मुंशी प्रेमचंद यांच्या हिंदी कथा - भाग चार : Fiction By Munshi Premchand - Part IV
प्रेमचंद
कथा - क्रम १) सभ्यता का रहस्य २) समस्या ३) दो सखियां
सभ्यता का रहस्य
योंतो मेरी समझ में दुनिया की एक
हजार एक बातें नहीं आती—जैसे लोग प्रात:काल उठते
ही बालों पर छुरा क्यों चलाते हैं ?
क्या अब
पुरुषों में भी इतनी नजाकत आ गयी है कि बालों का बोझ उनसे नहीं सँभलता ? एक साथ ही सभी पढ़े-लिखे
आदमियों की आँखें क्यों इतनी कमजोर हो गयी है ?
दिमाग की कमजोरी ही इसका कारण है या और कुछ? लोग खिताबों के पीछे क्यों
इतने हैरान होते हैं ?
इत्यादि—लेकिन इस समय मुझे इन
बातों से मतलब नहीं। मेरे मन में एक नया प्रश्न उठ रहा है और उसका जवाब मुझे कोई नहीं
देता। प्रश्न यह है कि सभ्य कौन है और असभ्य कौन ? सभ्यता
के लक्षण क्या हैं ?
सरसरी नजर
से देखिए,
तो इससे
ज्यादा आसान और कोई सवाल ही न होगा। बच्चा-बच्चा इसका समाधान कर सकता है। लेकिन जरा
गौर से देखिए,
तो प्रश्न
इतना आसान नहीं जान पड़ता। अगर कोट-पतलून पहनना, टाई-हैट
कालर लगाना,
मेज पर बैठकर
खाना खाना,
दिन में
तेरह बार कोको या चाय पीना और सिगार पीते हुए चलना सभ्यता है, तो उन गोरों को भी सभ्य
कहना पड़ेगा,
जो सड़क
पर बैठकर शाम को कभी-कभी टहलते नजर आते हैं; शराब
के नशे से आँखें सुर्ख,
पैर लड़खड़ाते
हुए, रास्ता चलनेवालों को अनायास
छेड़ने की धुन ! क्या उन गोरों को सभ्य कहा जा सकता है ? कभी नहीं। तो यह सिद्ध
हुआ कि सभ्यता कोई और ही चीज है,
उसका देह
से इतना सम्बन्ध नहीं है जितना मन से।
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मेरे इने-गिने मित्रों में एक राय
रतनकिशोर भी हैं। आप बहुत ही सहृदय,
बहुत ही
उदार, बहुत शिक्षित और एक बड़े
ओहदेदार हैं। बहुत अच्छा वेतन पाने पर भी उनकी आमदनी खर्च के लिए काफी नहीं होती। एक
चौथाई वेतन तो बँगले ही की भेंट हो जाती है। इसलिए आप बहुधा चिंतित रहते हैं। रिश्वत
तो नहीं लेते—कम-से-कम मैं नहीं जानता, हालाँकि कहने वाले कहते
हैं—लेकिन इतना जानता हूँ
कि वह भत्ता बढ़ाने के लिए दौरे पर बहुत रहते हैं, यहाँ
तक कि इसके लिए हर साल बजट की किसी दूसरे मद
से रुपये निकालने पड़ते हैं। उनके अफसर कहते हैं, इतने
दौरे क्यों करते हो,
तो जवाब
देते हैं,
इस जिले
का काम ही ऐसा है कि जब तक खूब दौरे न किए जाएँ रिआया शांत नहीं रह सकती। लेकिन मजा
तो यह है कि राय साहब उतने दौरे वास्तव में नहीं करते, जितने कि अपने रोजनामचे
में लिखते हैं। उनके पड़ाव शहर से पचास मील पर होते हैं। खेमे वहॉँ गड़े रहते हैं, कैंप के अमले वहाँ पड़े
रहते हैं और राय साहब घर पर मित्रों के साथ गप-शप करते रहते हैं, पर किसी की मजाल है कि
राय साहब की नेकनीयती पर सन्देह कर सके। उनके सभ्य पुरुष होने में किसी को शंका नहीं
हो सकती।
एक दिन मैं उनसे मिलने गया। उस समय वह अपने घसियारे दमड़ी को डाँट
रहे थे। दमड़ी रात-दिन का नौकर था,
लेकिन घर
रोटी खाने जाया करता था। उसका घर थोड़ी ही दूर पर एक गाँव में था। कल रात को किसी कारण
से यहाँ न आ सका। इसलिए डाँट पड़ रही थी।
राय साहब—जब हम तुम्हें रात-दिन
के लिए रखे हुए हैं,
तो तुम घर
पर क्यों रहे ?
कल के पैसे
कट जायेंगे।
दमड़ी—हजूर, एक मेहमान आ गये थे, इसी से न आ सका।
राय साहब—तो कल के पैसे उसी मेहमान
से लो।
दमड़ी—सरकार, अब कभी ऐसी खता न होगी।
राय साहब—बक-बक मत करो।
दमड़ी—हजूर......
राय साहब—दो रुपये जुरमाना।
दमड़ी रोता चला गया। रोजा बख्शाने आया था, नमाज़ गले पड़
गयी। दो रुपये जुरमाना ठुक गया। खता यही थी कि बेचारा कसूर माफ कराना चाहता था।
यह एक रात को गैरहाज़िर होने की सजा थी ! बेचारा दिन-भर का काम कर
चुका था, रात को यहाँ सोया न था, उसका दण्ड ! और घर बैठे
भत्ते उड़ानेवाले को कोई नहीं पूछता ! कोई दंड नहीं देता। दंड तो मिले और ऐसा मिले
कि जिंदगी-भर याद रहे;
पर पकड़ना
तो मुश्किल है। दमड़ी भी अगर होशियार होता, तो
जरा रात रहे आकर कोठरी में सो जाता। फिर किसे खबर होती कि वह रात को कहाँ रहा। पर गरीब
इतना चंट न था।
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दमड़ी के पास कुल छ: बिस्वे जमीन
थी। पर इतने ही प्राणियों का खर्च भी था। उसके दो लड़के, दो लड़कियाँ और स्त्री, सब खेती में लगे रहते
थे, फिर भी पेट की रोटियाँ
नहीं मयस्सर होती थीं। इतनी जमीन क्या सोना उगल देती ! अगर सब-के-सब घर से निकल मजदूरी
करने लगते,
तो आराम
से रह सकते थे;
लेकिन मौरूसी
किसान मजदूर कहलाने का अपमान न सह सकता था। इस बदनामी से बचने के लिए दो बैल बाँध रखे
थे ! उसके वेतन का बड़ा भाग बैलों के दाने-चारे ही में उड़ जाता था। ये सारी तकलीफें
मंजूर थीं,
पर खेती
छोड़कर मजदूर बन जाना मंजूर न था। किसान की जो प्रतिष्ठा है, वह कहीं मजदूर की हो सकती
है, चाहे वह रुपया रोज ही
क्यों न कमाये ?
किसानी के
साथ मजदूरी करना इतने अपमान की बात नहीं, द्वार
पर बँधे हुए बैल हुए बैल उसकी मान-रक्षा किया करते हैं, पर बैलों को बेचकर फिर
कहाँ मुँह दिखलाने की जगह रह सकती है !
एक दिन राय साहब उसे सरदी से काँपते देखकर बोले—कपड़े क्यों नहीं बनवाता
? काँप क्यों रहा है ?
दमड़ी—सरकार, पेट की रोटी तो पूरा ही
नहीं पड़ती,
कपड़े कहाँ
से बनवाऊँ ?
राय साहब—बैलों को बेच क्यों नहीं
डालता ? सैकड़ों बार समझा
चुका,
लेकिन न-जाने
क्यों इतनी मोटी-सी बात तेरी समझ में नहीं आती।
दमड़ी—सरकार, बिरादरी में कहीं मुँह
दिखाने लायक न रहूँगा। लड़की की सगाई न हो पायेगी, टाट
बाहर कर दिया जाऊँगा।
राय साहब—इन्हीं हिमाकतों से तुम
लोगों की यह दुर्गति हो रही है। ऐसे आदमियों पर दया करना भी पाप है। (मेरी तरफ फिर
कर) क्यों मुंशीजी,
इस पागलपन
का भी कोई इलाज है ?
जाड़ों मर
रहे हैं, पर दरवाजे पर बैल जरूर
बाँधेंगे।
मैंने कहा—जनाब, यह तो अपनी-अपनी समझ है।
राय साहब—ऐसी समझ को दूर से सलाम
कीजिए। मेरे यहॉं कई पुश्तों से जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता था। कई हजार रुपयों
पर पानी फिर जाता था। गाना होता था;
दावतें होती
थीं, रिश्तेदारों को न्योते
दिये जाते थे,
गरीबों को
कपड़े बाँटे जाते थे। वालिद साहब के बाद पहले ही साल मैंने उत्सव बन्द कर दिया। फायदा
क्या ? मुफ्त में चार-पाँच हजार
की चपत खानी पड़ती थी। सारे कसबे में वावेला मचा,
आवाजें कसी गयीं, किसी
ने नास्तिक कहा,
किसी ने
ईसाई बनाया लेकिन यहाँ इन बातों की क्या परवा ! आखिर थोड़े ही दिनों में सारा कोलाहल
शान्त हो गया। अजी,
बड़ी दिल्लगी
थी। कसबे में किसी के यहाँ शादी हो,
लकड़ी मुझसे
ले ! पुश्तों से यह रस्म चली आती थी। वालिद तो दूसरों से दरख्त मोल लेकर इस रस्म को
निभाते थे। थी हिमाकत या नहीं ?
मैंने फौरन
लकड़ी देना बन्द कर दिया। इस पर भी लोग बहुत रोये-धोये, लेकिन दूसरों का रोना-धोना
सुनूँ, या अपना फायदा देखूँ।
लकड़ी से कम-से-कम 500)रुपये सलाना की बचत हो गयी। अब कोई भूलकर भी इन चीजों के लिए
दिक करने नहीं आता।
मेरे दिल में फिर सवाल पैदा हुआ, दोनों
में कौन सभ्य है,
कुल-प्रतिष्ठा
पर प्राण देनेवाले मूर्ख दमड़ी;
या धन पर
कुल-मर्यादा को बलि देनेवाले राय रतन किशोर !
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राय साहब के इजलास में एक बड़े मार्के
का मुकदमा पेश था। शहर का एक रईस खून के मामले में फँस गया था। उसकी जमानत के लिए राय
साहब की खुशामदें होने लगीं। इज्जत की बात थी। रईस साहब का हुक्म था कि चाहे रियासत
बिक जाय, पर इस मुकदमे से बेदाग
निकल जाऊँ। डालियॉँ लगाई गयीं,
सिफारिशें
पहुँचाई गयीं,
पर राय साहब
पर कोई असर न हुआ। रईस के आदमियों को प्रत्यक्ष रूप से रिश्वत की चर्चा करने की हिम्मत
न पड़ती थी। आखिर जब कोई बस न चला,
तो रईस की
स्त्री से मिलकर सौदा पटाने की ठानी।
रात के दस बजे थे। दोनों महिलाओं में बातें होने लगीं। 20 हजार की
बातचीत थी ! राय साहब की पत्नी तो इतनी खुश हुईं
कि उसी वक्त राय साहब के पास दौड़ी हुई आयी और कहनें लगी—ले लो, ले लो
राय साहब ने कहा—इतनी बेसब्र न हो। वह
तुम्हें अपने दिल में क्या समझेंगी ? कुछ
अपनी इज्जत का भी खयाल है या नहीं ?
माना कि
रकम बड़ी है और इससे मैं एकबारगी तुम्हारी आये दिन की फरमायशों से मुक्त हो जाऊँगा, लेकिन एक सिविलियन की
इज्जत भी तो कोई मामूली चीज नहीं है। तुम्हें पहले बिगड़कर कहना चाहिए था कि मुझसे
ऐसी बेदूदी बातचीत करनी हो,
तो यहाँ
से चली जाओ। मैं अपने कानों से नहीं सुनना चाहती।
स्त्री—यह तो मैंने पहले ही किया, बिगड़कर खूब खरी-खोटी
सुनायीं। क्या इतना भी नहीं जानती ?
बेचारी मेरे
पैरों पर सर रखकर रोने लगी।
राय साहब—यह कहा था कि राय साहब
से कहूँगी,
तो मुझे
कच्चा ही चबा जायेंगे ?
यह कहते हुए राय साहब ने गदगद होकर पत्नी को गले लगा लिया।
स्त्री—अजी, मैं न-जाने ऐसी कितनी
ही बातें कह चुकी,
लेकिन किसी
तरह टाले नहीं टलती। रो-रोकर जान दे रही है।
राय साहब—उससे वादा तो नहीं कर
लिया ?
स्त्री—वादा ? मैं रुपये लेकर सन्दूक
में रख आयी। नोट थे।
राय साहब—कितनी जबरदस्त अहमक हो, न मालूम ईश्वर तुम्हें
कभी समझ भी देगा या नहीं।
स्त्री—अब क्या देगा ? देना होता, तो दे न दी होती।
राय साहब—हाँ मालूम तो ऐसा ही होता
है। मुझसे कहा तक नहीं और रुपये लेकर सन्दूक में दाखिल कर लिए ! अगर किसी तरह बात खुल
जाय, तो कहीं का न रहूँ।
स्त्री—तो भाई, सोच लो। अगर कुछ गड़बड़
हो, तो मैं जाकर रुपये लौटा
दूँ।
राय साहब—फिर वही हिमाकत ! अरे, अब तो जो कुछ होना था, हो चुका। ईश्वर पर भरोसा
करके जमानत लेनी पड़ेगी। लेकिन तुम्हारी हिमाकत में शक नहीं। जानती हो, यह साँप के मुँह में उँगली
डालना है। यह भी जानती हो कि मुझे ऐसी बातों से कितनी नफरत है, फिर भी बेसब्र हो जाती
हो। अबकी बार तुम्हारी हिमाकत से मेरा व्रत टूट रहा है। मैंने दिल में ठान लिया था
कि अब इस मामले में हाथ न डालूँगा,
लेकिन तुम्हारी
हिमाकत के मारे जब मेरी कुछ चलने भी पाये ?
स्त्री—मैं जाकर लौटाये देती
हूँ।
राय साहब—और मैं जाकर जहर खाये
लेता हूँ।
इधर तो स्त्री-पुरुष में यह अभिनय हो रहा था, उधर दमड़ी उसी वक्त अपने
गाँव के मुखिया के खेत से जुआर काट रहा था। आज वह रात-भर की छुट्टी लेकर घर गया था।
बैलों के लिए चारे का एक तिनका भी नहीं है। अभी वेतन मिलने में कई दिन की देर थी, मोल ले न सकता था। घर
वालों ने दिन को कुछ घास छीलकर खिलायी तो थी, लेकिन
ऊँट के मुँह में जीरा। उतनी घास से क्या हो सकता था। दोनों बैल भूखे खड़े थे। दमड़ी
को देखते ही दोनों पूँछें खड़ी करके हुँकारने लगे। जब वह पास गया तो दोनों उसकी हथेलियाँ
चाटने लगे। बेचारा दमड़ी मन मसोसकर रह गया। सोचा, इस
वक्त तो कुछ हो नहीं सकता,
सबेरे किसी
से कुछ उधार लेकर चारा लाऊँगा।
लेकिन जब ग्यारह बजे रात उसकी आँखें खुलीं, तो देखा कि दोनों बैल
अभी तक नाँद पर खड़े हैं। चाँदनी रात थी, दमड़ी
को जान पड़ा कि दोनों उसकी ओर उपेक्षा और याचना की दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी क्षुधा-वेदना
देखकर उसकी आँखें सजल हो आयीं। किसान को अपने बैल अपने लड़कों की तरह प्यारे होते हैं।
वह उन्हें पशु नहीं,
अपना मित्र
और सहायक समझता। बैलों को भूखे खड़े देखकर नींद आँखों से भाग गयी। कुछ सोचता हुआ उठा।
हँसिया निकाली और चारे की फिक्र में चला। गाँव के बाहर बाजरे और जुआर के खेत खड़े थे।
दमड़ी के हाथ काँपने लगे। लेकिन बैलों की याद ने उसे उत्तेजित कर दिया। चाहता, तो कई बोझ काट सकता था; लेकिन वह चोरी करते हुए
भी चोर न था। उसने केवल उतना ही चारा काटा, जितना
बैलों को रात-भर के लिए काफी हो। सोचा, अगर
किसी ने देख भी लिया,
तो उससे
कह दूँगा,
बैल भूखे
थे, इसलिए काट लिया। उसे विश्वास
था कि थोड़े-से चारे के लिए कोई मुझे पकड़ नहीं सकता। मैं कुछ बेचने के लिए तो काट
नहीं रहा हूँ;
फिर ऐसा
निर्दयी कौन है,
जो मुझे
पकड़ ले। बहुत करेगा,
अपने दाम
ले लेगा। उसने बहुत सोचा। चारे का थोड़ा होना ही उसे चोरी के अपराध से बचाने को काफी
था। चोर उतना काटता,
जितना उससे
उठ सकता। उसे किसी के फायदे और नुकसान से क्या मतलब ? गाँव के लोग दमड़ी
को चारा लिये जाते देखकर बिगड़ते जरूर, पर
कोई चोरी के इलजाम में न फँसाता,
लेकिन संयोग
से हल्के के थाने का सिपाही उधर जा निकला। वह पड़ोस के एक बनिये के यहाँ जुआ होने की
खबर पाकर कुछ ऐंठने की टोह में आया था। दमड़ी को चारा सिर पर उठाते देखा, तो सन्देह हुआ। इतनी रात
गये कौन चारा काटता है ?
हो न हो, कोई चोरी से काट रहा है, डाँटकर बोला—कौन चारा लिए जाता है
? खड़ा रह!
दमड़ी ने चौककर पीछे देखा, तो
पुलिस का सिपाही ! हाथ-पाँव फूल गये, काँपते
हुए बोला—हुजूर, थोड़ा ही-सा काटा है, देख लीजिए।
सिपाही—थोड़ा काटा हो या बहुत, है तो चोरी। खेत किसका
है ?
दमड़ी—बलदेव महतो का।
सिपाही ने समझा था,
शिकार फँसा, इससे कुछ ऐंठँगा; लेकिन वहाँ क्या रखा था।
पकड़कर गाँव में लाया और जब वहाँ भी कुछ हत्थे चढ़ता न दिखाई दिया तो थाने ले गया।
थानेदार ने चालान कर दिया। मुकदमा राय साहब ही के इजलास में पेश किया।
राय साहब ने दमड़ी को फँसे हुए देखा, तो हमदर्दी के बदले कठोरता
से काम लिया। बोले—यह मेरी बदनामी की बात
है। तेरा क्या बिगड़ा,
साल-छ: महीने
की सजा हो जायेगी,
शर्मिन्दा
तो मुझे होना पड़ रहा है ! लोग यही तो कहते होंगे कि राय साहब के आदमी ऐसे बदमाश और
चोर हैं। तू मेरा नौकर न होता,
तो मैं हलकी
सजा देता;
लेकिन तू
मेरा नौकर है,
इसलिए कड़ी-से-कड़ी
सजा दूँगा। मैं यह नहीं सुन सकता कि राय साहब ने अपने नौकर के साथ रिआयत की।
यह कहकर राय साहब ने दमड़ी को छ: महीने की सख्त कैद का हुक्म सुना
दिया।
उसी दिन उन्होंने खून के मुकदमे में जमानत ले ली। मैंने दोनों वृत्तान्त
सुने और मेरे दिल में यह ख्याल और भी पक्का हो गया कि सभ्यता केवल हुनर के साथ ऐब करने
का नाम है। आप बुरे-से-बुरा काम करें, लेकिन
अगर आप उस पर परदा डाल सकते हैं,
तो आप सभ्य
हैं, सज्जन हैं, जेन्टिलमैन हैं। अगर आप
में यह सिफ़त नहीं तो आप असभ्य हैं,
गँवार हैं, बदमाश हैं। यह
सभ्यता का रहस्य है !
समस्या
मेरे दफ्तर में चार चपरासी हैं। उनमें
एक का नाम गरीब है। वह बहुत ही सीधा, बड़ा
आज्ञाकारी,
अपने काम
में चौकस रहने वाला,
घुड़कियाँ
खाकर चुप रह जानेवाला यथा नाम तथा गुण वाला मनुष्य है।मुझे इस दफ्तर में साल-भर होते
हैं, मगर मैंने उसे एक दिन
के लिए भी गैरहाजिर नहीं पाया। मैं उसे 9 बजे दफ्तर में अपनी फटी दरी पर बैठे हुए देखने
का ऐसा आदी हो गया हूँ कि मानो वह भी उसी इमारत का कोई अंग है। इतना सरल है कि किसी
की बात टालना नहीं जाना। एक मुसलमान है। उससे सारा दफ्तर डरता है, मालूम नहीं क्यों ? मुझे तो इसका कारण सिवाय
उसकी बड़ी-बड़ी बातों के और कुछ नहीं मालूम होता। उसके कथनानुसार उसके चचेरे भाई रामपुर
रियासत में काजी हैं,
फूफा टोंक
की रियासत में कोतवाल हैं। उसे सर्वसम्मति ने ‘काजी-साहेब’ की उपाधि दे रखी
है। शेष दो महाशय जाति के ब्राह्मण हैं। उनके आशीर्वादों का मूल्य उनके काम से कहीं
अधिक है। ये तीनों कामचोर,
गुस्ताख
और आलसी हैं। कोई छोटा-सा काम करने को भी कहिए तो बिना नाक-भौं सिकोड़े नहीं करते।
क्लर्कों को तो कुछ समझते ही नहीं ! केवल बड़े बाबू से कुछ दबते हैं, यद्यपि कभी-कभी उनसे झगड़
बैठते हैं। मगर इन सब दुर्गुणों के होते हुए भी दफ्तर में किसी की मिट्टी इतनी खराब
नही है, जितनी बेचारे गरीब की।
तरक्की का अवसर आया है,
तो ये तीनों
मार ले जाते हैं,
गरीब को
कोई पूछता भी नहीं। और सब दस-दस पाते हैं, वह
अभी छ: ही में पड़ा हुआ है। सुबह से शाम तक उसके पैर एक क्षण के लिए भी नहीं टिकते—यहाँ तक कि तीनों चपरासी
उस पर हुकूमत जताते हैं और ऊपर की आमदनी में तो उस बेचारे का कोई भाग ही नहीं। तिस
पर भी दफ्तर के सब कर्मचारी—दफ्तरी से लेकर बाबू तक
सब—उससे चिढ़ते हैं। उसकी
कितनी ही बार शिकायतें हो चुकी हैं,
कितनी ही
बार जुर्माना हो चुका है और डाँट-डपट तो नित्य ही हुआ करती है। इसका रहस्य कुछ मेरी
समझ में न आता था। हाँ,
मुझे उस
पर दया अवश्य आती थी,
और आपने
व्यवहार से मैं यह दिखाना चाहता था कि मेरी दृष्टि में उसका आदर चपरासियों से कम नहीं।
यहाँ तक कि कई बार मैं उसके पीछे अन्य कर्मचारियों
से लड़ भी चुका हूँ।
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एक दिन बड़े बाबू ने गरीब से अपनी
मेज साफ करने को कहा। वह तुरन्त मेज साफ करने लगा। दैवयोग से झाड़न का झटका लगा, तो दावात उलट गयी और रोशनाई
मेज पर फैल गयी। बड़े बाबू यह देखते ही जामे से बाहर हो गये। उसके कान पकड़कर खूब ऐंठे
और भारतवर्ष की सभी प्रचलित भाषाओं से दुर्वचन चुन-चुनकर उसे सुनाने लगे। बेचारा गरीब
आँखों में आँसू भरे चुपचाप मूर्तिवत् खड़ा सुनता था, मानो
उसने कोई हत्या कर डाली हो। मुझे बाबू का जरा-सी बात पर इतना भयंकर रौद्र रूप धारण
करना बुरा मालूम हुआ। यदि किसी दूसरे चपरासी ने इससे भी बड़ा कोई अपराध किया होता, तो भी उस पर इतना
वज्र-प्रहार न होता। मैंने अंग्रेजी में कहा—बाबू
साहब, आप यह अन्याय कर रहे हैं।
उसने जान-बूझकर तो रोशनाई गिराया नहीं। इसका इतना कड़ा दण्ड अनौचित्य की पराकाष्ठा
है।
बाबूजी ने नम्रता से कहा—आप
इसे जानते नहीं,
बड़ा दुष्ट
है।
‘मैं तो उसकी कोई दुष्टता
नहीं देखता।’
‘आप अभी उसे जानते नहीं, एक ही पाजी है।
इसके घर दो हलों की खेती होती है, हजारों
का लेन-देन करता है;
कई भैंसे
लगती हैं। इन्हीं बातों का इसे घमण्ड है।’
‘घर की ऐसी दशा होती, तो आपके यहाँ चपरासगिरी
क्यों करता?’
‘विश्वास मानिए, बड़ा पोढ़ा आदमी है और
बला का मक्खीचूस।’
‘यदि ऐसा ही हो, तो भी कोई अपराध नहीं
है।’
‘अजी, अभी आप इन बातों को नहीं
जानते। कुछ दिन और रहिए तो आपको स्वयं मालूम हो जाएगा कि यह कितना कमीना आदमी है?’
एक दूसरे महाशय बोल उठे—भाई
साहब, इसके घर मनों दूध-दही
होता है, मनों मटर, जुवार, चने होते हैं, लेकिन इसकी कभी इतनी हिम्मत
न हुई कि कभी थोड़ा-सा दफ्तरवालों को भी दे दो। यहाँ इन चीजों को तरसकर रह जाते हैं।
तो फिर क्यों न जी जले ?
और यह सब
कुछ इसी नौकरी के बदौलत हुआ है। नहीं तो पहले इसके घर में भूनी भाँग न थी।
बड़े बाबू कुछ सकुचाकर बोले—यह
कोई बात नहीं। उसकी चीज है,
किसी को
दे या न दे;
लेकिन यह
बिल्कुल पशु है।
मैं कुछ-कुछ मर्म समझ गया। बोला—यदि
ऐसे तुच्छ हृदय का आदमी है,
तो वास्तव
में पशु ही है। मैं यह न जानता था।
अब बड़े बाबू भी खुले। संकोच दूर हुआ। बोले—इन सौगातों से किसी का
उबार तो होता नहीं, केवल देने वाले
की सहृदयता प्रकट होती है। और आशा भी उसी से की जाती है, जो इस योग्य होता है।
जिसमें सामर्थ्य ही नहीं,
उससे कोई
आशा नहीं करता। नंगे से कोई क्या लेगा ?
रहस्य खुल गया। बड़े बाबू ने सरल भाव से सारी अवस्था दरशा दी थी। समृद्धि
के शत्रु सब होते हैं,
छोटे ही
नहीं, बड़े भी। हमारी ससुराल
या ननिहाल दरिद्र हो,
तो हम उससे
आशा नहीं रखते ! कदाचित् वह हमें विस्मृत हो जाती है। किन्तु वे सामर्थ्यवान् होकर
हमें न पूछें,
हमारे यहाँ
तीज और चौथ न भेजें,
तो हमारे
कलेजे पर साँप लोटने लगता है। हम अपने निर्धन मित्र के पास जायँ, तो उसके एक बीड़े पान
से ही संतुष्ट हो जाते हैं;
पर ऐसा कौन
मनुष्य है,
जो अपने
किसी धनी मित्र के घर से बिना जलपान के लौटाकर उसे मन में कोसने न लगे और सदा के लिए
उसका तिरस्कार न करने लगे। सुदामा कृष्ण के घर से यदि निराश लौटते तो, कदाचित् वह उनके शिशुपाल
और जरासंध से भी बड़े शत्रु होते। यह मानव-स्वभाव है।
3
कई दिन पीछे मैंने गरीब से पूछा—क्यों जी, तुम्हारे घर पर
कुछ खेती-बारी होती है ?
गरीब ने दीन भाव से कहा—हाँ, सरकार, होती है। आपके दो गुलाम
हैं, वही करते हैं ?
‘गायें-भैंसें भी लगती
हैं?’
‘हाँ, हुजूर; दो भैंसें लगती हैं, मुदा गायें अभी गाभिन
नहीं है। हुजूर,
लोगों के
ही दया-धरम से पेट की रोटियाँ चल जाती हैं।’
‘दफ्तर के बाबू लोगों की
भी कभी कुछ खातिर करते हो?’
