी-शुक्र है दिल्ली में
हमारा प्रयत्न सफल हुआ। हमारी टीम में तीन नये खिलाड़ी जुड़े-जाफर, मेहरा और अर्जुन सिंह। आज
उनके कमाल देखकर आस्ट्रेलियन क्रिकेटरों की धाक मेरे दिल से जाती रही। तीनों गेंद
फेंकते हैं। जाफर अचूक गेंद फेंकता है, मेहरा सब्र की आजमाइश
करता है और अर्जुन बहुत चालाक है। तीनों दृढ़ स्वभव के लोग हैं, निगाह के सच्चे अकथ। अगर कोई इन्साफ से पूछे तो मैं कहूंगा कि अर्जुन
मुझसे बेहतर खेलता है। वहदो बार इंगलैण्ड हो आया है। अंग्रेजी रहन-सहन से परिचित
है और मिजाज पहचाननेवाला भी अव्वल दर्जे का है, सभ्यता और
आचार का पुतला। बृजेन्द्र का रंग फीका पड़ गया। अब अर्जुन पर खास कृपा दृष्टि है
और अर्जुन पर फतह पाना मेरे लिए आसान नहीं है, मुझे तो डर है
वह कहीं मेरी राह का रोड़ा न बन जाए।
२५ फरवरी-हमारी टीम पूरी हो गई।
दो प्लेयर हमें अलीगढ़ से मिले, तीन लाहौर से और एक अजमेर से और कल हम बम्बई आ गए। हमने अजमेर, लाहौर और दिल्ली में वहां की टीमों से मैच खेले और उन पर बड़ी शानदार फतह
पाई। आज बम्बई की हिन्दू टीम से हमारा मुकाबला है और मुझे यकीन है कि मैदान हमारे
हाथ रहेगा। अर्जुन हमारी टीम का सबसे अच्छा खिलाड़ी है और हेलेन उसकी इतनी
खातिदारी करती है लेकिन मुझे जलन नहीं होती, इतनी खातिरदारी
तो मेहमान की ही की जा सकती है। मेहमान से क्या डर। मजे की बात यह है कि हर
व्यक्ति अपने को हेलेन को कृपा-पात्र समझता है और उससे अपने नाज उठवाता है। अगर
किसी के सिर में दर्द है तो हेलेन का फर्ज है कि उसकी मिजाजपुर्सी करे, उसके सर में चन्दन तक घिसकर लगा दे। मगर उसके साथ ही उसका रोब हर एक के
दिल पर इतना छाया हुआ है कि उसके किसी काम की कोई आलोचना करने का साहस नहीं कर
सकता। सब के सब उसकी मर्जी के गुलाम हैं। वह अगर सबके नाज उठाती है तो हुकूमत भी
हर एक पर करती है। शामियाने में एक से एक सुन्दर औरतों का जमघट है मगर हेलेन के
कैदियों की मजाल नहीं कि किसी की तरफ देखकर मुस्करा भी सकें। हर एक के दिल पर ऐसा
डर छाया रहता है कि जैसे वह हर जगह पर मौजूद है। अर्जुन ने एक मिस परयूं ही कुछ
नजर डाली थी, हेलेन ने ऐसी प्रलय की आंख से उसे देखा कि
सरदार साहब का रंग उड़ गया। हर एक समझता है कि वह उसकी तकदीर की मालिक है और उसे
अपनी तरफ से नाराज करके वह शायद जिन्दा न रह सकेगा। औरों की तो मैं क्या कहूं,
मैंने ही गोया अपने को उसके हाथों बेच दिया हैं। मुझे तो अब ऐसा लग
रहा है कि मुझमें कोई ऐसी चीज खत्म हो गई है जो पहले मेरे दिल में डाह की आग-सी
जला दिया करती थी। हेलेन अब किसी से बोले, किसी से प्रेम की
बातें करे, मुझे गुस्सा नहीं आता। दिल पर चोट लगती जरूर है
मगर इसका इजहार अकेले में आंसू बहाकर करने को जी चाहता है, वह
स्वाभिमान कहां गायब हो गया नहीं कह सकता। अभी उसकी नाराजगी से दिल के टुकड़े हो
गए थे कि एकाएक उसकी एक उचटती हुई-सी निगाह ने या एक मुस्कराहट ने गुदगुदी पैदा कर
दी। मालूम नहीं उसमें वह कौन-सी ताकत है जो इतने हौसलामंद नौजवान दिलों पर हुकूमत
कररही है। उसे बहादुरी कहूं। चालाकी और फुर्ती कहूं, हम सब
जैसे उसके हाथों की कठपुतलियां हैं। हममें अपनी कोई शाख्सियत, कोई हस्ती नहीं है। उसने अपने सौन्दर्य से, अपनी
बुद्धि से, अपने धन से और सबसे ज्यादा सबको समेट सकने की अपनी
ताकत से हमारे दिलों पर अपना आधिपत्य जमा लिया है।
१ मार्च-कल आस्ट्रेलियन टीम से
हमारा मैच खत्म हो गया। पचास हजार से कम तमाशाइयों की भीड़ न थी। हमने पूरी
इनिंग्स से उनको हराया और देवताओं की तरह पुजे। हममें से हर एक ने दिलोजन से काम
किया और सभी यकसां तौर पर फूल हुए थे। मैच खत्म होते ही शहरवालों की तरफ से हमें
एक शानदार पार्टी दी गई। ऐसी पार्टी तो शायद वाइसराय के सम्मान में भी न दी जाती
होगी। मैं तो तारीफों और बधाइयों के बोझ से दब गया, मैंने ४४ रनों में पांच खिलाड़ियों का सफाया कर
दिया था। मुझे खुद अपने भयानक गेंद फेंकने पर अचरज हो रहा था। जरूर कोई अलौकिक
शक्ति हमारा साथ दे रही थी। इस भीड़ में बम्बई का सौंदर्य अपनी पूरी शान और रंगीनी
के साथ चमक रहा था और मुझे दावा है कि सुन्दरता की दृष्टि से यह शहर जितना
भाग्यशाली है, दुनिया का कोई दूसरा शहर शायद ही हो। मगर
हेलेन इस भीड़ में भी सबकी दृष्टियों का केन्द्र बनी हुई थी। यह जलिम महज हसीन
नहीं है, मीठी बोलती भी है और उसकी अदाएं भी मीठी हैं। सारे
नौजवान परवानों की तरह उस पर मंडलारहे थे, एक से एक खूबसूरत,
मनचले, और हेलेन उनकी भावनाओं से खेल रही थी,
उसी तरह जैसे वह हम लोगों की भावनाओं से खेल करती थी। महाराजकुमार
जैसा सुन्दर जवान मैंने आज तक नहीं देखा। सूरत से रोब टपकता है। उनके प्रेम ने
कितनी सुन्दरियों का दुख दिया है कौन जाने। मर्दाना दिलकशी का जादू-सा बिखेरता
चलता है। हेलेन उनसे भी वैसी ही आजाद बेतकल्लुफी से मिली जैसे दूसरे हजारों
नौजवानों से। उनके सौन्दर्य का, उनकी दौलत का उस पर जरा भी
असर न था। न जाने इतना गर्व, इतना स्वाभिमान उसमें कहां से आ
गया। कभी नहीं डगमगाती, कहीं रोब में नहीं आती, कभी किसी की तरफ नहीं झुकती। वही हंसी-मजाक है, वही
प्रेम का प्रदर्शन, किसी के साथ कोई विशेषता नहीं, दिलजोई सब की मगर उसी बेपरवाही की शान के साथ।
हम लोग सैर करके कोई दस बजे रात
को होटल पहुंचे तो सभी जिन्दगी के नए सपने देख रहे थे। सभी के दिलों में एक
धुकधुकी-सी हो रही थी कि देखें जब क्या होता है। आशा और भय ने सभी के दिलों में एक
तूफान-सा उठा रक्खा था गोया आज हर एक के जीवन की एक स्मरणीय घटना होनेवाली है। जब
क्या प्रोग्राम है, इसकी किसी को खबर न थी। सभी जिन्दगी के सपने देख रहे थे। हर एक के दिल पर
एक पागलपन सवार था, हर एक को यकीन था कि हेलेन की दृष्टि उस
पर है मगर यह अंदेशा भी हर एक के दिल में था कि खुदा न खास्ता कहीं हेलेन ने
बेवफाई की तो यह जान उसके कदमों पर रख देगा, यहां से जिन्दा
घर जाना कयामत था।
उसी वक्त हेलेन ने मुझे अपने कमरे
में बुला भेजा। जाकर देखता हूं तो सभी खिलाड़ी जमा हैं। हेलेन उस वक्त अपनी शर्बती
बेलदार साड़ी में आंखों में चकाचौंध पैदा कर रही थी। मुझे उस पर झुंझलाहट हुई, इस आम मजमे में मुझे बुलाकर
कवायद कराने की क्या जरूरत थी। मैं तो खास बर्ताव का अधिकारी था। मैं भूल रहा था
कि शायद इसी तरह उनमें से हर एक अपने को खास बर्ताव का अधिकारी समझता हो।
हेलेन ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-दोस्तों, मैं कह नहीं सकती कि आप लोगों
की कितनी कृतज्ञ हूं और आपने मेरी जिंदगी की कितनी बड़ी आरजू पूरी कर दी। आपमें से
किसी को मिस्टर रतन लाल की याद आती है?
रतन लाल! उसे भी कोई भूल सकता है!