गरीब ने अत्यन्त दीनता से कहा—हुजूर; मैं सरकार लोगों की क्या
खातिर कर सकता हूँ। खेती में जौ,
चना, मक्का, जुवार के सिवाय और क्या
होता है। आप लोग राजा हैं,
यह मोटी-झोटी
चीजें किस मुँह से आपकी भेंट करूँ। जी डरता है, कहीं
कोई डाँट न बैठे कि इस टके के आदमी की इतनी मजाल। इसी के मारे बाबूजी, हियाव नहीं पड़ता। नहीं
तो दूध-दही की कौन बिसात थी। मुँह लायक बीड़ा तो होना चाहिए।
‘भला एक दिन कुछ लाके दो
तो, देखो, लोग क्या कहते हैं। शहर
में यह चीजें कहाँ मयस्सर होती हैं। इन लोगों का जी कभी-कभी मोटी-झोटी चीजों पर चला
करता है।’
‘जो सरकार, कोई कुछ कहे तो? कहीं कोई साहब से शिकायत
कर दे तो मैं कहीं का न रहूँ।’
‘इसका मेरा जिम्मा है, तुम्हें कोई कुछ
न कहेगा। कोई कुछ कहेगा,
तो मैं समझा
दूँगा।’
‘तो हुजूर, आजकल तो मटर की फसिल है।
चने के साग भी हो गये हैं और कोल्हू भी खड़ा हो गया है। इसके सिवाय तो और कुछ नहीं
है।’
‘बस, तो यही चीजें लाओ।’
‘कुछ उल्टी-सीधी पड़े, तो हुजूर ही सँभालेंगे!’
‘हाँ जी, कह तो दिया कि मैं देख
लूँगा।’
दूसरे दिन गरीब आया तो उसके साथ तीन हृष्ट-पुष्ट युवक भी थे। दो के
सिरों पर टोकरियाँ थीं,
उसमें मटर
की फनियाँ भरी हुई थीं। एक के सिर पर मटका था, उसमें
ऊख का रस था। तीनों ऊख का एक-एक गट्ठर काँख में दबाये हुए थे। गरीब आकर चुपके से बरामदे
के सामने पेड़ के नीचे खड़ा हो गया। दफ्तर में आने का उसे साहस नहीं होता था, मानो कोई अपराधी वृक्ष
के नीचे खड़ा था कि इतने में दफ्तर के चपरासियों और अन्य कर्मचारियों ने उसे घेर लिया।
कोई ऊख लेकर चूसने लगा,
कई आदमी
टाकरें पर टूट पड़े, लूट मच गयी। इतने
में बड़े बाबू दफ्तर में आ पहुँचे। यह कौतुकब देखा तो उच्च स्वर से बोले—यह क्या भीड़ लगा रखी
है, अपना-अपना काम देखो।
मैंने जाकर उनके कान में कहा—गरीब, अपने घर से यह सौगात लाया
है। कुछ आप ले लीजिए,
कुछ इन लोगों
को बाँट दीजिए।
बड़े बाबू ने कृत्रिम क्रोध धारण करके कहा—क्यों गरीब, तुम ये चीजें यहाँ क्यों
लाये ? अभी ले जाओ, नहीं तो मैं साहब से रपट
कर दूँगा। कोई हम लोगों को मलूका समझ लिया है।
गरीब का रंग उड़ गया। थर-थर काँपने लगा। मुँह से एक शब्द भी न निकला।
मेरी ओर अपराधी नेत्रों से ताकने लगा।
मैंने उसकी ओर से क्षमा-प्रार्थना की। बहुत कहने-सुनने पर बाबू साहब
राजी हुए। सब चीजों में से आधी-आधी अपने घर भिजवायी। आधी में अन्य लोगों के हिस्से
लगाये गये। इस प्रकार यह अभिनय समाप्त हुआ।
4
अब दफ्तर में गरीब का नाम होने लगा।
उसे नित्य घुड़कियाँ न मिलतीं;
दिन-भर दौड़ना
न पड़ता। कर्मचारियों के व्यंग्य और अपने सहयोगियों के कटुवाक्य न सुनने पड़ते। चपरासी
लोग स्वयं उसका काम कर देते। उसके नाम में भी थोड़ा-सा परिवर्तन हुआ। वह गरीब से गरीबदास
बना। स्वभाव में कुछ तबदीली पैदा हुई। दीनता की जगह आत्मगौरव का उद्भव हुआ। तत्परता
की जगह आलस्य ने ली। वह अब भी कभी देर करके दफ्तर आता, कभी-कभी बीमारी का बहाना
करके घर बैठ रहता। उसके सभी अपराध अब क्षम्य थे। उसे अपनी प्रतिष्ठा का गुर हाथ लग
गया था। वह अब दसवें-पाँचवे दिन दूध, दही
लाकर बड़े बाबू की भेंट किया करता। देवता को संतुष्ट करना सीख गया। सरलता के बदले अब
उसमें काँइयाँपन आ गया।
एक रोज बड़े बाबू ने उसे सरकारी फार्मों का पार्सल छुड़ाने के लिए
स्टेशन भेजा। कई बड़े-बड़े पुलिंदे थे। ठेले पर आये। गरीब ने ठेलेवालों से बारह आने
मजदूरी तय की थी। जब कागज दफ्तर में गये तो उसने बड़े बाबू से बारह आने पैसे ठेलेवालों
को देने के लिए वसूल किये। लेकिन दफ्तर से कुछ दूर जाकर उसकी नीयत बदली। अपनी दस्तूरी
माँगने लगा। ठेलेवाले राजी न हुए। इस पर गरीब ने बिगड़कर सब पैसे जेब में रख लिये और
धमकाकर बोला—अब एक फूटी कौड़ी भी न
दूँगा। जाओ जहाँ फरियाद करो। देखें,
क्या बना
लेते हो।
ठेलेवाले ने जब देखा कि भेंट न देने से जमा ही गायब हुई जाती है तो
रो-धोकर चार आने पैसे देने पर राजी हुए। गरीब ने अठन्नी उसके हवाले की, बारह आने की रसीद लिखाकर
उसके अँगूठे के निशान लगवाये और रसीद दफ्तर में दाखिल हो गयी।
यह कुतूहल देखकर में दंग रह गया। यह वही गरीब है, जो कई महीने पहले सरलता
और दीनता की मूर्ति था,
जिजसे कभी
चपरासियों से भी अपने हिस्से की रकम माँगने का साहस न होता था, जो दूसरों को खिलाना भी
न जानता था,
खाने का
तो जिक्र ही क्या। यह स्वभावांतर देखकर अत्यन्त खेद हुआ। इसका उत्तरदायित्व किसके सिर
था ? मेरे सिर, जिसने उसे चघ्घड़पन और
धूर्तता का पहला पाठ पढ़ाया था। मेरे चित्त में प्रश्न उठा—इस काँइयाँपन से, जो दूसरों का गला दबाता
है, वह भोलापन क्या बुरा था, जो दूसरों का अन्याय सह
लेता था। वह अशुभ मुहूर्त था,
जब मैंने
उसे प्रतिष्ठा-प्राप्ति का मार्ग दिखाया, क्योंकि
वास्तव में वह उसके पतन का भयंकर मार्ग था।
मैंने बाह्य प्रतिष्ठा पर उसकी आत्म-प्रतिष्ठा का बलिदान कर दिया।
दो सखियाँ
1
लखनऊ
1-7-25
प्यारी बहन,
जब से यहाँ आयी हूँ, तुम्हारी याद सताती रहती
है। काश! तुम कुछ दिनों के लिए यहाँ चली आतीं, तो
कितनी बहार रहती। मैं तुम्हें अपने विनोद से मिलाती। क्या यह सम्भव नहीं है ? तुम्हारे माता-पिता क्या
तुम्हें इतनी आजादी भी न देंगे ?
मुझे तो
आश्चर्य यही है कि बेड़ियाँ पहनकर तुम कैसे रह सकती हो! मैं तो इस तरह घण्टे-भर भी
नहीं रह सकती। ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि मेरे पिताजी पुरानी लकीर पीटने वालों में
नहीं। वह उन नवीन आदर्शों के भक्त हैं,
जिन्होंने नारी-जीवन को स्वर्ग बना दिया है। नहीं तो मैं कहीं की
न रहती।
विनोद हाल ही में इंग्लैंड से डी0 फिल0 होकर लौटे हैं और जीवन-यात्रा
आरम्भ करने के पहले एक बार संसार-यात्रा करना चाहते हैं। योरप का अधिकांश भाग तो वह
देख चुके हैं,
पर अमेरिका, आस्ट्रेलिया और एशिया
की सैर किये बिना उन्हें चैन नहीं। मध्य एशिया और चीन का तो यह विशेष रूप से अध्ययन
करना चाहते हैं। योरोपियन यात्री जिन बातों की मीमांसा न कर सके, उन्हीं पर प्रकाश डालना
इनका ध्येय है। सच कहती हूँ,
चन्दा, ऐसा साहसी, ऐसा निर्भीक, ऐसा आदर्शवादी पुरुष मैंने
कभी नहीं देखा था। मैं तो उनकी बातें सुनकर चकित हो जाती हूँ। ऐसा कोई विषय नहीं है, जिसका उन्हें पूरा ज्ञान
न हो, जिसकी वह आलोचना न कर
सकते हो; और यह केवल किताबी आलोचना
नहीं होती,
उसमें मौलिकता
और नवीनता होती है। स्ववन्त्रता के तो वह अनन्य उपासक हैं। ऐसे पुरुष की पत्नी बनकर
ऐसी कौन-सी स्त्री है,
जो अपने
सौभाग्य पर गर्व न करे। बहन,
तुमसे क्या
कहूँ कि प्रात:काल उन्हें अपने बँगले की ओर आते देखकर मेरे चित्त की क्या दशा हो जाती
है। यह उन पर न्योछावर होने के लिए विकल हो जाता है। यह मेरी आत्मा में बस गये हैं।
अपने पुरुष की मैंने मन में जो कल्पना की थी, उसमें
और उनमें बाल बराबर भी अन्तर नहीं। मुझे रात-दिन यही भय लगा रहता है कि कहीं मुझमें
उन्हें कोई त्रुटि न मिल जाय। जिन विषयों से उन्हें रुचि है, उनका अध्ययन आधी रात तक
बैठी किया करती हूँ। ऐसा परिश्रम मैंने कभी न किया था। आईने-कंघी से मुझे कभी उतना
प्रेम न था, सुभाषितों को मैंने
कभी इतने चाव से कण्ठ न किया था। अगर इतना सब कुछ करने पर भी मैं उनका हृदय न पा सकी, तो बहन, मेरा जीवन नष्ट हो जायेगा, मेरा हृदय फट जायेगा और
संसार मेरे लिए सूना हो जायेगा।
कदाचित् प्रेम के साथ ही मन में ईर्ष्या का भाव भी उदय हो जाता है।
उन्हें मेरे बँगले की ओर जाते हुए देख जब मेरी पड़ोसिन कुसुम अपने बरामदे में आकर खड़ी
हो जाती है,
तो मेरा
ऐसा जी चाहता है कि उसकी आँखें ज्योतिहीन हो जायँ। कल तो अनर्थ ही हो गया। विनोद ने
उसे देखते ही हैट उतार ली और मुस्कराए। वह कुलटा भी खीसें निकालने लगी। ईश्वर सारी
विपत्तियाँ दे,
पर मिथ्याभिमान
न दे। चुड़ैलों की-सी तो आपकी सूरत है, पर
अपने को अप्सरा समझती हैं। आप कविता करती हैं और कई पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ छप
भी गई हैं। बस,
आप जमीन
पर पाँव नहीं रखतीं। सच कहती हूँ,
थोड़ी देर
के लिए विनोद पर से मेरी श्रद्धा उठ गयी। ऐसा आवेश होता था कि चलकर कुसुम का मुँह नोच
लूँ। खैरियत हुई कि दोनों में बातचलत न हुई, पर
विनोद आकर बैठे तो आध घण्टे तक मैं उनसे न बोल सकी, जैसे
उनके शब्दों में वह जादू ही न था,
वाणी में
वह रस ही न था। तब से अब तक मेरे चित्त की व्यग्रता शान्त नहीं हुई। रात-भर मुझे नींद
नहीं आयी,
वही दृश्य
आँखों के सामने बार-बार आता था। कुसुम को लज्जित करने के लिए कितने मसूबे बाँध चुकी
हूँ। अगर यह भय न होता कि विनोद मुझे ओछी और हलकी समझेंगे, तो मैं उनसे अपने मनोभावों
को स्पष्ट कह देती। मैं सम्पूर्णत: उनकी होकर उन्हें सम्पूर्णत: अपना बनाना चाहती हूँ।
मुझे विश्वास है कि संसार का सबसे रूपवान् युवक मेरे सामने आ जाय, तो मैं उसे आँख उठाकर
न देखूँगी। विनोद के मन में मेरे प्रति यह भाव क्यों नहीं है।
चन्दा, प्यारी बहन; एक सप्ताह के लिए आ जा।
तुझसे मिलने के लिए मन अधीर हो रहा है। मुझे इस समय तेरी सलाह और सहानुभूति की बड़ी
जरूरत है। यह मेरे जीवन का सबसे नाजुक समय है। इन्हीं दस-पाँच दिनों में या तो पारस
हो जाऊँगी या मिट्टी। लो सात बज गए और अभी बाल तक नहीं बनाये। विनोद के आने का समय
है। अब विदा होती हूँ। कहीं आज फिर अभागिनी कुसुम अपने बरामदे में न आ खड़ी हो। अभी
से दिल काँप रहा है। कल तो यह सोचकर मन को समझाया था कि यों ही सरल भाव से वह हँस पड़ी
होगी। आज भी अगर वही दृश्य सामने आया, तो
उतनी आसानी से मन को न समझा सकूँगी।
तुम्हारी,
पद्मा
2
गोरखपुर
5-7-25
प्रिय पद्मा,
भला एक युग के बाद तुम्हें मेरी सुधि तो आई। मैंने तो समझा था, शायद तुमने परलोक-यात्रा
कर ली। यह उस निष्ठुरता का दंड ही है, जो
कुसुम तुम्हें दे रही है। 15 एप्रिल को कालेज बन्द हुआ और एक जुलाई को आप खत लिखती
हैं—पूरे ढाई महीने बाद, वह भी कुसुम की कृपा से।
जिस कुसुम को तुम कोस रही हो,
उसे मैं
आशीर्वाद दे रही हूँ। वह दारुण दु:ख की भाँति तुम्हारे रास्ते में न आ खड़ी होती, तो तुम्हें क्यों मेरी
याद आती ? खैर, विनोद की तुमने जो तसवीर
खींची, वह बहुत ही आकर्षक है
और मैं ईश्वर से मना रही हूँ,
वह दिन जल्द
आए कि मैं उनसे बहनोई के नाते मिल सकूँ। मगर देखना, कहीं
सिविल मैरेज न कर बैठना। विवाह हिन्दू-पद्धति के अनुसार ही हो। हॉ, तुम्हें अख्त्यिर है जो
सैकड़ों बेहूदा और व्यर्थ के कपड़े हैं, उन्हें
निकाल डालो। एक सच्चे,
विद्वान
पण्डित को अवश्य बुलाना,
इसलिए नहीं
कि वह तुमसे बात-बात पर टके निकलवाये, बल्कि
इसलिए कि वह देखता रहे कि वह सब कुछ शास्त्र-विधि से हो रहा है, या नहीं।
अच्छा, अब मुझसे पूछो
कि इतने दिनों क्यों चुप्पी साधे बैठी रही। मेरे ही खानदान में इन ढाई महीनों में, पाँच शादियॉँ हुई। बारातों
का ताँता लगा रहा। ऐसा शायद ही कोई दिन गया हो कि एक सौ महमानों से कम रहे हों और जब
बारात आ जाती थी,
तब तो उनकी
संख्या पाँच-पाँच सौ तक पहुँच जाती थी। ये पाँचों लड़कियाँ मुझसे छोटी हैं और मेरा
बस चलता तो अभी तीन-चार साल तक न बोलती, लेकिन
मेरी सुनता कौन है और विचार करने पर मुझे भी ऐसा मालूम होता है कि माता-पिता का लड़कियों
के विवाह के लिए जल्दी करना कुछ अनुचित नहीं है। जिन्दगी का कोई ठिकाना नहीं। अगर माता-पिता
अकाल मर जायँ,
तो लड़की
का विवाह कौन करे। भाइयों का क्या भरोसा। अगर पिता ने काफी दौलत छोड़ी है तो कोई बात
नहीं; लेकिन जैसा साधारणत: होता
है, पिता ऋण का भार छोड़ गये, तो बहन भाइयों पर भार
हो जाती है। यह भी अन्य कितने ही हिन्दू-रस्मों की भाँति आर्थिक समस्या है, और जब तक हमारी आर्थिक
दशा न सुधरेगी,
यह रस्म
भी न मिटेगी।
अब मेरे बलिदान की बारी है। आज के पंद्रहवें दिन यह घर मेरे लिए विदेश
हो जायगा। दो-चार महीने के लिए आऊँगी, तो
मेहमान की तरह। मेरे विनोद बनारसी हैं, अभी
कानून पढ़ रहे हैं। उनके पिता नामी वकील हैं। सुनती हूँ, कई गाँव हैं, कई मकान हैं, अच्छी मर्यादा है। मैंने
अभी तक वर को नहीं देखा। पिताजी ने मुझसे पुछवाया था कि इच्छा हो, तो वर को बुला दूँ। पर
मैंने कह दिया,
कोई जरूरत
नहीं। कौन घर में बहू बने। है तकदीर ही का सौदा। न पिताजी ही किसी के मन में पैठ सकते
हैं, न मैं ही। अगर दो-एक बार
देख ही लेती,
नहीं मुलाकात
ही कर लेती तो क्या हम दोनों एक-दूसरे को परख लेते ? यह
किसी तरह संभव नहीं। ज्यादा-से-ज्यादा हम एक-दूसरे का रंग-रूप देख सकते हैं। इस विषय
में मुझे विश्वास है कि पिताजी मुझसे कम संयत नहीं हैं। मेरे दोनों बड़े बहनोई सौंदर्य
के पुतले न हों पर कोई रमणी उनसे घृणा नहीं कर सकती। मेरी बहनें उनके साथ आनन्द से
जीवन बिता रही हैं। फिर पिताजी मेरे ही साथ क्यों अन्याय करेंगे। यह मैं मानती हूँ
कि हमारे समाज में कुछ लोगों का वैवाहिक जीवन सुखकर नहीं है, लेकिन संसार में ऐसा कौन
समाज है, जिसमें दुखी परिवार न
हों। और फिर हमेशा पुरुषों ही का दोष तो नहीं होता, बहुधा
स्त्रियॉँ ही विष का गाँठ होती हैं। मैं तो विवाह को सेवा और त्याग का व्रत समझती हूँ
और इसी भाव से उसका अभिवादन करती हूँ। हाँ, मैं
तुम्हें विनोद से छीनना तो नहीं चाहती लेकिन अगर 20 जुलाई तक तुम दो दिन के लिए आ सको, तो मुझे जिला लो। ज्यों-ज्यों
इस व्रत का दिन निकट आ रहा है,
मुझे एक
अज्ञात शंका हो रही है;
मगर तुम
खुद बीमार हो,
मेरी दवा
क्या करोगी—जरूर आना बहन !
तुम्हारी,
चन्दा
3
मंसूरी
5-8-25
प्यारी चन्दा,
सैंकड़ों बातें लिखनी हैं, किस
क्रम से शुरू करूँ,
समझ में
नहीं आता। सबसे पहले तुम्हारे विवाह के शुभ अवसर पर न पहुँच सकने के लिए क्षमा चाहती
हूँ। मैं आने का निश्चय कर चुकी थी,
मैं और प्यारी
चंदा के स्वयंवर में न जाऊँ: मगर उसके ठीक तीन दिन पहले विनोद ने अपना आत्मसमर्पण करके
मुझे ऐसा मुग्ध कर दिया कि फिर मुझे किसी की सुधि न रही। आह! वे प्रेम के अन्तस्तल
से निकले हुए उष्ण,
आवेशमय और
कंपित शब्द अभी तक कानों में गूँज रहे हैं। मैं खड़ी थी, और विनोद मेरे सामने घुटने
टेके हुए प्रेरणा,
विनय और
आग्रह के पुतले बने बैठे थे। ऐसा अवसर जीवन में एक ही बार आता है, केवल एक बार, मगर उसकी मधुर स्मृति
किसी स्वर्ग-संगीत की भाँती जीवन के तार-तार में व्याप्त रहता है। तुम उस आनन्द का
अनुभव कर सकोगी—मैं रोने लगी, कह नहीं सकती, मन में क्या-क्या भाव
आये; पर मेरी आँखों से आँसुओं
की धारा बहने लगी। कदाचित् यही आनन्द की चरम सीमा है। मैं कुछ-कुछ निराश हो चली थी।
तीन-चार दिन से विनोद को आते-जाते कुसुम से बातें करते देखती थी, कुसुम नित नए आभूषणों
से सजी रहती थी और क्या कहूँ,
एक दिन विनोद
ने कुसुम की एक कविता मुझे सुनायी और एक-एक शब्द पर सिर धुनते रहे। मैं मानिनी तो हूँ
ही; सोचा,जब यह उस चुड़ैल पर लट्टू
हो रहे हें,
तो मुझे
क्या गरज पड़ी है कि इनके लिए अपना सिर खपाऊँ। दूसरे दिन वह सबेरे आये, तो मैंने कहला दिया, तबीयत अच्छी नहीं है।
जब उन्होंने मुझसे मिलने के लिए आग्रह किया, तब
विवश होकर मुझे कमरे में आना पड़ा। मन में निश्चय करके आयी थी—साफ कह दूंगी अब आप न
आया कीजिए। मैं आपके योग्य नहीं हूँ, मैं
कवि नहीं,
विदुषी नहीं, सुभाषिणी नहीं....एक पूरी
स्पीच मन में उमड़ रही थी,
पर कमरे
में आई और विनोद के सतृष्ण नेत्र देखे, प्रबल
उत्कंठा में काँपते हुए होंठ—बहन, उस आवेश का चित्रण नहीं
कर सकती। विनोद ने मुझे बैठने भी न दिया। मेरे सामने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गये
और उनके आतुर उन्मत्त शब्द मेरे हृदय को तरंगित करने लगे।
एक सप्ताह तैयारियों में कट गया। पापा ओर मामा फूले न समाते थे।
और सबसे प्रसन्न थी कुसुम ! यही कुसुम
जिसकी सूरत से मुझे घृणा थी ! अब मुझे ज्ञात हुआ कि मैंने उस पर सन्देह करके उसके साथ
घोर अन्याय किया। उसका हृदय निष्कपट है,
उसमें न ईर्ष्या है, न
तृष्णा, सेवा ही उसके जीवन का
मूलतत्व है। मैं नहीं समझती कि उसके बिना ये सात दिन कैसे कटते। मैं कुछ खोई-खोई सी
जान पड़ती थी। कुसुम पर मैंने अपना सारा भार छोड़ दिया था। आभूषणों के चुनाव और सजाव, वस्त्रों के रंग और काट-छाँट
के विषय में उसकी सुरुचि विलक्षण है। आठवें दिन जब उसने मुझे दुलहिन बनाया, तो मैं अपना रूप देखकर
चकित रह गई। मैंने अपने को कभी ऐसी सुन्दरी न समझा था। गर्व से मेरी आँखों में नशा-सा
छा गया।
उसी दिन संध्या-समय विनोद और में दो भिन्न जल-धाराओं की भाँति संगम
पर मिलकर अभिन्न हो गये। विहार-यात्रा की तैयारी पहले ही से हो चुकी थी, प्रात:काल हम मंसूरी के
लिए रवाना हो गये। कुसुम हमें पहुँचाने के लिए स्टेशन तक आई और विदा होते समय बहुत
रोयी। उसे साथ ले चलना चाहती थी,
पर न जाने
क्यों वह राजी न हुई।
मंसूरी रमणीक है,
इसमें सन्देह
नहीं। श्यामवर्ण मेघ-मालाएँ पहाड़ियों पर विश्राम कर रही हैं, शीतल पवन आशा-तरंगों की
भाँति चित्त का रंजन कर रहा है,
पर मुझे
ऐसा विश्वास है कि विनोद के साथ मैं किसी निर्जन वन में भी इतने ही सुख से रहती। उन्हें
पाकर अब मुझे किसी वस्तु की लालसा नहीं। बहन, तुम
इस आनन्दमय जीवन की शायद कल्पना भी न कर सकोगी। सुबह हुई, नाश्ता आया, हम दोनों ने नाश्ता किया; डाँडी तैयार है, नौ बजते-बजते सैर करने
निकल गए। किसी जल-प्रपात के किनारे जा बैठे। वहाँ जल-प्रवाह का मधुर संगीत सुन रहे
हैं। या किसी शिला-खंड पर बैठे मेघों की व्योम-क्रीड़ा देख रहे हैं। ग्यारह बजते-बजते
लौटै। भोजन किया। मैं प्यानो पर जा बैठी। विनोद को संगीत से प्रेम है। खुद बहुत अच्छा
गाते हैं और मैं गाने लगती हूँ,
तब तो वह
झूमने ही लगते हैं। तीसरे पहर हम एक घंटे के लिए विश्राम करके खेलने या कोई खेल देखने चले जाते हैं। रात
को भोजन करने के बाद थियेटर देखते हैं और वहाँ से लौट कर शयन करते हैं। न सास की घुड़कियाँ
हैं न ननदों की कानाफूसी,
न जेठानियों
के ताने। पर इस सुख में भी मुझे कभी-कभी एक शंका-सी होती है—फूल में कोई काँटा तो
नहीं छिपा हुआ है,
प्रकाश के
पीछे कहीं अन्धकार तो नहीं है ! मेरी समझ में नहीं आता, ऐसी शंका क्यों होती है।
अरे, यह लो पाँच बज गए, विनोद तैयार हैं, आज टेनिस का मैच देखने
जाना है। मैं भी जल्दी से तैयार हो जाऊँ। शेष बातें फिर लिखूँगी।
हाँ,
एक बात तो
भूली ही जा रही थी। अपने विवाह का समाचार लिखना। पतिदेव कैसे हैं ? रंग-रूप कैसा है ? ससुराल गयी, या अभी मैके ही में हो
? ससुराल गयीं, तो वहाँ के अनुभव अवश्य
लिखना। तुम्हारी खूब नुमाइश हुई होगी। घर, कुटुम्ब
और मुहल्ले की महिलाओं ने घूँघट उठा-उठाकर
खूब मुँह देखा होगा,
खूब परीक्षा
हुई होगी। ये सभी बातें विस्तार से लिखना। देखें कब फिर मुलाकात होती है।
तुम्हारी,
पद्मा
4
गोरखपुर
1-9-25
प्यारी पद्मा,
तुम्हारा पत्र पढ़कर चित्त को बड़ी शांति मिली। तुम्हारे न आने ही
से मैं समझ गई थी कि विनोद बाबू तुम्हें हर ले गए, मगर
यह न समझी थी कि तुम मंसूरी पहुँच गयी। अब उस आमोद-प्रमोद में भला गरीब चन्दा क्यों
याद आने लगी। अब मेरी समझ में आ रहा है कि विवाह के लिए नए और पुराने आदर्श में क्या
अन्तर है। तुमने अपनी पसन्द से काम लिया, सुखी
हो। मैं लोक-लाज की दासी बनी रही,
नसीबों को
रो रही हूँ।
अच्छा, अब मेरी बीती सुनो।
दान-दहेज के टंटे से तो मुझे कुछ मतलब है नहीं। पिताजी ने बड़ा ही उदार-हृदय पाया है।
खूब दिल खोलकर दिया होगा। मगर द्वार पर बारात आते ही मेरी अग्नि-परीक्षा शुरू हो गयी।
कितनी उत्कण्ठा थी—वह-दर्शन की, पर देखूँ कैसे। कुल की
नाक न कट जाएगी। द्वार पर बारात आयी। सारा जमाना वर को घेरे हुए था। मैंने सोचा—छत पर से देखूँ। छत पर
गयी, पर वहाँ से भी कुछ न दिखाई
दिया। हाँ,
इस अपराध
के लिए अम्माँजी की घुड़कियाँ सुननी पड़ीं। मेरी जो बात इन लोगों को अच्छी नहीं लगती, उसका दोष मेरी शिक्षा
के माथे मढ़ा जाता है। पिताजी बेचारे मेरे साथ बड़ी सहानुभूति रखते हैं। मगर किस-किस
का मुँह पकड़ें। द्वारचार तो यों गुजरा और भाँवरों की तैयारियाँ होने लगी। जनवासे से
गहनों और कपड़ों का थाल आया। बहन ! सारा घर—स्त्री-पुरुष—सब उस पर कुछ इस तरह टूटे, मानो इन लोगों ने कभी
कुछ देखा ही नहीं। कोई कहता है,
कंठा तो
लाये ही नहीं;
कोई हार
के नाम को रोता है! अम्माँजी तो सचमुच रोने लगी, मानो
मैं डुबा दी गयी। वर-पक्षवालों की दिल खोलकर निंदा होने लगी। मगर मैंने गहनों की तरफ
आँख उठाकर भी नहीं देखा। हाँ,
जब कोई वर
के विषय में कोई बात करता था,
तो मैं तन्मय
होकर सुनने लगती था। मालूम हुआ—दुबले-पतले आदमी हैं।
रंग साँवला है,
आँखें बड़ी-बड़ी
हैं, हँसमुख हैं। इन सूचनाओं
से दशर्नोत्कंठा और भी प्रबल होती थी। भाँवरों का मुहूर्त ज्यों-ज्यों समीप आता था, मेरा चित्त व्यग्र होता
जाता था। अब तक यद्यपि मैंने उनकी झलक भी न देखी थी, पर
मुझे उनके प्रति एक अभूतपूर्व प्रेम का अनुभव हो रहा था। इस वक्त यदि मुझे मालूम हो
जाता कि उनके दुश्मनों को कुछ हो गया है, तो
मैं बावली हो जाती। अभी तक मेरा उनसे साक्षात् नहीं हुआ हैं, मैंने उनकी बोली तक नहीं
सुनी है, लेकिन संसार का सबसे रूपवान्
पुरुष भी,
मेरे चित्त
को आकर्षित नहीं कर सकता। अब वही मेरे सर्वस्व हैं।
आधी रात के बाद भाँवरें हुईं। सामने हवन-कुण्ड था, दोनों ओर विप्रगण बैठे
हुए थे, दीपक जल रहा था, कुल देवता की मूर्ति रखी
हुई थीं। वेद मंत्र का पाठ हो रहा था। उस समय मुझे ऐसा मालूम हुआ कि सचमुच देवता विराजमान
हैं। अग्नि,
वायु, दीपक, नक्षत्र सभी मुझे उस समय
देवत्व की ज्योति से प्रदीप्त जान पड़ते थे।
मुझे पहली बार आध्यात्मिक विकास का परिचय मिला। मैंने जब अग्नि के सामने मस्तक
झुकाया, तो यह कोरी रस्म की पाबंदी
न थी, मैं अग्निदेव को अपने
सम्मुख मूर्तिवान्,
स्वर्गीय
आभा से तेजोमय देख रही थी। आखिर भाँवरें भी समाप्त हो गई; पर पतिदेव के दर्शन न हुए।
अब अन्तिम आशा यह थी कि प्रात:काल जब पतिदेव कलेवा के लिए बुलाये जायँगे, उस समय देखूँगी। तब उनके
सिर पर मौर न होगा,
सखियों के
साथ मैं भी जा बैठूँगी और खूब जी भरकर देखूँगी। पर क्या मालूम था कि विधि कुछ और ही
कुचक्र रच रहा है। प्रात:काल देखती हूँ, तो
जनवासे के खेमे उखड़ रहे हैं। बात कुछ न थी। बारातियों के नाश्ते के लिए जो सामान भेजा
गया था, वह काफी न था। शायद घी
भी खराब था। मेरे पिताजी को तुम जानती ही हो। कभी किसी से दबे नहीं, जहाँ रहे शेर बनकर रहे।
बोले—जाते हैं, तो जाने दो, मनाने की कोई जरूरत नहीं; कन्यापक्ष का धर्म है
बारातियों का सत्कार करना,
लेकिन सत्कार
का यह अर्थ नहीं कि धमकी और रोब से काम लिया जाय, मानो
किसी अफसर का पड़ाव हो। अगर वह अपने लड़के की शादी कर सकते हैं, तो मैं भी अपनी लड़की
की शादी कर सकता हूँ।
बारात चली गई और मैं पति के दर्शन न कर सकी ! सारे शहर में हलचल मच
गई। विरोधियों को हँसने का अवसर मिला। पिताजी ने बहुत सामान जमा किया था। वह सब खराब
हो गया। घर में जिसे देखिए,
मेरी ससुराल
की निंदा कर रहा है—उजड्ड हैं, लोभी हैं, बदमाश हैं, मुझे जरा भी बुरा नहीं
लगता। लेकिन पति के विरुद्ध मैं एक शब्द भी नहीं सुनना चाहती। एक दिन अम्माँजी बोली—लड़का भी बेसमझ है। दूध
पीता बच्चा नहीं, कानून पढ़ता है, मूँछ-दाढ़ी आ गई है, उसे अपने बाप को समझाना
चाहिए था कि आप लोग क्या कर रहे हैं। मगर वह भी भीगी बिल्ली बना रहा। मैं सुनकर तिलमिला
उठी। कुछ बोली तो नहीं,
पर अम्माँजी
को मालूम जरूर हो गया कि इस विषय में मैं उनसे सहमत नहीं। मैं तुम्हीं से पूछती हूँ
बहन, जैसी समस्या उठ खड़ी हुई
थी, उसमें उनका क्या धर्म
था ? अगर वह अपने पिता और अन्य
सम्बन्धियों का कहना न मानते,
तो उनका
अपमान न होता ?
उस वक्त
उन्होंने वही किया,
जो उचित
था। मगर मुझे विश्वास है कि जरा मामला ठंडा होने पर वह आयेंगे। मैं अभी से उनकी राह
देखने लगी हूँ। डाकिया चिट्ठियाँ लाता है, तो
दिल में धड़कन होने लगती हैं—शायद उनका पत्र भी हो
! जी में बार-बार आता है, क्यों न मैं ही
एक खत लिखूँ;
मगर संकोच
में पड़कर रह जाती हूँ। शायद मैं कभी न लिख सकूँगी। मान नहीं है केवल संकोच है। पर
हाँ, अगर दस-पाँच दिन और उनका
पत्र न आया, या वह खुद न आए, तो संकोच मान का रूप धारण
कर लेगा। क्या तुम उन्हें एक चिट्ठी नहीं लिख सकती ! सब खेल बन जाय। क्या मेरी इतनी
खातिर भी न करोगी ?
मगर ईश्वर
के लिए उस खत में कहीं यह न लिख देना कि चंदा ने प्रेरणा की है। क्षमा करना ऐसी भद्दी
गलती की, तुम्हारी ओर से शंका करके
मैं तुम्हारे साथ अन्याय कर रही हूँ, मगर
मैं समझदार थी ही कब ?
तुम्हारी,
चन्दा
5
मंसूरी
20-9-25
प्यारी चन्दा,
मैंने तुम्हारा खत पाने के दूसरे ही दिन काशी खत लिख दिया था। उसका
जवाब भी मिल गया। शायद बाबूजी ने तुम्हें खत लिखा हो। कुछ पुराने खयाल के आदमी हैं।
मेरी तो उनसे एक दिन भी न निभती। हाँ,
तुमसे निभ जायगी। यदि मेरे पति ने मेरे साथ यह बर्ताव किया होता—अकारण मुझसे रूठे होते—तो मैं जिन्दगी-भर उनकी
सूरत न देखती। अगर कभी आते भी,
तो कुत्तों
की तरह दुत्कार देती। पुरुष पर सबसे बड़ा अधिकार उसकी स्त्री का है। माता-पिता को खुश
रखने के लिए वह स्त्री का तिरस्कार नहीं कर सकता। तुम्हारे ससुरालवालों ने बड़ा घृणित
व्यवहार किया। पुराने खयालवालों का गजब का कलेजा है, जो
ऐसी बातें सहते हैं। देखा उस प्रथा का फल, जिसकी
तारीफ करते तुम्हारी जबान नहीं थकती। वह दीवार सड़ गई। टीपटाप करने से काम न चलेगा।
उसकी जगह नये सिरे से दीवार बनाने की जरूरत है।
अच्छा, अब कुछ मेरी भी
कथा सुन लो। मुझे ऐसा संदेह हो रहा है कि विनोद ने मेरे साथ दगा की है। इनकी आर्थिक
दशा वैसी नहीं,
जैसी मैंने
समझी थी। केवल मुझे ठगने के लिए इन्होंने सारा स्वाँग भरा था। मोटर माँगे की थी, बँगले का किराया अभी तक
नहीं दिया गया,
फरनिचर किराये
के थे। यह सच है कि इन्होंने प्रत्यक्ष रूप से मुझे धोखा नहीं दिया। कभी अपनी दौलत
की डींग नहीं मारी,
लेकिन ऐसा
रहन-सहन बना लेना,
जिससे दूसरों
को अनुमान हो कि यह कोई बड़े धनी आदमी हैं, एक
प्रकार का धोखा ही है। यह स्वाँग इसीलिए भरा गया था कि कोई शिकार फँस जाय। अब देखती
हूँ कि विनोद मुझसे अपनी असली हालत को छिपाने का प्रयत्न किया करते हैं। अपने खत मुझे
नहीं देखने देते,
कोई मिलने
आता है, तो चौंक पड़ते हैं और
घबरायी हुई आवाज में बेरा से पूछते हैं, कौन
है ? तुम जानती हो, मैं धन की लौंडी नहीं।
मैं केवल विशुद्ध हृदय चाहती हूँ। जिसमें पुरुषार्थ है, प्रतिभा है, वह आज नहीं तो कल अवश्य
ही धनवान् होकर रहेगा। मैं इस कपट-लीला से जलती हूँ। अगर विनोद मुझसे अपनी कठिनाइयाँ
कह दें, तो मैं उनके साथ सहानुभूति
करूँगी, उन कठिनाइयों को दूर करने
में उनकी मदद करूँगी। यों मुझसे परदा करके यह मेरी सहानुभूती और सहयोग ही से हाथ नहीं
धोते, मेरे मन में अविश्वास, द्वेष और क्षोभ का बीज
बोते हैं। यह चिंता मुझे मारे डालती हैं। अगर इन्होंने अपनी दशा साफ-साफ बता दी होती, तो मैं यहाँ मंसूरी आती
ही क्यों ?
लखनऊ में
ऐसी गरमी नहीं पड़ती कि आदमी पागल हो जाय। यह हजारों रुपये क्यों पानी पड़ता। सबसे
कठिन समस्या जीविका की है। कई विद्यालयों में आवेदन-पत्र भेज रखे हैं।जवाब का इंतजार
कर रहे हैं। शायद इस महीने के अंत तक कहीं जगह मिल जाय। पहले तीन-बार सौ मिलेंगे। समझ
में नहीं आता,
कैसे काम
चलेगा। डेढ़ सौ रुपये तो पापा मेरे कालेज का खर्च देते थे। अगर दस-पाँच महीने जगह न
मिली तो यह क्या करें गे,
यह फिक्र
और भी खाये डालती है। मुश्किल यही है कि विनोद मुझसे परदा रखते हैं। अगर हम दोनों बैठकर
परामर्श कर लेते,
तो सारी
गुत्थियाँ सुलझ् जातीं। मगर शायद यह मुझे इस योग्य ही नहीं समझते। शायद इनका खयाल है
कि मैं केवल रेशमी गुड़िया हूँ,
जिसे भाँति-भाँति
के आभूषणों,
सुगंधों
और रेशमी वस्त्रों से सजाना ही काफी है। थिरेटर में कोई नया तमाशा होने वाला होता है, दौड़े हुए आकर मुझे खबर
देते हैं। कहीं कोई जलसा हो,
कोई खेल
हो, कहीं सैर करना हो उसकी
शुभ सूचना मुझे अविलम्ब दी जाती है और बड़ी प्रसन्नता के साथ, मानो मैं रात-दिन विनोद
और क्रीड़ा और विलास में मग्न रहना चाहती हूँ, मानो
मेरे हृदय में गंभीर अंश है ही नहीं। यह मेरा अपमान है; घोर अपमान, जिसे मैं अब नहीं सह सकती।
मैं अपने संपूर्ण अधिकार लेकर ही संतुष्ट हो सकती हूँ। बस, इस वक्त इतना ही।
बाकी फिर। अपने यहाँ का हाल-हवाल विस्तार से लिखना। मुझे अपने लिए जितनी चिंता है, उससे कम तुम्हारे लिए
नहीं है। देखो,
हम दोनों
के डोंगे कहाँ लगते हैं। तुम अपनी स्वदेशी, पाँच
हजार वर्षों की पुरानी जर्जर नौका पर बैठी हो,
मैं नये,
द्रुतगामी
मोटर-बोट पर। अवसर,
विज्ञान
और उद्योग। मेरे साथ हैं। लेकिन कोई दैवी विपत्ति आ जाय, तब भी इसी मोटर-बोट पर
डूबूँगी। साल में लाखों आदमी रेल के टक्करों से मर जाते हैं, पर कोई बैलगाडियों पर
यात्रा नहीं करता। रेलों का विस्तार बढ़ता ही जाता है। बस।
तुम्हारी,
पद्मा
6
गोरखपुर
25-9-25
प्यारी पद्मा,
कल तुम्हारा खत मिला, आज
जवाब लिख रही हूँ। एक तुम हो कि महीनों रटाती हो। इस विषय में तुम्हें मुझसे उपदेश
लेना चाहिए। विनोद बाबू पर तुम व्यर्थ ही आक्षेप लगा रही हो। तुमने क्यों पहले ही उनकी
आर्थिक दशा की जाँच-पड़ताल नहीं की ? बस, एक सुन्दर, रसिक, शिष्ट, वाणी-मधुर युवक देखा और
फूल उठीं ?
अब भी तुम्हारा
ही दोष है। तुम अपने व्यवहार से,
रहन-सहन
से सिद्ध कर दो कि तुममें गंभीर अंश भी हैं, फिर
देखूँ कि विनोद बाबू कैसे तुमसे परदा रखते हैं। और बहन, यह तो मानवी स्वभाव है।
सभी चाहते हैं कि लोग हमें संपन्न समझें। इस स्वाँग को अंत तक निभाने की चेष्टा की
जाती है और जो इस काम में सफल हो जाता है, उसी
का जीवन सफल समझा जाता है। जिस युग में धन ही सर्वप्रधान हो, मर्यादा, कीर्ति, यश—यहाँ तक कि विद्या भी
धन से खरीदी जा सके,
उस युग में
स्वाँग भरना एक लाजिमी बात हो जाती है। अधिकार योग्यता का मुँह ताकते हैं ! यही समझ
लो कि इन दोनों में फूल और फल का संबंध है। योग्यता का फूल लगा और अधिकार का फल आया।
इन ज्ञानोपदेश के बाद अब तुम्हें हार्दिक धन्यवाद देती हूँ। तुमने
पतिदेव के नाम जो पत्र लिखा था,
उसका बहुत
अच्छा असर हुआ। उसके पाँचवें ही दिन स्वामी का कृपापात्र मुझे मिला। बहन, वह खत पाकर मुझे कितनी
खुशी हुई,
इसका तुम
अनुमान कर सकती हो। मालूम होता था,
अंधे को
आँखें मिल गयी हैं। कभी कोठे पर जाती थी, कभी
नीचे आती थी। सारे में खलबली पड़ गयी। तुम्हें वह पत्र अत्यन्त निराशाजनक जान पड़ता, मेरे लिए वह संजीवन-मंत्र
था, आशादीपक था। प्राणेश ने
बारातियों की उद्दंडता पर खेद प्रकट किया था, पर
बड़ों के सामने वह जबान कैसे खोल सकते थे। फिर जनातियों ने भी, बारातियों का जैसा
आदर-सत्कार करना चाहिए था,
वैसा नहीं
किया। अन्त में लिखा था—‘प्रिये, तुम्हारे दर्शनों की कितनी
उत्कंठा है,
लिख नहीं
सकता। तुम्हारी कल्पित मूर्ति नित आँखों के सामने रहती है। पर कुल-मर्यादा का पालन
करना मेरा कर्त्तव्य है। जब तक माता-पिता का
रुख न पाऊँ,
आ नहीं सकता।
तुम्हारे वियोग में चाहे प्राण ही निकल जायँ, पर
पिता की इच्छा की उपेक्षा नहीं कर सकता। हाँ, एक
बात का दृढ़-निश्चय कर चुका हूँ—चाहे इधर की दुनियां उधर
हो जाय, कपूत कहलाऊँ, पिता के कोप का भागी बनूँ, घर छोड़ना पड़े पर अपनी
दूसरी शादी न करूँगा। मगर जहाँ तक मैं समझता हूँ, मामला
इतना तूल न खींचेगा। यह लोग थोड़े दिनों में नर्म पड़ जायँगे और तब मैं आऊँगा और अपनी
हृदयेश्वरी को आँखों पर बिठाकर लाऊँगा।
बस,
अब मै। संतुष्ट
हूँ बहन, मुझे और कुछ न चाहिए।
स्वामी मुझ पर इतनी कृपा रखते हैं, इससे अधिक और वह
क्या कर सकते हैं ! प्रियतम! तुम्हारी चन्दा सदस तुम्हारी रहेगी, तुम्हारी इच्छा
ही उसका कर्त्तव्य है। वह जब तक जिएगी, तुम्हारे
पवित्र चरणों से लगी रहेगी। उसे बिसारना मत।
बहन, आँखों में आँसू
भर आते हैं,
अब नहीं
लिखा जाता,
जवाब जल्द
देना।
तुम्हारी,
चन्दा
7
दिल्ली
15-12-25
प्यारी बहन,
तुझसे बार-बार क्षमा मॉँगती हूँ, पैरों
पड़ती हूँ। मेरे पत्र न लिखने का कारण आलस्य न था, सैर-सपाटे
की धुन न थी। रोज सोचती थी कि आज लिखूँगी, पर
कोई-न-कोई ऐसा काम आ पड़ता था,
कोई ऐसी
बात हो जाती थी;
कोई ऐसी
बाधा आ खड़ी होती थी कि चित्त अशांत हो जाता था और मुँह लपेट कर पड़ रहती थी। तुम मुझे
अब देखो तोशायद पहिचान न सको। मंसूरी से दिल्ली
आये एक महीना हो गया। यहाँ विनोद को तीन सौ रुपये की एक जगह मिल गयी है। यह सारा महीना
बाजार की खाक छानने में कटा। विनोद ने मुझे
पूरी स्वाधीनता दे रखी है। मैं जो चाहूँ, करूँ, उनसे कोई मतलब नहीं। वह
मेरे मेहमान हैं। गृहस्थी का सारा बोझ मुझ पर डालकर वह निश्चिंत हो गए हैं। ऐसा बेफिक्रा मैंने आदमी ही नहीं देखा। हाजिरी की
परवाह है,
न डिनर की, बुलाया तो आ गए, नहीं तो बैठे हैं। नौकरों
से कुछ बोलने की तो मानो इन्होंने कसम ही खा ली है। उन्हें डाटूँ तो मैं, रखूँ तो मैं, निकालूँ तो मैं, उनसे कोई मतलब ही नहीं।
मैं चाहती हूँ,
वह मेरे
प्रबन्ध की आलोचना करें, ऐब निकालें; मैं चाहती हूँ जब मैं
बाजार से कोई चीज लाऊँ,
तो वह बतावें
मैं जट गई या जीत आई;
मैं चहती
हूँ महीने के खर्च का बजट बनाते समय मेरे और उनके बीच में खूब बहस हो, पर इन अरमानों में से
एक भी पूरा नहीं होता। मैं नहीं समझती, इस
तरह कोई स्त्री कहाँ तक गृह-प्रबन्ध में सफल हो सकती है। विनोद के इस सम्पूर्ण आत्म-समर्पण
ने मेरी निज की जरूरतों के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रखी। अपने शौक की चीजें खुद खरीदकर
लाते बुरा मालूम होता है,
कम-से-कम
मुझसे नहीं हो सकमा। मैं जानती हूँ,
मैं अपने
लिए कोई चीज लाऊँ,
तो वह नाराज
न होंगे। नहीं,
मुझे विश्वास
है, खुश होंगे; लेकिन मेरा जी
चाहता है,
मेरे शौक
सिंगार की चीजें वह खुद ला कर दें। उनसे लेने में जो आनन्द है, वह खुद जाकर लाने में
नहीं। पिताजी अब भी मुझे सौ रुपया महीना देते हैं और उन रुपयों को मैं अपनी जरूरतों
पर खर्च कर सकती हूँ। पर न जाने क्यों मुझे भय होता है कि कहीं विनोदद समझें, मैं उनके रुपये खर्च किये
डालती हूँ। जो आदमी किसी बात पर नाराज नहीं हो सकता, वह
किसी बात पर खुश भी नहीं हो सकता। मेरी समझ में ही नहीं आता, वह किस बात से खुश और
किस बात से नाराज होते हैं। बस,
मेरी दशा
उस आदमी की-सी है,
जो बिना रास्ता जाने इधर-उधर भटकता फिरे। तुम्हें याद
होगा, हम दोनों कोई गणित का
प्रश्न लगाने के बाद कितनी उत्सुकता से उसका जवाब देखती थी; जब हमारा जवाब किताब के
जवाब से मिल जाता था,
तो हमें कितना हार्दिक आनन्द मिलता था। मेहनत सफल हुईं, इसका विश्वास हो जाता
था। जिन गणित की पुस्तकों में प्रश्नों के उत्तर न लिखे होते थे, उसके प्रश्न हल करने की
हमारी इच्छा ही न होती थी। सोचते थे, मेहनत
अकारथ जायगी। मैं रोज प्रश्न हल करती हूँ, पर
नहीं जानती कि जवाब ठीक निकला,
या गलत।
सोचो, मेरे चित्त की क्या दशा
होगी।
एक हफ्ता होता है,
लखनऊ की
मिस रिग से भेंट हो गई। वह लेडी डाक्टर हैं और मेरे घर बहुत आती-जाती हैं। किसी का
सिर भी धमका और मिस रिग बुलायी गयीं। पापा जब मेडिकल कालेज में प्रोफेसर थे, तो उन्होंने इन मिस रिग
को पढ़ाया था। उसका एहसान वह अब भी मानती हैं। यहाँ उन्हें देखकर भोजन का निमंत्रण
न देना अशिष्टता की हद होती। मिस रिग ने दावत
मंजूर कर ली। उस दिन मुझे जितनी कठिनाई हुई, वह
बयान नहीं कर सकती। मैंने कभी अँगरेजों के साथ टेबुल पर नहीं खाया। उनमें भोजन के क्या
शिष्टाचार हैं,
इसका मुझे
बिलकुल ज्ञान नहीं। मैंने समझा था, विनोद मुझे सारी बातें बता देंगे। वह बरसों अँगरेजों के
साथ इंग्लैंड रह चुके हैं। मैंने उन्हें मिस रिग के आने की सूचना भी दे दी। पर उस भले
आदमी ने मानो सुना ही नहीं। मैंने भी निश्चय किया, मैं तुमसे कुछ न पूछूँगी, यही न होगा कि मिस रिग
हँसेंगी। बला से। अपने ऊपर बार-बार झुँझलाती थी कि कहाँ मिस रिग को बुला बैठी। पड़ोस
के बँगलों में कई हमी-जैसे परिवार रहते हैं। उनसे सलाह ले सकती थी। पर यही संकोच होता
था कि ये लोग मुझे गँवारिन समझेंगे। अपनी इस विवशता पर थोड़ी देर तक आँसू भी बहाती
रही। आखिर निराश होकर अपनी बुद्धि से काम लिया। दूसरे दिन मिस रिग आयीं। हम दोनों भी
मेज पर बैठे। दावत शुरू हुई। मैं देखती थी कि विनोद बार-बार झेंपते थे और मिस रिग बार-बार
नाक सिकोड़ती थीं,
जिससे प्रकट
हो रहा था कि शिष्टाचार की मर्यादा भंग हो रही है। मैं शर्म के मारे मरी जाती थी। किसी
भाँति विपत्ति सिर सके टली। तब मैंने कान पकड़े कि अब किसी अँगरेज की दावत न करूँगी।
उस दिन से देख रही हूँ,
विनोद मुझसे
कुछ खिंचे हुए हैं। मैं भी नहीं बोल रही हूँ। वह शायद समझते हैं कि मैंने उनकी भद्द
करा दी। मैं समझ रही हूँ। कि उन्होंने मुझे लज्जित लज्जित किया। सच कहती हूँ, चन्दा, गृहस्थी के इन झंझटों
में मुझे अब किसी से हँसने बोलने का अवसर नहीं मिलता। इधर महीनों से कोई नयी पुस्तक
नहीं पढ़ सकी। विनोद की विनोदशीलता भी न जाने कहाँ चली गयी। अब वह सिनेमा या थिएटर
का नाम भी नहीं लेते। हाँ,
मैं चलूँ
तो वह तैयार हो जायेंगे। मैं चाहती हूँ, प्रस्ताव
उनकी ओर से हो,
मैं उसका
अनुमोदन करूँ। शायद वह पहिले की आदतें छोड़ रहे हैं। मैं तपस्या का संकल्प उनके मुख
पर अंकित पाती हूँ। ऐसा जान पड़ता है, अपने
में गृह-संचालन की शक्ति न पाकर उन्होंने सारा भार मुझ पर डाल दिया है। मंसूरी में
वह घर के संचालक थे। दो-ढाई महीने में पन्द्रह सौ खर्च किये। कहाँ से लाये, यह में अब तक नहीं जानती।
पास तो शायद ही कुछ रहा हो। संभव है किसी मित्र से ले लिया हो। तीन सौ रुपये महीने
की आमदनी में थिएटर और सिनेमा का जिक्र ही क्या ! पचास रुपये तो मकान ही के निकल जाते
हैं। मैं इस जंजाल से तंग आ गयी हूँ। जी चाहता है, विनोद
से कह दूँ कि मेरे चलाये यह ठेला न चलेगा। आप तो दो-ढाई घंटा यूनिवर्सिटी में काम करके
दिन-भर चैन करें,
खूब टेनिस
खेलें, खूब उपन्यास पढ़ें, खूब सोयें और मैं सुबह
से आधी रात तक घर के झंझटों में मरा करूँ। कई बार छेड़ने का इरादा किया, दिल में ठानकर उनके पास
गयी भी, लेकिन उनका सामीप्य मेरे
सारे संयम,
सारी ग्लानि, सारी विरक्ति को हर लेता
है। उनका विकसित मुखमंडल, उनके अनुरक्त नेत्र, उनके कोमल शब्द मुझ पर
मोहिनी मंत्र-सा डाल देते हैं। उनके एक आलिंगन में मेरी सारी वेदना विलीन हो जाती है।
बहुत अच्छा होता,
अगर यह इतने
रूपवान्, इतने मधुरभाषी, इतने सौम्य न होते। तब
कदाचित् मैं इनसे झगड़ बैठती,
अपनी कठिनाइयाँ
कह सकती। इस दशा में तो इन्होंने मुझे जैसे भेड़ बना लिया है। मगर माया को तोड़ने का
मौका तलाश कर रही हूँ। एक तरह से मैं अपना आत्म-सम्मान खो बैठी हूँ। मैं क्यों हर एक
बात में किसी की अप्रसन्नता से डरती रहती हूँ ? मुझमें
क्यों यह भाव नहीं आता कि जो कुछ मैं कर रही हूँ, वह
ठीक है। मैं इतनी मुखापेक्षा क्यों करती हूँ ? इस
मनोवृत्ति पर मुझे विजय पाना है,
चाहे जो
कुछ हो। अब इस वक्त विदा होती हूँ। अपने यहाँ के समाचार लिखना, जी लगा है।
तुम्हारी,
पद्मा
8
काशी
25-12-25
प्यारी पद्मा,
तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे कुछ दु:ख हुआ, कुछ हँसी आयी, कुछ क्रोध आया। तुम क्या
चाहती हो,
यह तुम्हें
खुद नहीं मालूम। तुमने आदर्श पति पाया है, व्यर्थ
की शंकाओं से मन को अशांत न करो। तुम स्वाधीनता चाहती थीं, वह तुम्हें मिल गयी। दो
आदमियों के लिए तीन सौ रुपये कम नहीं होते। उस पर अभी तुम्हारे पापा भी सौ रुपये दिये
जाते हैं। अब और क्या करना चाहिए?