वह जिसने पहली बार हिन्दुस्तान की क्रिकेट टीम को इंगलैण्ड की धरती पर अपने जौहर
दिखाने का मौका दिया, जिसने अपने लाखों रुपयों इस चीज की नजर किए और आखिर बार-बार की पराजयों से
निराश होकर वहीं इंगलैण्ड में आत्महत्या कर ली। उसकी वह सूरत अब भी हमारी आंखों के
सामने फिर रही है।
सब ने कहा-खूब अच्दी तरह, अभी बात ही कै दिन की हैं
आज इस शानदार कामयाबी पर मैं आपको
बधाई देती हूं। भगवान ने चाहा तो अगले साल हम इंगलैण्ड का दौरा करेंगे। आप अभी से
इस मोर्चे के लिए तैयारियां कीजिए। लुत्फ जो जब है कि हम वहां एक मैच भी न हारें, मैदान बराबर हमारे हाथ रहे।
दोसतों, यही मेरे जीवन का लक्ष्य है। किसी लक्ष्य का पूरा
करने के लिए जो काम किया जाता है उसी का नाम जिन्दगी है। हमें कामयाबी वहीं होती
हैं जहां हम अपनेपूरे हौसते से काम में लगे हों, वही लक्ष्य
हमारा स्वप्न हो, हमारा प्रेम हो, हमारे
जीवन का केन्द्र हो। हममें और इस लक्ष्य के बीच में और कोई इच्छा, कोई आरजू दीवार की तरह न खड़ी हो। माफ कीजिएगा, आपने
अपने लक्ष्य के लिए जीना नहीं सीखा। आपके लिए क्रिकेट सिर्फ एक मनोरंजन है। आपको
उससे प्रेम नहीं। इसी तरह हमारे सैकड़ों दोस्त हैं जिनका दिल कहीं और होता है,
दिमाग कहीं और, और वह सारी जिन्दगी का नाकाम
रहते हैं। आपके लिए मै। ज्यादा दिलचस्पी की चीज थी, क्रिकेट
तो सिर्फ मुझे खुश करने का जरिया था। फिर भी आप कामयाब हुए। मुल्क में आप जैसे
हजारों नौजवान हैं जो अगर किसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए जीना और मरना सीख जाए तो
चमत्कार कर दिखाइए। जाइए और वह कमाल हासिल कीजिए। मेरा रूप और मेरी रातें वासना का
खिलौना बनने के लिए नहीं हैं। नौजवानों की आंखों को खुश करने और उनके दिलों में
मस्ती पैदा करने के लिए जीना मैं शर्मनाक समझती हूं। जीवन का लक्ष्य इससे कहीं
ऊंचा है। सच्ची जिन्दगी वही है जहां हम अपने लिए नहीं सबके लिए जीते हैं।
हम सब सिर झुकाये सुनते रहे और
झल्लाते रहे। हेलेन कमरे से निकलर कार पर जा बैठी। उसने अपनी रवानगी का इन्तजाम
पहले ही कर लिया था। इसके पहले कि हमारे होश-हवास सही हों और हम परिस्थिति समझें, वह जा चुकी थी।
हम सब हफ्ते-भर तक बम्बई की
गलियों, होटलों,
बंगलों की खाक छानते रहे, हेलेन कहीं न थी और
ज्यादा अफसोस यह है कि उसने हमारी जिंदगी का जो आइडियल रखा वह हमारी पहुंच से ऊंचा
है। हेलेन के साथ हमारी जिन्दगी का सारा जोश और उमंग खत्म हो गई।
कोई दुख न हो तो बकरी खरीद लो
उन दिनों
दूध की तकलीफ थी। कई डेरी फर्मों की आजमाइश की, अहारों का इम्तहान लिया, कोई
नतीजा नहीं। दो-चार दिन तो दूध अच्छा, मिलता फिर मिलावट शुरू
हो जाती। कभी शिकायत होती दूध फट गया, कभी उसमें से नागवार
बू आने लगी, कभी मक्खन के रेजे निकलते। आखिर एक दिन एक दोस्त
से कहा-भाई, आओ साझे में एक गाय ले लें, तुम्हें भी दूध का आराम होगा, मुझे भी। लागत आधी-आधी,
खर्च आधा-आधा, दूध भी आधा-आधा। दोस्त साहब
राजी हो गए। मेरे घर में जगह न थी और गोबर वगैरह से मुझे नफरत है। उनके मकान में
काफी जगह थी इसलिए प्रस्ताव हुआ कि गाय उन्हीं के घर रहे। इसके बदले में उन्हें
गोबर पर एकछत्र अधिकार रहे। वह उसे पूरी आजादी से पाथें, उपले
बनाएं, घर लीपें, पड़ोसियों को दें या
उसे किसी आयुर्वेदिक उपयोग में लाएं, इकरार करनेवाले को
इसमें किसी प्रकार की आपत्ति या प्रतिवाद न होगा और इकरार करनेवाला सही होश-हवास
में इकरार करता है कि वह गोबर पर कभी अपना अधिकार जमाने की कोशिश न करेगा और न
किसी का इस्तेमाल करने के लिए आमादा करेगा।
दूध आने लगा, रोज-रोज की झंझट से मुक्ति
मिली। एक हफ्ते तक किसी तरह की शिकायत न पैदा हुई। गरम-गरम दूध पीता था और खुश
होकर गाता था-
रब का शुक्र अदा कर भाई जिसने
हमारी गाय बनाई।
ताजा दूध पिलाया उसने लुत्फे हयात
चखाया उसने।
दूध में भीगी रोटी मेरी उसके करम
ने बख्शी सेरी।
खुदा की रहमत की है मूरत कैसी
भोली-भाली सूरत।१
1. एक फारसी
कहावत
मगर धीरे-धीरे यहां पुरानी
शिकायतें पैदा होने लगीं। यहां तक नौबत पहुंची कि दूध सिर्फ नाम का दूध रह गया।
कितना ही उबालो, न
कहीं मलाई का पता न मिठास। पहले तो शिकायत कर लिया करता था इससे दिल का बुखार निकल
जाता था। शिकायत से सुधार न होता तो दूध बन्द कर देता था। अब तो शिकायत का भी मौका
न था, बन्द कर देने का जिक्र ही क्या। भिखारी का गुस्सा अपनी
जान पर, पियो या नाले में डाल दो। आठ आने रोज का नुस्खा
किस्मत में लिखा हुआ। बच्चा दूध को मुंह न लगाता, पीना तो
दूर रहा। आधों आध शक्कर डालकर कुछ दिनों दूध पिलाया तो फोड़े निकलने शुरू हुए और
मेरे घर में रोज बमचख मची रहती थी। बीवी नौकर से फरमाती-दूध ले जाकर उन्हीं के सर
पटक आ। मैं नौकर को मना करता। वह कहतीं-अच्छे दोस्त है तुम्हारे, उसे शरम भी नहीं आती। क्या इतना अहमक है कि इतना भी नहीं समझता कि यह लोग
दूध देखकर क्या कहेंगे! गाय को अपने घर मंगवा लो, बला से
बदबू आयगी, मच्छर होंगे, दूध तो अच्छा
मिलेगा। रुपये खर्चे हैं तो उसका मजा तो मिलेगा।
चड्ढा साहब मेरे पुराने मेहरबान
हैं। खासी बेतकल्लुफी है उनसे। यह हरकत उनकी जानकारी में होती हो यह बात किसी तरह
गले के नीचे नहीं उतरती। या तो उनकी बीवी की शरारत है या नौकर की लेकिन जिक्र कैसे
करूं। और फिर उनकी बीवी से भी तो राह-रस्म है। कई बार मेरे घर आ चुकी हैं। मेरी
बीवी जी भी उनके यहां कई बार मेहमान बनकर जा चुकी हैं। क्या वह यकायक इतनी बेवकूफ
हो जायेंगी, सरीहन
आंखों में धूल झोंकेंगी! और फिर चाहे किसी की शरारत हो, मेरे
लिएयह गैरमुमकिन था कि उनसे दूध की खराबी की शिकायत करता। खैरियत यह हुई कि तीसरे
महीने चड्ढा का तबादला हो गया। मैं अकेले गाय न रख सकता था। साझा टूट गया। गाय आधे
दामों बेच दी गई। मैंने उस दिन इत्मीनान की सांस ली।
आखिर यह सलाह हुई कि एक बकरी रख
ली जाय। वह बीच आंगन के एक कोने में पड़ी रह सकती है। उसे दुहने के लिए न ग्वाले
की जरूरत न उसका गोबर उठाने, नांद धोने, चारा-भूसा डालने के लिए किसी अहीरिन की
जरूरत। बकरी तो मेरा नौकरभी आसानी से दुह लेगा। थोड़ी-सी चोकर डाल दी, चलिये किस्सा तमाम हुआ। फिर बकरी का दूध फायदेमंद भी ज्यादा है, बच्चों के लिए खास तौर पर। जल्दी हजम होता है, न
गर्मी करे न सर्दी, स्वास्थ्यवर्द्धक है। संयोग से मेरे यहां
जो पंडित जी मेरे मसौदे नकल करने आया करते थे, इन मामलों में
काफी तजुर्बेकार थे। उनसे जिक्र आया तो उन्होंने एक बकरी की ऐसी स्तुति गाई,
उसका ऐसा कसीदा पढ़ा कि मैं बिन देखे ही उसका प्रेमी हो गया। पछांही
नसल की बकरी है, ऊंचे कद की, बड़े-बड़े
थन जो जमीन से लगते चलते हैं। बेहद कमखोर लेकिन बेहद दुधार। एक वक्त में दो-ढाई
सेर दूध ले लीजिए। अभी पहली बार ही बियाई है। पच्चीस रुपये में आ जायगी। मुझे दाम
कुछ ज्यादा मालूम हुए लेकिन पंडितजी पर मुझे एतबार था। फरमाइश कर दी गई और तीसरे
दिन बकरी आ पहुंची। मैं देखकर उछल पड़ा। जो-जो गुण बताये गये थे उनसे कुछ ज्यादा
ही निकले। एक छोटी-सी मिट्टी की नांद मंगवाई गई, चोकर का भी
इन्तजाम हो गया। शाम को मेरे नौकर ने दूध निकाला तो सचमुच ढाई सेर। मेरी छोटी
पतीली लबालब भर गई थी। अब मूसलों ढोल बजायेंगे। यह मसला इतने दिनों के बाद जाकर
कहीं हल हुआ। पहले ही यह बात सूझती तो क्यों इतनी परेशानी होती। पण्डितजी का
बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया। मुझे सवेरे तड़के और शाम को उसकी सींग पकड़ने पड़ते
थे तब आदमी दुह पाता था। लेकिन यह तकलीफ इस दूध के मुकाबले में कुछ न थी। बकरी
क्या है कामधेनु है। बीवी ने सोचा इसे कहीं नजर न लग जाय इसलिए उसके थन के लिए एक
गिलाफ तैयार हुआ, इसकी गर्दन में नीले चीनी के दानों का एक
माला पहनाया गया। घर में जो कुछ जूठा बचता, देवी जी खुद जाकर
उसे खिला आती थीं।
लेकिन एक ही हफ्ते में दूध की
मात्रा कम होने लगी। जरूर नजर लग गई। बात क्या है। पण्डितजी से हाल कहा तो
उन्होंने कहा-साहब, देहात की बकरी है, जमींदार की। बेदरेग अनाज खाती थी
और सारे दिन बाग में घूमा-चरा करती थी। यहॉँ बंधे-बंधे दूध कम हो जाये तो ताज्जुब
नहीं। इसे जरा टहला दिया कीजिए।
लेकिन शहर में बकरी को टहलाये कौन
और कहां? इसलिए यह
तय हुआ कि बाहर कहीं मकान लिया जाय। वहां बस्ती से जरा निकलकर खेत और बाग है। कहार
घण्टे-दो घण्टे टहला लाया करेगा। झटपट मकान बदला और गौ कि मुझे दफ्तर आने-जाने में
तीन मील का फासला तय करना पड़ता था लेकिन अच्छा दूधमिले तो मैं इसका दुगना फासला
तय करने को तैयार था। यहां मकान खूब खुला हुआ था, मकान के
सामने सहन था, जरा और बढ़कर आम और महुए का बाग। बाग से
निकलिए तो काछियों के खेत थे, किसी में आलू, किसी में गोभी। एक काछी से तय कर लिया कि रोजना बकरी के लिए कुछ हरियाली
जाया करे। मगर इतनी कोशिश करने पर भी दूध की मात्रा में कुछ खास बढ़त नहीं हुई।
ढाई सेर की जगह मुश्किल से सेर-भर दूध निकलता था लेकिन यह तस्कीन थी कि दूध खालिस
है, यही क्या कम है!
मै। यह कभी
नहीं मान सकता कि खिदमतगारी के मुकाबले में बकरी चराना ज्यादा जलील काम है। हमारे
देवताओं और नबियों का बहुत सम्मानित वर्ग गल्ले चराया करते था। कृष्ण जी गायें
चराते थे। कौन कह सकता है कि उस गल्ले में बकरियां न रही होंगी। हजरत ईसा और हजरत
मुहम्मद दोनों ही भेड़े चराते थे। लेकिन आदमी रूढ़ियों का दास है। जो कुछ बुजुर्गों
ने नहीं किया उसे वह कैसे करे। नये रास्ते पर चलने के लिए जिस संकल्प और दृढ़
आस्था की जरूरत है वह हर एक में तो होती नहीं। धोबी आपके गन्दे कपड़े धो लेगा
लेकिन आपके दरवाजे पर झाड़ू लगाने में अपनी हतक समझता है। जरायमपेशा कौमों के लोग
बाजार से कोई चीज कीमत देकर खरीदना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। मेरे खितमतगार को
बकरी लेकर बाग में जाना बुरा मालूम होता था। घरसे तो ले जाय लेकिन बाग में उसे
छोड़कर खुद किसी पेड़ के नीचे सो जाता। बकरी पत्तियां चर लेती थी। मगर एक दिन उसके
जी में आया कि जरा बाग से निकलकर खेतों की सैर करें। यों वह बहुत ही सभ्य और
सुसंस्कृत बकरी थी, उसके चेहरे से गम्भीरता झलकती थी। लेकिन बाग और खेत में घुस गई आजादी नहीं
है, इसे वह शायद न समझ सकी। एक रोज किसी खेत में घुस गई और
गोभी की कई क्यारियां साफ कर गई। काछी ने देखा तो उसके कान पकड़ लिये और मेरे पास
लाकर बोला-बाबजी, इस तरह आपकी बकरी हमारे खेत चरेगी तो हम तो
तबाह हो जायेंगे। आपको बकरी रखने का शौक है तो इस बांधकर रखिये। आज तो हमने आपका
लिहाज किया लेकिन फिर हमारे खेत में गई तो हम या तो उसकी टॉँग तोड़ देंगे या
कानीहौज भेज देंगे।
अभी वह अपना भाषण खत्म न कर पाया
था कि उसकी बीवी आ पहुंची और उसने इसी विचार को और भी जोरदार शब्दों में अदा
किया-हां, हां,
करती ही रही मगर रांड खेत में घुस गई और सारा खेत चौपट कर दिया,
इसके पेट में भवनी बैठे! यहॉँ कोई तुम्हारा दबैल नहीं है। हाकिम
होंगे अपने घर के होंगे। बकरी रखना है तो बांधकर रखो नहीं गला ऐंठ दूंगी!
मैं भीगी बिल्ली बना हुआ खड़ा था।
जितनी फटकर आज सहनी पड़ी उतनी जिन्दगी में कभी न सही। और जिस धीरज से आज काम लिया
अगरउसे दूसरे मौकों पर काम लिया होतातो आज आदमी होता। कोई जवाब नहीं सूझता था। बस
यही जी चाहता थाकि बकरी का गला घोंट दूं ओर खिदमतगार को डेढ़ सौ हण्टर जमाऊं। मेरी
खामोशी से वह औरत भी शेर होती जाती थी। आज मुझे मालूम हुआ कि किन्हीं-किन्हीं
मौकों पर खामोशी नुकसानदेह साबित होती है। खैर, मेरी बीवी ने घर में यह गुल-गपाड़ा सुना तो
दरवाजे पर आ गई तो हेकड़ी से बोली-तू कानीहौज पहुंचा दे और क्या करेगी, नाहक टर्र-टर्र कर रही है, घण्टे-भर से। जानवर ही है,
एक दिन खुल गई तो क्या उसकी जान लेगी? खबरदार
जो एक बात भी मुंह से निकाली। क्यों नहीं खेत के चारों तरफ झाड़ लगा देती, कॉँटों से रूंध दे। अपनी गती तो मानती नहीं, ऊपर से
लड़ने आई है। अभी पुलिस में इत्तला कर दें तो बंधे-बंधे फिरो।
बात कहने की इस शासनपूर्ण शैली ने
उन दोनों को ठण्डा कर दिया। लेकिन उनके चले जाने के बाद मैंने देवी जी की खूब खबर
ली-गरीबों का नुकसन भी करती हो और ऊपर से रोब जमाती हो। इसी का नाम इंसाफ है?
देवी जी ने गर्वपूर्वक उत्तर
दिया-मेरा एहसान तो न मानोगे कि शैतनों को कितनी आसानी से भगा दिया, लगे उल्टे डांटने। गंवारों को
राह बतलाने का सख्ती के सिवा दूसरा कोई तरीका नहीं। सज्जनता या उदारता उनकी समझ
में नहीं आती। उसे यह लोग कमजोरी समझते हैं और कमजोर को कोन नहीं दबाना चाहता।
खिदमतगार से जवाब तलब किया तो
उसने साफ कह दिया-साहब, बकरी चराना मेरा काम नहीं है।
मैंने कहा-तुमसे बकरी चराने को
कौन कहता है, जरा
उसे देखते रहो करो कि किसी खेत में न जाय, इतना भी तुमसे
नहीं हो सकता?
मैं बकरी नहीं चरा सकता साहब, कोई दूसरा आदमी रख लीजिए।
आखिरी मैंने खुद शाम को उसे बाग
में चरा लाने का फैसला किया। इतने जरा-से काम के लिए एक नया आदमी रखना मेरी हैसियत
से बाहर था। और अपने इस नौकर को जवाब भी नहीं देना चाहता था जिसने कई साल तक
वफादारी से मेरी सेवा की थी और ईमानदार था। दूसरे दिन में दफ्तर से जरा जल्द चला
आया और चटपट बकरी को लेकर बाग में जा पहुंचा। जोड़ों के दिन थे। ठण्डी हवा चल रही
थी। पेड़ों के नीचे सूखी पत्तियॉँ गिरी हुई थीं। बकरी एक पल में वह जा पहुंची।
मेरी दलेल हो रही थी, उसके पीछे-पीछे दौड़ता फिरता था। दफ्तर से लौटकर जरा आराम किया करता था,
आज यह कवायद करना पड़ी, थक गया, मगर मेहनत सफल हो गई, आज बकरी ने कुछ ज्यादा दूध
पिया।
यह खयाल आया, अगर सूखी पत्तियां खाने से
दूध की मात्रा बढ़ गई तो यकीनन हरी पत्तियॉँ खिलाई जाएं तो इससे कहीं बेहतर नतीजा
निकले। लेकिन हरी पत्तियॉँ आयें कहॉँ से? पेड़ों से तोडूं तो
बाग का मालिक जरूर एतराज करेगा, कीमत देकर हरी पत्तियां मिल
न सकती थीं। सोचा, क्यों एक बार बॉँस के लग्गे से पत्तियां
तोड़ें। मालिक ने शोर मचाया तो उससे आरजू-मिन्नत कर लेंगे। राजी हो गया तो खैर,
नहीं देखी जायगी। थोड़ी-सी पत्तियॉँ तोड़ लेने से पेड़ का क्या
बिगड़ जाता है। चुनाचे एक पड़ोसी से एकपतला-लम्बा बॉँस मॉँग लाया, उसमें एक ऑंकुस बॉँधा और शाम को बकरी को साथ लेकर पत्तियॉँ तोड़ने लगा।
चोर ऑंखों से इधर-उधर देखता जाता था, कहीं मालिक तो नहीं
आरहा है। अचानक वही काछी एक तरफ से आ निकला और मुझे पत्तियां तोड़ते देखकर बोला-यह
क्या करते हो बाबूजी, आपके हाथ में यह लग्गा अच्छा नहीं
लगता। बकरी पालना हम गरीबों का काम है कि आप जैसे शरीफों का। मैं कट गया, कुछ जवाब नसूझा। इसमें क्या बुराई है, अपने हाथ से
अपना काम करने में क्या शर्म वगैरह जवाब कुछ हलके, बेहकीकत,
बनावटी मालूम हुए। सफेदपोशी के आत्मगौरव के जबान बन्द कर दी। काछी
ने पास आकर मेरे हाथ से लग्गा ले लिया और देखते-देखते हरी पत्तियों का ढेर लगा
दिया और पूछा-पत्तियॉँ कहॉँ रख जाऊं?
मैंने झेंपते हुए कहा-तुम रहने दो? मैं उठा ले जाऊंगा।
उसने थोड़ी-सी पत्तियॉं बगल में उठा
लीं और बोला-आप क्या पत्तियॉँ रखने जायेंगे,
चलिए मैं रख आऊं।
मैंने बरामदे में पत्तियॉँ रखवा
लीं। उसी पेड़ के नीचे उसकी चौगुनी पत्तियां पड़ी हुई थी। काछी ने उनका एक गट्ठा
बनाया और सर पर लादकर चला गया। अब मुझे मालूम हुआ, यह देहाती कितने चालाक होते हैं। कोई बात मतलब से
खाली नहीं।
मगर दूसरे दिन बकरी को बाग में ले
जाना मेरे लिए कठिन हो गया। काछी फिर देखेगा और न जाने क्या-क्या फिकरे चुस्त करे।
उसकी नजरों में गिर जाना मुंह से कालिख लगाने से कम शर्मनाक न था। हमारे सम्मान और
प्रतिष्ठा की जो कसौटी लोगों ने बना रक्खी है, हमको उसका आदर करना पड़ेगा, नक्कू बनकर रहे तो क्या रहे।
लेकिन बकरी इतनी आसानी से अपनी
निर्द्वन्द्व आजाद चहलकदमी से हाथ न खींचना चाहती थी जिसे उसने अपने साधारण
दिनचर्या समझना शुरू कर दिया था। शाम होते ही उसने इतने जोर-शोर से प्रतिवाद का
स्वर उठायया कि घर में बैठना मुश्किल हो गय। गिटकिरीदार ‘मे-मे’
का निरन्तर स्वर आ-आकर कान के पर्दों को क्षत-विक्षत करने लगा। कहां भाग जाऊं?
बीवी ने उसे गालियां देना शुरू कीं। मैंने गुससे में आकर कई डण्डे
रसीदे किये, मगर उसे सत्याग्रह स्थागित न करना था न किया।
बड़े संकट में जान थी।
आखिर मजबूर हो गया। अपने किये का, क्या इलाज! आठ बजे रात,
जाड़ों के दिन। घर से बाहर मुंह निकालना मुश्किल और मैं बकरी को बाग
में टहला रहा था और अपनी किस्मत को कोस रहा था। अंधेरे में पांव रखते मेरी रूह
कांपती है। एक बार मेरे सामने से एक सांप निकल गया था। अगर उसके ऊपर पैर पड़ जाता
तो जरूर काट लेता। तब से मैं अंधेरे में कभी न निकलता था। मगर आज इस बकरी के कारण
मुझे इस खतरे का भी सामना करना पड़ा। जरा भी हवा चलती और पत्ते खड़कते तो मेरी
आंखें ठिठुर जातीं और पिंडलियां कॉँपने लगतीं। शायद उस जन्म में मैं बकरी रहा
हूंगा और यह बकरी मेरी मालकिन रही होगी। उसी का प्रायश्चित इस जिन्दगी में भोग रहा
था। बुरा हो उस पण्डित का, जिसने यह बला मेरे सिर मढी।
गिरस्ती भी जंजाल है। बच्चा न होता तो क्यों इस मूजी जानवर की इतनी खुशामद करनी
पड़ती। और यह बच्चा बड़ा हो जायगा तो बात न सुनेगा, कहेगा,
आपने मेरे लिए क्या किया है। कौन-सी जायदाद छोड़ी है! यह सजा भुगतकर
नौ बजे रात को लौटा। अगररात को बकरी मर जाती तो मुझे जरा भी दु:ख न होता।
दूसरे दिन सुबह से ही मुझे यह
फिक्र सवार हुई कि किसी तरह रात की बेगार से छुट्टी मिले। आज दफ्तर में छुट्टी थी।
मैंने एक लम्बी रस्सी मंगवाई और शाम को बकरी के गले में रस्सी डाल एक पेड़ की जड़
से बांधकर सो गया-अब चरे जितना चाहे। अब चिराग जलते-जलते खोल लाऊंगा। छुट्टी थी ही, शाम को सिनेमा देखने की ठहरी।
एक अच्छा-सा खेल आया हुआ था। नौकर को भी साथ लिया वर्ना बच्चे को कौन सभालाता। जब
नौ बजे रात को घर लोटे और में लालटेन लेकर बकरी लेनो गया तो क्या देखता हूं कि
उसने रस्सी को दो-तीन पेड़ों से लपेटकर ऐसा उलझा डाला है कि सुलझना मुश्किल है।
इतनी रस्सी भी न बची थी कि वह एक कदम भी चल सकती। लाहौलविकलाकूवत, जी में आया कि कम्बख्त को यहीं छोड़ दूं, मरती है तो
मर जाय, अब इतनी रात को लालटेन की रोशनी में रस्सी सुलझाने
बैठे। लेकिन दिल न माना। पहले उसकी गर्दन से रस्सी खोली, फिर
उसकी पेंच-दर-पेंच ऐंठन छुड़ाई, एक घंटा लग गया। मारे सर्दी
के हाथ ठिठुरे जाते थे और जी जल रहा था वह अलग। यह तरकीब। और भी तकलीफदेह साबित
हुई।
अब क्या करूं, अक्ल काम न करती थी। दूध का
खयाल न होता तो किसी को मुफ्त दे देता। शाम होते ही चुड़ैल अपनी चीख-पुकार शुरू कर
देगी और घर में रहना मुश्किल हो जायगा, और आवाज भी कितनी
कर्कश और मनहूस होती है। शास्त्रों में लिखा भी है, जितनी
दूर उसकी आवाज जाती है उतनी दूर देवता नहीं आते। स्वर्ग की बसनेवाली हस्तियां जो
अप्सराओं के गाने सुनने की आदी है, उसकी कर्कश आवाज से नफरत
करें तो क्या ताज्जुब! मुझ पर उसकी कर्ण कटु पुकारों को ऐसा आंतक सवार था कि दूसरे
दिन दफ्तर से आते ही मैं घर से निकल भागा। लेकिन एक मील निकल जाने पर भी ऐसा लग
रहा था कि उसकी आवाज मेरा पीछा किये चली आती है। अपने इस चिड़चिड़ेपन पर शर्म भी आ
रही थी। जिसे एक बकरीरखने की भी सामर्थ्य न हो वह इतना नाजुक दिमाग क्यों बने और
फिर तुम सारी रात तो घर से बाहर रहोगे नहीं, आठ बजे पहुंचोगे
तो क्या वह गीत तुम्हारा स्वागत न करेगा?
सहसा एक नीची शाखोंवाला पेड़
देखकर मुझे बरबस उस पर चढ़ने की इच्छा हुई। सपाट तनों पर चढ़ना मुश्किल होता है, यहां तो छ: सात फुट की ऊंचाई
पर शाखें फूट गयी थीं। हरी-हरी पत्तियों से पेड़ लदा खड़ा था और पेड़ भी था गूलर
का जिसकी पत्तियों से बकरियों को खास प्रेम है। मैं इधर तीस साल से किसी रुख पर
नहीं चढ़ा। वहआदत जाती रही। इसलिए आसान चढ़ाई के बावजूद मेरे पांव कांप रहे थे पर
मैंने हिम्मत न हारी और पत्तियों तोड़-तोड़ नीचे गिराने लगा। यहां अकेले में कौन
मुझे देखता है कि पत्तियां तोड़ रहा हूं। अभी अंधेरा हुआ जाता है। पत्तियों का एक
गट्ठा बगल में दबाऊंगा और घर जा पहुंचूंगा। अगर इतने पर भी बकरी ने कुछ चीं-चपड़
की तो उसकी शामत ही आ जायगी।
मैं अभी ऊपर ही था कि बकरियों और
भेड़ों काएक गोल न जाने किधर से आ निकला और पत्तियों पर पिल पड़ा। मैं ऊपर से चीख
रहा हूं मगर कौन सुनता है। चरवाहे का कहीं पता नहीं । कहीं दुबक रहा होगा कि देख
लिया जाऊंगा तो गालियां पड़ेंगी। झल्लाकर नीचे उतरने लगा। एक-एक पल में पत्तियां
गायब होती जाती थी। उतरकर एक-एक की टांग तोडूंगा। यकायक पांव फिसला और मैं दस फिट
की ऊंचाई से नीचे आ रहा। कमर में ऐसी चोट आयी कि पांच मिनट तक आंखों तले अंधेरा छा
गया। खैरियत हुई कि और ऊपर से नहीं गिरा, नहीं तो यहीं शहीद हो जाता। बारे, मेरे गिरने के
धमाके से बकरियां भागीं और थोड़ी-सी पत्तियां बच रहीं। जब जरा होश ठिकाने हुए तो
मैंने उन पत्तियों को जमा करके एक गट्ठा बनाया और मजदूरों की तरह उसे कंधे पर रखकर
शर्म की तरह छिपाये घर चला। रास्ते में कोई दुर्घटना न हुई। जब मकान कोई चार फलांग
रह गया और मैंने कदम तेज किये कि कहीं कोई देख न ले तो वह काछी समाने से आता
दिखायी दिया। कुछ न पूछो उस वक्त मेरी क्या हालत हुई। रास्ते के दोनो तरफ खेतों की
ऊंची मेड़ें थीं जिनके ऊपर नागफनी निकलेगा और भगवान् जाने क्या सितम ढाये। कहीं
मुड़ने का रास्ता नहीं और बदल ली और सिर झुकाकर इस तरह निकल जाना चाहता था कि कोई
मजदूर है। तले की सांस तले थी, ऊपर की ऊपर, जैसे वह काछी कोई खूंखार शोरहो। बार-बार ईश्वर को याद कर रहा था कि हे
भगवान्, तू ही आफत के मारे हुओं का मददगार है, इस मरदूद की जबान बन्द कर दे। एक क्षण के लिए, इसकी
आंखों की रोशनी गायब कर दे...आह, वह यंत्रणा का क्षण जब मैं
उसके बराबर एक गज के फासले से निकला! एक-एक कदम तलवार की धार पर पड़ रहा था शैतानी
आवाज कानों में आयी-कौन है रे, कहां से पत्तियां तोड़े लाता
है!