मुझे भय
होता है कि तुम्हारा चित्त कुछ अव्यवस्थित हो गया है। मेरे पास तुम्हारे लिए सहानुभूति
का एक शब्द भी नहीं।
मैं पन्द्रह तारीख को काशी आ गयी। स्वामी स्वयं मुझे विदा कराने गये
थे। घर से चलते समय बहुत रोई। पहले मैं समझती थी कि लड़कियाँ झूठ-मूठ रोया करती हैं।
फिर मेरे लिए तो माता-पिता का वियोग कोई नई बात न थी। गर्मी, दशहरा और बड़े दिन की
छुट्टियों के बाद छ: सालों से इस वियोग का अनुभव कर रही हूँ। कभी आँखों में आँसू न
आते थे। सहेलियों से मिलने की खुशी होती थी। पर अबकी तो ऐसा जान पड़ता था कि कोई हृदय
को खींचे लेता है। अम्माँजी के गले लिपटकर तो मैं इतना रोई कि मुझे मूर्छा आ गयी। पिताजी
के पैरों पर लोट कर रोने की अभिलाषा मन में
ही रह गयी। हाय,
वह रुदन
का आनन्द ! उस समय पिता के चरणों पर गिरकर रोने के लिए मैं अपने प्राण तक दे देती।
यही रोना आता था कि मैंने इनके लिए कुछ न किया। मेरा पालन-पोषण करने में इन्होंने क्या
कुछ कष्ट न उठाया ! मैं जन्म की रोगिणी हूँ। रोज ही बीमार रहती थी। अम्माँजी रात-रात
भर मुझे गोद में लिये बैठी रह जाती थी। पिताजी के कन्धों पर चढ़कर उचकने की याद मुझे
अभी तक आती है। उन्होंने कभी मुझे कड़ी निगाह से नहीं देखा। मेरे सिर में दर्द हुआ
और उनके हाथों के तोते उड़ जाते थे। दस वर्ष की उम्र तक तो यों गए। छ: साल देहरादून
में गुजरे। अब,
जब इस योग्य
हुई कि उनकी कुछ सेवा करूँ,
तो यों पर
झाड़कर अलग हो गई। कुल आठ महीने तक उनके चरणों की सेवा कर सकी और यही आठ महीने मेरे
जीवन की निधि है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि मेरा जन्म फिर इसी गोद में हो
और फिर इसी अतुल पितृस्नेह का आनन्द भोगूँ।
सन्ध्या समय गाड़ी स्टेशन से चली। मैं जनाना कमरे में थी और लोग दूसरे
कमरे में थे। उस वक्त सहसा मुझे स्वामीजी को देखने की प्रबल इच्छा हुई। सान्त्वना, सहानुभूति और आश्रय के
लिए हृदय व्याकुल हो रहा था। ऐसा जान पड़ता था जैसे कोई कैदी कालापानी जा रहा हो।
घंटे भर के बाद गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। मैं पीछे की ओर खिड़की से
सिर निकालकर देखने लगी। उसी वक्त द्वार खुला और किसी ने कमरे में कदम रखा। उस कमरे
में एक औरत भी न थी। मैंने चौंककर पीछे देखा तो एक पुरुष। मैंने तुरन्त मुँह छिपा लिया
और बोली, आप कौन हैं ? यह जनाना कमरा है। मरदाने
कमरे में जाइए।
पुरुष ने खड़े-खड़े कहा—मैं
तो इसी कमरे में बैठूँगा। मरदाने कमरे में भीड़ बहुत है।
मैंने रोष से कहा—नहीं, आप इसमें नहीं बैठ सकते।
‘मैं तो बैठूँगा।’
‘आपको निकलना पड़ेगा। आप
अभी चले जाइये,
नहीं तो
मैं अभी जंजीर खींच लूँगी।’
‘अरे साहब, मैं भी आदमी हूँ, कोई जानवर नहीं हूँ। इतनी
जगह पड़ी हुई है। आपका इसमें हरज क्या है?’
गाड़ी ने सीटी दी। मैं और घबराकर बोली—आप निकलते हैं, या मैं जंजीर खींचूँ ?
पुरुष ने मुस्कराकर कहा—आप
तो बड़ी गुस्सावर मालूम होती हैं। एक गरीब आदमी पर आपको जरा भी दया नहीं आती ?
गाड़ी चल पड़ी। मारे क्रोध और लज्जा के मुझे पसीना आ गया। मैंने फौरन
द्वार खोल दिया और बोली—अच्छी बात है, आप बैठिए, मैं ही जाती हूँ।
बहन,
मैं सच कहती
हूँ, मुझे उस वक्त लेशमात्र
भी भय न था। जानती थी,
गिरते ही
मर जाऊँगी,
पर एक अजनबी
के साथ अकेले बैठने से मर जाना अच्छा था। मैंने एक पैर लटकाया ही था कि उस पुरुष ने
मेरी बाँह पकड़ ली और अन्दर खींचता हुआ बोला—अब
तक तो आपने मुझे कालेपानी भेजने का सामान कर दिया था। यहाँ और कोई तो है नहीं, फिर आप इतना क्यों घबराती
हैं। बैठिए,
जरा हँसिए-बोलिए।
अगले स्टेशन पर मैं उतर जाऊँगा,
इतनी देर
तक कृपा-कटाक्ष से वंचित न कीजिए। आपको देखकर दिल काबू से बाहर हुआ जाता है। क्यों
एक गरीब का खून सिर पर लीजिएगा।.......
मैंने झटककर अपना हाथ छुटा लिया। सारी देह काँपने लगी। आँखों में आँसू
भर आये। उस वक्त अगर मेरे पास कोई छुरी या कटार होती, तो मैंने जरूर उसे निकाल
लिया होता और मरने-मारने को तैयार हो गई होती। मगर इस दशा में क्रोध से ओंठ चबाने के
सिवा और क्या करती ! आखिर झल्लाना व्यर्थ समझकर मैंने सावधान होने की चेष्टा करके कहा—आप कौन हैं ? उसने उसी ढिठाई से कहा—तुम्हारे प्रेम का इच्छुक।
‘आप तो मजाक करते हैं।
सच बतलाइए।’
‘सच
बता रहा हूँ,
तुम्हारा
आशिक हूँ।’
‘अगर आप मेरे आशिक हैं, तो कम-से-कम इतनी
बात मानिए कि अगले स्टेशन पर उतर जाइए। मुझे बदनाम करके आप कुछ न पायेंगे। मुझ पर इतनी
दया कीजिए।’
मैंने हाथ जोड़कर यह बात कही। मेरा गला भी भर आया था। उस आदमी ने द्वार
की ओर जाकर कहा—अगर आपका यही हुक्म है, तो लीजिए, जाता हूँ। याद रखिएगा।
उसने द्वार खोल लिया और एक पाँव आगे बढ़ाया। मुझे मालूम हुआ वह नीचे
कूदने जा रहा है। बहन,
नहीं कह
सकती कि उस वक्त मेरे दिल की क्या दशा हुई। मैंने बिजली की तरह लपककर उसका हाथ पकड़
लिया और अपनी तरफ जोर से खींच लिया।
उसने ग्लानि से भरे हुए स्वर में कहा—‘क्यों खींच लिया, मैं तो चला जा रहा था।’
‘अगला स्टेशन आने दीजिए।’
‘जब आप भगा ही रही हैं, तो जितनी जल्द
भाग जाऊँ उतना ही अच्छा।’
‘मैं यह कब कहती हूँ कि
आप चलती गाड़ी से कूद पड़िए।’
‘अगर मुझ पर इतनी दया है, तो एक बार जरा
दर्शन ही दे दो।’
‘अगर आपकी स्त्री से कोई
दूसरा पुरुष बातें करता,
तो आपको
कैसा लगता?’
पुरुष ने त्योरियाँ चढ़ाकर कहा—‘मैं
उसका खून पी जाता।’
मैंने निस्संकोच होकर कहा—तो
फिर आपके साथ मेरे पति क्या व्यवहार करेंगे, यह
भी आप समझते होंगे ?
‘तुम अपनी रक्षा आप ही
कर सकती हो। प्रिये! तुम्हें पति की मदद की जरूरत ही नहीं। अब आओ, मेरे गले से लग जाओ। मैं
ही तुम्हारा भाग्यशाली स्वामी और सेवक हूँ।’
मेरा हृदय उछल पड़ा। एक बार मुँह से निकला—अरे! आप!!’ और मैं दूर हटकर
खड़ी हो गयी। एक हाथ लंबा घूँघट खींच लिया। मुँह से एक शब्द न निकला।
स्वामी ने कहा—अब यह शर्म और परदा कैसा?
मैंने कहा—आप बड़े छलिये हैं ! इतनी
देर तक मुझे रुलाने में क्या मजा आया?
स्वामी—इतनी देर में मैंने तुम्हें
जितना पहचान लिया,
उतना घर
के अन्दर शायद बरसों में भी न पहचान सकता। यह अपराध क्षमा करो। क्या तुम सचमुच गाड़ी
से कूद पड़तीं ?
‘अवश्य?’
‘बड़ी खैरियत हुई, मगर यह दिल्लगी बहुत दिनों
याद रहेगी।’
मेरे स्वामी
औसत कद के,
साँवले, चेचकरू, दुबले आदमी हैं। उनसके
कहीं रूपवान् पुरुष मैंने देखे हैं: पर मेरा हृदय कितना उल्लसित हो रहा था ! कितनी
आनन्दमय सन्तुष्टि का अनुभव कर रही थी, मैं
बयान नहीं कर सकती।
मैंने पूछा—गाड़ी कब तक पहुँचेगी
?
‘शाम को पहुँच जायेंगे।’
मैंने देखा,
स्वामी का
चेहरा कुछ उदास हो गया है। वह दस मिनट तक चुपचाप
बैठे बाहर की तरफ ताकते रहे। मैंने उन्हें केवल बात में लगाने ही के लिए यह अनावश्यक
प्रश्न पूछा था। पर अब भी जब वह न बोले तो मैंने फिर न छेड़ा। पानदान खोलकर पान बनाने
लगी। सहसा,
उन्होंने
कहा—चन्दा, एक बात कहूँ ?
मैंने कहा—हाँ-हाँ, शौक से कहिए।
उन्होंने सिर झुकाकर शर्माते हुए कहा—मैं जानता कि तुम इतनी
रूपवती हो,
तो मैं तुमसे
विवाह न करता। अब तुम्हें देखकर मुझे मालूम हो रहा है कि मैंने तुम्हारे साथ अन्याय
किया है। मैं किसी तरह तुम्हारे योग्य न था।
मैंने पान का बीड़ा उन्हें देते हुए कहा—ऐसी बातें न कीजिए। आप
जैसे हैं,
मेरे सर्वस्व
हैं। मैं आपकी दासी बनकर अपने भाग्य को धन्य मानती हूँ।
दूसरा स्टेशन आ गया। गाड़ी रुकी। स्वामी चले गये। जब-जब गाड़ी रुकती
थी, वह आकर दो-चार बातें कर
जाते थे। शाम को हम लोग बनारस पहुँच गए। मकान एक गली में है और मेरे घर से बहुत छोटा
है। इन कई दिनों में यह भी मालूम हो रहा है कि सासजी स्वभाव की रूखी हैं। लेकिन अभी
किसी के बारे में कुछ नहीं कह सकती। सम्भव है, मुझे
भ्रम हो रहा हो। फिर लिखूँगी। मुझे इसकी चिन्ता नहीं कि घर कैसा है, आर्थिक दशा कैसी है, सास-ससुर कैसे
हैं। मेरी इच्छा है कि यहाँ सभी मुझ से खुश रहें। पतिदेव को मुझसे प्रेम है, यह मेरे लिए काफी है।
मुझे और किसी बात की परवा नहीं। तुम्हारे बहनोईजी का मेरे पास बार-बार आना सासजी को
अच्छा नहीं लगता। वह समझती हैं,
कहीं यह
सिर न चढ़ जाय। क्यों मुझ पर उनकी यह अकृपा है, कह
नहीं सकती;
पर इतना
जानती हूँ कि वह अगर इस बात से नाराज होती हैं, तो
हमारे ही भले के लिए। वह ऐसी कोई बात क्यों
करेंगी, जिसमें हमारा हित न हो।
अपनी सन्तान का अहित कोई माता नहीं कर सकती। मुझ ही में कोई बुराई उन्हें नजर आई होगी।
दो-चार दिन में आप ही मालूम हो जाएगा ! अपने यहाँ के समाचार लिखना। जवाब की आशा एक
महीने के पहले तो है नहीं,
यों तुम्हारी
खुशी।
तुम्हारी,
चन्दा
9
दिल्ली
1-2-26
प्यारी बहन,
तुम्हारे प्रथम मिलन की कुतूहलमय कथा पढ़कर, चित्त प्रसन्न हो गया।
मुझे तुम्हारे ऊपर हसद हो रहा है। मेंने समझा था, तुम्हें
मुझ पर हसद होगा,
पर क्रिया
उलटी हो गयी, तुम्हें चारों
ओर हरियाली ही नजर आती है,
मैं जिधर
नजर डालती हूँ,
सूखे रेत
और नग्न टीलों के सिवा और कुछ नहीं। खैर ! अब कुछ मेरा वृत्तान्त सुनो—
“अब जिगर थामकर बैठो, मेरी बारी आयी।”
विनोद की अविचलित दर्शनिकता अब असह्य हो गयी है। कुछ विचित्र जीव हैं, घर में आग लगे, पत्थर पड़े इनकी बला से।
इन्हें मुझ पर जरा भी दया नहीं आती। मैं सुबह से शाम तक घर के झंझटों में कुढ़ा करूँ, इन्हें कुछ परवाह नहीं।
ऐसा सहानुभूति से खाली आदमी कभी नहीं देखा था। इन्हें तो किसी जंगल में तपस्या करनी
चाहिए थी। अभी तो खैर दो ही प्राणी हैं, लेकिन
कहीं बाल-बच्चे हो गये तब तो मैं बे-मौत मर जाऊँगी। ईश्वर न करे, वह दारुण विपत्ति मेरे
सिर पड़े।
चन्दा, मुझे अब दिल से
लगी हुई है कि किसी भाँति इनकी वह समाधि भंग कर दूँ। मगर कोई उपाय सफल नहीं होता, कोई चाल ठीक नहीं पड़ती।
एक दिन मैंने उनके कमरे के लंप का बल्व तोड़ दिया। कमरा अँधेरा पड़ा रहा। आप सैर करके
आये, तो कमरा अँधेरा देखा।
मुझसे पूछा,
मैंने कह
दिया बल्ब टूट गया। बस,
आपने भोजन
किया और मेरे कमरे में आकर लेट रहे। पत्रों और उपन्यासों की ओर देखा तक नहीं, न-जाने वह उत्सुकता कहाँ
विलीन हो गयी। दिन-भर गुजर गया,
आपको बल्व
लगवाने की कोई फिक्र नहीं। आखिर,
मुझी को
बाजार से लाना पड़ा।
एक दिन मैंने झुँझलाकर रसोइये को
निकाल दिया। सोचा जब लाला रात-भर भूखे सोयेंगे,
तब आँखें खुलेंगी। मगर इस भले आदमी ने कुछ पूछा तक नहीं। चाय न मिली, कुछ परवाह नहीं। ठीक दस
बजे आपने कपड़े पहने,
एक बार रसोई
की ओर जाकर देखा,
सन्नाटा
था। बस, कालेज चल दिये।
एक आदमी पूछता है,
महाराज कहाँ
गया, क्यों गया; अब क्या इन्तजाम होगा, कौन खाना पकायेगा, कम-से-कम इतना तो मुझसे
कह सकते थे कि तुम अगर नहीं पका सकती, तो
बाजार ही से कुछ खाना मँगवा लो। जब वह चले गए, तो
मुझे बड़ा पश्चात्ताप हुआ। रायल होटल से खाना मँगवाया और बैरे के हाथ कालेज भेज दिया।
पर खुद भूखी ही रही। दिन-भर भूख के मारे बुरा हाल था। सिर में दर्द होने लगा। आप कालेज
से आए और मुझे पड़े देखा तो ऐसे परेशान हुए मानो मुझे त्रिदोष है। उसी वक्त एक डाक्टर
बुला भेजा। डाक्टर आये,
आँखें देखी, जबान देखी, हरारत देखी, लगाने की दवा अलग दी, पीने की अलग, आदमी दवा लेने गया। लौटा
तो बारह रुपये का बिल भी था। मुझे इन सारी बातों पर ऐसा क्रोध आ रहा था कि कहाँ भागकर
चली जाऊँ। उस पर आप आराम-कुर्सी डालकर मेरी चारपाई के पास बैठ गए और एक-एक पल पर पूछने
लगे कैसा जी है ? दर्द कुछ कम हुआ ? यहाँ मारे भूख के आँतें
कुलकुला रही थी। दवा हाथ से छुई तक नहीं। आखिर झख मारकर मैंने फिर बैरे से खाना मंगवाया।
फिर चाल उलटी पड़ी। मैं डरी कि कहीं सबेरे फिर यह महाशय डाक्टर को न बुला बैठैं, इसलिए सबेरा होते ही हारकर
फिर घर के काम-धन्धे में लगी। उसी वक्त एक दूसरा महाराज बुलवाया। अपने पुराने महाराज
को बेकसूर निकालकर दण्डस्वरूप एक काठ के उल्लू को रखना पड़ा, जो मामूली चपातियाँ भी
नहीं पका सकता। उस दिन से एक नयी बला गले पड़ी। दोनों वक्त दो घंटे इस महाराज को सिखाने
में लग जाते हैं। इसे अपनी पाक-कला का ऐसा घमण्ड है कि मैं चाहे जितना बकूँ, पर करता अपने ही मन की
है। उस पर बीच-बीच में मुस्कराने लगता है, मानो
कहता हो कि ‘तुम इन बातों को क्या
जानो, चुपचाप बैठी देख्ती जाव।’ जलाने चली थी विनोद
को और खुद जल गयी। रुपये खर्च हुए, वह
तो हुए ही,
एक और जंजाल
में फँस गयी। मैं खुद जानती हूँ कि विनोद का डाक्टर को बुलाना या मेरे पास बैठे रहना
केवल दिखावा था। उनके चेहरे पर जरा भी घबराहट न थी, चित्त
जरा भी अशांत न था।
चंदा, मुझे क्षमा करना।
मैं नहीं जानती कि ऐसे पुरुष के पाले पड़कर तुम्हारी क्या दशा होती, पर मेरे लिए इस दशा में
रहना असह्य है। मैं आगे जो वृत्तान्त कहने वाली हूँ,
उसे सुनकर तुम नाक-भौं सिकोड़ोगी, मुझे कोसोगी, कलंकिनी कहोगी; पर जो चाहे कहो, मुझे परवा नहीं। आज चार
दिन होते हैं,
मैंने त्रिया-चरित्र
का एक नया अभिनय किया। हम दोनों सिनेमा देखने गये थे। वहाँ मेरी बगल में एक बंगाली
बाबू बैठे हुए थे। विनोद सिनेमा में इस तरह बैठते हैं, मानो ध्यानावस्था में
हों। न बोलना,
न चालना!
फिल्म इतनी सुन्दर थी,
ऐक्टिंग
इतनी सजीव कि मेरे मुँह से बार-बार प्रशंसा के शब्द निकल जाते थे। बंगाली बाबू को भी
बड़ा आनन्द आ रहा था। हम दोनों उस फिल्म पर आलोचनाएँ करने लगे। वह फिल्म के भावों की
इतनी रोचक व्याख्या करता था कि मन मुग्ध हो जाता था। फिल्म से ज्यादा मजा मुझे उसकी
बातों में आ रहा था। बहन,
सच कहती हूँ, शक्ल-सूरत
में वह विनोद के तलुओं की बराबरी भी नहीं कर सकता, पर
केवल विनोद को जलाने के लिए मैं उससे मुस्करा-मुस्करा कर बातें करने लगी। उसने समझा, कोई शिकार फँस गया। अवकाश
के समय वह बाहर जाने लगा,
तो मैं भी
उठ खड़ी हुई;
पर विनोद
अपनी जगह पर ही बैठे रहे।
मैंने कहा—बाहर चलते हो, मेरी तो बैठे-बैठे कमर
दुख गयी।
विनोद बोले—हाँ-हाँ चलो, इधर-उधर टहल आयें। मैंने
लापरवाही से कहा—तुम्हारा जी न चाहे तो
मत चलो, मैं मजबूर नहीं करती।
विनोद फिर अपनी जगह पर बैठते हुए बोले—अच्छी बात है।
मैं बाहर आयी तो बंगाली बाबू ने पूछा—क्या आप यहीं की रहने
वाली हैं ? ‘मेरे
पति यहाँ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं।’
‘अच्छा! वह आपके पति थे।
अजीब आदमी हैं।’
‘आपको तो मैंने शायद यहाँ
पहले ही देखा है।’
‘हाँ, मेरा मकान तो बंगाल में
है। कंचनपुर के महाराज साहब का प्राइवेट सेक्रेटरी हूँ। महाराजा साहब वाइसराय से मिलने
आये हैं। ’
‘तो अभी दो-चार दिन रहिएगा?’
‘जी हाँ, आशा तो करता हूँ। रहूँ
तो साल-भर रह जाऊँ। जाऊँ तो दूसरी गाड़ी से चला जाऊँ। हमारे महाराजा साहब का कुछ ठीक
नहीं। यों बड़े सज्जन और मिलनसार हैं। आपसे मिलकर बहुत खुश होंगे।
यह बातें करते-करते हम रेस्ट्राँ में पहुँच गये। बाबू ने चाय और टोस्ट
लिया। मैंने सिर्फ चाय ली।
‘तो इसी वक्त आपका महाराजा साहब से परिचय करा दूं। आपको
आश्चर्य होगा कि मुकुटधारियों में भी इतनी नम्रता और विनय हो सकती है। उनकी बातें सुनकर
आप मुग्ध हो जायँगी।’
मैंने आईने में अपनी सूरत देखकर कहा—जी नहीं, फिर किसी दिन पर रखिए।
आपसे तो अक्सर मुलाकात होती रहेगी। क्या आपकी स्त्री आपके साथ नहीं आयीं ?
युवक ने मुस्कराकर कहा—मैं
अभी क्वाँरा हूँ और शायद क्वाँरा ही रहूँ?
मैंने उत्सुक होकर पूछा—अच्छा!
तो आप भी स्त्रियों से भागने वाले जीवों में हैं। इतनी बातें तो हो गयी और आपका नाम
तक न पूछा।
बाबू ने अपना नाम भुवनमोहन दास गुप्त बताया। मैंने अपना परिचय दिया।
‘जी नहीं, मैं उन अभागों में हूँ, जो एक बार निराश होकर
फिर उसकी परीक्षा नहीं करते। रूप की तो संसार में कमी नहीं, मगर रूप और गुण का मेल
बहुत कम देखने में आता है। जिस रमणी से मेरा प्रेम था, वह आज एक बड़े वकील की
पत्नी है। मैं गरीब था। इसकी सजा मुझे ऐसी मिली कि जीवनपर्यन्त न भूलेगी। साल-भर तक
जिसकी उपासना की,
जब उसने
मुझे धन पर बलिदान कर दिया,
तो अब और
क्या आशा रखूँ?
मैंने हँसकर कहा—‘आपने बहुत जल्द हिम्मत
हार दी।’
भुवन ने सामने द्वार की ओर ताकते हुए कहा—मैंने आज तक ऐसा वीर ही
नहीं देखा,
जो रमणियों
से परास्त न हुआ हो। ये हृदय पर चोट करती हैं और हृदय एक ही गहरी चोट सह सकता है। जिस
रमणी ने मेरे प्रेम को तुच्छ समझकर पैरों से कुचल दिया, उसको मैं दिखाना चाहता
हूँ कि मेरी आँखों में धन कितनी तुच्छ वस्तु है, यही
मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। मेरा जीवन उसी दिन सफल होगा, जब विमला के घर के सामने
मेरा विशाल भवन होगा और उसका पति मुझसे मिलने में अपना सौभाग्य समझेगा।
मैंने गम्भीरता से कहा—यह
तो कोई बहुत ऊँचा उद्देश्य नहीं है। आप यह क्यों समझते हैं कि विमला ने केवल धन के
लिए आपका परित्याग किया। सम्भव है,
इसके और
भी कारण हों। माता-पिता ने उस पर दबाव डाला हो, या
अपने ही में उसे कोई ऐसी त्रुटि दिखलाई दी हो,
जिससे आपका जीवन दु:खमय हो जाता। आप यह क्यों समझते हैं कि जिस प्रेम
से वंचित होकर आप इतने दु:खी हुए, उसी
प्रेम से वंचित होकर वह सुखी हुई होगी। सम्भव था, कोई
धनी स्त्री पाकर आप भी फिसल जाते।
भुवन ने जोर देकर कहा—यह
असम्भव है,
सर्वथा असम्भव
है। मैं उसके लिए त्रिलोक का राज्य भी त्याग देता।
मैंने हँसकर कहा—हाँ, इस वक्त आप ऐसा कह सकते
हैं; मगर ऐसी परीक्षा में पड़कर
आपकी क्या दशा होती,
इसे आप निश्चयपूर्वक
नहीं बता सकते। सिपाही की बहादुरी का प्रमाण उसकी तलवार है, उसकी जबान नहीं। इसे अपना
सौभाग्य समझिए कि आपको उस परीक्षा में नहीं पड़ना पड़ा। वह प्रेम, प्रेम नहीं है, जो प्रत्याघात की शरण
ले। प्रेम का आदि भी सहृदयता है और अन्त भी सहृदयता। सम्भव है, आपको अब भी कोई ऐसी बात
मालूम हो जाय,
जो विमला
की तरफ से आपको नर्म कर दे।
भुवन गहरे विचार में डूब गया। एक मिनट के बाद उन्होंने सिर उठाया।
और बोले—‘मिसेज विनोद, आपने आज एक ऐसी बात सुझा
दी, जो आज तक मेरे ध्यान में
आयी ही न थी। यह भाव कभी मेरे मन में उदय ही नहीं हुआ। मैं इतना अनुदार क्यों हो गया, समझ में नहीं आता। मुझे
आज मालूम हुआ कि प्रेम के ऊँचे आदर्श का पालन रमणियाँ ही कर सकती हैं। पुरुष कभी प्रेम
के लिए आत्म-समर्पण नहीं कर सकता —
वह प्रेम
को स्वार्थ और वासना से पृथक नहीं कर सकता। अब मेरा जीवन सुखमय हो जायगा। आपने मुझे
आज शिक्षा दी है,
उसके लिए
आपको धन्यवाद देता हूँ।’
यह कहते-कहते भुवन सहसा चौंक पड़े और बोले—ओह! मैं कितना बड़ा मूर्ख
हूँ—सारा रहस्य समझ में आ
गया, अब कोई बात छिपी नहीं
है। ओह, मैंने विमला के साथ घोर
अन्याय किया! महान् अन्याय! मैं बिल्कुल अंधा
हो गया था। विमला,
मुझे क्षमा
करो।
भुवन इसी तरह देर तक विलाप करते रहे। बार-बार मुझे धन्यवाद देते थे
और मूर्खता पर पछताते थे। हमें इसकी सुध ही न रही कि कब घंटी बजी, कब खेल शुरू हुआ। यकायक
विनोद कमरे में आए। मैं चौंक पड़ी। मैंने उनके मुख की ओर देखा, किसी भाव का पता न था।
बोले—तुम अभी यही हो, पद्मा! खेल शुरू हुए तो
देर हुई! मैं चारों तरफ तुम्हें खोज रहा था।
मैं हकबकाकर उठ खड़ी हुई और बोली—खेल
शुरू हो गया?