मुझे मालूम हुआ, नीचे से जमीन निकल गयी है और
मैं उसके गहरे पेट में जा पहुंचा हूं। रोएं बर्छियां बने हुए थे, दिमाग में उबाल-सा आ रहा था, शरीर को लकवा-सा मार
गया, जवाब देने का होश न रहा। तेजी से दो-तीन कदम आगे बढ़
गया, मगर वह ऐच्छिक क्रिया न थी, प्राण-रक्षा
की सहज क्रिया थी।
कि एक जालिम हाथ गट्ठे पर पड़ा और
गट्ठा नीचे गिर पड़ा। फिर मुझे याद नहीं,
क्या हुआ। मुझे जब होश आया तो मैं अपने दरवाजे पर पसीने से तर खड़ा
था गोया मिरगी के दौरे के बाद उठा हूं। इस बीच मेरी आत्मा पर उपचेतना का आधिपत्य
था और बकरी की वह घृणित आवाज, वह कर्कश आवाज, वह हिम्मत तोड़नेवाली आवाज, वह दुनिया की सारी
मुसीबतों का खुलसा, वह दुनिया की सारी लानतों की रूह कानों
में चुभी जा रही थी।
बीवी ने पूछा-आज कहां चले गये थे? इस चुड़ैल को जरा बाग भी न ले
गये,जीना मुहाल किये देती है। घर से निकलकर कहां चली जाऊ!
मैंने
इत्मीनान दिलाया-आज चिल्ला लेने दो,
कल सबसे पहला यह काम करूंगा कि इसे घर से निकाल बाहर करूंगा,
चाहे कसाई को देना पड़े।
‘और
लोग न जाने कैसे बकरियां पालते हैं।’
‘बकरी
पालने के लिए कुत्ते का दिमाग चाहिए।’
सुबह को
बिस्तर से उठकर इसी फिक्र में बैठा था कि इस काली बलासे क्योंकर मुक्ति मिले कि
सहसा एक गड़रिया बकरियों का एक गल्ला चराता हुआ आ निकला। मैंने उसे पुकारा और उससे
अपनी बकरी को चराने की बात कही। गड़रिया राजी हो गया। यही उसका काम था। मैंने
पूछा-क्या लोगे?
‘आठ
आने बकरी मिलते हैं हजूर।’
‘मैं
एक रुपया दूंगा लेकिन बकरी कभी मेरे सामने न आवे।’
गड़रिया
हैरत में रह गया-मरकही है क्या बाबूजी?
‘नही,
नहीं, बहुत सीधी है, बकरी
क्या मारेगी, लेकिन मैं उसकी सूरत नहीं देखना चाहता।’
‘अभी
तो दूध देती है?’
‘हां,
सेर-सवा सेर दूध देती है।’
‘दूध
आपके घर पहुंच जाया करेगा।’
‘तुम्हारी
मेहरबानी।’
जिस वक्त
बकरी घर से निकली है मुझे ऐसा मालूम हुआ कि मेरे घर का पाप निकला जा रहा है। बकरी
भी खुश थी गोया कैद से छूटी है, गड़रिये ने उसी वक्त दूध निकाला और घर में रखकर बकरी को लिये चला गया। ऐसा
बेगराज गाहक उसे जिन्दगी में शायद पहली बार ही मिला होगा।
एक हफ्ते तक
दूध थोड़ा-बहुत आता रहा फिर उसकी मात्रा कम होने लगी, यहां तक कि एक महीना खतम
होते-होते दूध बिलकुल बन्द हो गया। मालूम हुआ बकरी गाभिन हो गयी है। मैंने जरा भी
एतराज न किया काछी के पास गाय थी, उससे दूध लेने लगा। मेरा
नौकर खुद जाकर दुह लाता था।
कई महीने
गुजर गये। गड़रिया महीने में एक बार आकर अपना रुपया ले जाता। मैंने कभी उससे बकरी
का जिक्र न किया। उसके खयाल ही से मेरी आत्मा कांप जाती थी। गड़रिये को अगर चेहरे
का भाव पढ़ने की कला आती होती तो वह बड़ी आसानी से अपनी सेवा का पुरस्कार दुगना कर
सकता था।
एक दिन मैं
दरवाजे पर बैठा हुआ था कि गड़रिया अपनी बकरियों का गल्ला लिये आ निकला। मैं उसका
रुपया लाने अन्दर गया, कि क्या देखता हूं मेरी बकरी दो बच्चों के साथ मकान में आ पहुंची। वह पहले
सीधी उस जगह गयी जहां बंधा करती थी फिर वहां से आंगन में आयी और शायद परिचय दिलाने
के लिए मेरी बीवी की तरफ ताकने लगी। उन्होंने दौड़कर एक बच्चे को गोद में ले लिया
और कोठरी में जाकर महीनों का जमा चोकर निकाल लायीं और ऐसी मुहब्बत से बकरी को
खिलाने लगीं कि जैसे बहुत दिनों की बिछुड़ी हुई सहेली आ गयी हो। न व पुरानी कटुता
थी न वह मनमुटाव। कभी बच्चे को चुमकारती थीं। कभी बकरी को सहलाती थीं और बकरी
डाकगड़ी की रफ्तार से चोकर उड़ा रही थी।
तब मुझसे बोलीं-कितने खूबसूरत
बच्चे है!
‘हां,
बहुत खूबसूरत।’
‘जी
चाहता है, एक पाल लूं।’
‘अभी
तबियत नहीं भरी?’
‘तुम
बड़े निर्मोही हो।’
चोकर खत्म
हो गया, बकरी
इत्मीनान से विदा हो गयी। दोनों बच्चे भी उसके पीछे फुदकते चले गये। देवी जी आंख
में आंसू भरे यह तमाशा देखती रहीं।
गड़रिये ने
चिलम भरी और घर से आग मांगने आया। चलते वक्त बोला-कल से दूध पहुंचा दिया करूंगा।
मालिक।
देवीजी ने
कहा-और दोनों बच्चे क्या पियेंगे?
‘बच्चे
कहां तक पियेंगे बहूजी। दो सेर दूध् अच्छा न होता था, इस
मारे नहीं लाया।’
मुझे रात को
वह मर्मान्तक घटना याद आ गयी।
मैंने
कहा-दूध लाओ या न लाओ, तुम्हारी खुशी, लेकिन बकरी को इधर न लाना।
उस दिन से न
वह गड़रिया नजर आया न वह बकरी, और न मैंने पता लगाने की कोशिश की। लेकिन देवीजी उसके बच्चों को याद करके
कभी-कभी आंसू बहा रोती हैं।
देवी
बूढ़ों में
जो एक तरह की बच्चों की-सी बेशर्मी आ जाती है वह इस वक्त भी तुलिया में न आई थी, यद्यपि उसके सिर के बाल चांदी
हो गये थे। और गाल लटक कर दाढ़ों के नीचे आ गये थे। वह खुद भी निश्चित रूप से अपनी
उम्र न बता सकती थी, लेकिन लोगों का अनुमान था कि वह सौ की
सीमा को पार कर चुकी है। और अभी तक चलती तो अंचल से सिर दांककर, आंखें नीची किये हुए, मानो नवेली बहू है। थी तो
चमारिन, पर क्या मजाल कि किसी घर का पकवान देखकर उसका जी
ललचाया। गांव में ऊंची जातों के बहुत-से घर थे। तुलिया का सभी जगह आना-जाना था।
सारा गांव उसकी इज्जत करता था और गृहिणियां तो उसे श्रद्धा की आंखों से देखती थीं।
उसे आग्रह के साथ अपने घर बुलातीं, उसके सिर में तेल डालतीं, मांग में सेंदूर भरती, कोई अच्छी चीज पकाई होती, जैसे हलवा या खीर या पकौड़ियां, तो उसे खिलाना
चाहतीं, लेकिन बुढ़िया को जीभ से सम्मान कहीं प्यारा था। कभी
न खाती। उसके आगे-पीछे कोई न था। उसके टोले के लोग कुछ तो गांव छोड़कर भाग गये थे, कुछ प्लेग और मलेरिया की भेंट हो गये थे और अब थोड़े-से खंडहर मानो उनकी
याद में नंगे सिर खड़े छाती-सी पीट रहे थे। केवल तुलिया की मंड़ैया ही जिन्दा बच
रही थी, और यद्यपि तुलिया जीवन-यात्रा की उस सीमा के निकट
पहुंच चुकी थी, जहा आदमी धर्म और समाज के सारे बन्धनों से
मुक्त हो जाता हैं और अब श्रेष्ठ प्राणियों को भी उससे उसकी जात के कारण कोई भेद न
था, सभी उसे अपने घर में आश्रय देने को तैयार थे, पर मान-प्रिय बुढ़िया क्यों किसी का एहसान ले,
क्यों अपने मालिक की इज्जत में बट्टा लगाये, जिसकी उसने सौ
बरस पहले केवल एक बार सूरत देखी थी। हां, केवल एक बार!
तुजिया की जब सगाई हुई तो वह केवल
पांच साल की थी और उसका पति अठारह साल का बलिष्ठ युवक था। विवाह करके वह कमाने
पूरब चला गया। सोचा, अभी इस लड़की के जवान होने में दस-बारह साल की देर है। इतने दिनों में
क्यों न कुछ धन कमा लूं और फिर निश्चिन्त होकर खेती-बारी करूं। लेकिन तुलिया जवान
भी हुई, बूढ़ी भी हो गई, वह लौटकर घर न
आया। पचास साल तक उसके खत हर तीसरे महीने आते रहे। खत के साथ जवाब के लिए एक पता
लिखा हुआ लिफाफा भी होता था और तीस रुपये का मनीआर्डर। खत में वह बराबर अपनी
विवशता, पराधीनता और दुर्भाग्य का रोना रोता था—क्या करूं तूला, मन में तो बड़ी अभिलाषा है कि अपनी
मंड़ैया को आबाद कर देता और तुम्हारे साथ सुख से रहता, पर सब
कूछ नसीब के हाथ है, अपना कोई बस नहीं। जब भगवान लावेंगे तब
आऊंगा। तुम धीरज रखना, मेरे जीते जी तुम्हें कोई कष्ट न
होगा। तुम्हारी बांह पकड़ी है तो मरते दम तक निबाह करूंगा। जब आंखें बन्द हो
जाएंगी तब क्या होगा, कौन जाने? प्राय:
सभी पत्रों में थोड़े-से-फेर-फार के साथ यही शब्द और यही भाव होते थे। हां, जवानी के पत्रों में विरह की जो ज्वाला होती थी,
उसकी जगह अब निराशा की राख ही रह गई थी। लेकिन तुलिया के लिए सभी पत्र एक-से
प्यारे थे, मानो उसके हृदय के अंग हों। उसने एक खत भी कभी न
फाड़ा था—ऐसे शगुन के पत्र कहीं फाड़े जाते हैं—उनका एक छोटा-सा पोथा जमा हो गया था। उनके कागज का रंग उड़ गया था, स्याही भी उड़ गई थी, लेकिन तुलिया के लिए वे अभी
उतने ही सजीव, उतने ही सतृष्ण, उतने ही
व्याकुल थे। सब के सब उसकी पेटारी में लाल डोरे से बंधे हुए,
उसके दीर्घ जीवन से संचित सोहाग की भांति, रखे हुए थे। इन
पत्रों को पाकर तुलिया गद्गद हो जाती। उसके पांव जमीन पर न पड़ते, उन्हें बार-बार पढ़वाती और बार-बार रोती। उस दिन वह अवश्य केशों में तेल
डालती, सिन्दूर से मांग भरवाती, रंगीन
साड़ी पहनती, अपनी पुरखिनों के चरन छूती और आशीर्वाद लेती।
उसका सोहाग जाग उठता था। गांव की बिरहिनियों के लिए पत्र पत्र नहीं, जो पढ़कर फेंक दिया जाता है, अपने प्यारे परदेसी के
प्राण हैं, देह से मूल्यवान। उनमें देह की कठोरता नहीं, कलुषता नहीं, आत्मा की आकुलता और अनुराग है। तुलिया
पति के पत्रों ही को शायद पति समझती थी। पति का कोई दूसरा रूप उसने कहां देखा था?
रमणियां हंसी से पूछती—क्यों बुआ, तुम्हें फूफा की कुछ याद आती है—तुमने उनको देखा तो
होगा? और तुलिया के झुरिंयों से भरे हुए मुखमण्डल पर यौवन
चमक उठता, आंखों में लाली आ जाती। पुलककर कहती—याद क्यों नहीं आती बेटा, उनकी सूरत तो आज भी मेरी
आंखें के समाने हैं बड़ी-बड़ी आंखें, लाल-लाल ऊंचा माथा, चौड़ी छाती, गठी हुई देह, ऐसा
तो अब यहां कोई पट्ठा ही नहीं है। मोतियों के-से दांत थे बेटा। लाल-लाल कुरता पहने
हुए थे। जब ब्याह हो गया तो मैंने उनसे कहा, मेरे लिए
बहुत-से गहने बनवाओगे न, नहीं मैं तुम्हारे घर नहीं रहूंगी।
लड़कपन था बेटा, सरम-लिहाज कुछ थोड़ा ही था। मेरी बात सुनकर
वह बड़े जोर से ठट्ठा मारकर हंसे और मुझे अपने कंधे पर बैठाकर बोले—मैं तुझे गहनों से लाद दूंगा, तुलिया, कितने गहने पहनेगी। मैं परदेस कमाने जाता हूं, वहां
से रुपये भेजूंगा, तू बहुत-से गहने बनवाना। जब वहां से आऊंगा
तो अपने साथ भी सन्दूक-भर गहने लाऊंगा। मेरा डोला हुआ था बेटा, मां-बाप की ऐसी हैसियत कहां थी कि उन्हें बारात के साथ अपने घर बुलातें
उन्हीं के घर मेरी उनसे सगाई हुई और एक ही दिन में मुझे वह कुछ ऐसे भाये कि जब वह
चलने लगे तो मैं उनके गले लिपट कर रोती थी और कहती थी कि मुझे भी अपने साथ ले चलो, मैं तुम्हारा खाना पकाऊंगी, तुम्हारी खाट बिछाऊंगी, तुम्हारी धेती छांटूगी। वहां उन्हीं के उमर के दो-तीन लड़के और बैठे हुए
थे। उन्हीं के सामने वह मुस्करा कर मेरे कान में बोले—और
मेरे साथ सोयेगी नहीं? बस, मैं उनका
गला छोड़कर अलग खड़ी हो गई और उनके ऊपर एक कंकड़ फेककर बोली—मुझे
गाली दोगे तो कहे देती हूं, हां!
और यह जीवन-कथा नित्य के सुमिरन
और जाप से जीवन-मन्त्र बन गयी थी। उस समय कोई उसका चेहरा देखता! खिला पड़ता था।
घूंघट निकालकर भाव बताकर, मुंह फेरकर हंसती हुई, मानो उसके जीवन में दुख जैसी
कोई चीज है ही नहीं। वह अपने जीवन की इस पुण्य स्मृति का वर्णन करती, अपने अन्तस्तल के इस प्रकाश को देर्शाती जो सौ बरसों से उसके जीवन-पथ को
कांटों और गढ़ों से बचाता आता था। कैसी अनन्त अभिलाषा था,
जिसे जीवन-सत्यों ने जरा भी धूमिल न कर पाया था।
२
वह दिन भी
थे, जब तुलिया
जवान थी, सुंदर थी और पतंगों को उसके रूप-दीपक पर मंछराने का
नशा सवार था। उनके अनुराग और उन्माद तथा समर्पण की कथाएं जब वह कांपते हुए स्वरों
और सजल नेत्रों से कहती तो शायद उन शहींदों की आत्माएं स्वर्ग में आनन्द से नाच
उठती होंगी, क्योंकि जीते जी उन्हें जो कुछ न मिला वही अब
तुलिया उन पर दानों हाथों से निछावर कर रही थी। उसकी उठती हुई जवानी थी। जिधर से
निकल जाती युवक समाज कलेजे पर हाथ रखकर रह जाता। तब बंसीसिंह नाम का एक ठाकुर था, बड़ा छैला, बड़ा रसिया, गांव
का सबसे मनचला जवान, जिसकी तान रात के सन्नाटे में कोस-भर से
सुनायी पड़ती थी। दिन में सैकड़ों बार तुलिया के घर के चक्कर लगाता। तालाब के किनारे, खेत में, खलिहान में, कुंए पर, जहां वह जाती, परछाईं की तरह उसके पीछे लगा रहता।
कभी दूध लेकर उसके घर आता, कभी घी लेकर। कहता, तुलिया, मैं तुझसे कुछ नहीं चाहता, बस जो कुछ मैं तुझे भेंट किया करूं, वह ले लिया कर।
तू मुझसे नहीं बोलना चाहती मत बोल, मेरा मुंह नहीं देखना
चाहती, मत देख लेकिन मेरे चढ़ावों को ठुकरा मत। बस, मैं इसी से सन्तुष्ठ हो जाऊंगा। तुलिया ऐसी भोली न थी, जानती थी यह उंगली पकड़ने की बातें हैं, लेकिन न
जाने कैसे वह एक दिन उसके धोखे में आ गयी—नहीं, धोखे में नहीं आयी—उसकी जवानी पर उसे दया आ गयी। एक
दिन वह पके हुए कलमी आमों की एक टोकरी लाया! तुलिया ने कभी कलमी आम न खाये थे।
टोकरी उससे ले ली। फिर तो आये दिन आम की डलियां आने लगीं। एक दिन जब तुलिया टोकरी
लेकर घर में जाने लगी तो बंसी ने धीरे से उसका हाथ पकड़कर अपने सीने पर रख लिया और
चट उसके पैरों पर गिर पड़ा। फिर बोला—तुलिया, अगार अब भी तुझे मुझ पर दया नहीं आती तो आज मुझे मार डाल। तेरे हाथों से
मर जाऊं, बस यही साध है।
तुलिया न टोकरी पटक दी, अपने पांव छुड़ाकर एक पग पीछे
हट गयी ओर रोषभरी आंखों से ताकती हुई बोली—अच्छा ठाकुर, अब यहां से चले जाव, नहीं तो या तो तुम न रहूंगी।
तुम्हारे आमों में आग लगे, और तुमको क्या कहूं! मेरा आदमी
काले कोसों मेरे नाम पर बैठा हुआ है इसीलिए कि मैं यहां उसके साथ कपट करूं! वह
मर्द है, चार पेसे कमाता है, क्या वह
दूसरी न रख सकता था? क्या औरतों की संसार में कमी है? लेकिन वह मेरे नाम पर चाहे न हो। पढ़ोगे उसकी चिट्ठियां जो मेरे नाम
भेजता है? आप चाहे जिस दशा में हो, मैं
कौन यहां बेठी देखती हूं, लेकिन मेरे पास बराबर रुपये भेजता
है। इसीलिए कि मैं यहां दूसरों से विहार करूं? जब तक मुझको
अपनी और अपने को मेरा समझता रहेगा, तुलिया उसी की रहेगी, मन से भी, करम से भी। जब उससेमेरा ब्याह हुआ तब मैं
पांच साल की अल्हड़ छोकरी थी। उसने मेरे साथ कौन-सा सुख उठाया? बांह पकड़ने की लाज ही तो निभा रहा है! जब वह मर्द होकर प्रीत निभाता है
तो मैं औरत होकर उसके साथ दगा करूं!
यह कहकर वह
भीतर गयी और पत्रों की पिटारी लाकर ठाकुर के सामने पटक दी। मगर ठाकुर की आंखों का
तार बंधा हुआ था,
ओठ बिचके जा रहे थे। ऐसा जान पड़ता था कि भूमि में धंसा जा रहा है।
एक क्षण के बाद उसने हाथ जोड़कर
कहा—मुझसे बहुत
बड़ा अपराध हो गया तुलिया। मैंने तुझे पहचाना न था। अब इसकी यही सजा है कि इसी
क्षण मुझे मार डाल। ऐसे पापी का उद्वार का यही एक मार्ग है।
तुलिया को उस पर दया नहीं आयी। वह
समझती थी कि यह अभी तक शरारत किये जाता है। झल्लाकर बोली—मरने को जी चाहता है तो मर
जाव। क्या संसार में कुए-तालाब नहीं, या तुम्हारे पास
तलवार-कटार नहीं है। मैं किसी को क्यों मारूं?
ठाकुर ने हताश आंखों से देखा।
“तो यही
तेरा हुक्म है?”
‘मेरा हुक्म क्यों होने लगा?
मरने वाले किसी से हुक्म नहीं मांगते।’
ठाकुर चला गया और दूसरे दिन उसकी
लाश नदी में तैरती हुई मिली। लोगों ने समझा तड़के नहाने आया होगा, पांव फिसल गया होगा। महीनों
तक गांव में इसकी चर्चा रही, पर तुलिया ने जबान तक न खोली, उधर का आना-जाना बन्द कर दिया।
बंसीसिंह के मरते ही छोटे भाई ने
जायदाद पर कब्जा कर लिया और उसकी स्त्री और बालक को सताने लगा। देवरानी ताने देती, देवर ऐब लगाता। आखिरं अनाथ
विधवा एक दिन जिन्दगी से तंग आकर घर से निकल पड़ी। गांव में सोता पड़ गया था।
तुलिया भोजन करके हाथ में लालटेन लिये गाय को रोटी खिलाने निकली थी। प्रकाश में
उसने ठकुराइन को दबे पांव जाते देखा। सिसकती और अंचल से आंसु पोंछती जाती थी। तीन
साल का बालक गोद में था।
तुलिया ने पूछा—इतनी रात गये कहां जाती हो
ठकुराइन? सुनो, बात क्या है, तुम तो रो रही हो।
ठकुराइन घर से जा तो रही थी, पर उसे खुद न मालूम था कहां।
तुलिया की ओर एक बार भीत नेत्रों से देखकर बिना कुछ जवाब दिये आगे बढ़ी। जवाब कैसे
देती? गले में तो आंसू भरे हुए थे और इस समय न जाने क्यों और
उमड़ आये थे।
तुलिया सामने आकर बोली—जब तक तुम बता न दोगी, मैं एक पग भी आगे न जाने दूंगी।
ठकुराइन
खड़ी हो गयी और आंसू-भरी आंखों से क्रोध में भरकर बोली—तू क्या करेगी पूछकर? तुझसे मतलब?
‘मुझसे कोई मतलब ही नहीं?
क्या मैं तुम्हारे गांव में नहीं रहती? गांव वाले एक-दूसरे
के दुख-दर्द में साथ न देंगे तो कौन देगा?’
‘इस जमाने में कौन किसका साथ देता है तुलिया? जब अपने घरवालों ने ही साथ नहीं दिया और तेरे भैया के मरते ही मेरे खून
के प्यासे हो गये, तो फिर मैं और किससे आशा रखूं? तुझसे मेरे घर का हाल कुछ छिपा है? वहां मेरे लिए
अब जगह नहीं है। जिस देवर-देवरानी के लिए मैं प्राण देती थी,
वही अब मेरे दुश्मन हैं। चाहते हैं कि यह एक रोटी खाय और अनाथों की तरह पड़ी रहे।
मैं रखेली नहीं हूं उढ़री हूं, ब्याहता हूं, दस गांव के बीच में ब्याह के आयी हूं। अपनी रत्ती-भी जायदाद न छोडूंगी ओर
अपना राधा लेकर रहूंगी।’
‘तेरे भैया’, ये दो शब्द
तुलिया को इतने प्यारे लगे कि उसने ठकुराइन को गले लगा लिया ओर उसका हाथ पकड़कर
बोली—तो बहिन, मेरे घर में चलकर रहो।
और कोई साथ दे या न दे, तुलिया मरते दम तक तुम्हारा साथ
देगी। मेरा घर तुम्हारे लायक नहीं है, लेकिन घर में और कुछ
नहीं शान्ति तो है और मैं कितनी ही नीच
हूं, तुम्हारी बहिन तो हूं।
ठकुराइन ने तुलिया के चेहरे पर
अपनी विस्मय-भरी आंखें जमा दीं।
‘ऐसा न हो मेरे पीछे मेरा देवर तुम्हारा भी दुश्मन
हो जाय।’
‘मैं दुश्मनों से नहीं डरती,
नहीं इस टोले में अकेली न रहती।’
‘लेकिन मैं तो नहीं चाहती कि मेरे कारन तुझ पर आफत
आवे।’
‘तो उनसे कहने ही कौन जाता है, और किसे मालूम होगा कि अन्दर तुम हो।’
ठकुराइन को ढाढ़स बंधा। सकुचाती
हुई तुलिया के साथ अन्दर आयी। उसका हृदय
भारी था। जो एक विशाल पक्के की स्वामिनी थी, आज इस झोपड़ी में पड़ी हुई है।
घर में एक ही खाट थी, ठकुराइन बच्चे के साथ उस पर
सोती। तुलिया जमीन पर पड़ रहती। एक ही कम्बल था, ठकुराइन
उसको ओढ़ती, तुलिया टाट का टुकड़ा ओढ़कर रात काटती। मेहमान
का क्या सत्कार करे, कैसे रक्खे, यही
सोचा करती। ठकुराइन के जुठे बरतन मांजना, कपड़े छांटना, उसके बच्चे को खिलाना ये सारे काम वह इतने उमंग से करती, मानो देवी की उपासना कर रही हो। ठकुराइन इस विपत्ति में भी ठकुराइन थी, गर्विणी, विलासप्रिय,
कल्पनाहीन। इस तरह रहती थी मानो उसी का घर है और तुलिया पर इस तरह रोब जमाती थी
मानो वह उसकी लौंडी है। लेकिन तुलिया अपने अभागे प्रेमी के साथ प्रीति की रीति का
निबाह कर रही थी, उसका मन कभी न मैला होता, माथे पर कभी न बल पड़ता।
एक दिन ठकुराइन ने कहा—तुला,
तुम बच्चे को देखती रहना, मैं दो-चार दिन के लिए जरा बाहर
जाऊंगी। इस तरह तो यहां जिन्दगी-भर तुम्हारी रोटीयां तोड़ती रहूंगी, पर दिल की आग कैसे ठण्डी होगी? इस बेहया को इसकी
जाल कहां कि उसकी भावज कहां चली गयी। वह तो दिल में खुश होगा कि अच्छा हुआ उसके
मार्ग का कांटा हट गया। ज्यों ही पता चला कि मैं अपने मैके नहीं गयी, कहीं और पड़ी हूं, वह तुरन्त मुझे बदनाम कर देगा और
तब सारा समाज उसी का साथ देगा। अब मुझे कुछ अपनी फिक्र करनी चाहिए।
तुलिया ने पूछा—कहां जाना चाहती हो बहिन? कोई हर्ज न हो तो मैं भी साथ चलूं। अकेली कहां जाओगी?