घंटी की
आवाज तो सुनायी ही नहीं दी।
भुवन भी उठे। हम फिर आकर तमाशा देखने लगे। विनोद ने मुझे अगर इस वक्त
दो-चार लगने वाली बातें कह दी होतीं, उनकी
आँखों में क्रोध की झलक दिखायी देती, तो
मेरा अशान्त हृदय सँभल जाता,
मेरे मन
को ढाढ़स होती,
पर उनके
अविचलित विश्वास ने मुझे और भी अशांत कर दिया। बहन, मैं
चाहती हूँ,
वह मुझ पर
शासन करें। मैं उनकी कठोरता,
उनकी उद्दण्डता, उनकी बलिष्ठता का रूप
देखना चाहती हूँ। उनके प्रेम,
प्रमोद, विश्वास का रूप देख चुकी।
इससे मेरी आत्मा को तृप्ति नहीं होती ! तुम उस पिता को क्यों कहोगी, जो अपने पुत्र को अच्छा
खिलाये, अच्छा पहनाये, पर उसकी शिक्षा-दीक्षा
की कुछ चिनता न करे;
वह जिस राह
जाय, उस राह जाने दे; जो कुछ करे, वह करने दे। कभी उसे कड़ी
आँख से देखे भी नहीं। ऐसा लड़का अवश्य ही आवारा हो जायगा। मेरा भी वही हाल हुआ जाता
है। यह उदासीनता मेरे लिए असह्य है। इस भले आदमी ने यहाँ तक न पूछा कि भुवन कौन है
? भुवन ने यही तो समझा होगा
कि इसका पति इसकी बिल्कुल परवाह नहीं करता। विनोद खुद स्वाधीन रहना चाहते हैं, मुझे भी स्वाधीन छोड़
देना चाहते हैं। वह मेरे किसी काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते। इसी तरह चाहते हैं
कि मैं भी उनके किसी काम में हस्तक्षेप न करूँ
मैं इस स्वाधीनता को दोनों ही के लिए विष तुल्य समझती हूँ। संसार में स्वाधीनता
का चाहे जो भी मूल्य हो,
घर में तो
पराधीनता ही फलती-फूलती है। मैं जिस तरह अपने एक जेवर को अपना समझती हूँ, उसी तरह विनोद को अपना
समझना चाती हूँ। अगर मुझसे पूछे बिना विनोद उसे किसी को दे दें, तो मैं लड़ पड़ूँगी। मैं
चाहती हूँ,
कहाँ हूँ, क्या पढ़ती हूँ, किस तरह जीवन जीवन व्यतीत
करती हूँ,
इन सारी
बातों पर उनकी तीव्र दृष्टि रहनी चाहिए। जब वह मेरी परवाह नहीं करते, तो मैं उनकी परवाह क्यों
करूँ? इस खींचातानी में हम एक-दूसरे
से अलग होते चले जा रहे हैं और क्या कहूँ, मुझे
कुछ नहीं मालूम कि वह किन मित्रों को रोज पत्रा लिखते हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी कुछ नहीं पूछा। खैर, मैं क्या लिख रही थी, क्या कहने लगी। विनोद
ने मुझसे कुछ नहीं पूदा। मैं फिर भुवन से फिल्म के सम्बन्ध में बातें करने लगी।
जब खेल खत्म हो गया और हम लोग बाहर आए और ताँगा ठीक करने लगे, तो भुवन ने कहा—‘मैं अपनी कार में आपको
पहुँचा दूँगा।’
हमने कोई आपत्ति नहीं की। हमारे मकान का पता पूछकर भुवन ने कार चला
दी। रास्ते में मैंने भुवन से कहा—‘कल मेरे यहाँ दोपहर का
खाना खाइएगा।’
भुवन ने
स्वीकार कर लिया।
भुवन तो हमें पहुँचाकर चले गए, पर
मेरा मन बड़ी देर तक उन्हीं की तरफ लगा रहा। इन दो-तीन घंटों में भुवन को जितना समझी, उतना विनोद को आज तक नहीं
समझी। मैंने भी अपने हृदय की जितनी बातें उससे कह दीं, उतनी विनोद से आज तक नहीं
कहीं। भुवन उन मनुष्यों में है,
जो किसी
पर पुरुष को मेरी कुदृष्टि डालते देखकर उसे मार डालेगा। उसी तरह मुझे किसी पुरुष से
हँसते देखकर मेरा खून पी लेगा और जरूरत पड़ेगी, तो
मेरे लिए आग में कूद पड़ेगा। ऐसा ही पुरुष-चरित्र मेरे हृदय पर विजय पर सकता है।मेरे
ही हृदय पर नहीं, नारी-जाति (मेरे
विचार में) ऐसे ही पुरुष पर जान देती हैं। वह निर्बल है, इसलिए बलवान् का आश्रय
ढूँढ़ती है।
बहन, तुम ऊब गई होगी, खत बहुत लम्बा हो गया; मगर इस काण्ड को समाप्त
किए बिना नहीं रहा जाता। मैंने सबेरे ही से भुवन की दावत की तैयारी शुरू कर दी। रसोइया
तो काठ का उल्लू है,
मैंने सारा
काम अपने हाथ से किया। भोजन बनाने में ऐसा आनन्द मुझे और कभी न मिला था।
भुवन बाबू की कार ठीक समय पर आ पहुँची। भुवन उतरे और सीधे मेरे कमरे
में आए। दो-चार बातें हुईं। डिनर-टेबल पर जा बैठे। विनोद भी भोजन करने आए। मैंने उन
दोनों आदमियों का परिचय करा दिया। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि विनोद ने भुवन की ओर से कुछ
उदासीनता दिखायी। इन्हें राजाओं-रईसों से चिढ़ है, साम्यवादी
हैं। जब राजाओं से चिढ़ है तो उनके पिट्ठुओं से क्यों न होती। वह समझते हैं, इन रईसों के दरबार में
खुशामदी, निकम्मे, सिद्धान्तहीन, चरित्रहीन लोगों का जमघट
रहता है, जिनका इसके सिवाय और कोई
काम नहीं कि अपने रईस की हर एक उचित-अनुचित इच्छा पूरी करें और प्रजा का गला काटकर
अपना घर भरें। भोजन के समय बातचीत की धारा घूमते-घूमते विवाह और प्रेम-जैसे महत्त्व
के विषय पर आ पहुँची।
विनोद ने कहा—‘नहीं, मैं वर्तमान वैवाहिक प्रथा
को पसन्द नहीं करता। इस प्रथा का आविष्कार उस समय हुआ था, जब मनुष्य सभ्यता की प्रारम्भिक
दशा में था। तब से दुनियां बहुत आगे बढ़ी है। मगर विवाह प्रथा में जौ-भर भी अन्तर नहीं
पड़ा। यह प्रथा वर्तमान काल के लिए इपयोगी नहीं।’
भुवन ने कहा—‘आखिर आपको इसमें क्या
दोष दिखाई देते हैं ?
विनोद ने विचारकर कहा—‘इसमें
सबसे बड़ा ऐब यह है कि यह एक सामाजिक प्रश्न को धार्मिक रूप दे देता है।’
‘और दूसरा?’
‘दूसरा यह कि यह व्यक्तियों
की स्वाधीनता में बाधक हैं। यह स्त्रीव्रत और पतिव्रत का स्वाँग रचकर हमारी आत्मा को
संकुचित कर देता है। हमारी बुद्धि के विकास में जितनी रुकावट इस प्रथा ने डाली है, उतनी और किसी भौतिक या
दैविक क्रांति से भी नहीं हुई। इसने मिथ्या आदर्शों को हमारे सामने रख दिया और आज तक
हम उन्हीं पुरानी,
सड़ी हुई, लज्जाजनक पाशविक लकीरों
को पीटते जाते हैं। व्रत केवल एक निरर्थक बंधन का नाम है। इतना महत्त्वपूर्ण नाम देकर
हमने उस कैद को धार्मिक रूप दे दिया है। पुरुष क्यों चाहता है कि स्त्री उसको अपना ईश्वर, अपना सर्वस्व समझे ? केवल इसलिए कि वह उसका
भरण-पोषण करता है। क्या स्त्री का कर्त्तव्य केवल पुरुष की सम्पत्ति के लिए वारिस पैदा
करना है? उस सम्पत्ति के लिए जिस
पर, हिन्दू नीतिशास्त्र
के अनुसार,
पति के देहान्त
के बाद उसका कोई अधिकार नहीं रहता। समाज की यह सारी व्यवस्था, सारा संगठन सम्पत्ति-रक्षा
के आधार पर हुआ है। इसने सम्पत्ति को प्रधान और व्यक्ति को गौण कर दिया है। हमारे ही
वीर्य से उत्पन्न सन्तान हमारी कमाई हुई जायदाद का भोग करे, इस मनोभाव में कितनी स्वार्थान्धता, कितना दासत्व छिपा
हुआ है, इसका कोई अनुमान नहीं कर सकता। इस कैद में जकड़ी
हुई समाज की सन्तान यदि आज घर में,
देश में, संसार में, अपने क्रूर स्वार्थ के
लिए रक्त की नदियाँ बहा रही है,
तो क्या
आश्चर्य है। मैं इस वैवाहिक प्रथा को सारी बुराइयों का मूल समझता हूँ।
भुवन चकित हो गया। मैं खुद
चकित हो गई। विनोद ने इस विषय पर मुझसे कभी इतनी स्पष्टता से बातचीत न की थी। मैं यह
तो जानती थी,
वह साम्यवादी
हैं, दो-एक बार इस विषय पर
उनसे बहस भी कर चुकी हूँ , पर वैवाहिक प्रथा के वे
इतने विरोधी हैं,
यह मुझे
मालूम न था। भुवन के चेहरे से ऐसा प्रकट होता था कि उन्होंने ऐसे दार्शनिक विचारों
की गंध तक नहीं पाई। जरा देर के बाद बोले—प्रोफेसर
साहेब, आपने तो मुझे एक बड़े
चक्कर में डाल दिया। आखिर आप इस प्रथा की जगह कोई और प्रथा रखना चाहते हैं या विवाह
की आवश्यकता ही नहीं समझते ?
जिस तरह
पशु-पक्षी आपस में मिलते हैं,
वह हमें
भी करना चाहिए?
विनोद ने तुरंत उत्तर दिया—बहुत
कुछ। पशु-पखियों में सभी का मानसिक विकास एक-सा नहीं है। कुछ ऐसे हैं, जो जोड़े के चुनाव में कोई विचार नहीं रखते। कुछ ऐसे
हैं, जो एक बार बच्चे पैदा
करने के बाद अलग हो जाते हैं, और कुछ ऐसे हैं, जो जीवनपर्यन्त एक साथ
रहते हैं। कितनी ही भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। मैं मनुष्य होने के नाते उसी श्रेणी
को श्रेष्ठ समझता हूँ,
जो जीवनपर्यन्त एक साथ रहते हैं। मगर स्वेच्छा से।
उनके यहाँ कोई कैद नहीं,
कोई सजा
नहीं। दोनों अपने-अपने चारे-दाने की फिक्र करते हैं। दोनों मिलकर रहने का स्थान बनाते
हैं, दोनों साथ बच्चों का पालन
करते हैं। उनके बीच में कोई तीसरा नर या मादा आ ही नहीं सकता, यहाँ तक कि उनमें से जब
एक मर जाता है तो दूसरा मरते दम तक फुट्टैल रहता है। यह अन्धेर मनुष्य-जाति ही में
है कि स्त्री ने किसी दूसरे पुरुष से हँसकर बात की और उसके पुरुष की छाती पर साँप लोटने
लगा, खून-खराबे के मंसूबे
सोचे जाने लगे। पुरुष ने किसी दूसरी स्त्री की ओर रसिक नेत्रों से देखा और अर्धांगिनी
ने त्योरियाँ बदलीं,
पति के प्राण
लेने को तैयार हो गई। यह सब क्या है ? ऐसा
मनुष्य-समाज सभ्यता का किस मुँह से दावा कर सकता है ?
भुवन ने सिर सहसलाते हुए कहा—मगर
मनुष्यों में भी तो भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। कुछ लोग हर महीने एक नया जोड़ा खोज
निकालेंगे।
विनोद ने हँसकर कहा—लेकिन
यह इतना आसान काम न होगा। या तो वह ऐसी स्त्री चाहेगा, जो सन्तान का पालन स्वयं
कर सकती हो या उसे एक मुश्त सारी रकम अदा करना पड़ेगी !
भुवन भी हँसे—आप अपने को किस श्रेणी
में रक्खेंगे?
विनोद इस प्रश्न के लिए तैयार न थ। था भी बेढंगा-सा सवाल। झेंपते हुए
बोले—परिस्थितियाँ जिस श्रेणी
में ले जायँ। मैं स्त्री और पुरुष दोनों के लिए पूर्ण स्वाधीनता का हामी हूँ। कोई कारण
नहीं है कि मेरा मन किसी नवयौवना की ओर आकर्षित हो और वह भी मुझे चाहे तो भी मैं समाज
और नीति के भय से उसकी ओर ताक न सकूँ। मैं इसे पाप नहीं समझता।
भुवन अभी कुछ उत्तर न देने पाये थे कि विनोद उठ खड़े हुए। कालेज के
लिए देर हो रही थी। तुरन्त कपड़े पहने और चल दिये। हम दोनों दीवानखाने में आकर बैठे और बातें करने लगे।
भुवन ने सिगार जलाते हुए कहा—‘कुछ
सुना’ कहाँ जाकर तान
टूटी?
मैंने मारे शर्म के सिर झुका लिया। क्या जवाब देती। विनोद की अन्तिम बात ने मेरे हृदय पर कठोर आघात किया था।
मुझे ऐसा मालूम हो रहा था कि विनोद ने केवल मुझे सुनाने के लिए विवाह का यह नया खण्डन
तैयार किया है। वह मुझसे पिंड छुड़ा लेना चाहते हैं। वह किसी रमणी की ताक में हैं, मुझसे उनका जी भर गया।
वह ख्याल करके मुझे बड़ा दु:ख हुआ। मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। कदाचित् एकांत में
मैं न रोती,
पर भुवन
के सामने मैं संयत न रह सकी। भुवन ने मुझे बहुत सांत्वना दी—‘आप व्यर्थ इतना शोक करती
हैं। मिस्टर विनोद आपका मान न करें;
पर संसार
में कम-से-कम एक ऐसा व्यक्ति है,
जो आपके
संकेत पर अपने प्राण तक न्योछावर कर सकता। आप-जैसी रमणी-रत्न पाकर संसार में ऐसा कौन
पुरुष है,
जो अपने
भाग्य को धन्य न मानेगा। आप इसकी बिलकुल चिन्ता न करें।’
मुझे भुवन की यह बात बुरी मालूम हुई।
क्रोध से मेरा मुख लाल हो गया। यह धूर्त मेरी इस दुर्बलता से लाभ उठाकर मेरा सर्वनाश
करना चाहता है। अपने दुर्भाग्य पर बराबर रोना आता था। अभी विवाह हुए साल भी नहीं पूरा
हुआ, मेरी यह दशा हो गई कि
दूसरों को मुझे बहकाने और मुझ पर अपना जादू चलाने का साहस हो रहा है। जिस वक्त मैंने
विनोद को देखा था, मेरा हृदय कितना फूल उठा
था। मैंने अपने हृदय को कितनी भक्ति से उनके चरणों पर अर्पण किया था। मगर क्या जानती
थी कि इतनी जल्द मैं उनकी आँखों से गिर जाऊँगी और मुझे परित्यक्ता समझ, फिर शोहदे मुझ
पर डोरे डालेंगे।
मैंने आँसू पोंछते हुए कहा—मैं
आपसे क्षमा माँगती हूँ। मुझे जरा विश्राम लेने दीजिए।
‘हाँ-हाँ, आराम करें; मैं बैठा देखता रहूँगा।’
‘जी नहीं, अब आप कृपा करके जाइए।
यों मुझे आराम न मिलेगा।’
‘अच्छी बात है, आप आराम कीजिए। मैं सन्ध्या-समय आकर देख जाऊँगा।’
‘जी नहीं, आपको कष्ट करने की कोई
जरूरत नहीं है।’
‘अच्छा तो मैं कल जाऊँगा।
शायद महाराजा साहब भी आवें।’
‘नहीं, आप लोग मेरे बुलाने का
इन्तजार कीजिएगा। बिना बुलाये न आइएगा।’
‘यह कहती हुई मैं उठकर
अपने सोने के कमरे की ओर चली। भुवन एक क्षण मेरी ओर देखता रहा, फिर चुपके से चला गया।
बहन,
इसे दो दिन
हो गये हैं। पर मैं कमरे से बाहर नहीं निकली। भुवन दो-तीन बार आ चुका है, मगर मैंने उससे
मिलने से साफ इनकार कर दिया। अब शायद उसे फिर आने का साहस न होगा। ईश्वर ने बड़े नाजुक
मौके पर मुझे सुबुद्धि प्रदान की, नहीं
तो मैं अब तक अपना सर्वनाश कर बैठी होती। विनोद प्राय: मेरे पास ही बैठे रहते हैं।
लेकिन उनसे बोलने को मेरा जी नहीं चाहता। जो पुरुष व्यभिचार का दाशर्निक सिद्धांतों
से समथर्न कर सकता है,
जिसकी आँखों
में विवाह-जैसे पवित्र बन्धन को कोई मूल्य नहीं, जो
न मेरा हो सकता है,
न मुझे अपना
बना सकता है,
उसके साथ
मुझ-जैसी मानिनी गर्विणी स्त्री का कै दिन निर्वा
होगा!
बस,
अब विदा
होती हूँ। बहन,
क्षमा करना।
मैंने तुम्हारा बहुत-सा अमूल्य समय ले लिया। मगर इतना समझ लो कि मैं तुम्हारी दया नहीं, सहानुभूति चाहती हूँ।
तुम्हारी,
पद्मा
10
काशी
5-1-26
बहन,
तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे ऐसा मालूम हुआ कि कोई उपन्यास पढ़कर उठी
हूं। अगर तुम उपन्यास लिखों,
तो मुझें
विश्वास है,
उसकी धूम
मच जाय। तुम आप उसकी नायिका बन जाना। तुम ऐसी-ऐसी बातें कहॉँ सीख गयी, मुझें तो यही आश्चर्य
है। उस बंगाली के साथ तुम अकेली कैसी बैठी बातें करती रहीं, मेरी तो समझ नहीं आता।
मैं तो कभी न कर सकती। तुम विनोद को जलाना चाहती हो, उनके
चित्त को अशांत करना चाहती हो। उस गरीब के साथ तुम कितना भयंकर अन्याय कर रही हो !
तुम यह क्यों समझती हो कि विनोद तुम्हारी उपेक्षा कर रहे हैं, अपने विचारों में इतने
मग्न है कि उनकी रुचि ही नहीं रही। संभव है, वह
कोई दार्शनिक तत्व खोज रहें हो,
कोई थीसिस
लिख रहीं हो,
किसी पुस्तक
की रचना कर रहे हों। कौन कह सकता है ? तुम
जैसी रुपवती स्त्री पाकर यदि कोई मनुष्य चिन्तित रहे, तो समझ लो कि उसके
दिल पर कोई बड़ा बोझ हैं। उनको तुम्हारी सहानुभूति की जरुरत है, तुम उनका बोझ हलका
कर सकती हों। लेकिन तुम उलटे उन्हीं को दोष
देती हों। मेरी समझ में नही आता कि तुम एक
दिन क्यों विनोद से दिल खोलकर बातें नहीं कर लेती, संदेह को जितनी जल्द हो
सकें, दिल से निकाल डालना चाहिए।
संदेह वह चोट है, जिसका उपच जल्द
न हो,
तो नासूर
पड़ जाता है और फिर अच्छा नहीं होता। क्यों दो-चार दिनों के लिए यहॉँ नहीं चली आतीं
? तुम शायद कहो, तू ही क्यों नहीं चली
आती। लेकिन मै स्वतन्त्र नही हूँ,
बिना सास-ससुर
से पूछे कोई काम नहीं कर सकती। तुम्हें तो
कोई बंधन नहीं है।
बहन, आजकल मेरा जीवन
हर्ष और शोक का विचित्र मिश्रण हो रहा हैं। अकेली होती हूँ, तो रोती हूं, आनन्द आ जाते है तो हॅंसती
हूँ। जी चाहता है,
वह हरदम
मेरे सामने बैठे रहते। लेकिन रात के बारह बजे के पहले उनके दर्शन नहीं होते। एक दिन
दोपहर को आ गयें,
तो सासजी
ने ऐसा डॉंटा कि कोई बच्चे को क्या डॉंटेगा। मुझें ऐसा भय हो रहा है कि सासजी को मुझसे
चिढ़ हैं। बहन,
मैं उन्हें
भरसक प्रसन्न रखने की चेष्टा करती हूँ। जो काम कभी न किये थे, वह उनके लिए करती हूँ, उनके स्नान के लिए पानी
गर्म करती हूँ,
उनकी पूजा
के लिए चौकी बिछाती हूँ। वह स्नान कर लेती हैं, तो
उनकी धोती छॉँटती हूँ,
वह लेटती
हैं तो उनके पैर दबाती हूँ;
जब वह सो
जाती है तो उन्हें पंखा झलती हूँ। वह मेरी माता हैं, उन्ही
के गर्भ से वह रत्न उत्पन्न हुआ है जो मेरा प्राणधार है। मै उनकी कुछ सेवा कर सकूँ, इससे बढकर मेरे लिए सौभाग्य
की और क्या बात होगी। मैं केवल इतना ही चाहती हूँ कि वह मुझसे हँसकर बोले, मगर न जाने क्यों वह बात-बात
पर मुझे कोसने दिया करती हैं। मैं जानती हूँ, दोष
मेरा ही हैं। हॉँ,
मुझे मालूम
नहीं, वह क्या हैं। अगर मेरा
यही अपराध है कि मैं अपनी दोनों नन्दों से रुपवती क्यों हूँ, पढ़ी-लिखी क्यों हूँ, आन्नद मुझें इतना क्यों
चाहते हैं,
तो बहन, यह मेरे बस की
बात नही। मेरे प्रति सासजी को भ्रम होता होगा कि मैं ही आन्नद को भरमा रहीं हूँ। शायद
वह पछताती है कि क्यों मुझें बहू बनाया ! उन्हे भय होता है कि कहीं मैं उनके बैटे को
उनसे छीन न लूँ। दो-एक बार मुझे जादूगरनी कही चुकी हैं। दोनों ननदें अकारण ही मुझसे
जलती रहती है। बड़ी ननदजी तो अभी कलोर हैं, उनका
जलना मेरी समझ में नही आता। मैं उनकी जगह होती,तो
अपनी भावज से कुछ सीखने की,
कुछ पढ़ने
की कोशिश करती,
उनके चरण
धो-धोकर पीती,
पर इस छोकरी
को मेरा अपमान करने ही में आन्नद आता हैं। मैं जानती हूँ, थोड़े दिनों में दोनों
ननदें लज्जित होंगी। हॉँ, अभी वे मुझसे बिचकती
हैं। मैं अपनी तरफ से तो उन्हें अप्रसन्न होने को कोई अवसर नहीं देती।
मगर रुप को क्या करुँ। क्या जानती थी कि एक दिन इस रुप के कारण मैं
अपराधिनी ठहरायी जाऊँगी। मैं सच कहती हूँ बहन, यहाँ
मैने सिगांर करना एक तरह से छोड़ ही दिया हैं। मैली-कुचैली बनी बेठी रहती हूँ। इस भय से कि कोई मेरे पढ़ने-लिखने पर नाक न
सिकोड़े, पुस्तकों को हाथ नहीं
लगाती। घर से पुस्तकों का एक गटठर बॉँध लायी थी। उसमें कोई पुस्तकें बड़ी सुन्दर हैं।
उन्हें पढ़ने के लिए बार-बार जी चाहता हैं, मगर
छरती हूँ कि कोई ताना न दे बैठे। दोनों ननदें मुझें देखती रहती हैं कि यह क्या करती हैं, कैसे
बैठती है,
कैसे बोलती
है, मानो दो-दो जासूस मेरे
पीछे लगा दिए गए हों। इन दोनों महिलाओं को मेरी बदगोई में क्यों इतना मजा आता हैं, नही कह सकती। शायद आजकल
उन्हे सिवा दूसरा काम ही नहीं। गुस्सा तो ऐसा आता हैं कि एक बार झिढ़क दूँ, लेकिन मन को समझाकर रोक
लेती हूँ। यह दशा बहुत दिनों नहीं रहेगी। एक नए आदमी से कुछ हिचक होना स्वाभाविक ही
है, विशेषकर जब वह नया आदमी
शिक्षा और विचार व्यवहार में हमसे अलग हो। मुझी को अगर किसी फ्रेंच लेडी के साथ रहना
पड़े, तो शायद मे भी उसकी हरएक
बात को आलोचना और कुतूहल की दृष्टि से देखने लगूँ। यह काशीवासी लोग पूजा-पाठ बहुत करते
है। सासजी तो रोज गंगा-स्नान करने जाती हैं। बड़ी ननद भी उनके साथ जाती है। मैने कभी
पूजा नहीं की। याद है,
हम और तुम
पूजा करने वालों को कितना बनाया करती थी। अगर मै पूजा करने वालों का चरित्र कुछ उन्नत पाती, तो
शायद अब तक मै भी पूजा करती होती। लेकिन मुझे तो कभी ऐसा अनुभव प्राप्त नहीं हुआ, पूजा करने वालियॉँ भी
उसी तरह दूसरों की निन्दा करती हैं,
उसी तरह
आपस में लड़ती-झगड़ती हैं, जैसे वे जो कभी
पूजा नहीं करतीं। खैर,
अब मुझे
धीरे-धीरे पूजा से श्रद्धा होती जा रही हैं। मेरे ददिया ससुरजी ने एक छोटा-सा ठाकुरद्वारा
बनवा दिया था। वह मेरे घर के सामने ही हैं। मैं अक्सर सासजी के साथ वहॉँ जाती हूँ और
अब यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि उन विशाल मूर्तियों के दर्शन से मुझे अपने अतस्तल
में एक ज्योति का अनुभव होता है। जितनी अश्रद्धा से मैं राम और कृष्ण के जीवन की आलोचना
किया करती थी,
वह बहुत
कुछ मिट चुकी हैं।
लेकिन रुपवती होने का दण्ड यहीं तक बस नहीं है। ननदें अगर मेरे रुप
कों देखकर जलती हैं, तो यह स्वाभाविक
हैं। दु:खी तो इस बात का है कि यह दण्ड मुझे उस तरफ से भी मिल रहा है, जिधर से इसकी कोई संभावना
न होनी चाहिए—मेरे आनन्द बाबू भी मुझे इसका दण्ड दे रहे है। हॉँ, उनकी दण्डनीति एक निराले
ही ढग की हैं। वह मेरे पास नित्य ही कोई-न-कोई सौगात लाते रहते है। वह जितनी देर मेरे
पास रहते है। उनके मन में यह संदेह होता रहता है कि मुझे उनका रहना अच्छा नहीं लगता।
वह समझते है कि मैं उनसे जो प्रेम करती हूँ, यह
केवल दिखावा है,
कोशल है।।
वह मेरे सामने कुछ ऐसे दबे-दबायें,
सिमटे-सिमटायें
रहते है कि मैं मारे लज्जा के मर जाती हूँ। उन्हें मुझसे कुछ कहते हुए ऐसा संकोच होता
है, मानो वह कोई अनाधिकार
चेष्टा कर रहे हों। जैसे मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए कोई आदमी उज्जवल वस्त्र पहनने
वालों से दूर ही रहना चाहता है,
वही दशा
इनकी है। वह शायद समझते हैं कि किसी रुपवती स्त्री को रूपहीन पुरुष से प्रेम हो ही
नहीं सकता। शायद वह दिल में पछतातें है कि क्यों इससे विवाह किया। शायद उन्हें अपने
ऊपर ग्लानि होती है। वह मुझे कभी रोते देख लेते है,
तो समझते है। मैं अपने भाग्य को रों रही हूँ, कोई पत्र लिखते देखते
हैं, तो समझते है, मैं उनकी रुपहीनता ही
का रोना रो रही हूँ। क्या कहूँ बहन,
यह सौन्दर्य
मेरी जान का गाहक हो गया। आनन्द के मन से शंका को निकालने और उन्हें अपनी ओर से आश्वासन
देने के लिए मुझे ऐसी-ऐसी बातें करनी पड़ती हैं, ऐसे-ऐसे
आचरण करने पड़ते हैं,
जिन पर मुझे
घृणा होती हैं। अगर पहले से यह दशा जानती, तो
ब्रह्मा से कहती कि मुझे कुरूपा ही बनाना। बड़े असमंजस में पड़ी हूँ! अगर सासजी की
सेवा नहीं करती,
बड़ी ननदजी
का मन नहीं रखती,
तो उनकी
ऑंखों से गिरती हूँ। अगर आनन्द बाबू को निराश करती हूँ, तो कदाचित् मुझसे विरक्त
ही हो जायँ। मै तुमसे अपने हृदय की बात कहती हूँ। बहन, तुमसे क्या पर्दा रखना
है; मुझे आनन्द बाबू से उतना प्रेम है, जो किसी स्त्री को पुरूष
से हो सकता है,
उनकी जगह
अब अगर इन्द्र भी सामने आ जायँ,
तो मै उनकी
ओर ऑख उठाकर न देखूँ। मगर उन्हें कैसे विश्वास दिलाऊँ। मै देखती हूँ, वह किसी न किसी बहाने
से बार-बार घर मे आते है और दबी हुई, ललचाई
हुई नजरों से मेरे कमरे के द्वार की ओर देखते है, तो
जी चाहता है,
जाकर उनका
हाथ पकड़ लूँ और अपने कमरे में खींच ले आऊँ। मगर एक तो डर होता है कि किसी की ऑंख पड़
गयी, तो छाती पीटने लगेगी, और इससे भी बड़ा डर यह
कि कहीं आनन्द इसे भी कौशल ही न समझ बैठे। अभी उनकी आमदनी बहुम कम है, लेकिन दो-चार रुपये
सौगातों मे रोज उड़ाते हैं। अगर प्रेमोपहार-स्वरूप वह धेले की कोई चीज दें, तो मैं उसे ऑंखों से लगाऊँ, लेकिन वह कर-स्वरूप देते
हैं, मानो उन्हें ईश्वर ने
यह दण्ड दिया हैं। क्या करूँ,
अब मुझे
भी प्रेम का स्वॉँग करना पड़ेगा। प्रेम-प्रदर्शन से मुझे चिढ़ हैं। तुम्हें याद होगा, मैने एक बार कहा था कि
प्रेम या तो भीतर ही रहेगा या बाहर ही रहेगा। समान रूप से वह भीतर और बाहर दोनों जगह
नहीं रह सकता। सवॉँग वेश्याओं के लिए है, कुलवंती
तो प्रेम को हृदय ही में संचित रखती हैं!
बहन, पत्र बहुत लम्बा
हो गया,
तुम पढ़ते-पढ़ते
ऊब गयी होगी। मैं भी लिखते-लिखते थक गयी। अब शेष बातें कल लिखूँगी। परसों यह पत्र तुम्हारे
पास पहूँचेगा।
X X X
बहन, क्षमा करना; कल पत्र लिखने का अवसर
नहीं मिला। रात एक ऐसी बात हो गयी,
जिससे चित्त
अशान्त उठा। बड़ी मुश्किलों से यह थोड़ा-सा समय निकाल सकी हूँ। मैने अभी तक आनन्द से
घर के किसी प्राणी की शिकायत नहीं की थी। अगर सासजी ने कोई बात की दी या ननदजी ने कोई
ताना दे दिया;
तो इसे उनके
कानों तक क्यों पहुँचाऊँ। इसके सिवा कि गृह-कलह उत्पन्न हो, इससे और क्या हाथ आयेगा।
इन्हीं जरा-जरा सी बातों को न पेट में डालने से घर बिगड़ते हैं। आपस में वैमनस्य बढ़ता
हैं। मगर संयोग की बात,
कल अनायास
ही मेरे मुंह से एक बात निकल गयी जिसके लिये मै अब भी अपने को कोस रहीं हूँ, और ईश्वर से मनाती हूँ
कि वह आगे न बढ़े। बात यह हुई कि कल आन्नद बाबू बहुत देर करके मेरे पास आये। मैं उनके
इन्तार में बैठी एक पुस्तक पढ़ रही थी। सहसा सासजी ने आकर पूछा—क्या अभी तक बिजली जल
रही है? क्या वह रात-भर न आयें, तो तुम रात-भर बिजली जलाती
रहोगी?
मैनें उसी वक्त बत्ती ठण्डी कर दी। आनन्द बाबू थोड़ी ही देर मे आयें, तो कमरा अँधेरा पड़ा था
न-जाने उस वक्त मेरी मति कितनी मन्द हो गयी थी। अगर मैने उनकी आहट पाते ही बत्ती जला
दी होती, तो कुछ न होता, मगर मैं अँधेरे में पड़ी
रहीं। उन्होनें पूछा—क्या सो गयीं? यह अधेरा क्यों पड़ा हुआ
है?
हाय! इस वक्त भी यदि मैने कह दिया होता कि मैने अभी बती गुल कर दी
तो बात बन जाती। मगर मेरे मुँह से निकला—‘सांसजी
का हुक्म हुआ कि बत्ती गुल कर दो,
गुल कर दी।
तुम रात-भर न आओ,
तो क्या
रातभर बत्ती जलती रहें?’
‘तो अब तो जला दो। मै रोशनी
के सामने से आ रहा हूँ। मुझे तो कुछ सूझता ही नहीं।’
‘मैने अब बटन को हाथ से
छूने की कसम खा ली है। जब जरूरत पड़गी; तो
मोम की बत्ती जला लिया करूँगी। कौन मुफ्त में घुडकियॉँ सहें।’
आन्नद ने बिजली का बटन दबाते हुए कहा—‘और मैने कसम खा ली कि
रात-भर बत्ती जलेगी,
चाहे किसी
को बुरा लगे या भला। सब कुछ देखता हूँ,
अन्धा नहीं हूँ। दूसरी बहू आकर इतनी सेवा करेगी तो देखूँगा; तुम नसीब की खोटी
हो कि ऐसे प्राणियों के पाले पड़ी। किसी दूसरी सास की तुम इतनी खिदमत करतीं, तो वह तुम्हें पान की
तरह फेरती,
तुम्हें
हाथों पर लिए रहती,
मगर यहॉँ
चाहे प्राण ही दे दे,
किसी के
मुँह से सीधी बात न निकलेगी।’
मुझे अपनी भूल साफ मालूम हो गयी। उनका क्रोध शान्त करने के इरादे से
बोली—गलती भी तो मेरी ही थी
कि व्यर्थ आधी रात तक बत्ती जलायें बैठी रही। अम्मॉँजी ने गुल करने को कहा, तो क्या बुरा कहा ? मुझे समझाना, अच्छी सीख देना, उनका धर्म हैं। मेरा धर्म
यही है कि यथाशक्ति उनकी सेवा करूँ और उनकी शिक्षा को गिरह बाँधूँ।
आन्नद एक क्षण द्वार की ओर ताकते रहे। फिर बोले—मुझे मालूम हो रहा है
कि इस घर में मेरा अब गुजर न होगा। तुम नहीं कहतीं, मगर
मै सब कुछ सुनता रहता हूँ। सब समझता हूँ। तुम्हें मेरे पापों का प्रायश्चित करना पड़
रहा हैं। मै कल अम्मॉँजी से साफ-साफ कह दूँगा—‘अगर
आपका यही व्यवहार है,
तो आप अपना
घर लीजिए,
मै अपने
लिए कोई दूसरी राह निकाल लूँगा।’
मैंने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा—नहीं-नहीं। कहीं ऐसा गजब
भी न करना। मेरे मुँह में आग लगे,
कहॉँ से
कहाँ बत्ती का जिकर कर बैठी। मैं तुम्हारे चरण छूकर कहती हूँ, मुझे न सासजी से कोई शिकायत
है, न ननदजी से, दोनों मुझसे बड़ी है, मेरी माता के तुल्य हैं।
अगर एक बात कड़ी भी कह दें,
तो मुझे
सब्र करना चाहिए! तुम उनसे कुछ न कहना नहीं तो मझे बड़ा दु:ख होगा।
आनन्द ने रुँधे कंठ से कहा—तुम्हारी-जैसी
बहू पाकर भी अम्मॉँजी का कलेजा नहीं पसीजता, अब
क्या कोई स्वर्ग की देवी घर में आती? तुम
डरो मत, मैं ख्वाहमख्वाह लड़ूँगा
नहीं। मगर हॉँ,
इतना अवश्य
कह दूँगा कि जरा अपने मिजाज को काबू में रखें। आज अगर मै दो-चार सौ रुपयें घर में लाता
होता, तो कोई चूँ न करता। कुछ
कमाकर नहीं लाता,
यह उसी का
दण्ड है। सच पूछों,
तो मुझे
विवाह करने का कोई अधिकार ही न था। मुझ-जैसे मन्द बुद्धि को, जो कौड़ी कमा नहीं सकता, उसे अपने साथ किसी महिला
को डुबाने का क्या हक था! बहनजी को न-जाने क्या सूझी है कि तुम्हारे पीछे पड़ी रहती
हैं। ससुराल का सफाया कर दिया,
अब यहॉँ
भी आग लगाने पर तुली हुई है। बस,
पिताजी का
लिहाज करता हूँ,
नहीं इन्हें
तो एक दिन में ठीक कर देता।
बहन,
उस वक्त
तो मैने किसी तरह उन्ही शान्त किया,
पर नहीं
कह सकती कि कब वह उबल पड़े। मेरे लिए वह सारी दुनियां से लड़ाई मोल ले लेगें। मै जिन
परिस्थितयों में हूँ,
उनका तुम
अनुमान कर सकती हो। मुझ पर कितनी ही मार पड़े मुझे रोना न चाहिए, जबान तक न हिलाना चाहिए।
मैं रोयी और घर तबाह हुआ। आनन्द फिर कुछ न सुनेगे, कुछ
न देखेगें। कदाचित इस उपाय से वह अपने विचार मे मेरे हृदय में अपने प्रेम का अंकुर
जमाना चाहते हो। आज मुझे मालूम हुआ कि यह कितने क्रोधी हैं। अगर मैने जरा-सा पुचार
दे दिया होता,
तो रात ही
को वह सासजी की खोपड़ी पर जा पहुँचते। कितनी युवतियॉँ इसी अधिकार के गर्व में अपने
को भूल जाती हैं। मै तो बहन,
ईश्वर ने
चाहा तो कभी न भूलूँगी। मुझे इस बात का डर नहीं है कि आनन्द अलग घर बना लेगें, तो गुजर कैसे होगा। मै
उनके साथ सब-कुछ झेल सकती हूँ। लेकिन घर तो तबाह हो जायेगा।
बस, प्यारी पद्मा, आज इतना ही। पत्र का जवाब
जल्द देना।
तुम्हारी,
चन्दा
11
दिल्ली
5-2-26
प्यारी चन्दा,
क्या लिखूँ,
मुझ पर तो विपत्ति का पहाड़ टूट
पड़ा! हाय,
वह चले गए।
मेरे विनोद का तीन दिन से पता नहीं—निर्मोही चला गया, मुझे छोड़कर बिना कुछ
कहे-सुने चला गया—अभी तक रोयी नहीं। जो
लोग पूछने आते हैं,
उनसे बहाना
कर देती हूँ कि—दो-चार दिन में आयेंगे, एक काम से काशी गये हैं।
मगर जब रोऊँगी तो यह शरीर उन ऑंसुओं में डूब जायेगा। प्राण उसी मे विसर्जित हो जायँगे।
छलियें ने मुझसे कुछ भी नहीं कहा,
रोज की तरह
उठा, भोजन किया, विद्यालय गया; नियत समय पर लौटा, रोज की तरह मुसकराकर मेरे
पास आया। हम दोनों ने जलपान किया,
फिर वह दैनिक
पत्र पढ़ने लगा,
मैं टेनिस
खेलने चली गयी। इधर कुछ दिनो से उन्हें टेनिस से कुछ प्रेम न रहा था, मैं अकेली ही जाती। लौटी, तो रोज ही की तरह उन्हें
बरामदे में टहलते और सिगार पीते देखा। मुझे देखते ही वह रोज की तरह मेरा ओवरकोट लाये
और मेरे ऊपर डाल दिया। बरामदे से नीचे उतरकर खुले मैदान मे हम टहलने लगे। मगर वह ज्यादा
बोले नहीं,
किसी विचार
में डूबे रहें। जब ओस अधिक पड़ने लगी, तो
हम दोनों फिर अन्दर चले आयें। उसी वक्त वह बंगाली महिला आ गयी, जिनसे मैने वीणा
सीखना शुरू किया है। विनोद भी मेरे साथ ही बैठे रहे। संगीत उन्हें कितना प्रिय है, यह तुम्हें लिख चुकी हूँ।
कोई नयी बात नहीं हुई। महिला के चले जाने के बाद हमने साथ-ही-साथ भोजन यिका फिर मै
अपने कमरे में लेटने आयी। वह रोज की तरह अपने कमरे मे लिखने-पढ़ने चले गयें! मैं जल्द
ही सो गयी, लेकिन
बेखबर पड़ी रहूँ,
उनकी आहट
पाते ही आप-ही-आप ऑंखे खुल गयीं। मैने देखा, वह
अपना हरा शाल ओढ़े खड़े थें। मैने उनकी ओर हाथ बढ़ाकर कहा—आओं, खड़े क्यों हो, और फिर सो गयी। बस, प्यारी बहन! वही विनोद
के अंतिम दर्शन थे। कह नहीं सकती,
वह पंलग
पर लेटे या नहीं। इन ऑखों में न-जाने कौन-सी महानिद्रा समायी हुई थी। प्रात: उठी तो
विनोद को न पाया। मैं उनसे पहले उठती हूँ,
वह पड़े सोते रहते हैं। पर आज वह पलंग पर न थें। शाल भी न था। मैने
समझा,
शायद अपने
कमरे में चले गये हों। स्नान-गृह में चली गयी। आध घंटें मे बाहर आयी, फिर भी वह न दिखायी दिये।
उनके कमरे में गयी,
वहॉँ भी
न थें। आश्चर्य हुआ कि इतने सबरे कहॉँ चले गयें। सहसा खूँटी पर पड़ी—कपड़े ने थे। किसी से
मिलने चले गये?
या स्नान
के पहले सैर करने की ठानी। कम-से-कम मुझसे कह तो देते, संशय मे तो जी न पड़ता।
क्रोध आया—मुझे लौंडी समझते हैं…
हाजिरी का समय आया। बैरा मेज पर चाय रख गया। विनोद के इतंजार में चाय
ठंडी हो गयी। मै बार-बार झुँझालती थी, कभी
भीतर जाती,
कभी बाहर
आती, ठान ली थी कि आज ज्योही
महाशय आयेंगे,
ऐसा लताड़ूँगी
कि वह भी याद करेंगे। कह दूँगी,
आप अपना
घर लीजिए,
आपकों अपना
घर मुबारक रहें,
मै अपने
घर चली जाऊँगी। इस तरह तो रोटियॉँ वहॉं भी मिल जायेंगी। जाड़े के नौ बजने में देर ही
क्या लगती है। विनोद का अभी पता नहीं। झल्लायी हुई कमरे मे गयी कि एक पत्र लिखकर मेज
पर रख दूँ—साफ-साफ लिख दूँ कि इस
तरह अगर रहना है,
तो आप रहिए मे नहीं रह सकती। मै जितना ही तरह देती जाती
हूँ, उतना ही तुम मुझे चिढ़ाते
हों। बहन,
उस क्रोध
मे सन्तप्त भावों की नदी-सी मन में उमड़ रही थी। अगर लिखने बैठती, तो पन्नों-के-पन्ने लिख डालती। लेकिन आह! मै तो भाग जान
की धमकी ही दे रही थी,
वह पहले
ही भाग चुके थे। ज्योंही मेज पर बैठी, मुझे
पैडी मे उनका एक पत्र मिला। मैने तुरन्त उस पत्र को निकाल लिया और सरसरी निगाह से पढ़ा—मेरे हाथ कॉँपने लगे, पॉँव थरथराने लगे, जान पड़ा कमरा हिल रहा
है। एक ठण्डी,
लम्बी, हृदय को चीरने वाली आह
खींचकर मैं कोच पर गिर पड़ी। पत्र यह था—
‘प्रियें ! नौ महीने हुए, जब मुझे पहली बार तुम्हारे
दर्शनों का सौभाग्य हुआ था। उस वक्त मैने अपने को धन्य माना था। आज तुमसे वियोग का
दुर्भाग्य हो रहा है फिर भी मैं अपने को धन्य मानता हूँ। मुझे जाने का लोशमात्र भी
दु:ख नहीं है,
क्योकि मै
जानता हूँ तुम खुश होगी। जब तुम मेरे साथ सुखी नही रह सकती; तो मैं तबरदस्ती क्यों
पड़ा रहूँ। इससे तो यह कहीं अच्छा है कि हम और तुम अलग हो जायँ। मै जैसा हूँ, वैसा ही रहूँगा। तुम भी
जैसी हो, वैसी ही रहोगी। फिर सुखी
जीवन की सम्भावना कहाँ?
मै विवाह
को आत्म-विकास का पूरी का साधन समझता हूँ। स्त्री पुरुष के सम्बन्ध का अगर कोई अर्थ
है, तो यही है, वर्ना मै विवाह की कोई
जरुरत नहीं समझता। मानव सन्तान बिना विवाह के भी जीवित रहेगी और शायद इससे अच्छे रूप
में। वासना भी बिना विवाह के पूरी हो सकती है, घर
के प्रबन्ध के लिए विवाह करने की काई जरुरत नहीं। जीविका एक बहुत ही गौण प्रश्न है।
जिसे ईश्वर ने दो हाथ दिये है वह कभी भूखा नहीं रह सकता। विवाह का उद्देश्य यही और
केवल यही हैं कि स्त्री और पुरूष एक-दूसरे की आत्मोन्नति में सहायक हों। जहॉँ अनुराग हों, वहा विवाह है और अनुराग
ही आत्मोन्नति का मुख्य साधन है। जब अनुराग न हो, तो
विवाह भी न रहा। अनुराग के बिना विवाह का अर्थ नहीं।
जिस वक्त मैने तुम्हें पहली बार देखा था, तुम मुझे अनुराग की सजीव
मूर्ति-सी नजर आयी थीं। तुममे सौंदर्य था, शिक्षा
थी, प्रेम था, स्फूर्ति थी, उमंग थी। मैं मुग्ध हो
गया। उस वक्त मेरी अन्धी ऑंखों को यह न सूझा कि जहॉँ तुममें इतने गुण थे, वहॉँ चंचलता भी थी, जो इन सब गुणों पर पर्दा
डाल देती। तुम चंचल हो,
गजब की चंचल, जो उस वक्त मुझे न सूझा
था। तुम ठीक वैसी ही हो,
जैसी तुम्हारी
दूसरी बहनें होती है,
न कम, न ज्यादा। मैने तुमको
स्वाधीन बनाना चाहा था,
क्योंकि
मेरी समझ मे अपनी पूरी ऊँचाई तक पहुँचने के लिए इसी की सबसे अधिक जरूरत है। संसार भर
में पुरूषों के विरुद्ध क्यों इतना शोर मचा हुआ है? इसीलिए
कि हमने औरतों की आजादी छीन ली है और उन्हें अपनी इच्छाओं की लौंडी बना रखा है। मैने
तुम्हें स्वाधीन कर दिया। मै तुम्हारे ऊपर अपना कोई अधिकार नहीं मानता। तुम अपनी स्वामिनी
हो, मुझे कोई चिन्ता न थी।
अब मुझे मालूम हो रहा है,
तुम स्वेच्छा
से नहीं, संकोच या भय या बन्धन
के कारण रहती हो। दो ही चार दिन पहले मुझ पर यह
बात खुली है। इसीलिए अब मै तुम्हारें सुख के मार्ग में बाधा नहीं डालना चाहता।
मै कहीं भागकर नहीं जा रहा हूँ। केवल तुम्हारे रास्ते से हटा जा रहा हूँ, और इतनी दूर हटा जा रहा
हूँ, कि तुम्हें मेरी ओर से
पूरी निश्चिन्तता हो जाय। अगर मेरे बगैर तुम्हारा जीवन अधिक सुन्दर हो सकता है, तो तुम्हें जबरन नहीं
रखना चाहता। अगर मै समझता कि तुम मेरे सुख के मार्ग बाधक हो रही हों, तो मैने तुमसे साफ-साफ
कह दिया होता। मै धैर्य और नीति का ढोंग नहीं मानता, केवल
आत्माका संतोष चाहता हूँ—अपने लिए भी, तुम्हारे लिए भी। जीवन
का तत्व यही है;
मूल्य यही
है। मैने डेस्क में अपने विभाग के अध्यक्ष के नाम एक पत्र लिखकर रख दिया हैं। वह उनके
पास भेज देना। रूपये की कोई चिन्ता मत करना।
मेरे एकाउंट मे अभी इतने रूपये हैं,
जो तुम्हारे
लिए कई महीने को काफी हैं, और उस वक्त तक मिलते रहेगें, जब तक तुम लेना चाहोगी।
मै समझता हूँ, मैने अपना भाव
स्पष्ट कर दिया है। इससे अधिक स्पष्ट मै नहीं करना चाहता। जिस वक्त तुम्हारी इच्छा
मुझसे मिलने की हो,
बैंक से
मेरा पता पूछ लेना। मगर दो-चार दिन के बाद। घबराने की कोई बात नहीं। मै स्त्री को अबला
या अपंग नहीं समझता। वह अपनी रक्षा स्वयं कर सकती हैं—अगर करना चाहें। अगर अब
या अब से दो-चार महीना,
दो-चार साल
पीछें तुम्हे मेरी याद आए और तुम समझों कि मेरे साथ सुखी रह सकती हो, तो मुझे
केवल दो शब्द लिखकर डाल देना,
मै तुरन्त
आ जाऊँगा,
क्योंकि
मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं हैं। तुम्हारे साथ मेरे जीवन के जितने के जितने दिन कटे हैं, वह मेरे लिए स्वर्ग-स्वप्न
के दिन हैं। जब तक जीउँगी,
इस जीवन
की आनन्द-स्मृतियों कों हृदय में संचित रखूँगा। आह! इतनी देर तक मन को रोके रहने के
बाद ऑंखों से एक बूँद ऑंसू गिर ही पड़ा। क्षमा करना, मैनें
तुम्हें ‘चंचल’ कहा हैं। अचंचल कौन है? जानता हूँ कि तुमने मुझे
अपने हृदय से निकालकर फेंक दिया हैं, फिर
भी इस एक घंटे में कितनी बार तुमको देख-देखकर लौट आया हूँ! मगर इन बातों को लिखकर मैं
तुम्हारी दया को उकसाना नहीं चाहता। तुमने वही किया, जिसका
मेरी नीति में तुमको अधिकार था,
है और रहेगां।
मैं विवाह में आत्मा को सर्वोपरी रखना चाहता हूँ। स्त्री और पुरुष में मै वही प्रेम
चाहता हूँ,
जो दो स्वाधीन
व्यक्तियों में होता हैं। वह प्रेम नहीं जिसका आधार पराधीनता हैं।
बस,
अब और कुछ
न लिखूँगा। तुमको एक चेतावनी देने की इच्छा हो रही है पर दूँगा नहीं; क्योंकि तुम अपना
भला और बुरा खुद समझ सकती हो। तुमने सलाह देने का हक मुझसे छीन लिया है। फिर भी इतना
कहे बगैर नहीं रहा जाता कि संसार में प्रेम का स्वॉँग भरने वाले शोहदों की कमी नहीं
है,
उनसे बचकर
रहना। ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि तुम जहॉं रहो, आनन्द से रहों। अगर कभी
तुम्हें मेरी जरूरत पड़े,
तो याद करना।
तुम्हारी एक तस्वीर का अपहरण किये जाता हूँ। क्षमा करना, क्या मेरा इतना अधिकार
भी नहीं? हाय! जी चाहता है, एक बार फिर देख आऊँ, मगर नहीं आऊँगा।’
—तुम्हारा
ठुकराया हुआ,
विनोद
बहन,
यह पत्र
पढ़कर मेरे चित्त की जो दशा हुई,
उसका तुम
अनुमान कर सकती हो। रोयी तो नहीं; पर दिल बैठा जाता
था। बार-बार जी चाहता था कि विष खाकर सो रहूँ। दस बजने में अब थोड़ी ही देर थी। मैं
तुरन्त विद्यालय गयी और दर्शन-विभाग के अध्यक्ष को विनोद का पत्र पढ़कर बोले—आपको मालूम है, वह कहॉँ गये और कब तक
आयेंगें? इसमें तो केवल एक मास
की छुटटी मॉँगी गयी है। मैनें बहाना किया—वह
एक आवश्यक कार्य से काशी गये है। और निराश
होकर लौट आयी। मेरी अन्तरात्मा संहस्रों जिहवा बनकर मुझे धिक्कार रही थी। कमरे में
उनकी तस्वीर के सामने घुटने टेककर मैने जितने पश्चाताप–पूर्ण शब्दों में क्षमा
माँगी है,
वह अगर किसी
तरह उनके कानों तक पहुँच सकती,
तो उन्हें
मालूम होता कि उन्हें मेरी ओर से कितना भ्रूम हुआ! तब से अब तक मैनें कुछ भोजन नहीं
किया और न एक मिनट सोयी। विनोद मेरी क्षुधा
और निद्रा भी अपने साथ लेते गये और शायद इसी तरह दस-पॉँच दिन उनकी खबर न मिली, तो प्राण भी चले जायेंगें।
आज मैं बैंक तर्क गयी थी,
यह पूछने
कि हिम्मत न पड़ी कि विनोद का कोई पत्र आयां।
वह सब क्या सोचते कि यह उनकी पत्नी होकर हमसे पूछने आयी हैं!
बहन,
अगर विनोद
न आये, तो क्या होगा? मैं समझती थी, वह मेरी तरफ से उदासीन
हैं, मेरी परवा नहीं करते, मुझसे अपने दिल की बातें
छिपाते हैं,
उन्हें शायद
मैं भारी हो गयी हूँ। अब मालूम हुआ,
मै कैसे
भयंकर-भ्रम में पड़ी हुई थी। उनका मन इतना
कोमल है,
यह मैं जानती, तो उस दिन क्यों भुवन
को मुँह लगाती?
मैं उस अभागे
का मुँह तक न देखती। इस वक्त जो उसे देख पाऊँ, तो
शायद गोली मार दूँ। जरा तुम विनोद के पत्र को फिर पढों, बहन—आप मुझे स्वाधीन बनाने
चले थे। अगर स्वाधीन बनाते थें,
तो भुवन
से जरा देर मेरा बातचीत कर लेना क्यों इतना अखरा? मुझें
उनकी अविचलित शांति से चिढ़ होती थी। वास्तव में उनके हृदय में इस रात-सी बात ने जितनी
अशांति पैदा कर दी,
शायद मुझमें
न कर सकती। मैं किसी रमणी से उनकी रूचि देखकर
शायद मुँह फुला लेती,
ताने देती, खुद रोती, उन्हें रुलाती; पर इतनी जल्द भाग न जाती।
मर्दों का घर छोड़कर भागना तो आज तक नहीं सुना, औरतें
ही घर छोड़कर मैके भागती है, या कहीं डूबने
जाती हैं,
या आत्महत्या
करती हैं। पुरूष निर्द्वन्द्व बैठे मूंछों पर ताव देते हैं। मगर यहॉँ उल्टी गंगा बह
रही हैं—पुरूष ही भाग खड़ा हुआ!
इस अशांति की थाह कौन लगा सकता हैं?
इस प्रेम
की गहराई को कौन समझ सकता हैं?
मै तो अगर
इस वक्त विनोद के चरणों पर पड़े-पड़े मर जाऊँ तो समझूँ, मुझे स्वर्ग मिल गया।
बस, इसके सिवा मुझे अब और
कोई इच्छा नहीं हैं। इस अगाध-प्रेम ने मुझे तृप्त कर दिया। विनोद मुझसे भागे तो, लेकिन भाग न सके। वह मेरे
हृदय से, मेरी धारणा से, इतने निकट कभी न थे। मैं
तो अब भी उन्हें अपने सामने बैठा देख रही हूँ। क्या मेरे सामने फिलासफर बनने चले थे? कहॉँ गयी आपकी वह दार्शनिक गंभीरता? यों
अपने को धोखा देते हो?
यों अपनी
आत्मा को कुचलते हों ?