‘उस सांप को कुचलने के लिए कोई लाठी खोजूंगी।’
तुलिया इसका आशक न समझ सकी। उसके
मुख की ओर ताकने लगी।
इकुराइन ने निर्लज्ज्ता के साथ
कहा—तू इतनी
मोटी-सी बात भी नहीं समझी! साफ-साफ ही सुनना चाहती है? अनाथ
स्त्री के पास अपनी रक्षा का अपने रूप के सिवा दूसरा कौन अस्त्र है? अब उसी अस्त्र से काम लूंगी। जानती है, इस रूप के
क्या दाम होंगे? इस भेड़िये का सिर। इस परगने का हाकिम जो
कोई भी हो उसी पर मेरा जादू चलेगा। और ऐसा कौन मर्द है जो किसी युवती के जादू से
बच सके, चाहे वह ऋषि ही क्यों न हो। धर्म जाता है जाय, मुझ परवाह नहीं। मैं यह नहीं देख सकती कि मैं बन-बन की पत्तियां तोडूं और
वह शोहदा मूंछों पर ताव देकर राज करे।
तुलिया को
मालूम हुआ कि इस अभिमानिनी के हृदय पर किनी गहरी चोट हैं इस व्यथा को शान्त करने
के लिए वह जान ही पर नहीं खेल रही है, धर्म पर खेल रही है जिसे वह प्राणों से भी प्रिय समझती है। बंसीसिंह की
वह प्रार्थी मूर्ति उसकी आंखों के समाने आ खड़ी हुई। वह बलिष्ठ था, अपनी फौलादी शक्ति से वह बड़ी आसानी के साथ तुलिया पर बल प्रयोग कर सकता
था, ओर उस रात के सन्नाटे में उस आनाथा की रक्षा करने वाला
ही कौन बैठा हुआ था। पर उसकी सतीत्व-भरी भर्त्सना ने बंसीसिंह को किस तरह मोहित कर
लिया, जैसे कोई काला भयंकर नाग महुअर का सुरीला राग सुनकर
मस्त हो गया हो। उसी सच्चे सूरमा की कुली-मर्यादा आज संकट में है। क्या तुलिया उस
मार्यादा को लुटने देगी और कुछ न करेगी? नहीं-नहीं! अगर
बंसीसिंह ने उसके सत् को अपने प्राणों से प्रिय समझा तो वह भी उसकी आबरू को अपने
धर्म से बचायेगी।
उसने ठकुराइन को तसल्ली देते हुए
कहा—अभी तुम कहीं
मत जाओ बहिन पहले मुझे अपनी शक्ति आजमा लेने दो। मेरी आबरू चली भी गयी तो कौन
हंसेगा। तुम्हारी आबरू के पीछे तो एक कुल की आबरू है।
ठकुराइन ने मुस्कराकर उसको देखा।
बोली—तू यह कला
क्या जाने तुलिया?
‘कौन-सी कला?’
‘यही मर्दों को उल्लू बनाने की।’
‘मैं नारी हूं?’
‘लेकिन पुरुषों का चरित्र तो नहीं जानती?’
‘यह तो हम-तुम दोनों मां के पेट से सीखकर आयी हैं।’
‘कुछ बता तो क्या करेगी?’
‘वही जो तुम करने जा रही हो। तुम परगने के हाकिम पर
अपना जादू डालना चाहती हो, मैं तुम्हारे देवर पर ज़ाला
फेंकूगी।’
‘बड़ा घाघ है तुलिया।’
‘यही तो देखना है।’
३
तुलिया ने
बाकी रात कार्यक्रम और उसका विधान सोचने में काटी। कुशल सुनापति की भांति उसने
धावे और मार-काट की एक योजना-सी मन में बना ली। उसे अपनी विजय का विश्वास था।
शुत्रु निश्शंक था, इस धावे की उसे जरा भी खबर न थी।
बंसीसिंह का छोटा भाई गिरधर कंधे
पर छ: फीट का मोटा लट्ठ रखे अकड़ता चला आता था कि तुलिया ने पुकारा—ठाकुर,
तनिक यह घास का गट्ठा उठाकर मेरे सिर पर रख दो। मुझसे नहीं उठता।
दोपहर हो गया था। मजदूर खेतों में
लौटकर आ चुके थे। बगूले उठने लगे थे। तुलिया एक पेड़ के नीचे घास का गट्ठा रखे
खड़ी थी। उसके माथे से पसीने की धार बह रही थी।
ठाकुन ने
चौंककर तुलिया की ओर देखां उसी वक्त तुलिया का अंचल खिसक गया और नीचे की लाल चोली
झलक पड़ी। उसने झट अंचल सम्हाल लिया, पर उतावली में जूड़े में गुंथी हुई फूलों की बेनी बिजली की तरह आंखें में
कौंद गयी। गिरधर का मन चंचली हो उठा। आंखों में हल्का-सा नशा पैदा हुआ और चेहरे पर
हल्की-सी सुर्खी और हल्की-सी मुस्कराहट। नस-नस में संगीत-सा गूंज उठा।
उसने तुलिया को हजारों बार देखा
था, प्यासी आंखों, ललचायी आंखों से, मगर तुलिया अपने रूप और सत् के
घमण्ड में उसकी तरह कभी आंखें तक न उठाती थी। उसकी मुद्रा और ढंग में कुछ ऐसी
रुखाई, कुछ ऐसी निठुरता होती थी कि ठाकुर के सारे हौसले पस्त
हो जाते थे, सारा शौक ठण्डा पड़ जाता था। आकाश में उड़ने
वाले पंछी पर उसके जाल और दाने का क्या असर हो सकता था? मगर
आज वह पंछी सामने वाली डाली पर आ बैठा था और ऐसा जान पड़ता था कि भूखा है। फिर वह
क्यों न दाना और जाल लेकर दौड़े।
उसने मस्त होकर कहा—मैं पहुंचाये देता हूं तुलिया, तू क्यों सिर पर उठायेगी।
‘और कोई देख ले तो यही कहे कि ठाकुर को क्या हो गया
है?’
‘मुझे कुत्तों के भूंकने की परवा नहीं है।’
‘लेकिन मुझे तो है।’
ठाकुर ने न माना। गट्ठा सिर पर
उठा लिया और इस तरह आकाश में पांव रखता चला मानो तीनों लोक का खजाना लूटे लिये
जाता है।
४
एक महिना
गुजर गया। तुलिया ने ठाकुर पर मोहिनी डाल दी थी और अब उसे मछली की तरह खेला रही
थी। कभी बंसी ढीली कर देती, कभी कड़ी। ठाकुर शिकार करने चला था, खुद जाल में
फंस गया। अपना ईसान और धर्म और प्रतिष्ठा सब कुछ होम करके वह देवी का वरदान न पा
सकता था। तुलिया आज भी उससे उनती ही दूर थी जितनी पहले।
एक दिन वह तुलिया से बोला—इस तरह कब तक जलायेगी तुलिया? चल कहीं भाग चलें।
तुलिया ने
फंदे को और कसा—हां, और क्या। जब तुम मुंह फेर लो तो कहीं की न रहूं। दीन से भी जाऊं, दुनिया से भी!
ठाकुर ने शिकायत के स्वर में कहा—अब भी तुझे मुझ पर विश्वास
नहीं आता?
‘भौंरे फूल का रस लेकर उड़ जाते हैं।’
‘और पतंगे जलकर राख नहीं हो जाते?’
‘पतियाऊं कैसे?’
‘मैंपे तेरा कोई हुक्म टाला है?’
‘तुम समझते होगे कि तुलिया को एक रंगीन साड़ी और
दो-एक छोटे-मोटे गहने देकर फंसा लूंगा। मैं ऐसी भोली नहीं हूं।’
तुलिया ने ठाकुर के दिल की बात
भांप ली थी। ठाकुर हैरत में आकर उसका मुंह ताकने लगा।
तुलिया ने फिर कहा—आदमी अपना घर छोड़ता है तो
पहले कहीं बैठने का ठिकाना कर लेता है।
ठाकुर प्रसन्न होकर बोला—तो तू चलकर मेरे घर में मालकिन
बनकर रह। मैं तुझसे कितनी बार कह चुका।
तुलिया आंखें मटकाकर बोली—आज मालकिन बनकर रहूं कल लौंडी बनकर
भी न रहने पाऊं, क्यों?
‘तो जिस तरह तेरा मन भरे वह कर। मैं तो तेरा गुलाम
हूं।’
‘बचन देते हो?’
‘हां, देता हूं। एक बार नहीं, सौ बार, हजार बार।’
‘फिर तो न जाओगे?’
‘वचन देकर फिर जाना नामर्दों का काम है।’
‘तो अपनी आधी जमीन-जायदाद मेरे नाम लिख दो।’
ठाकुर अपने घर की एक कोठरी, दस-पांच बीघे खेत, गहने-कपड़े तो उसके चरणों पर चढ़ा देने को तैयार था, लेकिन आधी जायदाद उसके नाम लिख देने का साहस उसमें न था। कल को तुलिया
उससे किसी बात पर नाराज हो जाय, तो उसे आधी जायदाद से हाथ
धोना पड़े। ऐसी औरत का क्या एतबार! उसे गुमान तक न था कि तुलिया उसके प्रेम की
इतनी कड़ी परीक्षा लेगी। उसे तुलिया पर क्रोध आया। यह चमार की बिटिया जरा सुन्दर
क्या हो गयी है कि समझती है, मैं अप्सरा हूं। उसी मुहब्बत
केवल उसके रूप का मोह थी। वह मुहब्बत, जो अपने को मिटा देती
है और मिट जाना ही अपने जीवन की सफलता समझती है, उसमें न थी।
उसने माथे पर बल लाकर कहा—मैं न जानता था, तुझे मेरी जमीन-जायदा से प्रेम है तुलिया, मुझसे
नहीं!
तुलिया ने छूटते ही जवाब दिया—तो क्या मैं न जानती थी कि
तुम्हें मेरे रूप और जवानी ही से प्रेम है, मुझसे नहीं?
‘तू प्रेम को बाजार का सौदा समझती है?’
‘हां, समझती हूं। तुम्हारे
लिए प्रेम चार दिन की चांदनी होगी, मेरे लिए तो अंधेरा पाख
हो जायगा। मैं जब अपना सब कुछ तुम्हें दे रही हूं तो उसके बदले में सब कुछ लेना भी
चाहती हूं। तुम्हें अगर मुझसे प्रेम होता तो
तुम आधी क्या पूरी जायदाद मेरे नाम लिख देते। मैं जायदाद क्या सिर पर उठा
ले जाऊंगी? लेकिन तुम्हारी नीयत मालू हो गयी। अच्छा ही हुआ।
भगवान न करे कि ऐसा कोई समय आवे, लेकिन दिन किसी के बराबर
नहीं जाते, अगर ऐसा कोई समय आया कि तुमको मेरे सामने हाथ
पसारना पड़ा तो तुलिया दिखा देगी कि औरत का दिल कितना उदार हो सकता है।’
तुलिया झल्लायी हुई वहां से चली
गयी, पर निराश न
थी, न बेदिल। जो कुछ हुआ वह उसके सोचे हुए विधान का एक अंग
था। इसके आगे क्या होने वाला है इसके बारे में भी उसे कोई सन्देह न था।
५
ठाकुर ने
जायदाद तो बचा ली थी, पर बड़े मंहगे दामो। उसके दिल का इत्मीनान गायब हो गया था। जिन्दगी में
जैसे कुछ रह ही न गया हो। जायदाद आंखों के समाने थी, तुलिया
दिल के अन्दर। तुलिया जब रोज समाने आकर अपनी तिर्छी चितवनों से उसके हृदय में बाण
चलाती थी, तब वह ठोस सत्य थी। अब जो तुलिया उसके हृदय में
बैठी हुई थी, वह स्वप्न थी जो सत्य से कहीं ज्यादा मादक है, विदरक है।
कभी-कभी तुलिया स्वप्न की एक
झलक-सी नजर आ जाती, और स्वप्न ही की भांति विलीन भी हो जाती। गिरधर उससे अपने दिल का दर्द
कहने का अवसर ढूंढ़ता रहता लेकिन तुलिया उसके साये से भी परहेज करती। गिरधर को अब
अनुभव हो रहा था कि उसके जीवन को सूखी बनाने के लिए उसकी जायदाद जितनी जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी तुलिया है। उसे अब अपनी कृपणता पर क्रोध आता।
जायदाद क्या तुलिया के नाम रही, क्या उसके नाम। इस जरा-सी
बात में क्या रक्खा है। तुलिया तो इसलिए अपने नाम लिखा रही थी कि कहीं मैं उसके
साथ बेवफाई कर जाऊं तो वह अनाथ न हो जाय। जब मैं उसका बिना कौड़ी का गुलाम हूं तो
बेवफाई कैसी? मैं उसके साथ बेवफाई करूंगा, जिसकी एक निगाह के लिए, एक शब्द के लिए तरसता रहता
हूं। कहीं उससे एक बार एकान्त में भेंट हो जाती तो उससे कह देता—तूला, मेरे पास जो कुछ है, वह
सब तुम्हारा है। कहो बखशिशनामा लिख हूं, कहो बयनामा लिख दूं।
मुझसे जो अपराध हुआ उसके लिए नादिम हूं। जायदाद से मनुष्य को जो एक संस्कार-गत
प्रेम है, उसी ने मेरे मुंह से वह शब्द निकलवाये। यही रिवाजी
लोभ मेरे और तुम्हारे बीच में आकर खड़ा हो गया। पर अब मैंने जाना कि दुनिया
में वही चीज सबसे कीमती है जिससे जीवन में
आनन्द और अनुराग पैदा हो। अगर दरिद्रता और वैराग्य में आनन्द मिले तो वही सबसे
प्रिय वस्तु है, जिस पर आदमी जमीन और मिल्कियत सब कुछ होम कर
देगा। आज भी लाखों माई के लाल हैं, जो संसार के सुखों पर लात
मारकर जंगलों और पहाड़ों की सैर करने में मस्त हैं। और उस वक्त मैं इतनी मोटी-सी
बात न समझा। हाय रे दुर्भाग्य!