अबकी तो
तुम भागे,
लेकिन फिर
भागना तो देखूँगी। मै न जानती थी कि तुम ऐसे चतुर बहुरूपिये हो। अब मैने समझा, और शायद तुम्हारी दार्शनिक
गंभीरता को भी समझ मे आया होगा कि प्रेम जितना ही सच्चा जितना ही हार्दिक होता है, उतना ही कोमल होता हें
वह वपत्ति के उन्मत्त सागर में थपेड़ खा सकता है, पर
अवहेलना की एक चोट भी नहीं सह सकता। बहिन, बात विचित्र है, पर है सच्ची, मै इस समय अपने अन्तस्तल में जितनी उमंग, जितने आनन्द का अनुभव
कर रही हूँ,
याद नहीं
आता कि विनोद के हृदय से लिपटकर भी कभी पाया हो। तब पर्दा बीच में था, अब कोई पर्दा बीच में
नहीं रहा। मै उनको प्रचलित प्रेम व्यापार की कसौटी पर कसना चाहती थी। यह फैशन हो गया
कि पुरुष घर मे आयें,
तो स्त्री
के वास्ते कोई तोहफा लाये,
पुरुष रात-दिन
स्त्री के लिए गहने बनवाने,
कपड़े सिलवाने, बेल, फीते, लेस खरीदने में मस्त रहे, फिर स्त्री को उससे कोई
शिकायत नहीं। वह आदर्श-पति है,
उसके प्रेम
में किसे संदेह हो सकता है?
लेकिन उसकी
प्रेयसी की मृत्यु के तीसरे महीने वह फिर नया विवाह रचाता है। स्त्री के साथ अपने प्रेम
को भी चिता मे जला आता है। फिर वही स्वॉँग इस नयी प्रेयसी से होने लगते हैं, फिर वही लीला शुरू हो
जाती है। मैंने यही प्रेम देखा था और इसी कसौटी पर विनोद कस रही थी। कितनी मन्दबुद्धि
हूँ ! छिछोरेपन को प्रेम समझे बैठी थी। कितनी स्त्रियाँ जानती हैं कि अधिकांश ऐसे ही
गहने, कपड़े और हँसने-बोलने
में मस्त रहने वाले जीव लम्पट होते हैं। अपनी लम्पटता को छिपाने के लिए वे यह स्वॉँग
भरते रहते हैं। कुत्ते को चुप रखने के लिए उसके सामने हड्डी के टुकड़े फेंक देते हैं।
बेचारी भोली-भाली उसे अपना सर्वस्व देकर खिलौने पाती है और उन्हीं में मग्न रहती है।
मैं विनोद को उसी कॉँटे पर तौल रही थी—हीरे
को साग के तराजू पर रख देती थी। मैं जानती हूँ, मेरा
दृढ़ विश्वास और वह अटल है कि विनोद की दृष्टि कभी किसी पर स्त्री पर नहीं पड़ सकती।
उनके लिए मै हूँ, अकेली मै हूँ, अच्छी हूँ या बुरी हूँ, जो कुछ हूँ, मै हूँ। बहन, मेरी तो मारे गर्व और
आनन्द से छाती फूल उठी है। इतना बड़ा साम्राज्य—इतना
अचल, इतना स्वरक्षित, किसी हृदयेश्वरी को नसीब
हुआ है ! मुझे तो सन्देह है। और मैं इस पर भी असन्तुष्ट थी, यह न जानती थी कि ऊपर
बबूले तैरते हैं,
मोती समुद्र
की तह मे मिलते हैं। हाय! मेरी इस मूर्खता के कारण, मेरे
प्यारे विनोद को कितनी मानसिक वेदना हो रही
है। मेरे जीवन-धन,
मेरे जीवन-सर्वस्व
न जाने कहॉँ मारे-मारे फिरते होंगें, न
जाने किस दशा में होगें,
न-जाने मेरे
प्रति उनके मन में कैसी-कैसी शंकाऍं उठ रही होंगी—प्यारे
! तुमने मेरे साथ कुछ कम अन्याय नहीं किया। अगर मैने तुम्हें निष्ठुर समझा, तो तुमने तो मुझे उससे
कहीं बदतर समझा—क्या अब भी पेट नहीं भरा? तुमने मुझे इतनी गयी-गुजरी
समझ लिया कि इस अभागे भुवन… मै ऐसे-ऐसे एक
लाख भुवनों को तुम्हारे चरणों पर भेंट कर सकती हूँ। मुझे तो संसार में ऐसा कोई प्राणी
ही नहीं नजर आता,
जिस पर मेरी
निगाह उठ सके। नहीं,
तुम मुझे
इतनी नीच,
इतनी कलंकिनी
नहीं समझ सकते—शायद वह नौबत आती, तो तुम और मैं दो में
से एक भी इस संसार में न होता।
बहन, मैंने विनोद को बुलाने
की, खींच लाने की, पकड़ मँगवाने की एक तरकीब
सोची है। क्या कहूँ,
पहले ही
दिन यह तरकीब क्यों न सूझी ?
विनोद को
दैनिक पत्र पढ़े बिना चैन नहीं आता और वह कौन-सा पत्र पढ़ते हैं, मैं यह भी जानती हूँ।
कल के पत्र में यह खबर छपेगी—‘पद्मा मर रही है’, और परसों विनोद यहॉँ होंगे—रुक ही नहीं सकते। फिर
खूब झगड़े होंगे,
खूब लड़ाइयॉँ
होंगी।
अब कुछ तुम्हारे विषय में। क्या तुम्हारी बुढ़िया सचमुच तुमसे इसलिए
जलती है कि तुम सुन्दर हो,
शिक्षित
हो ? खूब ! और तुम्हारे आनन्द
भी विचित्र जीव मालूम होते हैं। मैने सुना है कि पुरुष कितना ही कुरूप हो, उसकी निगाह अप्सराओं ही
पर जाकर पड़ती है। फिर आन्नद बाबू तुमसे क्यों बिचकते है? जरा गौरसे देखना, कहीं राधा और कृष्ण के
बीच में कोई कुब्जा तो नहीं?
अगर सासजी
यों ही नाक में दम करती रहें,
तो मैं तो
यही सलाह दूँगी कि अपनी झोपड़ी अलग बना लो। मगर जानती हूँ, तुम मेरी यह सलाह न मानोगी, किसी तरह न मानेगी। इस
सहिष्णुता के लिए मैं तुम्हें बधाई देती हूँ। पत्र जल्द लिखना। मगर शायद तुम्हारा पत्र
आने के पहले ही मेरा दूसरा पत्र पहुँचे।
तुम्हारी,
पद्मा
12
काशी
10-2-26
प्रिय पद्मा,
कई दिन तक तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा करने के बाद आज यह खत लिख रही
हूँ। मैं अब भी आशा कर रही हूँ कि विनोद बाबू घर आ गये होगें, मगर अभी वह न आये हों
और तुम रो-रोकर अपनी ऑंखे फोड़े डालती हो, तो
मुझे जरा भी दु:ख न होगा! तुमने उनके साथ जो अन्याय किया है, उसका यही दण्ड है। मुझे
तुमसे जरा भी सहानुभूति नहीं है। तुम गृहिणी होकर वह कुटिल क्रीड़ा करने चली थीं, जो
प्रेम का सौदा करने वाली स्त्रियों को ही शोभा देती है। मैं तो जब खुश होती कि विनोद
ने तुम्हारा गला घोंट दिया होता और भुवन के कुसंस्कारों को सदा के लिए शांत कर देते।
तुम चाहे मुझसे रूठ ही क्यों न जाओ पर मैं इतना जरूर कहूँगी कि तुम विनोद के योग्य
नहीं हो। शायद तुमने अँग्रेजी किताबों मे पढ़ा होगा कि स्त्रियाँ छैले रसिकों
पर ही जान देती हैं और यह पढ़कर तुम्हारा सिर फिर गया है। तुम्हें नित्य कोई सनसनी
चाहिए, अन्यथा तुम्हारा जीवन
शुष्क हो जायेगा। तुम भारत की पतिपरायणा रमणी नहीं, यूरोप
की आमोदप्रिय युवती हो। मुझे तुम्हारे ऊपर दया आती है। तुमने अब तक रूप को ही आकर्षण
का मूल समझ रखा है। रूप में आर्कषण है, मानती
हूँ। लेकिन उस आकर्षण का नाम मोह है, वह
स्थायी नहीं, केवल धोखे की टट्टी
है। प्रेम का एक ही मूल मंत्र है, और
वह है सेवा। यह मत समझो कि जो पुरूष तुम्हारे ऊपर भ्रमर की भॉँति मँडराया करता है, वह तुमसे प्रेम करता है।
उसकी यह रूपासक्ति बहुत दिनों तक नहीं रहेगी। प्रेम का अंकुर रूप में है, पर उसको पल्लवित और पुष्पित
करना सेवा ही का काम है। मुझे विश्वास नहीं आता कि विनोद को बाहर से थके-मॉँदे, पसीने मे तर देखकर तुमने
कभी पंखा झला होगा। शायद टेबुल-फैन लगाने की बात भी न सूझी होगी। सच कहना, मेरा अनुमान ठीक या नहीं? बतलाओ, तुमने की उनके पैरों में
चंपी की है?
कभी उनके
सिर में तेज डाला है?
तुम कहोगी, यह खिदमतगारों का काम
है, लेडियाँ यह मरज नहीं पालतीं।
तुमने उस आनन्द का अनुभव ही नहीं किया। तुम विनोद को अपने अधिकार में रखना चाहती हो, मगर उसका साधन नहीं करतीं।
विलासनी मनोरंजन कर सकती है,
चिरसंगिनी
नहीं बन सकती। पुरूष के गले से लिपटी हुई भी वह उससे कोसों दूर रहती है। मानती हूँ, रूपमोह मनुष्य का स्वभाव
है, लेकिन रूप से हृदय की
प्यास नहीं बुझती,
आत्मा की
तृप्ति नहीं होती। सेवाभाव रखने वाली रूप-विहीन स्त्री का पति किसी स्त्री के रूप-जाल
मे फँस जाय,
तो बहुत
जल्द निकल भागता है, सेवा का चस्का
पाया हुआ मन केवल नखरों और चोचलों पर लट्टू नहीं होता। मगर मैं तो तुम्हें उपदेश करने
बैठ गयी,
हालॉँकि
तुम मुझसे दो-चार महीने बड़ी होगी। क्षमा करो बहन, यह
उपदेश नहीं है। ये बातें हम-तुम सभी जानते हैं, केवल
कभी-कभी भूल जाते हैं। मैंने केवल तुम्हें याद दिला दिया हैं। उपदेश मे हृदय नहीं होता, लेकिन मेरा उपदेश मेरे
मन की वह व्यथा है,
जो तुम्हारी
इस नयी विपत्ति से जागरित हुई है।
अच्छा, अब मेरी रामकहानी
सुनो। इस एक महीने में यहॉँ बड़ी-बड़ी घटनाऍं हो गयीं। यह तो मैं पहले ही लिख चुकी
हूँ कि आनन्द बाबू और अम्मॉँजी में कुछ मनमुटाव रहने लगा। वह आग भीतर-ही-भीतर सुलगती
रहती थी। दिन में दो-एक बार मॉँ बेटे में चोंचें हो जाती थी। एक दिन मेरी छोटी ननदजी मेरे कमरे
से एक पुस्तक उठा ले गयीं। उन्हें पढ़ने का रोग है। मैंने कमरे में किताब न देखी, तो उनसे पूछा। इस जरा-सी
बात पर वह भले-मानस बिगड़ गयी और कहने लगी—तुम तो मुझे चोरी लगाती
हो। अम्मॉँ ने उन्हीं का पक्ष लिया और मुझे खूब सुनायी। संयोग की बात, अम्मॉँजी मुझे कोसने ही
दे रही थीं कि आन्नद बाबू घर में आ गये। अम्माँजी उन्हें देखते ही और जोर से बकने लगीं, बहू की इतनी मजाल! वह
तूने सिर पर चढ़ा रखा है और कोई बात नहीं। पुस्तक क्या उसके बाप की थी? लड़की लायी, तो उसने कौन गुनाह किया? जरा भी सब्र न हुआ, दौड़ी हुई उसके सिर पर
जा पहुँची और उसके हाथों से किताब छीनने लगी।
बहन,
मैं यह स्वीकार
करती हूँ कि मुझे पुस्तक के लिए इतनी उतावली न करनी चाहिए थी। ननदजी पढ़ चुकने पर आप
ही दे जातीं। न भी देतीं तो उस एक पुस्तक के न पढ़ने से मेरा क्या बिगड़ा जाता था।
मगर मेरी शामत कि उनके हाथों से किताब छीनने लगी थी। अगर इस बात पर आनन्द बाबू मुझे
डाँट बताते,
तो मुझे
जरा भी दु:ख न होता मगर उन्होंने उल्टे मेरा पक्ष लिया और त्योरियाँ चढ़ाकर बोले—किसी की चीज कोई बिना
पूछे लाये ही क्यों?
यह तो मामूली
शिष्टाचार है।
इतना सुनना था कि अम्मॉँ के सिर पर भूत-सा सवार हो गया। आनन्द बाबू
भी बीच-बीच मे फुलझड़ियॉँ छोड़ते रहे और मैं अपने कमरे में बैठी रोती रही कि कहॉँ-से-कहॉँ
मैंने किताब मॉँगी। न अम्मॉँजी ही ने भोजन किया, न
आनन्द बाबू ने ही। और मेरा तो बार-बार यही जी चाहता था कि जहर खा लूँ। रात को जब अम्मॉजी
लेटी तो मैं अपने नियम के अनुसार उनके पॉँव पक्रड़ लिये। मैं पैंताने की ओर तो थी ही।
अम्मॉँजी ने जो पैर से मुझे ढकेला तो मैं चारपाई के नीचे गिर पड़ी। जमीन पर कई कटोरियॉँ
पड़ी हुई थीं। मैं उन कटोरियों पर गिरी, तो
पीठ और कमर में बड़ी चोट आयी। मैं चिल्लाना न चाहती थी, मगर न जाने कैसे मेरे
मुँह से चीख निकल गयी। आनन्द बाबू अपने कमरे में आ गये थे, मेरी चीख सुनकर दौड़े
पड़े और अम्मॉँजी के द्वार पर आकर बोले—क्या
उसे मारे डालती हो, अम्मॉँ? अपराधी तो मैं हूँ; उसकी जान क्यों ले रही
हो? यह कहते हुए वह कमरे में
घुस गये और मेरा हाथ पकड़ कर जबरदस्ती खींच ले गये। मैंने बहुत चाहा कि अपना हाथ छुड़ा
लूँ, पर आन्नद ने न छोड़ा!
वास्वत में इस समय उनका हम लोगों के बीच में कूद पड़ना मुझे अच्छा नहीं लगता था। वह
न आ जाते,
तो मैंने
रो-धोकर अम्मॉँजी को मना लिया होता। मेरे गिर पड़ने से उनका क्रोध कुछ शान्त हो चला
था। आनन्द का आ जाना गजब हो गया। अम्मॉँजी कमरे के बाहर निकल आयीं और मुँह चिढ़ाकर
बोली—हॉँ, देखो, मरहम-पट्टी कर दो, कहीं कुछ टूट-फूट न गया
हो !
आनन्द ने ऑंगन में रूककर कहा—क्या तुम चाहती हो कि
तुम किसी को मार डालो और मैं न बोलूँ ?
‘हॉँ, मैं तो डायन हूँ, आदमियों को मार डालना
ही तो मेरा काम है। ताज्जुब है कि मैंने तुम्हें क्यों न मार डाला।’
‘तो पछतावा क्यों हो रहा
है, धेले की संखिया में तो
काम चलता है।‘
‘अगर तुम्हें इस तरह औरत
को सिर चढ़ाकर रखना है,
तो कहीं
और ले जाकर रखो। इस घर में उसका निर्वाह अब न होगा।’
‘मैं खुद इसी फ्रिक में
हूँ, तुम्हारे कहने की जरूरत
नहीं।’
‘मैं भी समझ लूँगी कि मैंने
लड़का ही नहीं जना।’
‘मैं भी समझ लूँगा कि मेरी
माता मर गयी।’
मैं आनन्द का हाथ पकड़कर जोर से खींच रही थी कि उन्हें वहॉँ से हटा
ले जाऊँ, मगर वह बार-बार मेरा हाथ
झटक देते थे। आखिर जब अम्मॉँजी अपने कमरे में चली गयीं, तो वह अपने कमरे में आये
और सिर थामकर बैठ गये।
मैंने कहा—यह तुम्हें क्या सूझी
?
आनन्द ने भूमि की ओर ताकते हुए कहा—अम्मॉँ
ने आज नोटिस दे दिया।
‘तुम खुद ही उलझ पड़े, वह बेचारी तो कुछ बोली
नहीं।’
‘मैं ही उलझ पड़ा !’
‘और क्या। मैंने तो तुमसे
फरियाद न की थी।’
‘पकड़ न लाता, तो अम्माँ ने तुम्हें
अधमरा कर दिया होता। तुम उनका क्रोध नहीं जानती।’
‘यह तुम्हारा भ्रम है।
उन्होंने मुझे मारा नहीं,
अपना पैर
छुड़ा रही थीं। मैं पट्टी पर बैठी थी, जरा-सा
धक्का खाकर गिर पड़ीं। अम्मॉँ मुझे उठाने ही जा रही थीं कि तुम पहुँच गये।’
‘नानी के आगे ननिहाल का
बखान न करो,
मैं अम्मॉँ
को खूब जानता हूँ। मैं कल ही दूसरा घर ले लूँगा, यह
मेरा निश्चय है। कहीं-न-कहीं नौकरी मिल ही जायेगी। ये लोग समझते हैं कि मैं इनकी रोटियों
पर पड़ा हुआ हूँ। इसी से यह मिजाज है !’
मैं जितना ही उनको समझती थी, उतना
वह और बफरते थे। आखिर मैंने झुँझलाकर कहा—तो
तुम अकेले जाकर दूसरे घर में रहो। मैं न जाऊँगी। मुझे यहीं पड़ी रहने दो।
आनन्द ने मेरी ओर कठोर नेत्रों से देखकर कहा—यही लातें खाना अच्छा
लगता है?
‘हाँ, मुझे यही अच्छा
लगता है।’
‘तो तुम खाओ, मैं नहीं खाना चाहता।
यही फायदा क्या थोड़ा है कि तुम्हारी दुर्दशा
ऑंखों से न देखूँगा,
न पीड़ा
होगी।’
‘अलग रहने लगोगे, तो दुनिया क्या कहेगी।’
‘इसकी परवाह नहीं। दुनियां
अन्धी है।’
‘लोग यही कहेंगे कि स्त्री
ने यह माया फैलायी है।‘
‘इसकी भी परवाह नहीं, इस भय से अपना जीवन संकट
में नहीं डालना चाहता।’
मैंने रोकर कहा—तुम मुझे छोड़ दोगे, तुम्हें मेरी जरा भी मुहब्बत
नहीं है। बहन,
और किसी
समय इस प्रेम-आग्रह से भरे हुए शब्दों ने न जाने क्या कर दिया होता। ऐसे ही आग्रहों
पर रियासतें मिटती हैं,
नाते टूटते
हैं, रमणी के पास इससे बढ़कर
दूसरा अस्त्र नहीं। मैंने आनन्द के गले में बाँहें डाल दी थीं और उनके कन्धे पर सिर
रखकर रो रही थी। मगर इस समय आनन्द बाबू इतने कठोर हो गये थे कि यह आग्रह भी उन पर कुछ
असर न कर सका। जिस माता न जन्म दिया, उसके
प्रति इतना रोष ! हम अपनी माता की एक कड़ी बात नहीं सह सकते, इस आत्माभिमान का कोई
ठिकाना है। यही वे आशाऍं हैं,
जिन पर माता
ने अपने जीवन के सारे सुख-विलास अर्पण कर दिये थे, दिन
का चैन और रात की नींद अपने ऊपर हराम कर ली थी ! पुत्र पर माता का इतना भी अधिकार नहीं
!
आनन्द ने उसी अविचलित कठोरता से कहा—अगर मुहब्बत का यही अर्थ
है कि मैं इस घर में तुम्हारी दुर्गति कराऊँ, तो
मुझे वह मुहब्बत नहीं है।
प्रात:काल वह उठकर बाहर जाते हुए मुझसे बोले—मैं जाकर घर ठीक किये
आता हूँ। तॉँगा भी लेता आऊँगा,
तैयार रहना।
मैंने दरवाजा रोककर कहा—क्या
अभी तक क्रोध शान्त नहीं हुआ?
‘क्रोध की बात नहीं, केवल दूसरों के सिर से
अपना बोझ हटा लेने की बात है।’
‘यह अच्छा काम नहीं कर
रहे हो। सोचो,
माता जी
को कितना दु:ख होगा। ससुरजी से भी तुमने कुछ पूछा ?’
‘उनसे पूछने की कोई जरूरत
नहीं। कर्ता-धर्ता जो कुछ हैं,
वह अम्मॉँ
हैं। दादाजी मिट्टी के लोंदे हैं।’
‘घर
के स्वामी तो हैं ?‘
‘तुम्हें चलना है या नहीं, साफ कहो।’
‘मैं तो अभी न जाऊँगी।’
‘अच्छी बात है, लात खाओ।’
मैं कुछ नहीं बोली। आनन्द ने एक क्षण के बाद फिर कहा—तुम्हारे पास कुछ रूपये
हो, तो मुझे दो।
मेरे पास रूपये थे,
मगर मैंने
इनकार कर दिया। मैंने समझा,
शायद इसी
असमंजस में पड़कर वह रूक जायँ। मगर उन्होंने बात मन में ठान ली थी। खिन्न होकर बोले—अच्छी बात है, तुम्हारे रूपयों के बगैर
भी मेरा काम चल जायगा। तुम्हें यह विशाल भवन, यह
सुख-भोग, ये नौकर-चाकर, ये ठाट-बाट मुबारक हों।
मेरे साथ क्यों भूखों मरोगी। वहॉँ यह सुख कहॉँ ! मेरे प्रेम का मूल्य ही क्या !
यह कहते हुए वह चले गये। बहन, क्या
कहूँ, उस समय अपनी बेबसी पर
कितना दु:ख हो रहा था। बस, यही जी में आता
था कि यमराज आकर मुझे उठा ले जायें। मुझे कल-कलंकिनी के कारण माता और पुत्र में यह
वैमनस्य हो रहा था। जाकर अम्मॉँजी के पैरों पर गिर पड़ी और रो-रोकर आनन्द बाबू के चले
जाने का समाचार कहा। मगर माताजी का हृदय जरा भी न पसीजा। मुझे आज मालूम हुआ कि माता
भी इतनी वज्र-हृदया हो सकती है। फिर आनन्द बाबू का हृदय क्यों न कठोर हो। अपनी माता
ही के पुत्र तो हैं।
माताजी ने निर्दयता से कहा—तुम
उसके साथ क्यों न चली गयी ?
जब वह कहता
था तब चला जाना चाहिए था। कौन जाने,
यहॉँ मैं
किसी दिन तुम्हें विष दे दूँ।
मैंने गिड़गिड़ाकर कहा—अम्मॉँजी, उन्हें बुला भेजिए, आपके पैरों पड़ती हूँ।
नहीं तो कहीं चले जायेंगे।
अम्मॉँ उसी निर्दयता से बोलीं—जाय
चाहे रहे,
वह मेरा
कौन है। अब तो जो कुछ हो,
तुम हो, मुझे कौन गिनता
है। आज जरा-सी बात पर यह इतना झल्ला रहा है। और मेरी अम्माँजी ने मुझे सैकड़ों ही बार
पीटा होगा। मैं भी छोकरी न थी, तुम्हारी
ही उम्र की थी,
पर मजाल
न थी कि तुम्हारे दादाजी से किसी के सामने बोल सकूँ। कच्चा ही खा जातीं ! मार खाकर
रात-भर रोती रहती थी,
पर इस तरह
घर छोड़कर कोई न भागता था। आजकल के लौंडे ही प्रेम करना नहीं जानते, हम भी प्रेम करते थे, पर इस तरह नहीं कि मॉँ-बाप, छोटे-बड़े किसी को कुछ
न समझें।
यह कहती हुई माताजी पूजा करने चली
गयी। मैं अपने कमरे में आकर नसीबों को रोने लगी। यही शंका होती थी कि आनन्द किसी तरफ
की राह न लें। बार-बार जी मसोसता था कि रूपये क्यों न दे दिये। बेचारे इधर-उधर मारे-मारे
फिरते होंगे। अभी हाथ-मुँह भी नहीं धोया, जलपान
भी नहीं किया। वक्त पर जलपान न करेंगे तो, जुकाम
हो जायेगा,
और उन्हें
जुकाम होता है,
तो हरारत
भी हो जाती है। महरी से कहा—जरा जाकर देख तो बाबूजी
कमरे में हैं?
उसने आकर
कहा—कमरे में तो कोई नहीं, खूँटी पर कपड़े भी नहीं
है।
मैंने पूछा—क्या और भी कभी इस तरह
अम्मॉँजी से रूठे हैं?
महरी बोली—कभी नहीं बहू ऐसा सीधा
तो मैंने लड़का ही नहीं देखा। मालकिन के सामने कभी सिर नहीं उठाते थे। आज न-जाने क्यों
चले गए।
मुझे आशा थी कि दोपहर को भोजन के समय वह आ जायेँगे। लेकिन दोपहर कौन
कहे; शाम भी हो गयी और उनका
पति नहीं। सारी रात जागती रही। द्वार की ओर कान लगे हुए थे। मगर रात भी उसी तरह गुजर
गयी। बहन,
इस प्रकार
पूरे तीन बीत गये। उस वक्त तुम मुझे देखतीं, तो
पहचान न सकतीं। रोते-रोते आँखें लाल हो गयी थीं। इन तीन दिनों में एक पल भी नहीं सोयी
और भूख का तो जिक्र ही क्या,
पानी तक
न पिया। प्यास ही न लगती थी। मालूम होता था, देह
में प्राण ही नहीं हैं। सारे घर में मातम-सा छाया हुआ था। अम्मॉँजी भोजन करने दोनों
वक्त जाती थीं,
पर मुँह
जूठा करके चली आती थी। दोनों ननदों की हँसी और चुहर भी गायब हो गयी थी। छोटी ननदजी
तो मुझसे अपना अपराध क्षमा कराने आयी।
चौथे दिन सबेरे रसोइये ने आकर मुझसे कहा—बाबूजी तो अभी मुझे दशाश्वमेध
घाट पर मिले थे। मैं उन्हें देखते ही लपककर उनके पास आ पहुँचा और बोला—भैया, घर क्यों नहीं चलते? सब लोग घबड़ाये हुए हैं।
बहूजी ने तीन दिन से पानी तक पिया। उनका हाल बहुत बुरा है। यह सुनकर वह कुछ सोच में
पड़ गये, फिर बोले—बहूजी ने क्यों दाना-पानी
छोड़
रखा है? जाकर कह देना, जिस आराम के लिए उस घर
को न छोड़ सकी,
उससे क्या
इतनी जल्द जी-भर गया !
अम्मॉँजी उसी समय आँगन में आ गयी। महाराज की बातों की भनक कानों में
पड़ गयी, बोली—क्या है अलगू, क्या आनन्द मिला था ?
महाराज—हाँ, बड़ी बहू, अभी दशाश्वमेध घाट पर
मिले थे। मैंने कहा—घर क्यों नहीं चलते, तो बोले—उस घर में मेरा कौन बैठा
हुआ है?
अम्मॉँ—कहा नहीं और कोई अपना
नहीं है, तो स्त्री तो अपनी है, उसकी जान क्यों लेते हो?
महाराज—मैंने बहुत समझाया बड़ी
बहू, पर वह टस-से-मस न हुए।
अम्मॉँ—करता क्या है?