६
एक दिन
ठाकुर के पास तुलिया ने पैगाम भेजा—मैं बीमार हूं, आकर देख जाव,
कौन जाने बचूं कि न बचूं।
इधर कई दिन से ठाकुर ने तुलिया को
न देखा था। कई बार उसके द्वार के चक्कर भी लगाए, पर वह न दीख पड़ी। अब जो यह संदेशा मिला तो वह
जैसे पहाड़ से नीचे गिर पड़ा। रात के दस बजे होंगे। पूरी बात भी न सुनी और दौड़ा।
छाती धड़क रही थी और सिर उड़ा जाता था, तुलिया बीमार है!
क्या होगा भगवान्! तुम मुझे क्यों नहीं बीमार कर देते? मैं
तो उसके बदले मरने को भी तैयार हूं। दोनों ओर के काले-काले वृक्ष मौत के दूतों की
तरह दौड़े चले आते थे। रह-रहकर उसके प्राणों से एक ध्वनि निकलती थी, हसरत और दर्द में डूबी हुई—तुलिया बीमार है!
उसकी तुलिया ने उसे बुलाया है। उस
कृतघ्नी, अधम, नीच, हत्यारे को बुलाया है कि आकर मुझे देख जाओ, कौन जाने बचूं कि न बचूं। तू अगर न बचेगी तुलिया तो मैं भी न बचूंगा, हाय, न बचूंगा!! दीवार से सिर फोड़कर मर जाऊंगा।
फिर मेरी और तेरी चिता एक साथ बनेगी, दोनों के जनाजे एक साथ
निकलेंगे।
उसने कदम और तेज किए। आज वह अपना
सब कुछ तुलिया के कदमों पर रख देगा। तुलिया उसे बेवफा समझती है। आज वह दिखाएगा, वफा किसे कहते हैं। जीवन में
अगर उसने वफा न की तो मरने के बाद करेगा। इस चार दिन की जिन्दगी में जो कुछ न कर
सका वह अनन्त युगों तक करता रहेगा। उसका प्रेम कहानी बनकर घर-घर फैल जाएगा।
मन में शंका हुई, तुम अपने प्राणों का मोह छोड़
सकोगे? उसने जोर से छाती पीटी ओर चिल्ला उठा—प्राणों का मोह किसके लिए? और प्राण भी तो वही है, जो बीमार है। देखूं मौत कैसे प्राण ले जाती है, और
देह को छोड़ देती है।
उसने धड़कते हुए दिल और थरथराते
हुए पांवों से तुलिया के घर में कदम रक्खा। तुलिया अपनी खाट पर एक चादर ओढ़े सिमटी
पड़ी थी, और
लालटेन के अन्धे प्रकाश में उसका पीला मुख मानो मौत की गोद में विश्राम कर रहा था।
उसने उसके चरणों पर सिर रख दिया
और आंसुओं में डूबी हुई आवाज से बोला—तूला, यह अभाग तुम्हारे चरणों पर पड़ा हुआ है। क्या
आंखें न खोलेगी?
तुलिया ने आंखें खोल दीं और उसकी
ओर करुण दृष्टि डालकर कराहती हुई बोली—तुम हो गिरधर सिंह, तुम आ गए?
अब मैं आराम से मरूंगी। तुम्हें एक बार देखने के लिए जी बहुत बेचैन था। मेरा
कहा-सुना माफ कर देना और मेरे लिए रोना मत। इस मिट्टी की देह में क्या रक्खा है
गिरधर! वह तो मिट्टी में मिल जाएगी। लेकिन मैं कभी तुम्हारा साथ न छोडूंगी। परछाईं
की तरह नित्य तुम्हारे साथ रहूंगी। तुम मुझे देख न सकोगे,
मेरी बातें सुन न सकोगे, लेकिन तुलिया आठों पहर सोते-जागते
तुम्हारे साथ रहेगी। मेरे लिए अपने को बदनाम मत करना गिरधर! कभी किसी के सामने
मेरा नाम जबान पर न लाना। हां, एक बार मेरी चिता पर पानी के
छींटे मार देना। इससे मेरे हृदय की ज्वाला शान्त हो जायगी।
गिरघर
फूट-फूटकर रो रहा था। हाथ में कटार होती तो इस वक्त जिगर में मार लेता और उसके
सामने तड़पकर मर जाता।
जरा दम लेकर तुलिया ने फिर कहा—मैं बचूंगी नहीं गिरधर, तुमसे एक बिनती करती हूं, मानोगी?
गिरधर ने छाती ठोककर कहा—मेरी लाश भी तेरे साथ ही
निकलेगी तुलिया। अब जीकर क्या करूंगा और जिऊं भी तो कैसे? तू
मेरा प्राण हे तुलिया।
उसे ऐसा मालूम हुआ तुलिया
मुस्कराई।
‘नहीं-नहीं, ऐसी नादानी मत
करना। तुम्हारे बाल-बच्चे हैं, उनका पालन करना। अगर तुम्हें
मुझसे सच्चा प्रेम है, तो ऐसा कोई काम मत करना जिससे किसी को इस प्रेम की गन्ध भी मिले। अपनी
तुलिया को मरने के पीछे बदनाम मत करना।
गिरधर ने रोकर कहा—जैसी तेरी इच्छा।
‘मेरी तुमसे एक बिनती है।’
‘अब तो जिऊंगी ही इसीलिए कि तेरा हुक्म पूरा करूं, यही मेरे जीवन का ध्येय होगा।’
‘मेरी यही विनती है कि अपनी भाभी को उसी
मान-मार्यादा के साथ रखना जैसे वह बंसीसिंह के सामने रहती थी। उसका आधा उसको दे
देना।
‘लेकिन भाभी तो तीन महीने से अपने मैके में है, और कह गई है कि अब कभी न आऊंगी।’
‘यह तुमने बुरा किया है गिरधर, बहुत बुरा किया है। अब मेरी समझ में आया कि क्यों मुझे बुर-बुरे सपने आ
रहे थे। अगर चाहते हो कि मैं अच्छी हो जाऊं, तो जितनी जल्दी
हो सके, लिखा-पढ़ी करके कागज-पत्तर मेरे पास रख दो। तुम्हारी
यह बददियानती ही मेरी जान का गाहक हो रही है। अब मुझे मालूम हुआ कि बंसीसिंह क्यों
मुझे बार-बार सपना देते थे। मुझे और कोई रोग नहीं है। बंसीसिंह ही मुझे सता रहे
हैं। बस, अभी जाओ। देर की तो मुझे जीता न पाओगे। तुम्हारी
बेइन्साफी का दंड बंसीसिंह मुझे दे रहे हैं।’
गिरधर ने दबी जबान से कहा—लेकिन रात को कैसे लिखा-पढ़ी
होगी तूली। स्टाम्प कहां मिलेगा? लिखेगा कौन? गवाह कहां हैं?
‘कल सांझ तक भी तुमने लिखा-पढ़ी कर ली तो मेरी जान
बच जाएगी, गिरधर। मुझे बंसीसिंह लगे हुए हैं, वही मुझे सता रहे हैं, इसीलिए कि वह जानते हैं
तुम्हें मुझसे प्रेम है। मैं तुम्हारे ही प्रेम के कारन मारी जा रही हूं। अगर
तुमने देर की तो तुलिया को जीता न पाओगे।’
‘मैं अभी जाता हूं तुलिया। तेरा हुक्म सिर और आंखों
पर। अगर तूने पहले ही यह बात मुझसे कह दी होती तो क्यों यह हालत होती? लेकिन कहीं ऐसा न हो, मैं तुझे देख न सकूं और मन की
लालसा मन में ही रह जाय।’
‘नहीं-नहीं, मैं कल सांझ तक
नहीं मरूंगी, विश्वास रक्खो।’
गिरधर उसी छन वहां से निकला और
रातों-रात पच्चीस कोस की मंजिल काट दी। दिन निकलते-निकलते सदर पहुंचा, वकीलों से सलाह-मशविरा किया, स्टाम्प लिया, भावज के नाम आधी जायदाद लिखी, रजिस्ट्री कराई, और चिराग जलते-जलते हैरान-परीशान, थका-मांदा, बेदाना-पानी, आशा
और दुराशा से कांपता हुआ आकर तुलिया के सामने खड़ा हो गया। रात के दस बज गए थे। उस
ववत न रेलें थीं, न लारियां, बेचारे को
पचास कोस की कठिन यात्रा करनी पड़ी। ऐसा थक गया था कि एक-एक पग पहाड़ मालूम होता
था। पर भय था कि कहीं देर तो अनर्थ हो जाएगा।
तुलिया ने प्रसन्न मन से पूछा—तुम आ गए गिरधर? काम कर आए?
गिरधर ने कागज उसके सामने रख दिया
और बोला—हां तूला, कर आया, मगर अब भी तुम अच्छी न हुई तो तुम्हारे साथ
मेरी जान भी जायगी। दुनिया चाहे हंसे, चाहे रोये, मुझे परवाह नहीं है। कसम ले लो, जो एक घूंट पानी भी
पिया हो।
तुलिया उठ बैठी और कागज को अपने
सिरहाने रखकर बोली—अब मैं बहुत अच्छी हूं। सबेरे तक बिलकुल अच्छी हो जाऊंगीं तुमने मेरे साथ
जो नेकी की है, वह मरते दम तक न भूलूंगी। लेकिन अभी-अभी मुझे
जरा नींद आ गई थी। मैंने सपना देखा कि बंसीसिंह मेरे सिरहाने खड़े हैं और मुझसे कह
रहे हैं, तुलिया, तू ब्याहता है, तेरा आदमी हजार कोस पर बैठा तेरे नाम की माला जप रहा है। चाहता तो दूसरी
कर लेता, लेकिन तेरे नाम पर बैठा हुआ है और जन्म-भर बैठा
रहेगा। अगर तूने उससे दगा की तो मैं तेरा
दुश्मन हो जाऊंगा, और फिर जान लेकर ही छोडूंगा। अपना भला
चाहती है तो अपने सत् पर रह। तूने उससे कपट किया, उसी दिन
मैं तेरी सांसत कर डालूंगा। बस, यह कहकर वह लाल-लाल आंखों से
मुझे तरेरते हुए चले गए।
गिरधर ने एक
छन तुलिया के चेहरे की तरफ देखा, जिस पर इस समय एक दैवी तेज विराज रहा था, एकाएक
जैसे उसकी आंखों के सामने से पर्दा हट गया और सारी साजिश समझ में आ गई। उसने सच्ची
श्रद्धा से तुलिया के चरणों को चूमा और बोला—समझ गया तुलिया, तू देवी है।
पैपुजी
सिद्धान्त
का सबसे बड़ा दुश्मन है मुरौवत। कठिनाइयों, बाघओं, प्रलोभनों का सामना आप कर सकते हैं दृढ़
संकल्प और आत्मबल से। लेकिन एक दिली दोस्त से बेमुरौबती तो नहीं की जाती, सिद्धन्त रहे या जाय। कई साल पहले मैंने जनेऊ हाथ में लेकर प्रतिज्ञा की
थी कि अब कभी किसी की बरात में न जाऊंगा, चाहे इधर की दुनिया
उधर हो जाय। ऐसी विकट प्रतिज्ञा करने की जरूरत क्यों पड़ी,
इसकी कथा लंबी है और आज भी उसे याद करके मेरी प्रतिज्ञा को जीवन मिल जाता है। बरात
थी कायस्थों की। समधी थे मेरे पुराने मित्र। बरातियों में अधिकांश जान-पहचान के
लोग थे। देहात में जाना था। मैंने सोचा, चलो दो-तीन दिन
देहात की सैर रहेगी, चल पड़ा। लेकिन मुझे यह देखकर हैरत हुई
कि बरातियों की वहां जाकर बुद्धि ही कुछ भ्रष्ट हो गई है। बात-बात पर झगड़ा-तकरार।
सभी कन्यापक्षवालों से मानो लड़ने को तैयार। यह चीज नहीं आई,
वह चीज नहीं भेजी, यह आदमी है या जानवर, पानी बिना बरफ के कौन पियेगा। गधे ने बरफ भेजी भी तो दस सेर। पूछो दस सेर
बरफ लेकिर आंखों में लगायें या किसी देवता को चढ़ाएं! अजबचिल्ल-पों मची हुई थी।
कोई किसी की न सुनता था। समधी साहब सिर पीट रहे थे कि यहां उनके मित्रों की जितनी दुर्गति हुई, उसका उन्हें उम्र-भर खेद रहेगा। वह क्या जानते थे कि लड़कीवाले इतने
गंवार हैं। गंवार क्यों, मतलबी कहिए। कहने को शिक्षित हैं, सभ्य हैं, भद्र हैं, धन भी
भगवान् की दया से कम नहीं, मगर दिल के इतने छोटे। दस सेर बरफ
भेजते हैं! सिगरेट की एक डिबिया भी नहीं। फंस गया और क्या।
मैंने उनसे बिना सहानुभूति दिखाये
कहा—सिगरेट नहीं
भेजे तो कौन-सा बड़ा अनर्थ हो गया, खमीरा तम्बाकू तो दस सेर
भेज दिया है, पीती क्यों नहीं घोल-घोल कर।
मेरे समधी मित्र ने विस्मय-भरी
आंखों से मुझे मानो उन्हें कानों पर विश्वास न हो। ऐसी अनीति!
बोले—आप भी अजीब आदमी हैं, खमीरा यहां कौन पीता है। मुद्दत हुई लोगों ने गुड़गुड़ियां और फर्शियां
गुदड़ी बाजार में बेच डालीं। थोड़े-से दकियानूसी अब भी हुक्का गुड़गुड़ाते हैं
लेकिन बहुत कम। यहां तो ईश्वर की कृपा से सभी नई रोशनी, नये
विचार, नये जमाने के लोग हैं और कन्यावाले यह बात जानते हैं, फिर भी गिगरेट नहीं भेजी, यहां कई सज्जन आठ-दस
डिबियां रोज पी जाते हैं। एक साहब तो बारह तक पहुंच जाते हैं। और चार-पांच डिबियां
तो आम बात है। इतने आदमियों के बीच में पांच सौ डिबियां भी न हों तो क्या हो। और
बरफ देखी आपने, जेसे दवा के लिए भेजी है। यहां इतनी बरफ
घर-घर आती है। मैं तो अकेला ही दस सेर पी जाता हूं। देहातियों को कभी हगल न आएगी, पढ़लिख कितने ही जाए।
मैंने कहा—तो आपको अपने साथ एक गाड़ी
सिगरेट और टन-भर बरफ लेते आना चाहिए था।
वह स्तम्भित हो गए—आप भंग तो नहीं खा गए?
--जी नहीं, कभी उम्र-भर नहीं खाई।
--तो फिर ऐसी ऊल-जलूल बातें क्यों
करते हो?
--मैं तो सम्पूर्णत: अपने होश में
हूं।
--होश में रहने वाला आदमी ऐसी बात
नहीं कर सकता। हम यहां लड़का ब्याहने आए हैं, लड़कीवालों को हमारी सारी फरमाइशें पूरी करनी पड़ेंगी, सारी। हम जो कुद मांगेंगे उन्हें देना पड़ेगा,
रो-रोकर देना पड़ेगा, दिल्लगी नहीं है। नाकों चने न चबवा दें
तो कहिएगा। यह हमारा खुला हुआ अपमान है। द्वार पर बुलाकर जलील करना। मेरे साथ जो
लोग आए हैं वे नाई-कहार नहीं हैं, बड़े-बड़े आदमी हैं। मैं
उनकी तौहीन नहीं देख सकता। अगर इन लोगों की यह जिद है तो बरात लौट जाएगी।
मैंने देखा यह इस वक्त ताव में
हैं, इनसे बहस
करना उचित नहीं। आज जीवन में पहली बार, केवल दो दिन के लिए, इन्हें एक आदमी पर अधिकार मिल गया है। उसकी गर्दन इनके पांव के नीचे है।
फिर उन्हें क्यों न नशा हो जाय क्यों न सिर फिर जाय, क्यों न
उस दिल खोलकर रोब जमाएं। वरपक्षवाले कन्यापक्षवालों पर मुद्दतों से हुकूमत करते
चले आए हैं, और उस अधिकार को त्याग देना आसान नहीं। इन लोगों
के दिमाग में इस वक्त यह बात कैसे आएगी कि तुम कन्यपक्षवालों के मेहमान हो और वे तुम्हें
जिस तरह रखना चाहें तुम्हें रहना पड़ेगा। मेहमान को जो आदर-सत्कार, चूनी-चोकर, रूखा-सूखा मिले,
उस पर उसे सन्तुष्ट होना चाहिए, शिष्टता यह कभी गवारा नहीं
कर सकती कि वह जिनका मेहमान है, उनसे अपनी खातिरदारी का
टैक्स वसूल करे। मैंने वहां से टल जाना ही मुनासिब समझा।
लेकिन जब विवाह का मुर्हूत आया, इधर से एक दर्जन व्हिस्की की
बोतलों की फरमाइश हुई और कहा गया कि जब तक बोतलें न आ जाएगी हम विवाह-संस्कार के
लिए मंडप में न जाएंगे। तब मुझसे न देखा गया। मैंने समझ लिया कि ये सब एशु हैं, इंसानियत से खाली। इनके साथ एक क्षण रहना भी अपनी आत्मा का खून करना है।
मैंने उसी वक्त प्रतिज्ञा की कि अब कभी किसी बरात में न जाऊंगा और अपना
बोरिया-बकचा लेकर उसी क्षण वहां से चल दिया।
इसलिए जब गत मंगलवार को मेरे परम
मित्र सुरेश बाबू ने मुझ अपने लडके के विवाह का निमन्त्रण दिया तो मैंने सुरेश
बाबू को दोनों हाथों से पकड़कर कहा—जी नहीं, मुझे कीजिए, मैं न
जाऊंगा।
उन्होंने खिन्न होकर कहा—आखिर क्यों?
‘मैंने प्रतिज्ञा कर ली है अब किसी बरात में न
जाऊंगा।’
‘अपने बेटे की बरात में भी नहीं?’
‘बेटे की बरात में खुद अपना स्वामी रहूंगा।’
‘तो समझ लीजिए यह आप ही का पुत्र है और आप यहाँ
अपने स्वामी हैं।’
मैं निरुतर हो गया। फिर भी मैंने
अपना पक्ष न छोड़ा।
‘आप लोग वहां कन्यापक्षवालों से सिगरेट बर्फ, तेल, शराब आदि-आदि चीजों के लिए आग्रह तो न करेंगे?’
‘भूलकर भी नहीं, इस विषय में
मेरे विचार वहीं हैं जो आपके।’
‘ऐसा तो न होगा कि मेरे जैसे विचार रखते हुए भी आप
वहीं दुराग्रहियों की बातों में आ जाएं और वे अपने हथकन्डे शुरू कर दें?’
‘मैं आप ही को अपना प्रतिनिधि बनाता हूं। आपके
फैसले की वहां कहीं अपील न होगीं।’
दिल में तो मेरे अब भी कुछ संशय
था, लेकिन इतना
आश्वासन मिलने पर और ज्यादा अड़ना असज्जनता थी। आखिर मेरे वहां जाने से यह बेचारे
तर तो नहीं जाएंगे। केवल मुझसे स्नेह रखने के कारण ही तो सब कुछ मेरे हाथों में
सौंप रहे हैं। मैंने चलने का वादा कर लिया। लेकिन जब सुरश बाबू विदा होने लगे तो
मैंने घड़े को जरा और ठोका—
‘लेन-देन का तो कोई झगड़ा नहीं है?’
‘नाम को नहीं। वे लोग अपनी खुशी से जो कुछ देंगे, वह हम ले लेंगे। मांगने न मांगने का अधिकार तो आपको रहेगा।’
‘अच्छी
बात है, मैं चलूंगा।’
शुक्रवार को बरात चली। केवल रेल
का सफर था और वह भी पचास मील का। तीसरे पहरके एक्सप्रेस से चले और शाम को कन्या के
द्वार पर पहुंच गए। वहां हर तरह का सामान
मौजूद था। किसी चीज के मांगने की जरुरत न थी। बरातियों की इतनी खातिरदारी भी हो
सकती है, इसकी
मुझे कल्पना भी न थी। घराती इतने विनीत हो सकते हैं, कोई बात मुंह से निकली नहीं कि एक की जगह चार आदमी
हाथ बांधे हाजिर!
लगन का मुहूर्त आया। हम सभी मंडप
में पहुंचे। वहां तिल रखने की जगह भी न थी। किसी तरह धंस-धंसाकर अपने लिए जगह
निकाली। सुरेश बाबू मेरे पीछे खड़े थे। बैठने को वहां जगह न थी।
कन्या-दान संस्कार शुरु हुआ।
कन्या का पिता, एक
पीताम्बर पहने आकर वर के सामने बैठ गया और
उसके चरणों को धोकर उन पर अक्षत, फूल आदि चढ़ाने लगा। मैं अब
तक सैकड़ों बरातों में जा चुका था, लेकिन विवाह-संस्कार
देखने का मुझे कभी अवसर न मिला था। इस समय वर के सगे-संबंधी ही जाते हैं। अन्य
बराती जनवासे में पड़े सोते हैं। या नाच
देखते हैं, या ग्रामाफोन के रिकार्ड सुनते हैं। और कुछ न हुआ
तो कई टोलियों में ताश खेलते हैं। अपने विवाह की मुझे याद नहीं। इस वक्त कन्या के
वृद्ध पिता को एक युवक के चरणों की पूजा करते देखकर मेरी आत्मा को चोट लगी। यह
हिन्दू विवाह का आदर्श है या उसका परिहास?
जामाता एक प्रकार से अपना पुत्र है, उसका धर्म
है कि अपने धर्मपिता के चरण धोये, उस पर पान-फूल चढ़ाये। यह
तो नीति-संगत मालूम होता है। कन्या का पिता वर के पांव पूजे यह तो न शिष्टता है,
न धर्म, न
मर्यादा। मेरी विद्रोही आत्मा किसी तरह शांत न रह सकी। मैंने झल्लाए हुए
स्वर में कहा-यह क्या अनर्थ हो रहा है, भाइयो! कन्या के पिता
का यह अपमान! क्या आप लोगों में आदमियत रही ही नहीं?
मंडप में सन्नाटा छा गया। मैं सभी
आंखों का केन्द्र बन गया। मेरा क्या आशाय है,
यह किसी की समझ में न आया।
आखिर सुरेश बाबू ने पूछा-कैसा
अपमान और किसका अपमान? यहां तो किसी का अपमान नहीं हो रहा है।
‘कन्या का पिता वर के पांव पूजे, यह अपमान नहीं तो क्या है?’
‘यह
अपमान नहीं, भाई
साहब, प्राचीन प्रथा है।’
कन्या के
पिता महोदय बोले-यह मेरा अपमान नहीं है मान्यवर, मेरा अहोभाग्य कि आज का यह शुभ अवसर आया। आप इतने
ही से घबरा गये। अभी तो कम से कम एक सौ आदमी पैपुजी के इन्तजार में बैठे हुए हैं।
कितने ही तरसते हैं कि कन्या होती तोवर के पांव पूजकर अपना जन्म सफल करते।
मैं लाजवाब हो गया। समधी साहब
पांव पूज चुके तो त्रियों और पुरुषों का
एक समूह वर की तरफ उमड़ पड़ा। और प्रत्येक प्राणी
लगा उसके पांव पूजने जो आता था, अपनी हैसियत के अनुसार कुछ न कुछ
चढ़ा जाता था। सब लोग प्रसन्नचित्त और गदगद नेत्रों से यह नाटक देख रहे थे और मैं
मन में सोच रहा था-जब समाज में औचित्य ज्ञान का इतना लोप हो गया है और लोग अपने
अपमान को अपना सम्मान समझते हैं तो फिर क्यों न त्रियों की समाज में दुर्दशा हो,
क्यों न वे अपने को पुरुष के पांव की जूती समझें, क्यों न उनके आत्मसम्मान का सर्वनाश हो जाय!
जब विवाह-संस्कार समाप्त हो गया
और वर-वधू मंडप से निकले तो मैंने जल्दी से आगे बढ़कर उसी थाल से थोड़े-से फूल चुन
लिए और एक अर्द्ध-चेतना की दशा में,
न जाने किन भावों से प्रेरित होकर, उन फूलों
को वधू के चरणों पर रख दिया, और उसी वक्त वहां से घर चल
दिया।
समाप्त

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