महाराज—यह तो मैंने नहीं पूछा, पर चेहरा बहुत उतरा हुआ
था।
अम्मॉँ—ज्यों-ज्यों तुम बूढ़े
होते हो, शायद सठियाते जाते हो।
इतना तो पूछा होता,
कहॉँ रहते
हो, कहॉँ खाते-पीते हो। तुम्हें
चाहिए था,
उसका हाथ
पकड़ लेते और खींचकर ले आते। मगर तुम नकमहरामों को अपने हलवे-मांडे से मतलब, चाहे कोई मरे या जिये।
दोनों वक्त बढ़-बढ़कर हाथ मारते हो और मूँछों पर ताव देते हो। तुम्हें इसकी क्या परवाह
है कि घर में दूसरा कोई खाता है या नहीं। मैं तो परवाह न करती, वह आये या न आये। मेरा
धर्म पालना-पोसना था,
पाल पोस
दिया। अब जहॉँ चाहे रहे। पर इस बहू का क्या करूँ, जो
रो-रोकर प्राण दिये डालती है। तुम्हें ईश्वर ने आँखे दी हैं, उसकी हालत देख रहे हो।
क्या मुँह से इतना भी न फूटा कि बहू अन्न जल त्याग किये पड़ी हुई।
महाराज—बहूजी, नारायण जानते हैं, मैंने बहुत तरह समझाया, मगर वह तो जैसे भागे जाते
थे। फिर मैं क्या करता।
अम्मॉँ—समझाया नहीं, अपना सिर। तुम समझाते
और वह योंही चला जाता। क्या सारी लच्छेदार बातें मुझी से करने को है? इस बहू को मैं क्या कहूँ।
मेरे पति ने मुझसे इतनी बेरूखी की होती, तो
मैं उसकी सूरत न देखती। पर,
इस पर उसने
न-जाने कौन-सा जादू कर दिया है। ऐसे उदासियों को तो कुलटा चाहिए, जो उन्हें तिगनी का नाच
नचाये।
कोई आध घंटे बाद कहार ने आकर कहा—बाबूजी
आकर कमरे में बैठे हुए हैं।
मेरा कलेजा धक-धक करने लगा। जी चाहता था कि जाकर पकड़ लाऊँ, पर अम्मॉँजी का हृदय सचमुच
वज्र है। बोली—जाकर कह दे, यहॉँ उनका कौन बैठा हुआ
है, जो आकर बैठे हैं !
मैंने हाथ जोड़कर कहा—अम्मॉँजी, उन्हें अन्दर बुला लीजिए, कहीं फिर न चले जाऍं।
अम्मॉँ—यहॉँ उनका कौन बैठा हुआ
है, जो आयेगा। मैं तो अन्दर
कदम न रखने दूँगी।
अम्मॉँजी तो बिगड़ रही थी, उधर
छोटी ननदजी जाकर आनन्द बाबू को लायी। सचमुच उनका चेहरा उतरा हुआ था, जैसे महीनों का मरीज हो।
ननदजी उन्हें इस तरह खीचें लाती थी,
जैसे कोई
लड़की ससुराल जा रही हो। अम्मॉँजी ने मुस्काराकर
कहा—इसे यहॉँ क्यों लायीं? यहॉँ इसका कौन बैठा हुआ
है?
आनन्द सिर झुकाये अपराधियों की भॉँति खड़े थे। जबान न खुलती थी। अम्मॉँजी
ने फिर पूछा—चार दिन से कहॉँ थे?
‘कहीं नही, यहीं तो था।’
‘खूब चैन से रहे होगे।’
‘जी हॉँ, कोई तकलीफ न थी।’
‘वह तो सूरत ही से मालूम
हो रहा है।’
ननदजी जलपान के लिए मिठाई लायीं। आनन्द मिठाई खाते इस तरह झेंप रहे
थे मानों ससुराल आये हों,
फिर माताजी
उन्हें लिए अपने कमरे में चली गयीं। वहॉँ आध घंटे तक माता और पुत्र में बातें होती
रही। मैं कान लगाये हुए थी,
पर साफ कुछ
न सुनायी देता था। हॉँ,
ऐसा मालूम
होता था कि कभी माताजी रोती हैं और कभी आन्नद। माताजी जब पूजा करने निकलीं, तो उनकी आँखें
लाल थीं। आनन्द वहॉँ से निकले, तो
सीधे मेरे कमरे में आये। मैं उन्हें आते देख चटपट मुँह ढॉँपकर चारपाई पर रही, मानो बेखबर सो रही हूँ।
वह कमरे में आये,
मुझे चरपाई
पर पड़े देखा,
मेरे समीप
आकर एक बार धीरे पुकारा और लौट पड़े। मुझे जगाने की हिम्मत न पड़ी। मुझे जो कष्ट हो
रहा था, इसका एकमात्र कारण अपने
को समझकर वह मन-ही-मन दु:खी हो रहे थे। मैंने अनुमान किया था, वह मुझे उठायेंगे, मैं मान करूँगी, वह मनायेंगे, मगर सारे मंसूबे खाक में
मिल गए। उन्हें लौटते देखकर मुझसे न रहा गया। मैं हकबकाकर उठ बैठी और चारपाई से नीचे
उतरने लगी,
मगर न-जाने
क्यों, मेरे पैर लड़खड़ाये और
ऐसा जान पड़ा मैं गिरी जाती हूँ। सहसा आनन्द ने पीछे फिर कर मुझे संभाल लिया और बोले—लेट जाओ, लेट जाओ, मैं कुरसी पर बैठा जाता
हूँ। यह तुमने अपनी क्या गति बना रखी है?
मैंने अपने को सँभालकर कहा—मैं
तो बहुत अच्छी तरह हूँ। आपने कैसे कष्ट किया?
‘पहले तुम कुछ भोजन कर
लो, तो पीछे मैं कुछ बात करूँगा।’
‘मेरे भोजन की आपको क्या
फिक्र पड़ी है। आप तो सैर सपाटे कर रहे हैं !’
‘जैसे
सैर-सपाटे मैंने किये हैं,
मेरा दिल
जानता है। मगर बातें पीछे करूँगा,
अभी मुँह-हाथ
धोकर खा लो। चार दिन से पानी तक मुँह में नहीं डाला। राम ! राम !’
‘यह आपसे किसने कहा कि
मैंने चार दिन से पानी तक मुँह में नहीं डाला। जब आपको मेरी परवाह न थी, तो मैं क्यों दाना-पानी
छोड़ती?’
‘वह तो सूरत ही कहे देती
हैं। फूल से… मुरझा गये।’
‘जरा अपनी सूरत जाकर आईने
में देखिए।’
‘मैं पहले ही कौन बड़ा
सुन्दर था। ठूँठ को पानी मिले तो क्या और न मिले तो क्या। मैं न जानता था कि तुम यह
अनशन-व्रत ले लोगी,
नहीं तो
ईश्वर जानता है,
अम्मॉँ मार-मारकर
भगातीं, तो भी न जाता।’
मैंने तिरस्कार की दृष्टि से देखकर कहा—तो क्या सचमुच तुम समझे
थे कि मैं यहाँ केवल आराम के विचार से रह गयी?
आनन्द ने जल्दी से अपनी भूल सुधरी—नहीं, नहीं प्रिये, मैं इतना गधा नहीं हूँ, पर यह मैं कदापि न समझता
था कि तुम बिलकुल दाना-पानी छोड़ दोगी। बड़ी कुशल हुई कि मुझे महाराज मिल गया, नहीं तो तुम प्राण ही
दे देती। अब ऐसी भूल कभी न होगी। कान पकड़ता हूँ। अम्मॉँजी तुम्हारा बखान कर-करके रोती
रही।
मैंने प्रसन्न होकर कहा—तब तो मेरी तपस्या सफल हो गयी।
‘थोड़ा-सा दूध पी लो, तो बातें हों। जाने कितनी बातें करनी है।
‘पी लूँगी, ऐसी
क्या जल्दी है।’
‘जब तक तुम कुछ खा न लोगी, मैं यही समझूँगा कि तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया।’
‘मैं भोजन जभी करूँगी, जब तुम यह प्रतिज्ञा करो कि फिर कभी इस तरह रूठकर न जाओगे।’
‘मैं सच्चे दिल से यह प्रतिज्ञा करता हूँ।’
बहन, तीन दिन कष्ट तो हुआ, पर मुझे उसके लिए जरा भी पछतावा नहीं है। इन तीन दिनों के अनशन
ने दिलों मे जो सफाई कर दी, वह
किसी दूसरी विधि से कदापि न होती। अब मुझे विश्वास है कि हमारा जीवन शांति से व्यतीत
होगा। अपने समाचार शीघ्र, अति
शीघ्र लिखना।
तुम्हारी
चन्दा
13
दिल्ली
20-2-26
प्यारी बहन,
तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे तुम्हारे ऊपर दया आयी। तुम मुझे कितना ही
बुरा कहो,
पर मैं अपनी
यह दुर्गति किसी तरह न सह सकती,
किसी तरह
नहीं। मैंने या तो अपने प्राण ही दे दिये होते, या
फिर उस सास का मुँह न देखती। तुम्हारा सीधापन, तुम्हारी
सहनशीलता, तुम्हारी सास-भक्ति
तुम्हें मुबारक हो। मैं तो तुरन्त आनन्द के साथ चली जाती और चाहे भीख ही क्यों न माँगनी
पड़ती उस घर में कदम न रखती। मुझे तुम्हारे ऊपर दया ही नहीं आती, क्रोध भी आता है, इसलिए कि तुममें स्वाभिमान
नहीं है। तुम-जैसी स्त्रियों ने ही सासों और पुरूषों का मिजाज आसमान चढ़ा दिया है।
‘जहन्नुम में जाय ऐसा घर—जहॉँ अपनी इज्जत नहीं।’ मैं पति-प्रेम भी इन दामों
न लूँ। तुम्हें उन्नीसवी सदी में जन्म लेना चाहिए था। उस वक्त तुम्हारे गुणों की प्रशंसा
होती। इस स्वाधीनता और नारी-स्वत्व के नवयुग में तुम केवल प्राचीन इतिहास हो। यह सीता
और दमयन्ती का युग नहीं। पुरूषों ने बहुत दिनों तक राज्य किया। अब स्त्री-जाति का राज्य
होगा। मगर अब तुम्हें अधिक न कोसूँगी।
अब मेरा हाल सुनो। मैंने सोचा था, पत्रों
में अपनी बीमारी का समाचार छपवा दूँगी। लेकिन फिर ख्याल आया; यह समाचार छपते ही मित्रों
का तॉँता लग जायेगा। कोई मिजाज पूछने आयेगा। कोई देखने आयेगा। फिर मैं कोई रानी तो
हूँ नहीं,
जिसकी बिमारी
का बुलेटिन रोजाना छापा जाय। न जाने लोगों के दिल में कैसे-कैसे विचार उत्पन्न हों।
यह सोचकर मैंने पत्र में छपवाने का विचार छोड़ दिया। दिन-भर मेरे चित्त की क्या दशा
रही, लिख नहीं सकती। कभी मन
में आता, जहर खा लूँ, कभी सोचती, कहीं उड़ जाऊं। विनोद
के सम्बन्ध में भॉँति-भॉँति की शंकाऍं होने लगीं। अब मुझे ऐसी कितनी ही बातें याद आने
लगीं, जब मैंने विनोद के प्रति
उदासीनता का भाव दिखाया था। मैं उनसे सब कुछ लेना चाहती थी; देना कुछ न चाहती थी।
मैं चाहती थी कि वह आठों पहर भ्रमर की भॉँति मुझ पर मँडराते रहें, पतंग की भॉँति मुझे घेरे
रहें। उन्हें किताबो और पत्रों में मग्न बैठे देखकर मुझे झुँझलाहट होने लगती थी। मेरा
अधिकांश समय अपने ही बनाव-सिंगार में कटता था, उनके
विषय में मुझे कोई चिन्ता ही न होती थी। अब मुझे मालूम हुआ कि सेवा का महत्व रूप से
कहीं अधिक है। रूप मन को मुग्ध कर सकता है, पर
आत्मा को आनन्द पहुँचाने वाली कोई दूसरी ही वस्तु है।
इस तरह एक हफ्ता गुजर गया। मैं प्रात:काल मैके जाने की तैयारियाँ कर
रही थी—यह घर फाड़े खाता था—कि सहसा डाकिये ने मुझे
एक पत्र लाकर दिया। मेरा हृदय धक-धक करने लगा। मैंने कॉँपते हुए हाथों से पत्र लिया, पर सिरनामे पर विनोद की
परिचित हस्तलिपि न थी,
लिपि किसी
स्त्री की थी,
इसमें सन्देह
न था, पर मैं उससे सर्वथा अपरिचित
थी। मैंने तुरन्त पत्र खोला और नीचे की तरफ देखा तो चौंक पड़ी—वह कुसुम का पत्र था।
मैंने एक ही साँस में सारा पत्र पढ़ लिया। लिखा था—‘बहन, विनोद बाबू तीन दिन यहॉँ
रहकर बम्बई चले गये। शायद विलायत जाना चाहते हैं। तीन-चार दिन बम्बई रहेंगे। मैंने
बहुत चाहा तकि उन्हें दिल्ली वापस कर दूँ, पर
वह किसी तरह न राजी हुए। तुम उन्हें नीचे लिखे पते से तार दे दो। मैंने उनसे यह पता
पूछ लिया था। उन्होंने मुझे ताकीद कर दी थी कि इस पते को गुप्त रखना, लेकिन तुमसे क्या परदा।
तुम तुरन्त तार दे दो, शायद रूक जायॅ।
वह बात क्या हुई ! मुझसे विनोद ने तो बहुत पूछने पर भी नहीं बताया, पर वह दु:खी बहुत
थे। ऐसे आदमी को भी तुम अपना न बना सकी, इसका
मुझे आश्चर्य है;
पर मुझे
इसकी पहले ही शंका थी। रूप और गर्व में दीपक और प्रकाश का सम्बन्ध है। गर्व रूप का
प्रकाश है।’…
मैंने पत्र रख दिया और उसी वक्त विनोद के नाम तार भेज दिया कि बहुत
बीमार हूँ,
तुरन्त आओ।
मुझे आशा थी कि विनोद तार द्वारा जवाब देंगे, लेकिन
सारा दिन गुजर गया और कोई जवाब न आया। बँगले के सामने से कोई साइकिल निकलती, तो मैं तुरन्त उसकी ओर
ताकने लगती थीं कि शायद तार का चपरासी हो। रात को भी मैं तार का इन्तजार करती रही।
तब मैंने अपने मन को इस विचार से शांत किया कि विनोद आ रहे हैं, इसलिए तार भेजने की जरूरत
न समझी।
अब मेरे मन में फिर शकाएँ उठने लगी। विनोद कुसुम के पास क्यों गये, कहीं कुसुम से उन्हें
प्रेम तो नहीं हैं?
कहीं उसी
प्रेम के कारण तो वह मुझसे विरक्त नहीं हो गये? कुसुम
कोई कौशल तो नहीं कर रही हैं?
उसे विनोद
को अपने घर ठहराने का अधिकार ही क्या था?
इस विचार से मेरा मन बहुत क्षुब्ध हो उठा। कुसुम पर क्रोध आने लगा।
अवश्य दोनों में बहुत दिनों से पत्र-व्यवहार होता रहा होगा। मैंने फिर कुसुम का पत्र
पढ़ा और अबकी उसके प्रत्येक शब्द में मेरे लिए कुछ सोचने की सामग्री रखी हुई थी। निश्चय
किया कि कुसुम को एक पत्र लिखकर खूब कोसूँ। आधा पत्र लिख भी डाला, पर उसे फाड़ डाला। उसी
वक्त विनोद को एक पत्र लिखा। तुमसे कभी भेंट होगी, तो
वह पत्र दिखलाऊँगी;
जो कुछ मुँह
में आया बक डाला। लेकिन इस पत्र की भी वही दशा हुई जो कुसुम के पत्र की हुई थी। लिखने
के बाद मालूम हुआ कि वह किसी विक्षप्त हृदय की बकवाद है। मेरे मन में यही बात बैठती
जाती थी वह कुसुम के पास हैं। वही छलिनी उन पर अपना जादू चला रही है। यह दिन भी बीत
गया। डाकिया कई बार आया,
पर मैंने
उसकी ओर ऑंख भी नहीं उठायी। चन्दा,
मैं नहीं
कह सकती, मेरा हृदय कितना तिलतमिला
रहा था। अगर कुसुम इस समय मुझे मिल जाती, तो
मैं न-जाने क्या कर डालती।
रात को लेटे-लेटे ख्याल आया, कहीं
वह यूरोप न चले गये हों। जी बैचेन हो उठा। सिर में ऐसा चक्कर आने लगा, मानों पानी में डूबी जाती
हूँ। अगर वह यूरोप चले गये,
तो फिर कोई
आशा नहीं—मैं उसी वक्त उठी और घड़ी
पर नजर डाली। दो बजे थे। नौकर को जगाया और तार-घर जा पहुँची। बाबूजी कुरसी पर लेटे-लेटे
सो रहे थे। बड़ी मुश्किल से उनकी नींद खुली। मैंने रसीदी तार दिया। जब बाबूजी तार दे
चुके, तो मैंने पूछा— इसका जवाब कब तक आयेगा?
बाबू ने कहा—यह प्रश्न किसी ज्योतिषी
से कीजिए। कौन जानता है,
वह कब जवाब
दें। तार का चपरासी जबरदस्ती तो उनसे जवाब नहीं लिखा सकता। अगर कोई और कारण न हो, तो आठ-नौ बजे तक जवाब
आ जाना चाहिए।
घबराहट में आदमी की बुद्धि पलायन कर जाती है। ऐसा निरर्थक प्रश्न करके
मैं स्वयं लज्जित हो गयी। बाबूजी ने अपने मन में मुझे कितना मूर्ख समझा होगा; खैर, मैं वहीं एक बेंच पर बैठ
गयी और तुम्हें विश्वास न आयेगा,
नौ बजे तक
वहीं बैठी रही। सोचो,
कितने घंटे
हुए? पूरे सात घंटे। सैकड़ों
आदमी आये और गये,
पर मैं वहीं
जमी बैठी रही। जब तार का डमी खटकता,
मेरे हृदय
में धड़कन होने लगती। लेकिन इस भय से कि बाबूजी झल्ला न उठें, कुछ पूछने का साहस
न करती थीं। जब दफ्तर की घड़ी में नौ बजे, तो
मैंने डरते-डरते बाबू से पूछा—क्या अभी तक जवाब नहीं
आया।
बाबू ने कहा—
आप तो यहीं
बैठी हैं,
जवाब आता
तो क्या मैं खा डालता?
मैंने बेहयाई
करके फिर पूछा—तो क्या अब न आवेगा? बाबू ने मुँह फेरकर कहा—और—दो-चार घंटे बैठी रहिए।
बहन,
यह वाग्बाण
शर के समान हृदय में लगा। आँखे भर आयीं। लेकिन फिर मैं वह टली नहीं। अब भी आशा बँधी
हुई थी कि शायद जवाब आता हो। जब दो घंटे और गुजर गये, तब मैं निराश हो गयी।
हाय ! विनोद ने मुझे कहीं का न रखा। मैं घर चली, तो
ऑंखें से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी। रास्ता न सूझता था।
सहसा पीछे से एक मोटर का हार्न सुनायी दिया। मैं रास्ते से हट गयी।
उस वक्त मन में आया,
इसी मोटर
के नीचे लेट जॉँऊ और जीवन का अन्त कर दूँ। मैंने ऑंखे पोंछकर मोटर की ओर देखा, भुवन बैठा हुआ था और उसकी
बगल में बैठी थी कुसुम ! ऐसा जान पड़ा,
अग्नि की ज्वाला मेरे पैरों से समाकर सिर से निकल गयी। मैं उन दोनों
की निगाहों से बचना चाहती थी, लेकिन
मोटर रूक गयी और कुसुम उतर कर मेरे गले से लिपट गयी। भुवन चुपचाप मोटर में बैठा रहा, मानो मुझे जानता ही नहीं।
निर्दयी, धूर्त !
कुसुम ने पूछा—मैं तो तुम्हारे पास जाती
थी, बहन? वहॉँ से कोई खबर आयी? मैंने बात टालने के लिए
कहा—तुम कब आयीं?
भुवन के सामने मैं अपनी विपत्ति-कथा न कहना चाहती थी।
कुसुम—आओ, कार में बैठ जाओ।
‘नहीं, मैं चली जाउँगी।
अवकाश मिले,
तो एक बार
चली आना।’
कुसुम ने मुझसे आग्रह न किया। कार में बैठकर चल दी। मैं खड़ी ताकती
रह गयी ! यह वही कुसुम है या कोई और? कितना
बड़ा अन्तर हो गया है?
मैं घर चली,
तो सोचने
लगी—भुवन से इसकी जान-पहचान, कैसे हुई? कहीं ऐसा तो नहीं है कि
विनोद ने इसे मेरी टोह लेने को भेजा हो ! भुवन से मेरे विषय में कुछ पूछने तो नहीं
आयी हैं?
मैं घर पहुँचकर बैठी ही थी कि कुसुम आ पहुँची। अब की वह मोटर में अकेली
न थी—विनोद बैठे हुए थे। मैं
उन्हे देखकर ठिठक गयी ! चाहिए तो यह था कि मैं दौड़कर उनका हाथ पकड़ लेती और मोटर से
अतार लाती,
लेकिन मैं
जगह से हिली तक नहीं। मूर्ति की भाँति अचल बैठी रही। मेरी मानिनी प्रकृति आपना उद्दण्ड-स्वरूप दिखाने के लिए विकल हो उठी। एक क्षण में कुसुम ने
विनोद को उतारा और उनका हाथ पकड़े हुये ले आयी। उस वक्त मैंने देखा कि विनोद का मुख
बिलकुल पीला पड़ गया है और वह इतने अशक्त हो गये हैं कि अपने सहारे खड़े भी नहीं रह
सकते, मैंने घबराकर पूछा, क्यों तुम्हारा यह क्या
हाल है?
कुसुम ने कहा—हाल पीछे पूछना, जरा इनकी चौपाई चटपट बिछा
दो और थोडा-सा दूध मँगवा लो।
मैंने तुरन्त चारपाई बिछायी और विनोद को उस पर लेटा दिया। और दूध तो
रखा हुआ था। कुसुम इस वक्त मेरी स्वामिनी बनी हुई थी। मैं उसके इशारे पर नाच रही थी।
चन्दा, इस वक्त मुझे ज्ञात हुआ
कि कुसुम पर विनोद को जितना विश्वास है, वह
मुझ पर नहीं। मैं इस योग्य हूँ ही नहीं। मेरा दिल सैकड़ों प्रश्न पूछने के लिए तड़फड़ा रहा था, लेकिन कुसुम एक पल के
लिए भी विनोद के पास से ने टलती थी। मैं इतनी मूर्ख हूँ कि अवसर पाने पर इस दशा में
भी मैं विनोद से प्रश्नों का तॉँता बॉँध देती।
विनोद को जब नींद आ गयी, मैंने
ऑंखो में ऑंसू भरकर कुसुम से पूछा—बहन, इन्हें क्या शिकायत है? मैंने तार भेजा। उसका
जवाब नहीं आया। रात दो बजे एक जरुरी और जवाबी तार भेजा। दस बजे तक तार-घर बैठी जवाब
की राह देखती रही। वहीं से लौट रही थी, जब
तुम रास्ते में मिली। यह तुम्हे कहॉँ मिल गये?
कुसुम मेरा हाथ पकड़कर दूसरे कमरे में ले गयी और बोली—पहले तुम यह बताओं कि
भुवन का क्या मुआमला था?
देखो, साफ, कहना।
मैंने आपत्ति करते हुए कहा—कुसुम, तुम यह प्रश्न पूछकर मेरे
साथ अन्याय कर रही हो। तुम्हें खुद समझ लेना चाहिए था कि इस बात में कोई सार नहीं है
! विनोद को केवल भ्रम हो गया।
‘बिना किसी कारण के?’
‘हॉँ, मेरी समझ में तो
कोई कारण न था।’
‘मैं इसे नहीं मानती। यह
क्यों नहीं कहतीं कि विनोद को जलाने, चिढाने
और जगाने के लिए तुमने यह स्वॉँग रचा था।’
कुसुम की सूझ पर चकित होकर मैंने कहा—वह तो केवल दिल्लगी थी।
‘तुम्हारे लिए दिल्लगी
थी, विनोद के लिए वज्रपात
था। तुमने इतने दिनों उनके साथ रहकर भी उन्हें नहीं समझा ! तुम्हें अपने बनाव-सँवार
के आगे उन्हें समझने की कहॉँ फुरसत ? कदाचित्
तुम समझती हो कि तुम्हारी यह मोहनी मूर्ति ही सब कुछ है। मैं कहती हूँ, इसका मूल्य दो-चार महीने
के लिए हो सकता है। स्थायी वस्तु कुछ और ही है।’
मैंने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा—विनोद को मुझसे कुछ पूछना
तो चाहिए था?
कुसुम ने हँसकर कहा—यही
तो वह नही कर सकते। तुमसे ऐसी बात पूछना उनके
लिए असम्भव है। वह उन प्राणियों में है, जो
स्त्री की ऑंखें से गिरकर जीते नहीं रह सकते। स्त्री या पुरूष किसी के लिए भी वह किसी
प्रकार का धार्मिक या नैतिक बन्धन नहीं रखना चाहते। वह प्रत्येक प्राणी के लिए पूर्ण
स्वाधीनता के समर्थक हैं। मन और इच्छा के सिवा वह कोई बंधन स्वीकार नहीं करते। इस विषय
पर मेरी उनसे खूब बातें हुई हैं। खैर—मेरा
पता उन्हें
मालूम था
ही, यहॉँ से सीधे मेरे पास
पहुँचे। मैं समझ गई कि आपस में पटी नहीं। मुझे तुम्हीं पर सन्देह हुआ।
मैंने पूछा—क्यों? मुझ पर तुम्हें क्यों
सन्देह हुआ?
‘इसलिए कि मैं तुम्हे पहले
देख चुकी थी।’
‘अब तो तुम्हें मुझ पर
सन्देह नहीं।’
‘नहीं, मगर इसका कारण
तुम्हारा संयम नहीं,
परम्परा
है। मैं इस समय स्पष्ट बातें कर रहीं हूं, इसके
लिए क्षमा करना।’
‘नहीं, विनोद से तुम्हें
जितना प्रेम है,
उससे अधिक
अपने-आपसे है। कम-से-कम दस दिन पहले यही बात थी। अन्यथा यह नौबत ही क्यों आती? विनोद यहॉँ से सीधे मेरे
पास गये और दो-तीन दिन रहकर बम्बई चले गये। मैंने बहुत पूछा, पर कुछ बतलाया नहीं। वहॉँ
उन्होंने एक दिन विष खा लिया।’
मेरे चेहरे का रंग उड़ गया।
‘बम्बई पहुँचते ही उन्होंने
मेरे पास एक खत लिखा था। उसमें यहॉँ की सारी बातें लिखी थीं और अन्त में लिखा था—मैं इस जीवन से तंग आ
गया हूँ, अब मेरे लिए मौत के सिवा
और कोई उपाय नहीं है।’
मैंने एक ठंडी साँस ली।
‘मैं यह पत्र पाकर घबरा
गयी और उसी वक्त बम्बई रवाना हो गयी। जब वहॉँ पहुँची, तो विनोद को मरणासन्न
पाया। जीवन की कोई आशा नहीं थी। मेरे एक सम्बन्धी वहॉँ डाक्टारी करते हैं। उन्हें लाकर
दिखाया तो वह बोले—इन्होंने जहर खा लिया
है। तुरन्त दवा दी गयी। तीन दिन तक डाक्टर साहब न दिन-को-दिन और रात-को-रात न समझा, और मैं तो एक क्षण के
लिए विनोद के पास से न हटी। बारे तीसरे दिन इनकी ऑंख खुली। तुम्हारा पहला तार मुझे
मिला था, पर उसका जवाब देने की
किसे फुरसत थी?
तीन दिन
और बम्बई रहना पड़ा। विनोद इतने कमजोर हो गये थे कि इतना लम्बा सफर करीनाउनके लिए असम्भव
था। चौथे दिन मैंने जब उनसे यहॉँ आने का प्रस्ताव किया, तो बोले—मैं अब वहॉँ न जाऊँगा।
जब मैंने बहुत समझाया,
तब इस शर्त
पर राजी हुए ताकि मैं पहले आकर यहॉँ की परिस्थिति देख जाऊं।’
मेरे मुँह से निकला—‘हा
! ईश्वर, मैं ऐसी अभागिनी हूँ।’
‘अभागिनी नहीं हो बहन, केवल तुमने विनोद को समझा
न था। वह चाहते थे कि मैं अकेली जाऊँ, पर
मैंने उन्हें इस दशा में वहॉ छोड़ना उचित न समझा। परसों हम दोनों वहॉँ चले।
यहॉँ पहुँचकर विनोद तो वेटिंग-रूम में ठहर गये, मैं
पता पूछती हुई भुवन के पास पहुँची। भुवन को मैंने इतना फटकारा कि वह रो पड़ा। उसने
मुझसे यहॉँ तक कह डाला कि तुमने उसे बुरी तरह दुत्कार दिया है। आँखों का बुरा आदमी
है, पर

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